New International Reader's Version

Obadiah 1:1-21

Obadiah’s Vision

1This is the vision about Edom that Obadiah had.

Here is what the Lord and King says about Edom.

We’ve heard a message from the Lord.

A messenger was sent to the nations.

The Lord told him to say,

“Get up! Let us go and make war against Edom.”

2The Lord says to Edom,

“I will make you weak among the nations.

They will look down on you.

3You live in the safety of the rocks.

You make your home high up in the mountains.

But your proud heart has tricked you.

So you say to yourself,

‘No one can bring me down to the ground.’

4You have built your home as high as an eagle does.

You have made your nest among the stars.

But I will bring you down from there,”

announces the Lord.

5“Edom, suppose robbers came to you at night.

They would steal only as much as they wanted.

Suppose grape pickers came to harvest your vines.

They would still leave a few grapes.

But you are facing horrible trouble!

6People of Esau, everything will be taken away from you.

Your hidden treasures will be stolen.

7All those who are helping you

will force you to leave your country.

Your friends will trick you and overpower you.

Those who eat bread with you

will set a trap for you.

But you will not see it.”

8Here is what the Lord announces. “At that time

I will destroy the wise men of Edom.

I will wipe out the men of understanding

in the mountains of Esau.

9People of Teman, your soldiers will be terrified.

Everyone in Esau’s mountains

will be cut down by swords.

10You did harmful things to the people of Jacob.

They are your relatives.

So you will be covered with shame.

You will be destroyed forever.

11Outsiders entered the gates of Jerusalem.

They cast lots to see what each one would get.

Strangers carried off its wealth.

When that happened, you just stood there and did nothing.

You were like one of them.

12That was a time of trouble for your relatives.

So you shouldn’t have been happy about what happened to them.

The people of Judah were destroyed.

So you should not have been happy about it.

You should not have laughed at them so much

when they were in trouble.

13You should not have marched

through the gates of my people’s city

when they were in trouble.

You shouldn’t have been happy about what happened to them.

You should not have stolen their wealth

when they were in trouble.

14You waited where the roads cross.

You wanted to cut down those who were running away.

You should not have done that.

You handed over to their enemies

those who were still left alive.

You should not have done that.

They were in trouble.

15“The day of the Lord is near

for all the nations.

Others will do to you

what you have done to them.

You will be paid back

for what you have done.

16You Edomites made my holy mountain of Zion impure

by drinking and celebrating there.

So all the nations will drink

from the cup of my anger.

And they will keep on drinking from it.

They will vanish.

It will be as if they had never existed.

17But on Mount Zion some of my people will be left alive.

I will save them.

Zion will be my holy mountain once again.

And the people of Jacob

will again receive the land as their own.

18They will be like a fire.

Joseph’s people will be like a flame.

The nation of Edom will be like straw.

Jacob’s people will set Edom on fire and burn it up.

No one will be left alive

among Esau’s people.”

The Lord has spoken.

19Israelites from the Negev Desert

will take over Esau’s mountains.

Israelites from the western hills

will possess the land of the Philistines.

They’ll take over the territories

of Ephraim and Samaria.

Israelites from the tribe of Benjamin

will possess the land of Gilead.

20Some Israelites were forced to leave their homes.

They’ll come back to Canaan and possess

it all the way to the town of Zarephath.

Some people from Jerusalem were taken

to the city of Sepharad.

They’ll return and possess

the towns of the Negev Desert.

21Leaders from Mount Zion will go

and rule over the mountains of Esau.

And the kingdom will belong to the Lord.

Hindi Contemporary Version

ओबदयाह 1:1-21

ओबदयाह का दर्शन

1ओबदिया द्वारा देखा गया दर्शन.

एदोम के विषय में परमेश्वर याहवेह का यह संदेश है,

हमने याहवेह से यह समाचार सुना है:

समस्त राष्ट्रों को संदेश देने के लिए एक दूत भेजा गया था,

“उठो, हम युद्ध के लिए उस पर आक्रमण करे.”

2“देखो, मैं तुम्हें राष्ट्रों के समक्ष छोटा बना दूंगा;

तुम अत्यंत घृणित हो जाओगे.

3तुम्हारे हृदय के अहंकार ने ही तुम्हें धोखा दिया है,

तुम, जो चट्टान के निकले भाग पर निवास करते हो

और अपना घर ऊंचाई पर बनाते हो,

तुम जो अपने आप से कहते हो,

‘किसमें दम है, जो मुझे नीचे भूमि पर ला सके?’

4यद्यपि तुम गिद्ध के सदृश ऊंचाइयों पर उड़ते रहते हो,

और अपना घोंसला मानो तारों के मध्य में बनाते हो,

मैं तुम्हें वहां से नीचे ले आऊंगा,”

यह याहवेह की घोषणा है.

5यदि चोर तुम्हारे पास आएं,

यदि रात्रि में डाकू आएं,

क्या वे उतना ही विनाश न करेंगे

जितना उनके लिए पर्याप्त होगा?

यदि द्राक्षा तोड़नेवाले तुम्हारे निकट आएं,

क्या वे अंगूर न छोड़ेंगे?

6पर एसाव की कैसी लूटमार होगी,

कैसे उसके छिपाये खजाने को खोज निकाली गई!

7तुम्हारे ही समस्त मित्र राष्ट्रों तुम्हें तुम्हारी सीमा तक खदेड़ देंगे;

तुम्हारे मित्र धोखा देकर तुम्हें अपने अधिकार में कर लेंगे;

जो तुम्हारी रोटी खाते हैं, वे ही तुम्हारे लिये जाल बिछायेंगे,

पर तुम्हें इसका पता भी नहीं चलेगा.

8याहवेह घोषणा कर रहे हैं,

“क्या मैं उस दिन” एदोम के बुद्धिमानों को,

एसाव पर्वत में से समझदारों को नष्ट न करूंगा?

9तुम्हारे योद्धा, तेमान, भयभीत होंगे,

और एसाव के पर्वतों पर

हर एक मनुष्य का संहार किया जाएगा.

याकोब पर एसाव की हिंसा

10“तुमने भाई याकोब पर हिंसा के कारण,

तुम्हें लज्जित होना पड़ेगा;

और तुम हमेशा के लिये नाश हो जाओगे.

11उस दिन तुम दूर खड़े हुए सब देखते रहे

और विदेशियों ने नगर में प्रवेश किया,

वे उसकी संपत्ति लूटकर ले जाते रहे

और उन्होंने येरूशलेम को हड़पने के लिए मतपत्रों का प्रयोग किया,

तुम उनमें से एक के जैसे थे.

12तुम अपने भाई की दुर्दशा के दिनों में

उसके ऊपर आनंद मत मनाना,

न ही यहूदिया प्रदेश के निवासियों पर,

उनके विनाश के दिन में आनंद मनाना,

और न ही उनके संकट के दिन में

ज्यादा घमंड करना.

13मेरी प्रजा की संकट की स्थिति में

उनके नगर में प्रवेश न करना,

न ही उनकी विपत्ति में

तुम उनको देखते रहना,

और न ही उनकी विपत्ति के अवसर पर

तुम उनकी संपत्ति पर कब्जा करना.

14तुम सड़क के चौक पर

उनके भागनेवालों को मार डालने के लिये खड़े मत होना,

न ही उनके संकट के समय में

उनके बच गये लोगों को शत्रु के हाथों में सौंपना.

15“सारे देशों के लिए

निर्धारित याहवेह का दिन निकट है.

जैसा तुमने किया है, ठीक वैसा ही तुम्हारे साथ भी किया जाएगा;

तुम्हारे द्वारा किए गए बुरे काम तुम्हारे ही सिर पर आ पड़ेंगे.

16ठीक जिस प्रकार तुमने मेरे पवित्र पर्वत पर वह प्याला पिया है,

उसी प्रकार सारे देश निरंतर वह प्याला पीते रहेंगे;

वे पीएंगे और पीएंगे

और ऐसे हो जायेंगे, जैसे वे कभी न थे.

17किंतु बचकर निकले लोग ज़ियोन पर्वत पर रहेंगे;

वह पवित्र होगा,

और याकोब के वंशज अपनी संपत्ति पर फिर अधिकार करेंगे.

18याकोब का वंश आग के समान

और योसेफ़ का वंश ज्वाला के समान होगा;

एसाव का वंश बचे हुए भूंसे के समान होगा,

और वे उन्हें जलाकर नाश कर देंगे.

एसाव के वंश में से

कोई भी न बचेगा.”

क्योंकि यह याहवेह ने कहा है.

19एसाव पर्वत पर

नेगेव के निवासियों का अधिकार हो जाएगा,

और फिलिस्तीन देश पर

नीचे के देश के लोग अधिकार कर लेंगे.

वे एफ्राईम तथा शमरिया पर के खेतों पर अधिकार कर लेंगे,

और बिन्यामिन गिलआद पर अधिकार करेगा.

20बंधुआ इस्राएलियों का यह दल, जो कनान में है

वह कनानियों के ज़ारेपथ देश तक अपने अधिकार में कर लेगा;

येरूशलेम के बंधुआ, जो सेफहारथ नगर में हैं,

वे नेगेव के नगरों को अपने अधिकार में कर लेंगे.

21छुड़ानेवाले एसाव पर्वत पर शासन करने के लिये

ज़ियोन पर्वत पर चढ़ आऐंगे.

और राज्य याहवेह का हो जाएगा.