New International Version

Romans 8:1-39

Life Through the Spirit

1Therefore, there is now no condemnation for those who are in Christ Jesus, 2because through Christ Jesus the law of the Spirit who gives life has set you8:2 The Greek is singular; some manuscripts me free from the law of sin and death. 3For what the law was powerless to do because it was weakened by the flesh,8:3 In contexts like this, the Greek word for flesh (sarx) refers to the sinful state of human beings, often presented as a power in opposition to the Spirit; also in verses 4-13. God did by sending his own Son in the likeness of sinful flesh to be a sin offering.8:3 Or flesh, for sin And so he condemned sin in the flesh, 4in order that the righteous requirement of the law might be fully met in us, who do not live according to the flesh but according to the Spirit.

5Those who live according to the flesh have their minds set on what the flesh desires; but those who live in accordance with the Spirit have their minds set on what the Spirit desires. 6The mind governed by the flesh is death, but the mind governed by the Spirit is life and peace. 7The mind governed by the flesh is hostile to God; it does not submit to God’s law, nor can it do so. 8Those who are in the realm of the flesh cannot please God.

9You, however, are not in the realm of the flesh but are in the realm of the Spirit, if indeed the Spirit of God lives in you. And if anyone does not have the Spirit of Christ, they do not belong to Christ. 10But if Christ is in you, then even though your body is subject to death because of sin, the Spirit gives life8:10 Or you, your body is dead because of sin, yet your spirit is alive because of righteousness. 11And if the Spirit of him who raised Jesus from the dead is living in you, he who raised Christ from the dead will also give life to your mortal bodies because of8:11 Some manuscripts bodies through his Spirit who lives in you.

12Therefore, brothers and sisters, we have an obligation—but it is not to the flesh, to live according to it. 13For if you live according to the flesh, you will die; but if by the Spirit you put to death the misdeeds of the body, you will live.

14For those who are led by the Spirit of God are the children of God. 15The Spirit you received does not make you slaves, so that you live in fear again; rather, the Spirit you received brought about your adoption to sonship.8:15 The Greek word for adoption to sonship is a term referring to the full legal standing of an adopted male heir in Roman culture; also in verse 23. And by him we cry, “Abba,8:15 Aramaic for father Father.” 16The Spirit himself testifies with our spirit that we are God’s children. 17Now if we are children, then we are heirs—heirs of God and co-heirs with Christ, if indeed we share in his sufferings in order that we may also share in his glory.

Present Suffering and Future Glory

18I consider that our present sufferings are not worth comparing with the glory that will be revealed in us. 19For the creation waits in eager expectation for the children of God to be revealed. 20For the creation was subjected to frustration, not by its own choice, but by the will of the one who subjected it, in hope 21that8:20,21 Or subjected it in hope. 21 For the creation itself will be liberated from its bondage to decay and brought into the freedom and glory of the children of God.

22We know that the whole creation has been groaning as in the pains of childbirth right up to the present time. 23Not only so, but we ourselves, who have the firstfruits of the Spirit, groan inwardly as we wait eagerly for our adoption to sonship, the redemption of our bodies. 24For in this hope we were saved. But hope that is seen is no hope at all. Who hopes for what they already have? 25But if we hope for what we do not yet have, we wait for it patiently.

26In the same way, the Spirit helps us in our weakness. We do not know what we ought to pray for, but the Spirit himself intercedes for us through wordless groans. 27And he who searches our hearts knows the mind of the Spirit, because the Spirit intercedes for God’s people in accordance with the will of God.

28And we know that in all things God works for the good of those who love him, who8:28 Or that all things work together for good to those who love God, who; or that in all things God works together with those who love him to bring about what is good—with those who have been called according to his purpose. 29For those God foreknew he also predestined to be conformed to the image of his Son, that he might be the firstborn among many brothers and sisters. 30And those he predestined, he also called; those he called, he also justified; those he justified, he also glorified.

More Than Conquerors

31What, then, shall we say in response to these things? If God is for us, who can be against us? 32He who did not spare his own Son, but gave him up for us all—how will he not also, along with him, graciously give us all things? 33Who will bring any charge against those whom God has chosen? It is God who justifies. 34Who then is the one who condemns? No one. Christ Jesus who died—more than that, who was raised to life—is at the right hand of God and is also interceding for us. 35Who shall separate us from the love of Christ? Shall trouble or hardship or persecution or famine or nakedness or danger or sword? 36As it is written:

“For your sake we face death all day long;

we are considered as sheep to be slaughtered.”8:36 Psalm 44:22

37No, in all these things we are more than conquerors through him who loved us. 38For I am convinced that neither death nor life, neither angels nor demons,8:38 Or nor heavenly rulers neither the present nor the future, nor any powers, 39neither height nor depth, nor anything else in all creation, will be able to separate us from the love of God that is in Christ Jesus our Lord.

New Chhattisgarhi Translation (नवां नियम छत्तीसगढ़ी)

रोमीमन 8:1-39

पबितर आतमा के जरिये जिनगी

1एकरसेति, अब जऊन मन मसीह यीसू के अंय, ओमन बर दंड के हुकूम नइं होवय। 2काबरकि, जिनगी देवइया पबितर आतमा के कानून ह मसीह यीसू के दुवारा मोला, पाप अऊ मिरतू के कानून ले सुतंतर कर दे हवय। 3काबरकि जऊन बुता ला मूसा के कानून ह हमर पापी सुभाव के कारन कमजोर होके नइं कर सकिस; ओ बुता ला परमेसर ह अपन खुद के बेटा ला पठोके करिस, जऊन ह पापी मनखे के रूप म संसार म आईस अऊ अपन-आप ला हमर खातिर पाप बलि के रूप म चघाईस। अऊ ए किसम ले परमेसर ह पापी मनखे म पाप ला सजा दीस, 4ताकि मूसा के कानून के धरमीपन के मांग ह हमन म पूरा होवय, जऊन मन पापी सुभाव के मुताबिक नइं, पर पबितर आतमा के मुताबिक जिनगी बिताथन।

5जऊन मन सारीरिक ईछा के मुताबिक जिनगी बिताथें, ओमन ह सरीर के बात म अपन चित लगाथें, पर जऊन मन पबितर आतमा के मुताबिक चलथें, ओमन पबितर आतमा के बात म चित लगाथें। 6सरीर के ऊपर चित लगई ह मिरतू अय, पर पबितर आतमा के ऊपर चित लगई ह हमन ला जिनगी अऊ सांति देथे, 7काबरकि जऊन ह सरीर के बात म चित लगाथे, ओह परमेसर ले बईरता रखथे। ओह परमेसर के कानून ला नइं मानय; वास्तव म ओह अइसने कर ही नइं सकय। 8जऊन मन अपन सरीर के बात ला मानथें, ओमन परमेसर ला खुस नइं कर सकंय।

9पर यदि परमेसर के आतमा ह तुमन म बसथे, त तुमन पबितर आतमा के चलाय चलथव, अपन सरीर के चलाय नइं। अऊ यदि काकरो करा मसीह के आतमा नइं ए, त ओह मसीह के नो हय। 10पर यदि मसीह तुम्‍हर जिनगी म हवय, त तुम्‍हर सरीर ह पाप के कारन मर गे हवय, पर तुम्‍हर आतमा ह धरमीपन के कारन जीयत हवय। 11परमेसर जऊन ह यीसू ला मरे म ले जियाईस, यदि ओकर आतमा तुमन म रहिथे, त ओ जऊन ह मसीह ला मरे म ले जियाईस, ओह तुम्‍हर नासमान सरीर ला घलो अपन आतमा के दुवारा जिनगी दिही अऊ ए आतमा ह तुमन म बसे हवय।

12एकरसेति, हे भाईमन हो! हमर बर ए जरूरी अय कि हमन अपन सरीर के सुभाव के मुताबिक जिनगी झन बितावन। 13काबरकि यदि तुमन सरीर के सुभाव के मुताबिक जिनगी बिताथव, त मरहू, पर यदि पबितर आतमा के दुवारा तुमन सरीर के काममन ला मारथव, त तुमन जीयत रहिहू। 14जऊन मन परमेसर के आतमा के अगुवई म चलथें, ओमन परमेसर के संतान अंय। 15काबरकि तुमन ला गुलामी के आतमा नइं मिले हवय कि तुमन फेर डर म पड़व; पर तुमन ला पबितर आतमा मिले हवय, जऊन ह तुमन ला परमेसर के संतान बनाथे। अऊ ओकरे दुवारा हमन परमेसर ला ए कहिके पुकारथन, “हे अब्बा, हे ददा!” 16पबितर आतमा ह खुद हमर आतमा के संग गवाही देथे कि हमन परमेसर के संतान अन। 17अऊ यदि हमन परमेसर के संतान अन, त हमन परमेसर के वारिस अऊ मसीह के संगी वारिस अन; यदि हमन ओकर दुःख म भागी होथन, त ओकर महिमा म घलो भागी होबो।

भविस्य के महिमा

18मेंह ए समझथंव कि जऊन महिमा हमर ऊपर परगट होही, ओकर तुलना म, हमर अभी के दुःख ह कुछू नो हय। 19ए सिरिस्टी ह बड़े आसा भरे नजर ले परमेसर के बेटामन (संतानमन) के परगट होय के बाट जोहथे। 20काबरकि ए सिरिस्टी ला बेकार कर दिये गीस, अऊ एह एकर खुद के ईछा ले नइं, पर परमेसर के ईछा ले ए आसा म करे गीस, 21कि सिरिस्टी ह खुद बिनास के अपन गुलामी ले छुटकारा पावय अऊ परमेसर के लइकामन के महिमा के सुतंतरता के भागीदार होवय।

22हमन जानथन कि जम्मो सिरिस्टी ह अभी तक ले छुवारी होय के पीरा सहीं कल्हरत हवय। 23अऊ सिरिप सिरिस्टी ही नइं, पर हमन करा पबितर आतमा के पहिली फर हवय अऊ हमन खुदे भीतरे-भीतर कल्हरत हवन, अऊ ए बात के बाट जोहथन कि परमेसर ह हमन ला अपन बेटा के रूप म गोद लिही, याने कि हमन ला हमर सरीर ले छुटकारा दिही। 24काबरकि ए आसा म हमर उद्धार होय हवय, पर जऊन चीज के हमन आसा करथन, यदि ओह हमन ला दिख जावय, त ओ आसा के अंत हो जाथे। कोनो मनखे कोनो अइसने चीज के आसा नइं करय, जऊन ह पहिली ले ओकर करा हवय। 25पर यदि हमन ओ चीज के आसा करथन, जऊन ह हमर करा नइं ए, त हमन धीर धरके ओकर बर बाट जोहथन।

26ओही किसम ले, पबितर आतमा ह हमर दुरबलता म हमर मदद करथे। हमन नइं जानन कि हमन ला कइसने पराथना करना चाही, पर पबितर आतमा ह खुद अइसने कल्‍हर-कल्‍हर के बिनती करथे, जेकर बयान नइं करे जा सकय। 27अऊ जऊन ह (परमेसर) मनखेमन के हिरदय ला जांचथे, ओह जानथे कि पबितर आतमा के का मनसा हवय, काबरकि पबितर आतमा ह परमेसर के मनसा के मुताबिक पबितर मनखेमन बर बिनती करथे।

28हमन जानथन कि जऊन मन परमेसर ले मया करथें अऊ ओकर ईछा के मुताबिक बलाय गे हवंय, ओमन बर परमेसर ह जम्मो बात म भलई पैदा करथे। 29काबरकि जऊन मन ला परमेसर ह पहिली ले जानत हवय, ओमन ला ओह चुने घलो हवय कि ओमन ओकर बेटा के सरूप म होवंय अऊ ओकर बेटा ह बहुंते भाईमन म पहिलांत ठहिरय। 30अऊ जऊन मन ला ओह चुन लीस, ओमन ला ओह बलाईस घलो; अऊ जऊन मन ला ओह बलाईस, ओमन ला धरमी घलो ठहराईस; अऊ जऊन मन ला ओह धरमी ठहराईस, ओमन के महिमा घलो करिस।

31तब एकर बारे म हमन का कहन? यदि परमेसर ह हमर संग हवय, त हमर बिरोधी कोन हो सकथे? 32जऊन ह अपन खुद के बेटा ला घलो नइं रख छोंड़िस, पर हमन जम्मो के खातिर ओला दे दीस; त ओह हमन ला अपन बेटा संग अऊ जम्मो चीज काबर नइं दिही? 33ओमन ऊपर कोन दोस लगाही, जऊन मन ला परमेसर ह चुने हवय? एह परमेसर अय, जऊन ह ओमन ला धरमी ठहिराथे। 34ओह कोन ए, जऊन ह सजा देथे? एह मसीह यीसू अय, जऊन ह मर गीस अऊ मरे म ले जी उठिस अऊ ओह परमेसर के जेवनी हांथ कोति हवय, अऊ हमर बर बिनती घलो करत हवय। 35तब कोन ह हमन ला मसीह के मया ले अलग कर सकथे? का संकट या बिपत्ती या सतावा या अकाल या गरीबी या जोखिम या तलवार के भय? 36जइसने कि परमेसर के बचन म लिखे हवय:

“तोर बर, हमन दिन भर मिरतू के जोखिम म रहिथन, हमन ओ भेड़ सहीं समझे जाथन,

जऊन मन के बध होवइया हवय।”8:36 भजन-संहिता 44:22

37ए जम्मो चीज म, हमन मसीह यीसू के जरिये बिजयी होथन, जऊन ह हमर ले मया करिस। 38काबरकि मोला पूरा भरोसा हवय कि न तो मिरतू न जिनगी, न स्वरगदूतमन, न परेत आतमामन, न तो बर्तमान न भविस्य, न कोनो सक्ति, 39न तो ऊंचई न गहिरई अऊ न जम्मो सिरिस्टी म कोनो आने चीज हमन ला परमेसर के मया ले अलग कर सकथे, जऊन ह हमर परभू मसीह यीसू म हवय।