New Chhattisgarhi Translation (नवां नियम छत्तीसगढ़ी)

मत्ती 13:1-58

बीज बोवइया के पटं‍तर

(मरकुस 4:1-9; लूका 8:4-8)

1ओहीच दिन, यीसू ह घर ले निकरिस, अऊ समुंदर के तीर म जाके बईठ गीस। 2तब ओकर चारों कोति अतेक बड़े भीड़ जुर गीस कि ओला जाके एक ठन डोंगा म बईठे पड़िस, अऊ जम्मो मनखेमन समुंदर के तीर म ठाढ़े रहंय। 3तब यीसू ह ओमन ला पटं‍तर म बहुंत बात बताईस। ओह कहिस, “एक किसान ह बीज बोय बर निकरिस। 4जब ओह बोवत रिहिस, त कुछू बीजामन रसता के तीर म गिरिन अऊ चिरईमन आके ओला चुग लीन। 5कुछू बीजामन पथर्री भुइयां म गिरिन, जिहां ओमन ला जादा माटी नइं मिलिस। ओ बीजामन जल्दी जाम गीन काबरकि उहां माटी ह गहिरा नइं रिहिस। 6पर जब सूरज निकरिस, त ओमन मुरझा गीन अऊ जरी नइं धरे रहय के कारन ओमन सूख गीन। 7कुछू बीजामन कंटिली झाड़ीमन के बीच म गिरिन अऊ ओ झाड़ीमन बढ़के ओमन ला दबा दीन। 8पर कुछू बीजामन बने भुइयां ऊपर गिरिन अऊ फर लानिन; कोनो सौ गुना, कोनो साठ गुना अऊ कोनो तीस गुना। 9जेकर कान हवय, ओह सुन ले।”

10चेलामन यीसू करा आके ओकर ले पुछिन, “तेंह मनखेमन संग पटं‍तर म काबर गोठियाथस?” 11ओह जबाब दीस, “स्‍वरग राज के भेद के गियान तुमन ला देय गे हवय, पर ओमन ला नइं।13:11 मरकुस 4:11 12काबरकि जेकर करा हवय, ओला अऊ दिये जाही अऊ ओकर करा बहुंत जादा हो जाही। पर जेकर करा नइं ए, ओकर करा ले ओला घलो ले लिये जाही, जऊन थोर बहुंत ओकर करा हवय। 13मेंह ओमन ले एकर कारन पटं‍तर म गोठियाथंव काबरकि ओमन देखत घलो नइं देखंय, अऊ सुनत घलो ओमन नइं सुनंय या समझंय।

14ओमन के बारे म यसायाह अगमजानी के ए अगमबानी ह पूरा होथे:

‘तुमन सुनहू जरूर,

पर कभू नइं समझहू,

अऊ तुमन देखहू जरूर,

पर कभू नइं सूझही।

15काबरकि ए मनखेमन के दिमाग ह मोटा हो गे हवय,

अऊ एमन अपन कान ले ऊंचहा सुने लगे हवंय।

अऊ एमन अपन आंखी ला मूंद ले हवंय। नइं तो एमन ह अपन आंखी ले देखतिन,

अपन कान ले सुनतिन,

अपन दिमाग ले समझतिन अऊ मोर कोति फिरतिन,

अऊ मेंह एमन ला चंगा कर देतेंव।’

16पर धइन अंय तुम्‍हर आंखीमन, काबरकि ओमन देखथें, अऊ धइन अंय तुम्‍हर कानमन, काबरकि ओमन सुनथें। 17मेंह तुमन ला सच कहथंव कि जऊन चीज ला तुमन देखत हव, ओला कतको अगमजानी अऊ धरमी मनखेमन देखे चाहत रिहिन, पर देखे नइं सकिन; अऊ जऊन गोठ ला तुमन सुनत हवव, ओला ओमन सुने चाहत रिहिन, पर सुने नइं सकिन।13:17 1यूहन्ना 1:1-2

18अब तुमन किसान के पटं‍तर के मतलब ला सुनव। 19जब कोनो मनखे स्‍वरग राज के बचन ला सुनथे अऊ ओला नइं समझय, त जऊन बचन ओकर हिरदय म बोय गय रहिथे, ओला दुस्‍ट सैतान ह आके छीन लेथे। एह ओ बीजा ए, जऊन ह रसता के तीर म बोय गय रिहिस। 20जऊन बीजा ह पथर्री भुइयां म बोय गे रिहिस, एह ओ मनखे अय, जऊन ह बचन ला सुनथे अऊ तुरते ओला आनंद सहित गरहन करथे। 21पर अपन म जरी नइं धरे रहय के कारन, ओह कुछू समय तक ही ठहरथे। जब बचन के सेति समस्या अऊ सताव आथे, त ओह तुरते बचन ले दूर हो जाथे। 22जऊन बीजा ह कंटिली झाड़ीमन के बीच म बोय गे रिहिस, एह ओ मनखे अय, जऊन ह बचन ला सुनथे, पर ए जिनगी के फिकर अऊ धन के लालच ह बचन ला दबा देथे अऊ ओह फर नइं लानय। 23पर जऊन बीजा ह बने भुइयां म बोय गय रिहिस, एह ओ मनखे अय, जऊन ह बचन ला सुनथे अऊ ओला समझथे। ओह फर लानथे; कोनो सौ गुना, कोनो साठ गुना अऊ कोनो तीस गुना।”

जंगली बीजा के पटं‍तर

24यीसू ह ओमन ला एक अऊ पटं‍तर सुनाईस, “स्‍वरग के राज ह ओ मनखे के सहीं अय, जऊन ह अपन खेत म बने बीजा ला बोईस। 25पर जब मनखेमन सुतत रिहिन, त ओ मनखे के बईरी ह आईस अऊ गहूं के बीच म जंगली बीजा ला बोके चल दीस। 26जब गहूं ह जामिस अऊ एकर बाली दिखे लगिस, त जंगली पौधा घलो दिखे लगिस।

27तब ओ खेत के मालिक के सेवकमन ओकर करा आईन अऊ कहिन, ‘मालिक, का तेंह अपन खेत म बने बीजा नइं बोय रहय? तब ओम ए जंगली पौधामन कहां ले आ गीन?’

28ओह ओमन ला कहिस, ‘एह कोनो बईरी के काम अय।’ तब सेवकमन ओकर ले पुछिन, ‘का तेंह चाहथस कि हमन जाके ओ जंगली पौधामन ला उखान दन?’ 29खेत के मालिक ह कहिस, ‘नइं, काबरकि जंगली पौधा ला उखानत बखत, हो सकथे कि तुमन ओमन के संग म गहूं ला घलो उखान डारव। 30लुवई के समय तक दूनों ला संगे-संग बढ़न देवव। लुवई के समय, मेंह लुवइयामन ला कहिहूं; पहिली जंगली पौधामन ला संकेलव अऊ जलाय बर ओमन के बोझा बांध लेवव। तब गहूं ला जमा करके मोर कोठार म ले आवव।’ ”

सरसों के बीजा अऊ खमीर के पटं‍तर

(मरकुस 4:30-32; लूका 13:18-19)

31यीसू ह ओमन ला एक अऊ पटं‍तर सुनाईस, “स्‍वरग के राज ह सरसों के एक बीजा के सहीं अय, जऊन ला लेके एक मनखे ह अपन खेत म बोईस। 32सरसों के बीजा ह तो जम्मो बीजामन ले छोटे होथे, पर जब एह बढ़थे, त जम्मो साग-भाजी ले बड़े हो जाथे अऊ अइसने रूख बन जाथे कि अकास के चिरईमन आके एकर डालीमन म बसेरा करथें13:32 ए किसम के सरसों के पौधा ह करीब तीन मीटर तक बढ़य।।”

33यीसू ह ओमन ला एक ठन अऊ पटं‍तर सुनाईस, “स्‍वरग के राज ह खमीर सहीं अय, जऊन ला एक माईलोगन ह लीस अऊ तीन पसेरी पिसान म तब तक मिलाईस जब तक कि ओ जम्मो पिसान ह खमीर नइं हो गीस13:33 खमीर के उपयोग पिसान ला फूलोय बर करे जावत रिहिस।।”

34यीसू ह मनखेमन ला ए जम्मो बात पटं‍तर म कहिस, अऊ बिगर पटं‍तर के ओह ओमन ला कुछू नइं कहत रिहिस। 35अइसने करे के दुवारा ओह अगमजानी के दुवारा कहे गय ए बात ला पूरा करिस:

“मेंह पटं‍तर म गोठियाहूं।

मेंह ओ बातमन ला उजागर करहूं, जऊन ह संसार के सिरजे के समय ले गुपत म हवय।”13:35 भजन-संहिता 78:2

जंगली बीजा के पटं‍तर के मतलब

36तब यीसू ह भीड़ ला छोंड़के घर के भीतर गीस। ओकर चेलामन ओकर करा आके कहिन, “खेत म जंगली बीजा के पटं‍तर के बारे म हमन ला समझा दे।”

37यीसू ह जबाब दीस, “जऊन मनखे ह बने बीजा ला बोईस, ओह मनखे के बेटा अय। 38खेत ह संसार अय, अऊ बने बीजा ह स्‍वरग राज के संतान अंय। जंगली बीजामन दुस्‍ट सैतान के संतान अंय, 39अऊ जऊन बईरी ह एमन ला बोथे, ओह सैतान अय। लुवई ह संसार के अंत अय, अऊ लुवइयामन स्‍वरगदूत अंय।

40जइसने जंगली पौधामन ला जमा करके आगी म बार दिये जाथे, वइसने संसार के अंत समय म होही। 41मनखे के बेटा ह अपन स्वरगदूतमन ला पठोही, अऊ ओमन ओकर राज के ओ जम्मो झन ला निकारहीं, जऊन मन मनखेमन के पाप के कारन बनथें अऊ जऊन मन कुकरम करथें। 42स्वरगदूतमन ओमन ला आगी के भट्ठी म झोंक दिहीं, जिहां ओमन रोहीं अऊ अपन दांत पीसहीं। 43तब धरमी मनखेमन अपन परमेसर के राज म सूरज सहीं चमकहीं। जेकर कान हवय, ओह सुन ले।”

गुपत खजाना अऊ मोती के पटं‍तर

44“स्‍वरग के राज ह एक खेत म छिपे खजाना के सहीं अय, जऊन ला एक मनखे ह पाईस, अऊ ओह ओला फेर लुका दीस। तब ओह खुसी म गीस अऊ अपन जम्मो कुछू ला बेंचके ओ खेत ला बिसो लीस।

45फेर, स्‍वरग के राज ह एक सौदागर के सहीं अय, जऊन ह सुघर मोती के खोज म रहिथे। 46जब ओला एक ठन महंगा मोती मिलथे, त ओह जाथे अऊ अपन जम्मो कुछू ला बेंचके ओ मोती ला बिसो लेथे।”

जाल के पटं‍तर

47“फेर स्‍वरग के राज ह एक जाल के सहीं अय, जऊन ला समुंदर म डारे गीस, अऊ ओम जम्मो किसम के मछरी फंसिन। 48जब जाल ह भर गीस त मछुआरमन ओला खींचके तीर म ले आईन। तब ओमन बईठ गीन अऊ बने मछरीमन ला निमार के टुकना म रखिन, अऊ खराप मछरीमन ला फटिक दीन। 49संसार के अंत समय म अइसनेच होही। स्वरगदूतमन आहीं, अऊ दुस्‍ट मनखेमन ला धरमीमन ले अलग करहीं, 50अऊ ओमन ला आगी के भट्ठी म झोंक दिहीं। उहां ओमन ह रोहीं अऊ अपन दांत पीसहीं।”

51यीसू ह अपन चेलामन ले पुछिस, “का तुमन ए जम्मो गोठ ला समझेव?” त ओमन ह कहिन, “हव जी।”

52यीसू ह ओमन ला कहिस, “एकरसेति, मूसा के कानून के हर ओ गुरू, जऊन ह स्‍वरग राज के सिकछा पा चुके हवय, ओह एक घर के मालिक सहीं अय, जऊन ह अपन भंडार ले नवां के संग-संग जुन्ना चीजमन ला निकारथे।”

एक अगमजानी बिगर आदरमान के

(मरकुस 6:1-6; लूका 4:16-30)

53यीसू ह ए पटं‍तरमन ला सुनाय के बाद उहां ले चल दीस। 54ओह अपन नगर म आईस, अऊ मनखेमन ला ओमन के सभा घर म सिकछा देवन लगिस। मनखेमन ओकर उपदेस ला सुनके चकित होईन अऊ कहिन, “ए मनखे ला, ए बुद्धि अऊ ए अचरज के काम करे के सामरथ कहां ले मिलिस? 55का एह बढ़ई के बेटा नो हय? का एकर दाई के नांव मरियम नो हय? का याकूब, यूसुफ, सिमोन अऊ यहूदा एकर भाई नो हंय? 56का एकर जम्मो बहिनीमन हमर बीच म नइं रहंय? तब ए मनखे ला ए जम्मो चीज कहां ले मिलिस?” 57अऊ ओमन ओकर ऊपर नराज होईन। पर यीसू ह ओमन ला कहिस, “सिरिप अपन सहर अऊ अपन घर ला छोंड़के, अगमजानी ह जम्मो जगह म आदरमान पाथे।”13:57 लूका 4:28-29

58मनखेमन के अबिसवास के कारन, ओह उहां जादा अचरज के काम नइं करिस।

Ketab El Hayat

إنجيل متى 13:1-58

مَثل الزارع

1فِي ذَلِكَ الْيَومِ خَرَجَ مِنَ الْبَيْتِ وَجَلَسَ عَلَى شَاطِئِ الْبُحَيْرَةِ. 2فَاجْتَمَعَتْ إِلَيْهِ جُمُوعٌ كَثِيرَةٌ، حَتَّى إِنَّهُ صَعِدَ إِلَى الْقَارِبِ وَجَلَسَ، بَيْنَمَا وَقَفَ الْجَمْعُ كُلُّهُ عَلَى الشَّاطِئِ. 3فَكَلَّمَهُمْ بِأَمْثَالٍ فِي أُمُورٍ كَثِيرَةٍ، قَالَ: «هَا إِنَّ الزَّارِعَ قَدْ خَرَجَ لِيَزْرَعَ. 4وَبَيْنَمَا هُوَ يَزْرَعُ، وَقَعَ بَعْضُ الْبِذَارِ عَلَى الْمَمَرَّاتِ، فَجَاءَتِ الطُّيُورُ وَالتَهَمَتْهُ. 5وَوَقَعَ بَعْضُهُ عَلَى أَرْضٍ صَخْرِيَّةٍ رَقِيقَةِ التُّرْبَةِ، فَطَلَعَ سَرِيعاً لأَنَّ تُرْبَتَهُ لَمْ تَكُنْ عَمِيقَةً؛ 6وَلكِنْ لَمَّا أَشْرَقَتِ الشَّمْسُ، احْتَرَقَ وَيَبِسَ لأَنَّهُ كَانَ بِلا أَصْلٍ. 7وَوَقَعَ بَعْضُ الْبِذَارِ بَيْنَ الأَشْوَاكِ، فَطَلَعَ الشَّوْكُ وَخَنَقَهُ. 8وَبَعْضُ الْبِذَارِ وَقَعَ فِي الأَرْضِ الْجَيِّدَةِ، فَأَثْمَرَ بَعْضُهُ مِئَةَ ضِعْفٍ وَبَعْضُهُ سِتِّينَ، وَبَعْضُهُ ثَلاثِينَ. 9مَنْ لَهُ أُذُنَانِ فَلْيَسْمَعْ!»

10فَتَقَدَّمَ إِلَيْهِ التَّلامِيذُ وَسَأَلُوهُ: «لِمَاذَا تُكَلِّمُهُمْ بِأَمْثَالٍ؟» 11فَأَجَابَ: «لأَنَّهُ قَدْ أُعْطِيَ لَكُمْ أَنْ تَعْرِفُوا أَسْرَارَ مَلَكُوتِ السَّمَاوَاتِ؛ أَمَّا أُولَئِكَ، فَلَمْ يُعْطَ لَهُمْ ذَلِكَ. 12فَإِنَّ مَنْ عِنْدَهُ، يُعْطَى الْمَزِيدَ فَيَفِيضُ؛ وَأَمَّا مَنْ لَيْسَ عِنْدَهُ، فَحَتَّى الَّذِي عِنْدَهُ يُنْتَزَعُ مِنْهُ. 13لِهَذَا السَّبَبِ أُكَلِّمُهُمْ بِأَمْثَالٍ: فَهُمْ يَنْظُرُونَ دُونَ أَنْ يُبْصِرُوا، وَيَسْمَعُونَ دُونَ أَنْ يَسْمَعُوا أَوْ يَفْهَمُوا. 14فَفِيهِمْ قَدْ تَمَّتْ نُبُوءَةُ إِشَعْيَاءَ حَيْثُ يَقُولُ: سَمْعاً تَسْمَعُونَ وَلا تَفْهَمُونَ، وَنَظَراً تَنْظُرُونَ وَلا تُبْصِرُونَ. 15لأَنَّ قَلْبَ هَذَا الشَّعْبِ قَدْ صَارَ غَلِيظاً، وَصَارَتْ آذَانُهُمْ ثَقِيلَةَ السَّمْعِ، وَأَغْمَضُوا عُيُونَهُمْ؛ لِئَلَّا يُبْصِرُوا بِعُيُونِهِمْ، وَيَسْمَعُوا بِآذَانِهِمْ، وَيَفْهَمُوا بِقُلُوبِهِمْ، وَيَرْجِعُوا إِلَيَّ، فَأَشْفِيَهُمْ! 16وَأَمَّا أَنْتُمْ، فَطُوبَى لِعُيُونِكُمْ لأَنَّهَا تُبْصِرُ، وَلِآذَانِكُمْ لأَنَّهَا تَسْمَعُ. 17فَالْحَقَّ أَقُولُ لَكُمْ: كَمْ تَمَنَّى أَنْبِيَاءُ وَصَالِحُونَ كَثِيرُونَ أَنْ يَرَوْا مَا أَنْتُمْ تَرَوْنَ وَلَمْ يَرَوْا، وَأَنْ يَسْمَعُوا مَا تَسْمَعُونَ وَلَمْ يَسْمَعُوا!

18فَاسْمَعُوا أَنْتُمْ مَعْنَى مَثَلِ الزَّارِعِ: 19كُلُّ مَنْ يَسْمَعُ كَلِمَةَ الْمَلَكُوتِ وَلا يَفْهَمُهَا، يَأْتِي الشِّرِّيرُ وَيَخْطَفُ مَا قَدْ زُرِعَ فِي قَلْبِهِ: هَذَا هُوَ الْمَزْرُوعُ عَلَى الْمَمَرَّاتِ.

20أَمَّا الْمَزْرُوعُ عَلَى أَرْضٍ صَخْرِيَّةٍ، فَهُوَ الَّذِي يَسْمَعُ الْكَلِمَةَ وَيَقْبَلُهَا بِفَرَحٍ فِي الْحَالِ، 21وَلكِنَّهُ لَا أَصْلَ لَهُ فِي ذَاتِهِ، وَإِنَّمَا يَبْقَى إِلَى حِينٍ: فَحَالَمَا يَحْدُثُ ضِيقٌ أَوِ اضْطِهَادٌ مِنْ أَجْلِ الْكَلِمَةِ، يَتَعَثَّرُ.

22أَمَّا الْمَزْرُوعُ بَيْنَ الأَشْوَاكِ، فَهُوَ الَّذِي يَسْمَعُ الْكَلِمَةَ، وَلكِنَّ هَمَّ الزَّمَانِ الْحَاضِرِ وَخِدَاعَ الْغِنَى يَخْنُقَانِ الْكَلِمَةَ، فَلا يُعْطِي ثَمَراً.

23وَأَمَّا الْمَزْرُوعُ فِي الأَرْضِ الْجَيِّدَةِ فَهُوَ الَّذِي يَسْمَعُ الْكَلِمَةَ وَيَفْهَمُهَا، وَهُوَ الَّذِي يُعْطِي ثَمَراً. فَيُنْتِجُ الْوَاحِدُ مِئَةً، وَالآخَرُ سِتِّينَ، وَغَيْرُهُ ثَلاثِينَ!»

مَثل الحشائش الغريبة

24وَضَرَبَ لَهُمْ مَثَلاً آخَرَ، قَالَ: «يُشَبَّهُ مَلَكُوتُ السَّمَاوَاتِ بِإِنْسَانٍ زَرَعَ زَرْعاً جَيِّداً فِي حَقْلِهِ. 25وَبَيْنَمَا النَّاسُ نَائِمُونَ، جَاءَ عَدُوُّهُ، وَزَرَعَ حَشَائِشَ غَرِيبَةً فِي وَسَطِ الْقَمْحِ، وَمَضَى. 26فَلَمَّا نَمَا الْقَمْحُ بِسَنَابِلِهِ، ظَهَرَتِ الحَشَائِشُ مَعَهُ. 27فَذَهَبَ عَبِيدُ رَبِّ الْبَيْتِ، وَقَالُوا لَهُ: يَا سَيِّدُ، أَمَا زَرَعْتَ حَقْلَكَ زَرْعاً جَيِّداً؟ فَمِنْ أَيْنَ جَاءَتْهُ الحَشَائِشُ؟ 28أَجَابَهُمْ إِنْسَانٌ عَدُوٌّ فَعَلَ هَذَا! فَسَأَلُوهُ: أَتُرِيدُ أَنْ نَذْهَبَ وَنَجْمَعَ الحَشَائشَ؟ 29أَجَابَهُمْ: لا، لِئَلّا تَقْلَعُوا الْقَمْحَ وَأَنْتُمْ تَجْمَعُونَ الحَشَائشَ. 30اُتْرُكُوهُمَا كِلَيْهِمَا يَنْمُوَانِ مَعاً حَتَّى الْحَصَادِ. وَفِي أَوَانِ الْحَصَادِ، أَقُولُ لِلْحَصَّادِينَ: الحَشَائشَ أَوَّلاً وَارْبِطُوهَا حُزَماً لِتُحْرَقَ. أَمَّا الْقَمْحُ، فَاجْمَعُوهُ إِلَى مَخْزَنِي».

مَثلا بِزرَة الخردل والخميرة

31وَضَرَبَ لَهُمْ مَثَلاً آخَرَ، قَالَ: «يُشَبَّهُ مَلَكُوتُ السَّمَاوَاتِ بِبِزْرَةِ خَرْدَلٍ أَخَذَهَا إِنْسَانٌ وَزَرَعَهَا فِي حَقْلِهِ. 32فَمَعَ أَنَّهَا أَصْغَرُ الْبُذُورِ كُلِّهَا، فَحِينَ تَنْمُو تُصْبِحُ أَكْبَرَ الْبُقُولِ جَمِيعاً، ثُمَّ تَصِيرُ شَجَرَةً، حَتَّى إِنَّ طُيُورَ السَّمَاءِ تَأْتِي وَتَبِيتُ فِي أَغْصَانِهَا».

33وَضَرَبَ لَهُمْ مَثَلاً آخَرَ، قَالَ: «يُشَبَّهُ مَلَكُوتُ السَّمَاوَاتِ بِخَمِيرَةٍ أَخَذَتْهَا امْرَأَةٌ وَأَخْفَتْهَا فِي ثَلاثَةِ مَقَادِيرَ مِنَ الدَّقِيقِ، حَتَّى اخْتَمَرَ الْعَجِينُ كُلُّهُ». 34هَذِهِ الأُمُورُ كُلُّهَا كَلَّمَ بِها يَسُوعُ الْجُمُوعَ بِأَمْثَالٍ. وَبِغَيْرِ مَثَلٍ لَمْ يَكُنْ يُكَلِّمُهُمْ، 35لِيَتِمَّ مَا قِيلَ بِلِسَانِ النَّبِيِّ الْقَائِلِ: «سَأَفْتَحُ فَمِي بِأَمْثَالٍ، وَأَكْشِفُ مَا كَانَ مَخْفِيًّا مُنْذُ إِنْشَاءِ الْعَالَمِ».

تفسير مثل الحشائش الغريبة

36ثُمَّ صَرَفَ يَسُوعُ الْجُمُوعَ وَرَجَعَ إِلَى الْبَيْتِ. فَتَقَدَّمَ إِلَيْهِ تَلامِيذُهُ وَقَالُوا: «فَسِّرْ لَنَا مَثَلَ حَشَائشِ الْحَقْلِ». 37فَأَجَابَهُمْ: «الزَّارِعُ الزَّرْعَ الْجَيِّدَ هُوَ ابْنُ الإِنْسَانِ. 38وَالْحَقْلُ هُوَ الْعَالَمُ. وَالزَّرْعُ الْجَيِّدُ هُوَ بَنُو الْمَلَكُوتِ. وَالحَشَائِشُ الْغَرِيبَةُ هُمْ بَنُو الشِّرِّيرِ. 39أَمَّا الْعَدُوُّ الَّذِي زَرَعَ الحَشَائشَ فَهُوَ إِبْلِيسُ. وَالْحَصَادُ هُوَ نِهَايَةُ الزَّمَانِ. وَالْحَصَّادُونَ هُمُ الْمَلائِكَةُ. 40وَكَمَا تُجْمَعُ الحَشَائشُ وَتُحْرَقُ بِالنَّارِ، هَكَذَا يَحْدُثُ فِي نِهَايَةِ الزَّمَانِ: 41يُرْسِلُ ابْنُ الإِنْسَانِ مَلائِكَتَهُ، فَيُخْرِجُونَ مِنْ مَلَكُوتِهِ جَمِيعَ الْمُفْسِدِينَ وَمُرْتَكِبِي الإِثْمِ، 42وَيَطْرَحُونَهُمْ فِي أَتُونِ النَّارِ، هُنَاكَ يَكُونُ الْبُكَاءُ وَصَرِيرُ الأَسْنَانِ. 43عِنْدَئِذٍ يُضِيءُ الأَبْرَارُ كَالشَّمْسِ فِي مَلَكُوتِ أَبِيهِمْ. مَنْ لَهُ أُذُنَانِ، فَلْيَسْمَعْ!

مَثل الكنز ومَثل اللؤلؤة

44يُشَبَّهُ مَلَكُوتُ السَّمَاوَاتِ بِكَنْزٍ مَطْمُورٍ فِي حَقْلٍ، وَجَدَهُ رَجُلٌ، فَعَادَ وَخَبَأَهُ. وَمِنْ فَرَحِهِ، ذَهَبَ وَبَاعَ كُلَّ مَا كَانَ يَمْلِكُ وَاشْتَرَى ذلِكَ الْحَقْلَ.

45وَيُشَبَّهُ مَلَكُوتُ السَّمَاوَاتِ أَيْضاً بِتَاجِرٍ كَانَ يَبْحَثُ عَنِ اللَّآلِئِ الْجَمِيلَةِ. 46فَمَا إِنْ وَجَدَ لُؤْلُؤَةً ثَمِينَةً جِدّاً، حَتَّى ذَهَبَ وَبَاعَ كُلَّ مَا يَمْلِكُ، وَاشْتَرَاهَا.

مَثل الشبكة

47وَيُشَبَّهُ مَلَكُوتُ السَّمَاوَاتِ أَيْضاً بِشَبَكَةٍ أُلْقِيَتْ فِي الْبَحْرِ، فَجَمَعَتْ مِنْ كُلِّ نَوْعٍ. 48وَلَمَّا امْتَلأَتْ، جَذَبَهَا الصَّيَّادُونَ إِلَى الشَّاطِئِ وَجَلَسُوا، ثُمَّ جَمَعُوا مَا كَانَ جَيِّداً فِي سِلالٍ، وَطَرَحُوا الرَّدِيءَ خَارِجاً. 49هكَذَا يَحْدُثُ فِي نِهَايَةِ الزَّمَانِ: يَأْتِي الْمَلائِكَةُ فَيُخْرِجُونَ الأَشْرَارَ مِنْ بَيْنِ الأَبْرَارِ، 50وَيَطْرَحُونَهُمْ فِي أَتُونِ النَّارِ، هُنَاكَ يَكُونُ الْبُكَاءُ وَصَرِيرُ الأَسْنَانِ.

51أَفَهِمْتُمْ هَذِهِ الأُمُورَ كُلَّهَا؟» أَجَابُوهُ: «نَعَمْ!» 52فَقَالَ: «وَلِهَذَا السَّبَبِ، فَأَيُّ وَاحِدٍ مِنَ الْكَتَبَةِ يَصِيرُ تِلْمِيذاً لِمَلَكُوتِ السَّمَاوَاتِ، يُشَبَّهُ بِإِنْسَانٍ رَبِّ بَيْتٍ يُطْلِعُ مِنْ كَنْزِهِ مَا هُوَ جَدِيدٌ وَمَا هُوَ عَتِيقٌ!»

نبي بلا كرامة

53وَبَعْدَمَا أَنْهَى يَسُوعُ هَذِهِ الأَمْثَالَ، انْتَقَلَ مِنْ هُنَاكَ.

54وَلَمَّا عَادَ إِلَى بَلْدَتِهِ، أَخَذَ يُعَلِّمُ الْيَهُودَ فِي مَجَامِعِهِمْ، حَتَّى دُهِشُوا وَتَسَاءَلُوا: «مِنْ أَيْنَ لَهُ هَذِهِ الْحِكْمَةُ وَهَذِهِ الْمُعْجِزَاتُ؟ 55أَلَيْسَ هُوَ ابْنَ النَّجَّارِ؟ أَلَيْسَتْ أُمُّهُ تُدْعَى مَرْيَمَ وَإخْوَتُهُ يَعْقُوبَ وَيُوسُفَ وَسِمْعَانَ وَيَهُوذَا؟ 56أَوَلَيْسَتْ أَخَوَاتُهُ جَمِيعاً عِنْدَنَا؟ فَمِنْ أَيْنَ لَهُ هَذِهِ كُلُّهَا؟» 57وَكَانُوا يَشُكُّونَ فِيهِ. أَمَّا هُوَ فَقَالَ لَهُمْ: «لا يَكُونُ النَّبِيُّ بِلا كَرَامَةٍ إِلّا فِي بَلْدَتِهِ وَبَيْتِهِ!» 58وَلَمْ يُجْرِ هُنَاكَ إِلّا مُعْجِزَاتٍ قَلِيلَةً، بِسَبَبِ عَدَمِ إِيمَانِهِمْ بِهِ.