New Amharic Standard Version

ዮሐንስ 6:1-71

ኢየሱስ አምስት ሺህ ሕዝብ መገበ

6፥1-13 ተጓ ምብ – ማቴ 14፥13-21፤ ማር 6፥32-44፤ ሉቃ 9፥10-17

1ከዚህ በኋላ ኢየሱስ ጥብርያዶስ የተባለውን የገሊላ ባሕር ተሻግሮ ራቅ ወዳለው የባሕሩ ዳርቻ ሄደ። 2ብዙ ሰዎችም በሽተኞችን በመፈወስ ያደረጋቸውን ታምራዊ ምልክቶች ስላዩ ተከተሉት። 3ከዚያም ኢየሱስ ወደ ተራራ ወጥቶ ከደቀ መዛሙርቱ ጋር ተቀመጠ። 4የአይሁድ የፋሲካ በዓልም ተቃርቦ ነበር።

5ኢየሱስም ቀና ብሎ ሲመለከት ብዙ ሕዝብ ወደ እርሱ ሲመጣ አየ፤ ፊልጶስንም፣ “እነዚህ ሰዎች እንዲበሉ እንጀራ ከየት እንግዛ?” አለው። 6ይህን የጠየቀው ሊፈትነው እንጂ ራሱ ሊያደርግ ያሰበውን ያውቅ ነበር።

7ፊልጶስም፣ “እያንዳንዱ ሰው ትንሽ ትንሽ እንዲቃመስ ለማድረግ፣ የሁለት መቶ ዲናር6፥7 ወይም የስምንት ወር ደመወዝ እንጀራ እንኳ አይበቃም” ሲል መለሰ።

8ከደቀ መዛሙርቱ አንዱ፣ የስምዖን ጴጥሮስ ወንድም እንድርያስም፣ እንዲህ አለ፤ 9“አምስት ትንንሽ የገብስ እንጀራና ሁለት ትንንሽ ዓሣ የያዘ አንድ ልጅ እዚህ አለ፤ ይህ ግን ለዚህ ሁሉ ሕዝብ እንዴት ይዳረሳል?”

10ኢየሱስም፣ “ሰዎቹ እንዲቀመጡ አድርጉ” አለ። በዚያ ቦታ ብዙ ሣር ነበረ፤ አምስት ሺህ ያህል ወንዶችም ተቀመጡ። 11ኢየሱስ አምስቱን እንጀራ አንሥቶ አመሰገነ፤ ለተቀመጡትም የሚፈልጉትን ያህል ዐደለ፤ ዓሣውንም እንዲሁ።

12ሁሉም በልተው ከጠገቡ በኋላ፣ ደቀ መዛሙርቱን፣ “ከተረፈው ቊርስራሽ ምንም እንዳ ይባክን ሰብስቡ” አላቸው። 13እነርሱም፣ ከተበላው አምስት የገብስ እንጀራ የተረፈውን ቊርስራሽ ሰብስበው ዐሥራ ሁለት መሶብ ሞሉ።

14ሰዎቹም ኢየሱስ ያደረገውን ታምራዊ ምልክት ካዩ በኋላ፣ “ወደ ዓለም የሚመጣው ነቢይ በርግጥ ይህ ነው” አሉ። 15ኢየሱስም ሰዎቹ መጥተው በግድ ሊያነግሡት እንዳሰቡ ዐውቆ እንደ ገና ብቻውን ወደ ተራራ ገለል አለ።

ኢየሱስ በውሃ ላይ እየተራመደ ሄደ

6፥16-21 ተጓ ምብ – ማቴ 14፥22-33፤ ማር 6፥47-51

16በመሸም ጊዜ ደቀ መዛሙርቱ ወደ ባሕር ወረዱ፤ 17በጀልባውም ተሳፍረው ወደ ቅፍርናሆም ለመሻገር ተነሡ። ጊዜው መሽቶ ነበር፤ ኢየሱስም ወደ እነርሱ ገና አልመጣም ነበር። 18ኀይለኛ ነፋስ ይነፍስ ስለ ነበር ባሕሩ ተናወጠ። 19አምስት ወይም ስድስት ኪሎ ሜትር6፥19 በግሪኩ ሃያ አምስት ወይም ሠላሳ ምዕራፍ ቀዘፉ ይላል ያህል እንደ ቀዘፉ፣ ኢየሱስ በውሃ ላይ እየተራመደ ወደ ጀልባዋ ሲመጣ አይተው ደነገጡ። 20እርሱ ግን፣ “እኔ ነኝ፤ አትፍሩ” አላቸው። 21እነርሱም እንዲሳፈር ፈለጉ፤ ጀልባዋም ወዲያውኑ ወደሚሄዱበት ዳርቻ ደረሰች።

22በማግሥቱ በባሕሩ ማዶ የቀሩት ሰዎች በዚያ አንዲት ጀልባ ብቻ እንደ ነበረች ተረዱ፤ ኢየሱስ እንዳልተሳፈረና ደቀ መዛሙርቱ ብቻቸውን እንደሄዱም ዐወቁ። 23ከዚያም በኋላ፣ ሌሎች ጀልባዎች ከጥብር ያዶስ፣ ሕዝቡ ጌታ የባረከውን እንጀራ ወደ በላበት ስፍራ መጡ። 24ሰዎቹም፣ ኢየሱስ ወይም ደቀ መዛሙርቱ በዚያ አለመኖራቸውን እንዳወቁ፣ ኢየሱስን ፍለጋ በጀልባዎቹ ወደ ቅፍርናሆም ሄዱ።

ኢየሱስ የሕይወት እንጀራ

25ከባሕሩ ማዶ ባገኙትም ጊዜ፣ “ረቢ፤ መቼ ወደዚህ መጣህ?” አሉት።

26ኢየሱስም እንዲህ ሲል መለሰላቸው፤ “እውነት እላችኋለሁ የምትፈልጉኝ እንጀራ ስለ በላችሁና ስለ ጠገባችሁ እንጂ፣ ታምራዊ ምልክቶችን ስላያችሁ አይደለም። 27ለሚጠፋ እንጀራ አትሥሩ፤ ነገር ግን የሰው ልጅ ለሚሰጣችሁ ለዘላለም ሕይወት ለሚኖር ምግብ ሥሩ፤ ለዚህም እግዚአብሔር አብ ማረጋገጫ ማኅተሙን በእርሱ ላይ አትሞአልና።”

28እነርሱም፣ “ታዲያ የእግዚአብሔርን ሥራ ለመሥራት ምን ማድረግ አለብን?” አሉት።

29ኢየሱስም፣ “እርሱ በላከው ታምኑ ዘንድ፣ ይህ የእግዚአብሔር ሥራ ነው” ሲል መለሰላቸው።

30ስለዚህ እንዲህ ብለው ጠየቁት፤ “አይተን እንድናምንህ ምን ታምራዊ ምልክት ታደርጋለህ? ምንስ ትሠራለህ? 31‘ይበሉ ዘንድ ከሰማይ እንጀራን ሰጣቸው’ ተብሎ እንደ ተጻፈ፣ አባቶቻችን በምድረ በዳ መና በሉ።”

32ኢየሱስም እንዲህ አላቸው፤ “እውነት እላችኋለሁ፤ ከሰማይ እንጀራ የሰጣችሁ ሙሴ አይደለም፤ እውነተኛውን እንጀራ ከሰማይ የሚሰጣችሁ ግን አባቴ ነው፤ 33የእግዚአብሔር እንጀራ እርሱ ከሰማይ የሚወርድ፣ ለዓለምም ሕይወትን የሚሰጥ ነውና።”

34እነርሱም፣ “ጌታ፣ እንግዲያውስ ይህን እንጀራ ሁል ጊዜ ስጠን” አሉት።

35ኢየሱስም እንዲህ አላቸው፤ “የሕይወት እንጀራ እኔ ነኝ፤ ወደ እኔ የሚመጣ ከቶ አይራብም፤ በእኔም የሚያምን ፈጽሞ አይጠማም። 36ነገር ግን እንደ ነገርኋችሁ፣ አይታችሁኝም እንኳ አታምኑም። 37አብ የሚሰጠኝ ሁሉ ወደ እኔ ይመጣል፤ ወደ እኔ የሚመጣውንም ከቶ ወደ ውጭ አላወጣውም፤ 38ከሰማይ የወረድሁት የራሴን ፈቃድ ለማድረግ ሳይሆን፣ የላከኝን የእርሱን ፈቃድ ለመፈጸም ነውና፤ 39የላከኝም ፈቃድ፣ ከሰጠኝ ሁሉ አንድ እንኳ ሳይጠፋብኝ በመጨረሻው ቀን እንዳስነሣ ነው። 40የአባቴ ፈቃድ ወልድን አይቶ በእርሱ የሚያምን ሁሉ የዘላለም ሕይወት እንዲኖረው ነው፤ እኔም በመጨረሻው ቀን አስነሣዋለሁ።”

41አይሁድም፣ “ከሰማይ የወረደ እንጀራ እኔ ነኝ” በማለቱ ያጒረመርሙበት ጀመር። 42ደግሞም፣ “ይህ አባቱንና እናቱን የምናውቃቸው፣ የዮሴፍ ልጅ ኢየሱስ አይደለምን? ታዲያ አሁን እንዴት፣ ‘ከሰማይ ወረድሁ ይላል’” አሉ።

43ኢየሱስም መልሶ እንዲህ አላቸው፤ “እርስ በርሳችሁ አታጒረምርሙ፤ 44የላከኝ አብ ካልሳበው በቀር ማንም ወደ እኔ መምጣት አይችልም፤ እኔም በመጨረሻው ቀን አስነሣዋለሁ። 45በነቢያትም፣ ‘ሁሉም ከእግዚአብሔር የተማሩ ይሆናሉ’ ተብሎ ተጽፎአል፤ አብን የሚሰማና ከእርሱም የሚማር ሁሉ ወደ እኔ ይመጣል። 46ከእግዚአብሔር ዘንድ ከሆነው በቀር አብን ያየ ማንም የለም፤ አብን ያየው እርሱ ብቻ ነው። 47እውነት እላችኋለሁ፤ የሚያምን ሁሉ የዘላለም ሕይወት አለው። 48የሕይወት እንጀራ እኔ ነኝ። 49አባቶቻችሁ በምድረ በዳ መና በሉ፤ ይሁን እንጂ ሞቱ። 50ነገር ግን ሰው እንዳይሞት ይበላው ዘንድ ከሰማይ የሚወርድ እንጀራ ይህ ነው። 51ከሰማይ የወረደ ሕያው እንጀራ እኔ ነኝ፤ ማንም ሰው ከዚህ እንጀራ ቢበላ ለዘላለም ይኖራል፤ ይህም እንጀራ፣ ለዓለም ሕይወት እንዲሆን የምሰጠው ሥጋዬ ነው።”

52አይሁድም፣ “እንበላ ዘንድ ይህ ሰው ሥጋውን እንዴት ሊሰጠን ይችላል?” እያሉ እርስ በርሳቸው አጥብቀው ይከራከሩ ጀመር።

53ኢየሱስም እንዲህ አላቸው፤ “እውነት እላችኋለሁ፤ የሰውን ልጅ ሥጋውን ካልበላችሁና ደሙንም ካልጠጣችሁ በራሳችሁ ሕይወት የላችሁም። 54ሥጋዬን የሚበላ፣ ደሜንም የሚጠጣ የዘላለም ሕይወት አለው፤ እኔም በመጨረሻው ቀን አስነሣዋለሁ፤ 55ሥጋዬ እውነተኛ ምግብ፣ ደሜም እውነተኛ መጠጥ ነውና፤ 56ሥጋዬን የሚበላ፣ ደሜንም የሚጠጣ በእኔ ይኖራል፤ እኔም በእርሱ እኖራለሁ። 57ሕያው አብ እንደ ላከኝ፣ እኔም ከእርሱ የተነሣ በሕይወት እንደምኖር፣ የሚበላኝም እንዲሁ ከእኔ የተነሣ በሕይወት ይኖራል። 58ከሰማይ የወረደ እንጀራ ይህ ነው፤ አባቶቻችሁ መና በሉ፤ ሞቱም፤ ይህን እንጀራ የሚበላ ግን ለዘላለም ይኖራል።” 59ይህን የተናገረው በቅፍርናሆም፣ በምኲራብ እያስተማረ ሳለ ነበር።

ብዙ ደቀ መዛሙርት ኢየሱስን መከተል ተዉ

60ከደቀ መዛሙርቱ ብዙዎች ይህን ሲሰሙ፣ “ይህ የሚያስጨንቅ ቃል ነው፤ ማንስ ሊቀበለው ይችላል?” አሉ።

61ደቀ መዛሙርቱም በዚህ ነገር ማጒረም ረማቸውን ኢየሱስ በገዛ ራሱ ተረድቶ፣ እንዲህ አላቸው፤ “ይህ ዕንቅፋት ይሆንባችኋልን? 62ታዲያ፣ የሰው ልጅ ቀድሞ ወደነበረበት ሲወጣ ብታዩ ምን ልትሉ ነው? 63መንፈስ ሕይወትን ይሰጣል፤ ሥጋ ግን ምንም አይጠቅምም። እኔ የነገርኋችሁ ቃል መንፈስም ሕይወትም ነው፤ 64ይሁን እንጂ ከእናንተ የማያምኑ አንዳንዶች አሉ።” ይህም፣ ኢየሱስ እነማን እንዳላመኑና ማን አሳልፎ እንደሚሰጠው ቀድሞውኑ ያውቅ ስለ ነበር ነው። 65ቀጥሎም፣ “ ‘ከአብ ካልተሰጠው በቀር፣ ማንም ወደ እኔ ሊመጣ አይችልም’ ያልኋችሁ ለዚህ ነው” አለ።

66ከዚህም በኋላ ከደቀ መዛሙርቱ ብዙዎች ወደ ኋላ ተመለሱ፤ ከዚያም ወዲያ አልተከተሉትም።

67ኢየሱስም ዐሥራ ሁለቱን፣ “እናንተም ደግሞ መሄድ ትፈልጋላችሁ?” አላቸው።

68ስምዖን ጴጥሮስም እንዲህ ሲል መለሰለት፤ “ጌታ ሆይ፤ ወደ ማን እንሄዳለን? አንተ የዘላለም ሕይወት ቃል አለህ፤ 69አንተ አንድያ የእግዚአብሔር ቅዱስ እንደሆንህ አምነናል፤ ዐውቀናልም።”

70ኢየሱስም መልሶ፣ “ዐሥራ ሁለታችሁንም የመረጥኋችሁ እኔ አይደለሁምን? ነገር ግን ከእናንተ አንዱ ዲያብሎስ ነው” አላቸው። 71የአስቆሮቱ የስምዖን ልጅ ይሁዳ፣ ከዐሥራ ሁለቱ አንዱ ቢሆንም፣ ኋላ አሳልፎ ስለሚሰጠው ስለ እርሱ መናገሩ ነበር።

Hindi Contemporary Version

योहन 6:1-71

पांच हज़ार को भोजन

1इन बातों के बाद मसीह येशु गलील अर्थात तिबेरियॉस झील के उस पार चले गए. 2उनके द्वारा रोगियों को स्वास्थ्यदान के अद्भुत चिह्नों से प्रभावित एक बड़ी भीड़ उनके साथ हो ली. 3मसीह येशु पर्वत पर जाकर वहां अपने शिष्यों के साथ बैठ गए. 4यहूदियों का फ़सह उत्सव पास था.

5जब मसीह येशु ने बड़ी भीड़ को अपनी ओर आते देखा तो फ़िलिप्पॉस से पूछा, “इन सबको खिलाने के लिए हम भोजन कहां से मोल लेंगे?” 6मसीह येशु ने यह प्रश्न उन्हें परखने के लिए किया था क्योंकि वह जानते थे कि वह क्या करने पर थे.

7फ़िलिप्पॉस ने उत्तर दिया, “दो सौ दीनार की रोटियां भी उनके लिए पर्याप्त नहीं होंगी कि हर एक को थोड़ी-थोड़ी मिल पाए.”

8मसीह येशु के शिष्य शिमओन पेतरॉस के भाई आन्द्रेयास ने उन्हें सूचित किया, 9“यहां एक लड़का है, जिसके पास जौ की पांच रोटियां और दो मछलियां हैं किंतु उनसे इतने लोगों का क्या होगा?”

10मसीह येशु ने कहा, “लोगों को बैठा दो” और वे सब, जिनमें पुरुषों की ही संख्या पांच हज़ार थी, घनी घास पर बैठ गए. 11तब मसीह येशु ने रोटियां लेकर धन्यवाद दिया और उनकी ज़रूरत के अनुसार बांट दीं और उसी प्रकार मछलियां भी.

12जब वे सब तृप्त हो गए तो मसीह येशु ने अपने शिष्यों को आज्ञा दी, “शेष टुकड़ों को इकट्ठा कर लो कि कुछ भी नाश न हो,” 13उन्होंने जौ की उन पांच रोटियों के शेष टुकड़े इकट्ठा किए, जिनसे बारह टोकरे भर गए.

14लोगों ने इस अद्भुत चिह्न को देखकर कहा, “निस्संदेह यह वही भविष्यवक्ता हैं, संसार जिनकी प्रतीक्षा कर रहा है.” 15जब मसीह येशु को यह मालूम हुआ कि लोग उन्हें ज़बरदस्ती राजा बनाने के उद्देश्य से ले जाना चाहते हैं तो वह फिर से पर्वत पर अकेले चले गए.

मसीह येशु का जल सतह पर चलना

16जब संध्या हुई तो मसीह येशु के शिष्य झील के तट पर उतर गए. 17अंधेरा हो चुका था और मसीह येशु अब तक उनके पास नहीं पहुंचे थे. उन्होंने नाव पर सवार होकर गलील झील के दूसरी ओर कफ़रनहूम नगर के लिए प्रस्थान किया. 18उसी समय तेज हवा के कारण झील में लहरें बढ़ने लगीं. 19नाव को लगभग पांच किलोमीटर खेने के बाद शिष्यों ने मसीह येशु को जल सतह पर चलते और नाव की ओर आते देखा. यह देखकर वे भयभीत हो गए. 20मसीह येशु ने उनसे कहा, “भयभीत मत हो, मैं हूं.” 21यह सुन शिष्य मसीह येशु को नाव में चढ़ाने को तैयार हो गए. इसके बाद नाव उस स्थान पर पहुंच गई जहां उन्हें जाना था.

22अगले दिन झील के उस पार रह गई भीड़ को मालूम हुआ कि वहां केवल एक छोटी नाव थी और मसीह येशु शिष्यों के साथ उसमें नहीं गए थे—केवल शिष्य ही उसमें दूसरे पार गए थे. 23तब तिबेरियास नगर से अन्य नावें उस स्थान पर आईं, जहां प्रभु ने बड़ी भीड़ को भोजन कराया था. 24जब भीड़ ने देखा कि न तो मसीह येशु वहां हैं और न ही उनके शिष्य, तो वे मसीह येशु को खोजते हुए नावों द्वारा कफ़रनहूम नगर पहुंच गए.

मसीह येशु—जीवन-रोटी

25झील के इस पार मसीह येशु को पाकर उन्होंने उनसे पूछा, “रब्बी, आप यहां कब पहुंचे?”

26मसीह येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “मैं तुम पर यह अटल सच्चाई प्रकट कर रहा हूं: तुम मुझे इसलिये नहीं खोज रहे कि तुमने अद्भुत चिह्न देखे हैं परंतु इसलिये कि तुम रोटियां खाकर तृप्त हुए हो. 27उस भोजन के लिए मेहनत मत करो, जो नाशमान है परंतु उसके लिए, जो अनंत जीवन तक ठहरता है, जो मनुष्य का पुत्र तुम्हें देगा क्योंकि पिता अर्थात परमेश्वर ने समर्थन के साथ मात्र उसी को यह अधिकार सौंपा है.”

28इस पर उन्होंने मसीह येशु से पूछा, “हमसे परमेश्वर की इच्छा क्या है?”

29“यह कि तुम परमेश्वर के भेजे हुए पर विश्वास करो,” मसीह येशु ने उत्तर दिया.

30इस पर उन्होंने मसीह येशु से दोबारा पूछा, “आप ऐसा कौन सा अद्भुत चिह्न दिखा सकते हैं कि हम आप में विश्वास करें? क्या है वह काम? 31हमारे पूर्वजों ने जंगल में मन्ना खाया; पवित्र शास्त्र के अनुसार: भोजन के लिए परमेश्वर ने उन्हें स्वर्ग से रोटी दी.”6:31 निर्ग 16:4; नेहे 9:15; स्तोत्र 78:24, 25

32इस पर मसीह येशु ने उनसे कहा, “मैं तुम पर यह अटल सच्चाई प्रकट कर रहा हूं: स्वर्ग से वह रोटी तुम्हें मोशेह ने नहीं दी; मेरे पिता ही हैं, जो तुम्हें स्वर्ग से वास्तविक रोटी देते हैं. 33क्योंकि परमेश्वर की रोटी वह है, जो स्वर्ग से आती है, और संसार को जीवन प्रदान करती है.”

34यह सुनकर उन्होंने विनती की, “प्रभु, अब से हमें यही रोटी दें.”

35इस पर मसीह येशु ने घोषणा की, “मैं ही हूं वह जीवन की रोटी. जो मेरे पास आएगा, वह भूखा न रहेगा और जो मुझमें विश्वास करेगा, कभी प्यासा न रहेगा. 36मैं तुमसे पहले भी कह चुका हूं कि तुम मुझे देखकर भी मुझमें विश्वास नहीं करते. 37वे सभी, जो पिता ने मुझे दिए हैं, मेरे पास आएंगे और हर एक, जो मेरे पास आता है, मैं उसको कभी भी न छोड़ूंगा. 38मैं स्वर्ग से अपनी इच्छा पूरी करने नहीं, अपने भेजनेवाले की इच्छा पूरी करने के लिए आया हूं. 39मेरे भेजनेवाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उन्होंने मुझे सौंपा है, उसमें से मैं कुछ भी न खोऊं परंतु अंतिम दिन में उसे फिर से जीवित करूं. 40क्योंकि मेरे पिता की इच्छा यह है कि हर एक, जो पुत्र को अपनाकर उसमें विश्वास करे, वह अनंत काल का जीवन प्राप्त करे तथा मैं उसे अंतिम दिन में फिर से जीवित करूं.”

41मसीह येशु का यह दावा सुनकर: “स्वर्ग से उतरी रोटी मैं ही हूं,” यहूदी कुड़कुड़ाने लगे 42और आपस में मंत्रणा करने लगे, “क्या यह योसेफ़ का पुत्र येशु नहीं, जिसके माता-पिता को हम जानते हैं? तो अब यह कैसे कह रहा है कि यह स्वर्ग से आया है?”

43यह जानकर मसीह येशु ने उनसे कहा, “कुड़कुड़ाओ मत, 44कोई भी मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक मेरे भेजनेवाले—पिता—उसे अपनी ओर खींच न लें. मैं उसे अंतिम दिन में फिर से जीवित करूंगा. 45भविष्यद्वक्ताओं के अभिलेख में यह लिखा हुआ है: वे सब परमेश्वर द्वारा सिखाए हुए होंगे,6:45 यशा 54:13 अतः हर एक, जिसने पिता परमेश्वर को सुना और उनसे सीखा है, मेरे पास आता है. 46किसी ने पिता परमेश्वर को नहीं देखा सिवाय उसके, जो पिता परमेश्वर से है, केवल उसी ने उन्हें देखा है. 47मैं तुम पर एक अटल सच्चाई प्रकट कर रहा हूं: अनंत काल का जीवन उसी का है, जो विश्वास करता है. 48मैं ही हूं जीवन की रोटी. 49जंगल में तुम्हारे पूर्वजों ने मन्ना खाया फिर भी उनकी मृत्यु हो गई. 50मैं ही स्वर्ग से उतरी रोटी हूं कि जो कोई इसे खाए, उसकी मृत्यु न हो. 51मैं ही स्वर्ग से उतरी जीवन की रोटी हूं. जो कोई यह रोटी खाता है, वह हमेशा जीवित रहेगा. जो रोटी मैं दूंगा, वह संसार के जीवन के लिए भेंट मेरा शरीर है.”

52यह सुनकर यहूदी आपस में विवाद करने लगे, “यह व्यक्ति कैसे हमें अपना शरीर खाने के लिए दे सकता है?”

53मसीह येशु ने उनसे कहा, “मैं तुम पर यह अटल सच्चाई प्रकट कर रहा हूं: जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का शरीर न खाओ और उसका लहू न पियो, तुममें जीवन नहीं. 54अनंत काल का जीवन उसी का है, जो मेरा शरीर खाता और मेरा लहू पीता है; अंतिम दिन मैं उसे फिर से जीवित करूंगा. 55मेरा शरीर ही वास्तविक भोजन और मेरा लहू ही वास्तविक पेय है. 56जो मेरा शरीर खाता और मेरा लहू पीता है, वही है, जो मुझमें बना रहता है और मैं उसमें. 57जैसे जीवन्त पिता परमेश्वर ने मुझे भेजा है और मैं पिता के कारण जीवित हूं, वैसे ही वह भी, जो मुझे ग्रहण करता है, मेरे कारण जीवित रहेगा. 58यह वह रोटी है, जो स्वर्ग से उतरी हुई है; वैसी नहीं, जो पूर्वजों ने खाई और फिर भी उनकी मृत्यु हो गई; परंतु वह, जो यह रोटी खाता है, हमेशा जीवित रहेगा.” 59मसीह येशु ने ये बातें कफ़रनहूम नगर के यहूदी सभागृह में शिक्षा देते हुए बताईं.

अनेक शिष्यों द्वारा मसीह येशु का त्याग

60यह बातें सुनकर उनके अनेक शिष्यों ने कहा, “बहुत कठोर है यह शिक्षा. कौन इसे स्वीकार कर सकता है?”

61अपने चेलों की बड़बड़ाहट का अहसास होने पर मसीह येशु ने कहा, “क्या यह तुम्हारे लिए ठोकर का कारण है? 62तुम तब क्या करोगे जब तुम मनुष्य के पुत्र को ऊपर स्वर्ग में जाते देखोगे, जहां वह पहले था? 63आत्मा ही हैं, जो शरीर को जीवन देती है. केवल शरीर का कुछ महत्व नहीं. जो शब्द मैंने तुमसे कहे हैं, वे आत्मा हैं और जीवन भी. 64फिर भी तुममें कुछ हैं, जो मुझमें विश्वास नहीं करते.” मसीह येशु प्रारंभ से जानते थे कि कौन हैं, जो उनमें विश्वास नहीं करेंगे और कौन है वह, जो उनके साथ धोखा करेगा. 65तब मसीह येशु ने आगे कहा, “इसलिये मैंने तुमसे यह कहा कि कोई भी मेरे पास तब तक नहीं आ सकता जब तक पिता उसे मेरे पास न आने दें.”

66इसके परिणामस्वरूप मसीह येशु के अनेक चेले पीछे हट गए और उनके पीछे चलना छोड़ दिया.

67यह देख मसीह येशु ने अपने बारह शिष्यों से अभिमुख हो उनसे पूछा, “कहीं तुम भी तो लौट जाना नहीं चाहते?”

68शिमओन पेतरॉस ने उत्तर दिया, “प्रभु, हम किसके पास जाएं? अनंत काल के जीवन की बातें तो आप ही के पास हैं. 69हमने विश्वास किया और जान लिया है कि आप ही परमेश्वर के पवित्र जन हैं.”

70मसीह येशु ने उनसे कहा, “क्या स्वयं मैंने तुम बारहों को नहीं चुना? यह होने पर भी तुममें से एक इबलीस है.” 71(उनका इशारा शिमओन के पुत्र कारियोतवासी यहूदाह की ओर था क्योंकि उन बारह शिष्यों में से वही मसीह येशु के साथ धोखा करने पर था.)