New Chhattisgarhi Translation (नवां नियम छत्तीसगढ़ी)

मत्ती 13:1-58

बीज बोवइया के पटं‍तर

(मरकुस 4:1-9; लूका 8:4-8)

1ओहीच दिन, यीसू ह घर ले निकरिस, अऊ समुंदर के तीर म जाके बईठ गीस। 2तब ओकर चारों कोति अतेक बड़े भीड़ जुर गीस कि ओला जाके एक ठन डोंगा म बईठे पड़िस, अऊ जम्मो मनखेमन समुंदर के तीर म ठाढ़े रहंय। 3तब यीसू ह ओमन ला पटं‍तर म बहुंत बात बताईस। ओह कहिस, “एक किसान ह बीज बोय बर निकरिस। 4जब ओह बोवत रिहिस, त कुछू बीजामन रसता के तीर म गिरिन अऊ चिरईमन आके ओला चुग लीन। 5कुछू बीजामन पथर्री भुइयां म गिरिन, जिहां ओमन ला जादा माटी नइं मिलिस। ओ बीजामन जल्दी जाम गीन काबरकि उहां माटी ह गहिरा नइं रिहिस। 6पर जब सूरज निकरिस, त ओमन मुरझा गीन अऊ जरी नइं धरे रहय के कारन ओमन सूख गीन। 7कुछू बीजामन कंटिली झाड़ीमन के बीच म गिरिन अऊ ओ झाड़ीमन बढ़के ओमन ला दबा दीन। 8पर कुछू बीजामन बने भुइयां ऊपर गिरिन अऊ फर लानिन; कोनो सौ गुना, कोनो साठ गुना अऊ कोनो तीस गुना। 9जेकर कान हवय, ओह सुन ले।”

10चेलामन यीसू करा आके ओकर ले पुछिन, “तेंह मनखेमन संग पटं‍तर म काबर गोठियाथस?” 11ओह जबाब दीस, “स्‍वरग राज के भेद के गियान तुमन ला देय गे हवय, पर ओमन ला नइं।13:11 मरकुस 4:11 12काबरकि जेकर करा हवय, ओला अऊ दिये जाही अऊ ओकर करा बहुंत जादा हो जाही। पर जेकर करा नइं ए, ओकर करा ले ओला घलो ले लिये जाही, जऊन थोर बहुंत ओकर करा हवय। 13मेंह ओमन ले एकर कारन पटं‍तर म गोठियाथंव काबरकि ओमन देखत घलो नइं देखंय, अऊ सुनत घलो ओमन नइं सुनंय या समझंय।

14ओमन के बारे म यसायाह अगमजानी के ए अगमबानी ह पूरा होथे:

‘तुमन सुनहू जरूर,

पर कभू नइं समझहू,

अऊ तुमन देखहू जरूर,

पर कभू नइं सूझही।

15काबरकि ए मनखेमन के दिमाग ह मोटा हो गे हवय,

अऊ एमन अपन कान ले ऊंचहा सुने लगे हवंय।

अऊ एमन अपन आंखी ला मूंद ले हवंय। नइं तो एमन ह अपन आंखी ले देखतिन,

अपन कान ले सुनतिन,

अपन दिमाग ले समझतिन अऊ मोर कोति फिरतिन,

अऊ मेंह एमन ला चंगा कर देतेंव।’

16पर धइन अंय तुम्‍हर आंखीमन, काबरकि ओमन देखथें, अऊ धइन अंय तुम्‍हर कानमन, काबरकि ओमन सुनथें। 17मेंह तुमन ला सच कहथंव कि जऊन चीज ला तुमन देखत हव, ओला कतको अगमजानी अऊ धरमी मनखेमन देखे चाहत रिहिन, पर देखे नइं सकिन; अऊ जऊन गोठ ला तुमन सुनत हवव, ओला ओमन सुने चाहत रिहिन, पर सुने नइं सकिन।13:17 1यूहन्ना 1:1-2

18अब तुमन किसान के पटं‍तर के मतलब ला सुनव। 19जब कोनो मनखे स्‍वरग राज के बचन ला सुनथे अऊ ओला नइं समझय, त जऊन बचन ओकर हिरदय म बोय गय रहिथे, ओला दुस्‍ट सैतान ह आके छीन लेथे। एह ओ बीजा ए, जऊन ह रसता के तीर म बोय गय रिहिस। 20जऊन बीजा ह पथर्री भुइयां म बोय गे रिहिस, एह ओ मनखे अय, जऊन ह बचन ला सुनथे अऊ तुरते ओला आनंद सहित गरहन करथे। 21पर अपन म जरी नइं धरे रहय के कारन, ओह कुछू समय तक ही ठहरथे। जब बचन के सेति समस्या अऊ सताव आथे, त ओह तुरते बचन ले दूर हो जाथे। 22जऊन बीजा ह कंटिली झाड़ीमन के बीच म बोय गे रिहिस, एह ओ मनखे अय, जऊन ह बचन ला सुनथे, पर ए जिनगी के फिकर अऊ धन के लालच ह बचन ला दबा देथे अऊ ओह फर नइं लानय। 23पर जऊन बीजा ह बने भुइयां म बोय गय रिहिस, एह ओ मनखे अय, जऊन ह बचन ला सुनथे अऊ ओला समझथे। ओह फर लानथे; कोनो सौ गुना, कोनो साठ गुना अऊ कोनो तीस गुना।”

जंगली बीजा के पटं‍तर

24यीसू ह ओमन ला एक अऊ पटं‍तर सुनाईस, “स्‍वरग के राज ह ओ मनखे के सहीं अय, जऊन ह अपन खेत म बने बीजा ला बोईस। 25पर जब मनखेमन सुतत रिहिन, त ओ मनखे के बईरी ह आईस अऊ गहूं के बीच म जंगली बीजा ला बोके चल दीस। 26जब गहूं ह जामिस अऊ एकर बाली दिखे लगिस, त जंगली पौधा घलो दिखे लगिस।

27तब ओ खेत के मालिक के सेवकमन ओकर करा आईन अऊ कहिन, ‘मालिक, का तेंह अपन खेत म बने बीजा नइं बोय रहय? तब ओम ए जंगली पौधामन कहां ले आ गीन?’

28ओह ओमन ला कहिस, ‘एह कोनो बईरी के काम अय।’ तब सेवकमन ओकर ले पुछिन, ‘का तेंह चाहथस कि हमन जाके ओ जंगली पौधामन ला उखान दन?’ 29खेत के मालिक ह कहिस, ‘नइं, काबरकि जंगली पौधा ला उखानत बखत, हो सकथे कि तुमन ओमन के संग म गहूं ला घलो उखान डारव। 30लुवई के समय तक दूनों ला संगे-संग बढ़न देवव। लुवई के समय, मेंह लुवइयामन ला कहिहूं; पहिली जंगली पौधामन ला संकेलव अऊ जलाय बर ओमन के बोझा बांध लेवव। तब गहूं ला जमा करके मोर कोठार म ले आवव।’ ”

सरसों के बीजा अऊ खमीर के पटं‍तर

(मरकुस 4:30-32; लूका 13:18-19)

31यीसू ह ओमन ला एक अऊ पटं‍तर सुनाईस, “स्‍वरग के राज ह सरसों के एक बीजा के सहीं अय, जऊन ला लेके एक मनखे ह अपन खेत म बोईस। 32सरसों के बीजा ह तो जम्मो बीजामन ले छोटे होथे, पर जब एह बढ़थे, त जम्मो साग-भाजी ले बड़े हो जाथे अऊ अइसने रूख बन जाथे कि अकास के चिरईमन आके एकर डालीमन म बसेरा करथें13:32 ए किसम के सरसों के पौधा ह करीब तीन मीटर तक बढ़य।।”

33यीसू ह ओमन ला एक ठन अऊ पटं‍तर सुनाईस, “स्‍वरग के राज ह खमीर सहीं अय, जऊन ला एक माईलोगन ह लीस अऊ तीन पसेरी पिसान म तब तक मिलाईस जब तक कि ओ जम्मो पिसान ह खमीर नइं हो गीस13:33 खमीर के उपयोग पिसान ला फूलोय बर करे जावत रिहिस।।”

34यीसू ह मनखेमन ला ए जम्मो बात पटं‍तर म कहिस, अऊ बिगर पटं‍तर के ओह ओमन ला कुछू नइं कहत रिहिस। 35अइसने करे के दुवारा ओह अगमजानी के दुवारा कहे गय ए बात ला पूरा करिस:

“मेंह पटं‍तर म गोठियाहूं।

मेंह ओ बातमन ला उजागर करहूं, जऊन ह संसार के सिरजे के समय ले गुपत म हवय।”13:35 भजन-संहिता 78:2

जंगली बीजा के पटं‍तर के मतलब

36तब यीसू ह भीड़ ला छोंड़के घर के भीतर गीस। ओकर चेलामन ओकर करा आके कहिन, “खेत म जंगली बीजा के पटं‍तर के बारे म हमन ला समझा दे।”

37यीसू ह जबाब दीस, “जऊन मनखे ह बने बीजा ला बोईस, ओह मनखे के बेटा अय। 38खेत ह संसार अय, अऊ बने बीजा ह स्‍वरग राज के संतान अंय। जंगली बीजामन दुस्‍ट सैतान के संतान अंय, 39अऊ जऊन बईरी ह एमन ला बोथे, ओह सैतान अय। लुवई ह संसार के अंत अय, अऊ लुवइयामन स्‍वरगदूत अंय।

40जइसने जंगली पौधामन ला जमा करके आगी म बार दिये जाथे, वइसने संसार के अंत समय म होही। 41मनखे के बेटा ह अपन स्वरगदूतमन ला पठोही, अऊ ओमन ओकर राज के ओ जम्मो झन ला निकारहीं, जऊन मन मनखेमन के पाप के कारन बनथें अऊ जऊन मन कुकरम करथें। 42स्वरगदूतमन ओमन ला आगी के भट्ठी म झोंक दिहीं, जिहां ओमन रोहीं अऊ अपन दांत पीसहीं। 43तब धरमी मनखेमन अपन परमेसर के राज म सूरज सहीं चमकहीं। जेकर कान हवय, ओह सुन ले।”

गुपत खजाना अऊ मोती के पटं‍तर

44“स्‍वरग के राज ह एक खेत म छिपे खजाना के सहीं अय, जऊन ला एक मनखे ह पाईस, अऊ ओह ओला फेर लुका दीस। तब ओह खुसी म गीस अऊ अपन जम्मो कुछू ला बेंचके ओ खेत ला बिसो लीस।

45फेर, स्‍वरग के राज ह एक सौदागर के सहीं अय, जऊन ह सुघर मोती के खोज म रहिथे। 46जब ओला एक ठन महंगा मोती मिलथे, त ओह जाथे अऊ अपन जम्मो कुछू ला बेंचके ओ मोती ला बिसो लेथे।”

जाल के पटं‍तर

47“फेर स्‍वरग के राज ह एक जाल के सहीं अय, जऊन ला समुंदर म डारे गीस, अऊ ओम जम्मो किसम के मछरी फंसिन। 48जब जाल ह भर गीस त मछुआरमन ओला खींचके तीर म ले आईन। तब ओमन बईठ गीन अऊ बने मछरीमन ला निमार के टुकना म रखिन, अऊ खराप मछरीमन ला फटिक दीन। 49संसार के अंत समय म अइसनेच होही। स्वरगदूतमन आहीं, अऊ दुस्‍ट मनखेमन ला धरमीमन ले अलग करहीं, 50अऊ ओमन ला आगी के भट्ठी म झोंक दिहीं। उहां ओमन ह रोहीं अऊ अपन दांत पीसहीं।”

51यीसू ह अपन चेलामन ले पुछिस, “का तुमन ए जम्मो गोठ ला समझेव?” त ओमन ह कहिन, “हव जी।”

52यीसू ह ओमन ला कहिस, “एकरसेति, मूसा के कानून के हर ओ गुरू, जऊन ह स्‍वरग राज के सिकछा पा चुके हवय, ओह एक घर के मालिक सहीं अय, जऊन ह अपन भंडार ले नवां के संग-संग जुन्ना चीजमन ला निकारथे।”

एक अगमजानी बिगर आदरमान के

(मरकुस 6:1-6; लूका 4:16-30)

53यीसू ह ए पटं‍तरमन ला सुनाय के बाद उहां ले चल दीस। 54ओह अपन नगर म आईस, अऊ मनखेमन ला ओमन के सभा घर म सिकछा देवन लगिस। मनखेमन ओकर उपदेस ला सुनके चकित होईन अऊ कहिन, “ए मनखे ला, ए बुद्धि अऊ ए अचरज के काम करे के सामरथ कहां ले मिलिस? 55का एह बढ़ई के बेटा नो हय? का एकर दाई के नांव मरियम नो हय? का याकूब, यूसुफ, सिमोन अऊ यहूदा एकर भाई नो हंय? 56का एकर जम्मो बहिनीमन हमर बीच म नइं रहंय? तब ए मनखे ला ए जम्मो चीज कहां ले मिलिस?” 57अऊ ओमन ओकर ऊपर नराज होईन। पर यीसू ह ओमन ला कहिस, “सिरिप अपन सहर अऊ अपन घर ला छोंड़के, अगमजानी ह जम्मो जगह म आदरमान पाथे।”13:57 लूका 4:28-29

58मनखेमन के अबिसवास के कारन, ओह उहां जादा अचरज के काम नइं करिस।

Священное Писание

Матай 13:1-58

Притча о сеятеле и семенах

(Мк. 4:1-9; Лк. 8:4-8)

1В тот же день Иса, выйдя из дома, сидел у озера. 2Вокруг Него собрались большие толпы, так что Он вынужден был сесть в лодку, а весь народ стоял на берегу. 3И Он о многом говорил им в притчах.

– Сеятель вышел сеять, – говорил Иса. – 4Когда он разбрасывал семена, некоторые из них упали у самой дороги. Прилетели птицы и склевали их. 5Другие упали в каменистые места, где было мало плодородной почвы. Они быстро проросли, потому что почва была неглубокой13:5 Тонкий слой земли, лежащий на каменной породе, быстрее прогревается, что способствует быстрому росту растений.. 6Но когда взошло солнце, оно опалило ростки, и те засохли, так как у них не было глубоких корней. 7Другие семена попали в терновник, который разросся так, что заглушил ростки. 8Семена же, которые упали на хорошую почву, принесли урожай, одни во сто, другие в шестьдесят, третьи в тридцать раз больше того, что было посеяно. 9У кого есть уши, пусть слышит!

Объяснение притчи о сеятеле и семенах

(Мк. 4:10-20; Лк. 8:9-15; 10:23-24)

10Тогда ученики подошли и спросили Ису:

– Почему Ты говоришь с людьми притчами?

11Иса ответил:

– Вам дано знать тайны Царства Всевышнего, а им не дано. 12Потому что у кого есть, тому будет дано ещё, и у него будет в изобилии; а у кого нет, будет отнято и то, что он имеет. 13Я говорю им притчами, потому что они, смотря, не видят, слушая, не слышат и не понимают. 14В них исполняется пророчество Исаии:

«Вы будете слушать, но не поймёте,

будете смотреть, но не увидите.

15Сердце этого народа огрубело,

ушами с трудом слышат,

и глаза свои они закрыли,

чтобы не увидеть глазами,

не услышать ушами,

не понять сердцем

и не обратиться, чтобы Я исцелил их»13:14-15 Ис. 6:9-10..

16А ваши глаза благословенны, потому что они видят, и ваши уши – потому что они слышат. 17Говорю вам истину: много пророков и праведников жаждали увидеть то, что вы видите, но не увидели, желали услышать то, что вы слышите, но не услышали.

18Так послушайте, что значит притча о сеятеле. 19К каждому, кто слышит весть о Царстве и не понимает её, приходит дьявол и крадёт то, что было посеяно в сердце. Это – семя, упавшее у дороги. 20Семя, упавшее на каменистую почву, – это о человеке, который слышит слово и сразу же с радостью принимает его, 21но у него нет корня, и поэтому его хватает лишь на короткое время, и когда наступают трудности и гонения за слово, он сразу же отступается. 22Семя, посеянное среди терновника, – это о человеке, который слышит слово, но повседневные заботы и соблазны богатства заглушают слово, и семя остаётся бесплодным. 23Семя же, посеянное в хорошую почву, – это о человеке, который слышит слово и понимает его. Такой человек приносит плод, кто во сто, кто в шестьдесят, кто в тридцать раз больше посеянного.

Притча о пшенице и сорняках

24Рассказал им Иса и другую притчу:

– Царство Всевышнего можно сравнить с человеком, засеявшим своё поле хорошими семенами. 25И вот когда все спали, пришёл его враг, посеял среди пшеницы сорняки и ушёл. 26Когда пшеница взошла и появились колосья, то стали заметны и сорняки. 27Рабы пришли к хозяину и говорят: «Господин, ты же сеял на поле хорошие семена, откуда же появились сорняки?» 28«Это сделал враг», – ответил хозяин. Тогда рабы спрашивают: «Может нам пойти и выполоть их?» 29«Нет, – ответил хозяин, – когда вы будете вырывать сорняки, вы можете нечаянно выдернуть и пшеницу. 30Пусть и то, и другое растёт до жатвы. А во время жатвы я велю жнецам собрать вначале сорняки, связать их в пучки и сжечь, а затем собрать пшеницу в моё хранилище».

Притча о горчичном зерне

(Мк. 4:30-32; Лк. 13:18-19)

31Рассказал Он им и ещё одну притчу:

– Царство Всевышнего можно сравнить с горчичным зерном, которое человек взял и посеял в поле. 32Хотя горчичное зерно и самое маленькое из всех семян, но когда оно вырастает, то становится больше огородных растений и превращается в настоящее дерево, так что даже птицы небесные прилетают и вьют гнёзда в его ветвях13:32 Ср. Дан. 4:7-9..

Притча о закваске

(Мк. 4:33-34; Лк. 13:20-21)

33И ещё одну притчу рассказал им Иса:

– Царство Всевышнего как закваска, которую женщина смешала с большим количеством13:33 Букв.: «три саты». Это, вероятно, около 36 л (23 кг муки). муки, чтобы вскисло всё тесто.

34Всё это Иса говорил народу в притчах и ничего не объяснял без притч, 35чтобы исполнилось сказанное через пророка:

«Я буду говорить притчами,

расскажу то, что было скрыто от создания мира»13:35 Заб. 77:2..

Объяснение притчи о пшенице и сорняках

36Потом Иса отпустил народ и вошёл в дом. Его ученики подошли к Нему и попросили:

– Объясни нам притчу о сорняках в поле.

37Иса в ответ сказал:

– Сеющий хорошие семена – это Ниспосланный как Человек. 38Поле – это мир, а хорошие семена – это те, кто принадлежит Царству. Сорняки – это те, кто принадлежит дьяволу. 39Враг, посеявший их, – это дьявол. Жатва – это конец мира, и жнецы – это ангелы. 40Как сорняки вырывают и сжигают в огне, так будет и в конце мира. 41Ниспосланный как Человек пошлёт Своих ангелов, и они удалят из Его Царства всё, что ведёт ко греху, и всех, делающих злое. 42Их бросят в огненную печь, где будет плач и скрежет зубов. 43А праведники тогда будут сиять, как солнце, в Царстве их Отца. У кого есть уши, пусть слышит!

Притча о спрятанном сокровище

44– Царство Всевышнего можно сравнить со спрятанным в поле кладом. Когда человек находит тот клад, он прячет его и радостный идёт и продаёт всё, что имеет, для того, чтобы купить это поле.

Притча о драгоценной жемчужине

45– Ещё Царство Всевышнего подобно купцу, который ищет прекрасный жемчуг. 46Найдя драгоценную жемчужину, он продаёт всё, что имеет, ради того, чтобы купить её одну.

Притча о рыболовной сети

47– Ещё Царство Всевышнего подобно сети, опущенной в озеро, в которую попало много разной рыбы. 48Когда сеть наполнилась, рыбаки вытащили её на берег. Потом они сели и отобрали хорошую рыбу в корзины, а плохую выбросили. 49Так будет и в конце мира. Придут ангелы, заберут злых из среды праведных 50и бросят их в пылающую печь, где будет плач и скрежет зубов.

51– Вы поняли всё это? – спросил Иса.

– Да, – ответили ученики.

52Тогда Иса сказал им:

– Так вот, каждый учитель Таурата, усвоивший весть о Царстве Всевышнего, похож на хозяина дома, который выносит из своих кладовых и новое, и старое.

Отвержение Исы Масиха в Его родном городе

(Мк. 6:1-6; Лк. 4:16-30)

53Когда Иса закончил рассказывать эти притчи, Он ушёл оттуда 54и, придя в Свой родной город, начал учить людей в молитвенном доме иудеев, так что они удивлялись:

– Откуда у Этого Человека такая мудрость и такая сила? 55Разве Он не сын плотника? Не Марьям ли зовут Его мать, и разве Он не брат Якуба, Иосии13:55 Или: «Юсуфа». Иосия – вариант имени Юсуф., Шимона и Иуды? 56Разве не среди нас живут все Его сёстры? Откуда же у Него всё это? – 57И они отвергли Его.

Иса же сказал им:

– Пророка уважают везде, только не на его родине и не в его доме.

58И Он не совершил там многих чудес из-за неверия этих людей.