New Chhattisgarhi Translation (नवां नियम छत्तीसगढ़ी)

लूका 1:1-80

1मयारू थियुफिलुस! बहुंत झन ओ घटना के बारे म लिखे बर मदद करे हवंय जऊन ह हमर बीच म घटे हवय। 2ओमन सुरू ले ए घटनामन ला अपन आंखी ले देखे रिहिन अऊ ओमन परमेसर के बचन के सेवक रिहिन। ओमन ए घटनामन ला लिखके हमन ला सऊंप दीन। 3एकरसेति, मेंह खुद सुरू ले हर एक बात ला धियान से जांच परताल करेंव अऊ मोला ए बने लगिस कि मेंह लाइन से ए बातमन ला तोर बर घलो लिखंव, 4ताकि तेंह ओ बातमन के सच्‍चई ला जान सकस जेकर सिकछा तोला मिले हवय।

यूहन्ना बतिसमा देवइया के जनम के बारे म अगमबानी

5यहूदिया प्रदेस के राजा हेरोदेस के समय म एक पुरोहित रिहिस, जेकर नांव जकरयाह रिहिस; ओह अबियाह के पुरोहिती दल के रिहिस; ओकर घरवाली घलो हारून के बंस के रिहिस जेकर नांव इलीसिबा रिहिस। 6ओ दूनों झन परमेसर के नजर म धरमी रिहिन, अऊ ओमन परभू के जम्मो हुकूम अऊ नियम मन ला साफ मन ले मानत रिहिन। 7पर ओमन के कोनो लइका नइं रिहिस, काबरकि इलीसिबा ह बांझ रिहिस अऊ ओ दूनों डोकरा-डोकरी हो गे रिहिन।

8एक बार जब जकरयाह ह अपन दल के पारी म परमेसर के आघू म पुरोहित के काम करत रिहिस। 9तब पुरोहितमन के रीति के मुताबिक चिट्ठी निकारे गीस अऊ चिट्ठी ह ओकर नांव म निकरिस कि ओह परभू के मंदिर म जाके धूप जलावय। 10अऊ धूप जलाय के समय म, मनखेमन के जम्मो भीड़ ह बाहिर म पराथना करत रहय।

11तब उहां परभू के एक स्‍वरगदूत ह ओकर करा परगट होईस अऊ ओ स्‍वरगदूत ह धूप के बेदी के जेवनी कोति ठाढ़े रहय। 12जकरयाह ह ओला देखके घबरा गीस अऊ ओह डर्रा गीस। 13पर स्‍वरगदूत ह ओला कहिस, “हे जकरयाह, झन डर! तोर पराथना ह सुने गे हवय। तोर घरवाली इलीसिबा तोर बर एक बेटा जनमही, अऊ तें ओकर नांव यूहन्ना रखबे। 14अऊ तोला आनंद अऊ खुसी होही, अऊ बहुंत झन ओकर जनम के खातिर आनंद मनाहीं, 15काबरकि ओह परभू के नजर म एक महान मनखे होही। ओह अंगूर के मंद या आने किसम के मंद कभू नइं पीही, अऊ ओह अपन दाई के पेट ले ही पबितर आतमा ले भरे होही। 16इसरायली मनखेमन ले बहुंते झन ला, ओह ओमन के परभू परमेसर करा लहुंटाके लानही। 17अऊ ओह अगमजानी एलियाह के आतमा अऊ सामरथ म, परभू के आघू-आघू चलही ताकि ओह ददामन के हिरदय ला ओमन के लइकामन कोति करय अऊ हुकूम नइं मनइयामन ला धरमी जन के बुद्धि कोति करय, अऊ ए किसम ले ओह परभू खातिर एक काबिल परजा तियार करय।”

18जकरयाह ह स्‍वरगदूत ले पुछिस, “मेंह एला कइसने मान लेवंव? काबरकि मेंह एक डोकरा मनखे अंव अऊ मोर घरवाली ह घलो डोकरी हो गे हवय।”

19स्‍वरगदूत ह ओला जबाब दीस, “मेंह जिब्राईल अंव, अऊ मेंह परमेसर के आघू म ठाढ़े रहिथंव। मोला एकर बर पठोय गे हवय कि मेंह तोर ले गोठियावंव अऊ तोला ए सुघर संदेस सुनावंव। 20देख! जब तक ए बात पूरा नइं हो जाही, तब तक तेंह कोंदा रहिबे, अऊ गोठियाय नइं सकबे; काबरकि तेंह मोर बात ला बिसवास नइं करय, जऊन ह अपन सही समय म पूरा होही।”

21अऊ मनखेमन जकरयाह के बाट जोहत रहंय अऊ अचम्भो करत रहंय कि ओह काबर अतेक बेर तक मंदिर म रूके हवय। 22जब ओह बाहिर आईस, त ओमन ले गोठियाय नइं सकिस। तब ओमन समझ गीन कि ओह मंदिर म कोनो दरसन देखे हवय, काबरकि ओह ओमन ला इसारा करत रहय, पर गोठियाय नइं सकय।

23जब ओकर सेवा के समय ह पूरा हो गीस, त ओह अपन घर वापिस चल दीस। 24एकर बाद ओकर घरवाली इलीसिबा ह देहें म होईस, अऊ ओह पांच महिना तक अपन-आप ला मनखेमन ले छिपाय रखिस। 25ओह कहिस, “परभू ह मोर बर ए करे हवय। ए दिन म, ओह अपन दया देखाके मनखेमन के बीच ले मोर कलंक ला दूर करे हवय।”

यीसू के जनम के अगमबानी

26इलीसिबा के देहें म रहे के छठवां महिना म, परमेसर ह जिब्राईल स्‍वरगदूत ला गलील प्रदेस के नासरत सहर म एक कुवांरी टूरी करा पठोईस। 27ओ टूरी के मंगनी यूसुफ नांव के एक मनखे संग होय रिहिस, जऊन ह दाऊद राजा के बंस के रिहिस। ओ कुवांरी के नांव मरियम रिहिस। 28स्‍वरगदूत ह ओकर करा आके ओला कहिस, “जोहार लागी! तोर ऊपर बहुंत किरपा होय हवय। परभू ह तोर संग हवय।”

29मरियम ह स्‍वरगदूत के बात ले बहुंत घबरा गीस अऊ सोचे लगिस कि ओकर बात के का मतलब हो सकथे। 30पर स्‍वरगदूत ह ओला कहिस, “हे मरियम, झन डर्रा! काबरकि परमेसर के दया तोर ऊपर होय हवय। 31देख, तेंह देहें म होबे अऊ एक बेटा ला जनम देबे, अऊ तेंह ओकर नांव यीसू रखबे। 32ओह महान होही अऊ परम परधान परमेसर के बेटा कहाही। परभू परमेसर ह ओला ओकर पुरखा दाऊद राजा के सिंघासन दिही, 33अऊ ओह याकूब के बंस ऊपर सदाकाल तक राज करही; ओकर राज के अंत कभू नइं होही।”

34मरियम ह स्‍वरगदूत ले पुछिस, “मेंह तो एक कुवांरी टूरी अंव। एह कइसने हो सकथे?”

35स्‍वरगदूत ह जबाब दीस, “पबितर आतमा ह तोर ऊपर उतरही, अऊ परम परधान परमेसर के सक्ति ह तोर ऊपर छइहां करही। एकरसेति ओ पबितर जन जऊन ह जनमही, ओह परमेसर के बेटा कहाही। 36अऊ त अऊ तोर रिस्तेदार इलीसिबा के ओकर बुढ़त काल म एक लइका होवइया हवय, ओला ठड़गी कहे जावत रिहिस; छठवां महिना हो गे, ओह देहें म हवय। 37काबरकि परमेसर बर कोनो काम असंभव नो हय।”

38मरियम ह कहिस, “देख, मेंह परभू के दासी अंव। तोर कहे मुताबिक होवय।” तब स्‍वरगदूत ह ओकर करा ले चले गीस।

मरियम ह इलीसिबा ले भेंट करे जाथे

39कुछू समय के बाद, मरियम ह तियार होईस अऊ जल्दी-जल्दी यहूदा प्रदेस के पहाड़ी इलाका के एक सहर म गीस, 40अऊ ओह उहां जकरयाह के घर म जाके इलीसिबा ला जोहार करिस। 41जब इलीसिबा ह मरियम के जोहार ला सुनिस, त लइका ह ओकर पेट म उछल पड़िस, अऊ इलीसिबा ह पबितर आतमा ले भर गीस, 42अऊ ओह चिचियाके कहिस, “माईलोगन म तेंह धइन (आसिसित) अस, अऊ तोर पेट के लइका ह धइन ए! 43पर अतेक जादा किरपा मोर ऊपर काबर होईस कि मोर परभू के दाई ह मोर करा आईस? 44जइसने मेंह तोर जोहार के सबद ला सुनेंव, लइका ह मोर पेट म आनंद के मारे उछल पड़िस। 45धइन अस तेंह, काबरकि तेंह बिसवास करय कि जऊन कुछू परभू ह तोला कहे हवय, ओह पूरा होही।”

मरियम के इस्तुति के गीत

46तब मरियम ह कहिस:

“मोर मन ह परभू के बड़ई करत हवय;

47अऊ मोर आतमा ह मोर उद्धार करइया परमेसर म आनंद मनावत हवय,

48काबरकि ओह अपन दासी के दीन-हीन दसा ऊपर धियान दे हवय।

अब ले जम्मो पीढ़ी के मनखेमन मोला धइन कहिहीं,

49काबरकि सामरथी परमेसर ह मोर बर बड़े-बड़े काम करे हवय –

ओकर नांव पबितर ए।

50ओकर दया ओमन ऊपर,

जऊन मन ओकर भय मानथें, पीढ़ी-पीढ़ी तक बने रहिथे।

51ओह अपन हांथ ले बड़े-बड़े काम करे हवय;

ओह ओमन ला तितिर-बितिर कर दे हवय, जऊन मन अपन मन म घमंड करथें।

52ओह सक्तिसाली राजामन ला ओमन के सिंघासन ले उतार दे हवय,

पर दीन-हीन मन ला ऊपर उठाय हवय।

53ओह भुखहा मनखेमन ला सुघर चीज ले भर दे हवय,

पर धनवानमन ला जुछा हांथ निकार दे हवय।

54अपन दया ला सुरता करके,

ओह अपन सेवक इसरायल के मदद करे हवय,

55जइसने ओह हमर पुरखामन ले कहे रिहिस कि ओह अब्राहम अऊ

ओकर बंस ऊपर सदा-काल तक दया करही।”

56मरियम ह इलीसिबा के संग करीब तीन महिना रिहिस अऊ तब अपन घर वापिस चल दीस।

यूहन्ना बतिसमा देवइया के जनम

57इलीसिबा के लइका जनमे के समय होईस अऊ ओह एक बेटा ला जनम दीस। 58जब ओकर पड़ोसी अऊ रिस्तेदार मन सुनिन कि परभू ह ओकर ऊपर बड़े दया करे हवय, त ओमन ओकर संग आनंद मनाईन।

59आठवां दिन म, ओमन लइका के खतना करे बर आईन अऊ ओमन ओकर नांव ओकर ददा के नांव जकरयाह रखे बर चाहत रिहिन, 60पर ओकर दाई ह कहिस, “नइं! ओकर नांव यूहन्ना होही।”

61ओमन ओला कहिन, “पर तोर रिस्तेदारमन म काकरो ए नांव नइं ए।”

62तब ओमन लइका के ददा ले इसारा करके पुछिन कि ओह लइका के का नांव रखे चाहथे। 63ओह लिखे के एक सिलेट लाने बर कहिस अऊ ओम लिखिस, “एकर नांव यूहन्ना ए।” एला देखके ओ जम्मो झन अचम्भो करिन। 64अऊ तुरते जकरयाह के मुहूं ह खुल गे अऊ ओह गोठियाय अऊ परमेसर के इस्तुति करे लगिस। 65जम्मो पड़ोसीमन ऊपर डर हमा गे अऊ ए जम्मो बात यहूदिया प्रदेस के जम्मो पहाड़ी इलाका म फइल गीस। 66अऊ ए बात के जम्मो सुनइयामन अपन-अपन मन म सोचिन अऊ कहिन, “ए लइका ह का बनही?” काबरकि परभू के हांथ ओकर संग रहय।

जकरयाह के गीत

67यूहन्ना के ददा जकरयाह ह पबितर आतमा ले भर गीस अऊ ए कहिके अगमबानी करिस:

68“इसरायल के परभू परमेसर के इस्तुति होवय,

काबरकि ओह आय हवय अऊ अपन मनखेमन के उद्धार करे हवय।

69ओह अपन सेवक दाऊद के बंस म हमर बर एक

सामरथी उद्धार करइया दे हवय,

70(जइसने ओह अपन पबितर अगमजानीमन के दुवारा बहुंत पहिली ले कहत आय हवय),

71कि ओह हमर बईरीमन ले अऊ जऊन मन हमन ले घिन करथें,

ओमन ले हमन ला बचाही।

72ओह हमर पुरखामन ऊपर दया करही

अऊ अपन पबितर करार ला सुरता करही।

73ओह किरिया खाके हमर पुरखा अब्राहम ले कहे रिहिस:

74कि ओह हमन ला हमर बईरीमन के हांथ ले बचाही,

75ताकि हमन निडर होके जिनगी भर पबितर अऊ धरमी बनके ओकर आघू म ओकर सेवा कर सकन।

76अऊ ए मोर लइका! तेंह परम परधान परमेसर के अगमजानी कहाबे,

काबरकि तेंह परभू के रसता तियार करे बर ओकर आघू-आघू जाबे,

77अऊ ओकर मनखेमन ला तेंह बताबे कि ओमन के पाप छेमा होय के दुवारा ओमन के उद्धार होही।

78एह हमर परमेसर के बड़े दया के कारन होही,

जब स्‍वरग ले बिहनियां के अंजोर हमर करा आही,

79अऊ ओमन ऊपर चमकही जऊन मन अंधियार अऊ मिरतू के छइहां म रहत हवंय,

अऊ हमर गोड़ ला सांति के रसता म ले चलही।”

80अऊ ओ लइका ह बढ़त अऊ आतमा म मजबूत होवत गीस अऊ ओह तब तक निरजन ठऊर म रिहिस, जब तक ओह इसरायली मनखेमन के आघू म खुले-आम नइं आईस।

Hindi Contemporary Version

लूकॉ 1:1-80

अभिलेख का उद्देश्य

1अनेक व्यक्तियों ने उन घटनाओं को लिखकर इकट्ठा करने का कार्य किया है, जो हमारे बीच में घटी. 2ये सबूत हमें उनसे प्राप्त हुए हैं, जो प्रारंभ ही से इनके प्रत्यक्षदर्शी और परमेश्वर के वचन के सेवक रहे. 3मैंने स्वयं हर एक घटनाओं की शुरुआत से सावधानीपूर्वक जांच की है. इसलिये परम सम्मान्य थियोफ़िलॉस महोदय, मुझे भी यह उचित लगा कि आपके लिए मैं यह सब क्रम के अनुसार लिखूं 4कि जो शिक्षाएं आपको दी गई हैं, आप उनकी विश्वसनीयता को जान लें.

बपतिस्मा देनेवाले योहन के जन्म की भविष्यवाणी

5यहूदिया प्रदेश के राजा हेरोदेस के शासनकाल में अबियाह दल के एक पुरोहित थे, जिनका नाम ज़करयाह था. उनकी पत्नी का नाम एलिज़ाबेथ था, जो हारोन की वंशज थी. 6वे दोनों ही परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी तथा प्रभु के सभी आदेशों और नियमों के पालन में दोषहीन थे. 7उनके कोई संतान न थी क्योंकि एलिज़ाबेथ बांझ थी और वे दोनों ही अब बूढ़े हो चुके थे.

8अपने दल की बारी के अनुसार जब ज़करयाह एक दिन परमेश्वर के सामने अपनी पुरोहित सेवा भेंटकर रहे थे, 9उन्हें पुरोहितों की रीति के अनुसार पर्ची द्वारा चुनाव कर प्रभु के मंदिर में प्रवेश करने और धूप जलाने का काम सौंपा गया था. 10धूप जलाने के समय बाहर सभी लोगों का विशाल समूह प्रार्थना कर रहा था.

11तभी ज़करयाह के सामने प्रभु का एक स्वर्गदूत प्रकट हुआ, जो धूप वेदी की दायीं ओर खड़ा था. 12स्वर्गदूत को देख ज़करयाह चौंक पड़े और भयभीत हो गए 13किंतु उस स्वर्गदूत ने उनसे कहा, “मत डरो, ज़करयाह! तुम्हारी प्रार्थना सुन ली गई है. तुम्हारी पत्नी एलिज़ाबेथ एक पुत्र जनेगी. तुम उसका नाम योहन रखना. 14तुम आनंदित और प्रसन्न होंगे तथा अनेक उसके जन्म के कारण आनंद मनाएंगे. 15यह बालक प्रभु की दृष्टि में महान होगा. वह दाखरस और मदिरा का सेवन कभी न करेगा तथा माता के गर्भ से ही पवित्रात्मा से भरा हुआ होगा. 16वह इस्राएल के वंशजों में से अनेकों को प्रभु—उनके परमेश्वर—की ओर लौटा ले आएगा. 17वह एलियाह की आत्मा और सामर्थ्य में प्रभु के आगे चलनेवाला बनकर पिताओं के हृदय संतानों की ओर तथा अनाज्ञाकारियों को धर्मी के ज्ञान की ओर फेरेगा कि एक राष्ट्र को प्रभु के लिए तैयार करें.”

18ज़करयाह ने स्वर्गदूत से प्रश्न किया, “मैं कैसे विश्वास करूं—क्योंकि मैं ठहरा एक बूढ़ा व्यक्ति और मेरी पत्नी की आयु भी ढल चुकी है?”

19स्वर्गदूत ने उन्हें उत्तर दिया, “मैं गब्रिएल हूं. मैं नित परमेश्वर की उपस्थिति में रहता हूं. मुझे तुम्हें यह बताने और इस शुभ समाचार की घोषणा करने के लिए ही भेजा गया है. 20और सुनो! जब तक मेरी ये बातें पूरी न हो जाए, तब तक के लिए तुम गूंगे हो जाओगे, बोलने में असमर्थ, क्योंकि तुमने मेरे वचनों पर विश्वास नहीं किया, जिसका नियत समय पर पूरा होना निश्चित है.”

21बाहर ज़करयाह का इंतजार कर रहे लोग असमंजस में पड़ गए कि उन्हें मंदिर में इतनी देर क्यों हो रही है. 22जब ज़करयाह बाहर आए, वह उनसे बातें करने में असमर्थ रहे. इसलिये वे समझ गए कि ज़करयाह को मंदिर में कोई दर्शन प्राप्त हुआ है. वह उनसे संकेतों द्वारा बातचीत करते रहे और मौन बने रहे.

23अपने पुरोहित सेवाकाल की समाप्ति पर ज़करयाह घर लौट गए. 24उनकी पत्नी एलिज़ाबेथ ने गर्भधारण किया और यह कहते हुए पांच माह तक अकेले में रहीं, 25“प्रभु ने मुझ पर यह कृपादृष्टि की है और समूह में मेरी लज्जित स्थिति से मुझे उबार लिया है.”

प्रभु येशु के जन्म की ईश्वरीय घोषणा

26छठे माह में स्वर्गदूत गब्रिएल को परमेश्वर द्वारा गलील प्रदेश के नाज़रेथ नामक नगर में 27एक कुंवारी कन्या के पास भेजा गया, जिसका विवाह योसेफ़ नामक एक पुरुष से होना निश्चित हुआ था. योसेफ़, राजा दावीद के वंशज थे. कन्या का नाम था मरियम. 28मरियम को संबोधित करते हुए स्वर्गदूत ने कहा, “प्रभु की कृपापात्री, नमस्कार! प्रभु आपके साथ हैं.”

29इस कथन को सुन वह बहुत ही घबरा गईं कि इस प्रकार के नमस्कार का क्या अर्थ हो सकता है. 30स्वर्गदूत ने उनसे कहा, “मत डरिए, मरियम! क्योंकि आप परमेश्वर की कृपा की पात्र हैं. 31सुनिए! आप गर्भधारण कर एक पुत्र को जन्म देंगी. आप उनका नाम येशु रखें. 32वह महान होंगे. परम प्रधान के पुत्र कहलाएंगे और प्रभु परमेश्वर उन्हें उनके पूर्वज दावीद का सिंहासन सौंपेंगे, 33वह याकोब के वंश पर हमेशा के लिए राज्य करेंगे तथा उनके राज्य का अंत कभी न होगा.”

34मरियम ने स्वर्गदूत से प्रश्न किया, “यह कैसे संभव होगा क्योंकि मैं तो कुंवारी हूं?”

35स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, “पवित्रात्मा आप पर उतरेंगे तथा परम प्रधान का सामर्थ्य आप पर छाया करेगा. इसलिये जो जन्म लेंगे, वह पवित्र और परमेश्वर-पुत्र कहलाएंगे. 36और यह भी सुनिए आपकी परिजन एलिज़ाबेथ ने अपनी वृद्धावस्था में एक पुत्र गर्भधारण किया है. वह, जो बांझ कहलाती थी, उन्हें छः माह का गर्भ है. 37परमेश्वर के लिए असंभव कुछ भी नहीं.”

38मरियम ने कहा, “देखिए, मैं प्रभु की दासी हूं. मेरे लिए वही सब हो, जैसा आपने कहा है.” तब वह स्वर्गदूत उनके पास से चला गया.

मरियम की एलिज़ाबेथ से भेंट

39मरियम तुरंत यहूदिया प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र के एक नगर को चली गईं. 40वहां उन्होंने ज़करयाह के घर पर जाकर एलिज़ाबेथ को नमस्कार किया. 41जैसे ही एलिज़ाबेथ ने मरियम का नमस्कार सुना, उनके गर्भ में शिशु उछल पड़ा और एलिज़ाबेथ पवित्रात्मा से भर गईं. 42वह उल्लसित शब्द में बोल उठी, “तुम सभी नारियों में धन्य हो और धन्य है तुम्हारे गर्भ का फल! 43मुझ पर यह कैसी कृपादृष्टि हुई है, जो मेरे प्रभु की माता मुझसे भेंट करने आई हैं! 44देखो तो, जैसे ही तुम्हारा नमस्कार मेरे कानों में पड़ा, हर्षोल्लास से मेरे गर्भ में शिशु उछल पड़ा. 45धन्य है वह, जिसने प्रभु द्वारा कही हुई बातों के पूरा होने का विश्वास किया है!”

मरियम का स्तुति गान

46इस पर मरियम के वचन ये थे:

“मेरा प्राण प्रभु की प्रशंसा करता है

47और मेरी अंतरात्मा परमेश्वर, मेरे उद्धारकर्ता में आनंदित हुई है,

48क्योंकि उन्होंने अपनी दासी की

दीनता की ओर दृष्टि की है.

अब से सभी पीढ़ियां मुझे धन्य कहेंगी,

49क्योंकि सामर्थ्यी ने मेरे लिए बड़े-बड़े काम किए हैं.

पवित्र है उनका नाम.

50उनकी दया उनके श्रद्धालुओं पर पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहती है.

51अपने भुजबल से उन्होंने प्रतापी काम किए हैं

और अभिमानियों को बिखरा दिया है.

52परमेश्वर ने राजाओं को उनके सिंहासनों से नीचे उतार दिया

तथा विनम्रों को उठाया है.

53उन्होंने भूखों को उत्तम पदार्थों से तृप्त किया

तथा सम्पन्नों को खाली लौटा दिया.

54उन्होंने अपने सेवक इस्राएल की सहायता

अपनी उस करुणा के स्मरण में की,

55जिसकी प्रतिज्ञा उसने हमारे बाप-दादों से करी थी और

जो अब्राहाम तथा उनके वंशजों पर सदा-सर्वदा रहेगी”.

56लगभग तीन माह एलिज़ाबेथ के साथ रहकर मरियम अपने घर लौट गईं.

बपतिस्मा देनेवाले योहन का जन्म

57एलिज़ाबेथ का प्रसवकाल पूरा हुआ और उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया. 58जब पड़ोसियों और परिजनों ने यह सुना कि एलिज़ाबेथ पर यह अनुग्रह हुआ है, तो वे भी उनके इस आनंद में सम्मिलित हो गए.

59आठवें दिन वे शिशु के ख़तना के लिए इकट्ठा हुए. वे शिशु को उसके पिता के नाम पर ज़करयाह पुकारने लगे 60किंतु शिशु की माता ने उत्तर दिया; “नहीं! इसका नाम योहन होगा!”

61इस पर उन्होंने एलिज़ाबेथ से कहा, “आपके परिजनों में तो इस नाम का कोई भी व्यक्ति नहीं है!”

62तब उन्होंने शिशु के पिता से संकेत में प्रश्न किया कि वह शिशु का नाम क्या रखना चाहते हैं? 63ज़करयाह ने एक लेखन पट्ट मंगा कर उस पर लिख दिया, “इसका नाम योहन है.” यह देख सभी चकित रह गए. 64उसी क्षण उनकी आवाज लौट आई. उनकी जीभ के बंधन खुल गए और वह परमेश्वर की स्तुति करने लगे. 65सभी पड़ोसियों में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा भाव आ गया और यहूदिया प्रदेश के सभी पर्वतीय क्षेत्र में इसकी चर्चा होने लगी. 66निस्संदेह प्रभु का हाथ उस बालक पर था. जिन्होंने यह सुना, उन्होंने इसे याद रखा और यह विचार करते रहे: “क्या होगा यह बालक!”

ज़करयाह का मंगल-गान

67पवित्रात्मा से भरकर उनके पिता ज़करयाह इस प्रकार भविष्यवाणियों का वर्णानुभाषण करना शुरू किया:

68“धन्य हैं प्रभु, इस्राएल के परमेश्वर,

क्योंकि उन्होंने अपनी प्रजा की सुधि ली और उसका उद्धार किया.

69उन्होंने हमारे लिए अपने सेवक दावीद के वंश में

एक उद्धारकर्ता उत्पन्न किया है,

70(जैसा उन्होंने प्राचीन काल के अपने पवित्र भविष्यद्वक्ताओं के माध्यम से प्रकट किया)

71शत्रुओं तथा उन सबसे,

जो हमसे घृणा करते हैं, बचाए रखा

72कि वह हमारे पूर्वजों पर अपनी कृपादृष्टि प्रदर्शित करें

तथा अपनी पवित्र वाचा को पूरा करें;

73वही वाचा, जो उन्होंने हमारे पूर्वज अब्राहाम से स्थापित की थी:

74वह हमें हमारे शत्रुओं से छुड़ाएंगे,

75कि हम पवित्रता और धार्मिकता में

निर्भय हो जीवन भर उनकी सेवा कर सकें.

76“और बालक तुम, मेरे पुत्र, परम प्रधान परमेश्वर के भविष्यवक्ता कहलाओगे;

क्योंकि तुम उनका मार्ग तैयार करने के लिए प्रभु के आगे-आगे चलोगे,

77तुम परमेश्वर की प्रजा को

उसके पापों की क्षमा के द्वारा उद्धार का ज्ञान प्रदान करोगे.

78हमारे परमेश्वर की अत्यधिक कृपा के कारण,

स्वर्ग से हम पर प्रकाश का उदय होगा,

79उन पर, जो अंधकार और मृत्यु की छाया में हैं;

कि इसके द्वारा हमारा मार्गदर्शन शांति के मार्ग पर हो.”

80बालक योहन का विकास होता गया तथा वह आत्मिक रूप से भी बलवंत होते गए. इस्राएल के सामने सार्वजनिक रूप से प्रकट होने के पहले वह जंगल में निवास करते रहे.