New Amharic Standard Version

ሐዋርያት ሥራ 28:1-31

ጳውሎስ በመላጥያ ደሴት

1በደኅና ወደ ምድር ከደረስን በኋላ፣ ደሴቲቱ መላጥያ ተብላ እንደምትጠራ ተረዳን። 2የደሴቲቱ ነዋሪዎችም የሚያስገርም ደግነት አሳዩን፤ ዝናብና ብርድ ነበርና እሳት አንድደው ሁላችንን ተቀበሉን። 3ጳውሎስም ጭራሮ ሰብስቦ ወደ እሳቱ ሲጨምር፣ ከሙቀቱ የተነሣ እፉኝት ወጥታ እጁ ላይ ተጣበቀች። 4የደሴቲቱ ነዋሪዎች እባብ በእጁ ላይ ተንጠልጥላ ባዩ ጊዜ፣ “ይህ ሰው በርግጥ ነፍስ ገዳይ ነው፤ ከባሕር ቢያመልጥ እንኳ የፍርድ አምላክ በሕይወት እንዲኖር አልፈቀደለትም” ተባባሉ። 5ጳውሎስ ግን እባቢቱን ወደ እሳቱ አራገፋት፤ አንዳችም ጒዳት አልደረሰበትም። 6ሰዎቹ ከአሁን አሁን ሰውነቱ ያብጣል ወይም ድንገት ሞቶ ይወድቃል ብለው ይጠባበቁ ነበር፤ ነገር ግን ብዙ ጊዜ ጠብቀው ምንም የተለየ ነገር እንዳልደረሰበት ባዩ ጊዜ፣ ሐሳባቸውን ለውጠው፣ “ይህስ አምላክ ነው” አሉ።

7በዚያም ስፍራ አጠገብ የደሴቲቱ አለቃ የፑፕልዮስ ርስት የሆነ መሬት ነበረ፤ እርሱም በቤቱ ተቀብሎን ሦስት ቀን በቸርነት አስተናገደን። 8የፑፕልዮስም አባት በትኵሳትና በተቅማጥ ሕመም ተይዞ ተኝቶ ነበር፤ ጳውሎስም ሊጠይቀው ገብቶ ከጸለየለት በኋላ፣ እጁን ጭኖ ፈወሰው። 9ይህም በሆነ ጊዜ፣ በደሴቲቱ የነበሩ ሌሎች ሕመምተኞችም እየመጡ ተፈወሱ። 10እኛንም በብዙ መንገድ አከበሩን፤ በመርከብም ለመሄድ በተዘጋጀን ጊዜ፣ የሚያስፈልገንን ሁሉ ጫኑልን።

ጳውሎስ ሮም ደረሰ

11ከሦስት ወር በኋላም፣ በደሴቲቱ ክረምቱን ቆሞ በሰነበተ በአንድ መርከብ ተነሥተን ጒዞ ጀመርን። ይህም መርከብ የእስክንድርያ ሲሆን፣ በላዩ ላይ የመንታ አማልክቱ የዲዮስቆሮስ አርማ ነበረበት። 12ወደ ሰራኩስ ከተማ ገብተን ሦስት ቀን በዚያ ተቀመጥን። 13ከዚያም በመርከብ ተጒዘን ሬጊዩም ደረስን፤ በማግስቱም የደቡብ ነፋስ ስለ ተነሣ ፑቲዮሉስ የደረስነው በሚቀጥለው ቀን ነበር። 14በዚያም ወንድሞችን አገኘን፤ እነርሱም ሰባት ቀን አብረናቸው እንድንቀመጥ ለመኑን፤ ከዚያም በኋላ ወደ ሮም ሄድን። 15በዚያ የነበሩ ወንድሞችም መምጣታችንን ስለ ሰሙ፣ እስከ አፍዩስ ፋሩስ፣ እንዲሁም ‘ሦስት ማደሪያ’ እስከሚባለው ቦታ ድረስ ሊቀበሉን ወጡ፤ ጳውሎስም ባያቸው ጊዜ እግዚአብሔርን አመሰገነ፤ ተጽናናም። 16ሮም በደረስን ጊዜም፣ ጳውሎስ ይጠብቀው ከነበረው ወታደር ጋር፣ ለብቻው በዚያ እንዲቈይ ተፈቀደለት።

ጳውሎስ በጥበቃ ሥር ሆኖ ሰበከ

17ከሦስት ቀንም በኋላ፣ ጳውሎስ የአይሁድን መሪዎች በአንድነት ጠራ፤ በተሰበሰቡም ጊዜ እንዲህ አላቸው፤ “ወንድሞች ሆይ፤ እኔ፣ ሕዝባችንን ወይም የአባቶቻችንን ሥርዐት የሚቃረን ምንም ሳላደርግ፣ በኢየሩሳሌም አስረው ለሮማውያን አሳልፈው ሰጥተውኛል። 18እነርሱም መርምረው ለሞት የሚያበቃ በደል ስላላገኙብኝ፣ ሊፈቱኝ ፈልገው ነበር፤ 19አይሁድ በተቃወሙ ጊዜ ግን፣ ለቄሳር ይግባኝ ማለት ግድ ሆነብኝ እንጂ ሕዝቤን የምከስበት ምክንያት ኖሮኝ አይደለም። 20እናንተንም ለማየትና ለማነጋገር የጠራኋችሁ በዚሁ ምክንያት ነው፤ በዚህ ሰንሰለት የታሰርሁትም ለእስራኤል በተሰጠው ተስፋ ምክንያት ነው።”

21እነርሱም እንዲህ አሉት፤ “ስለ አንተ ከይሁዳ ምድር የተጻፈ አንድም ደብዳቤ አልደረሰንም፤ ከዚያ የመጡ ወንድሞችም ስለ አንተ ያቀረቡት ወይም የተናገሩት አንዳች መጥፎ ነገር የለም። 22ይሁን እንጂ፣ ሰዎች ስለዚህ የእምነት ክፍል በየቦታው ክፉ እንደሚያወሩበት እናውቃለን፤ የአንተ አስተያየት ደግሞ ምን እንደሆነ መስማት እንፈልጋለን።”

23ቀን ከቀጠሩለትም በኋላ፣ ብዙ ሆነው ወደ ማረፊያ ስፍራው መጡ፤ እርሱም ከጠዋት ጀምሮ እስከ ማታ ስለ እግዚአብሔር መንግሥት እየመሰከረ ያብራራላቸው ነበር፤ ከሙሴ ሕግና ከነቢያትም በመጥቀስ ስለ ኢየሱስ ሊያሳምናቸው ሞከረ። 24አንዳንዶቹ እርሱ የሚለውን አምነው ተቀበሉ፤ ሌሎቹ ግን አላመኑበትም፤ 25እርስ በርሳቸውም አልተስማሙም፤ ጳውሎስም እንዲህ የሚል የመጨረሻ ቃል ከተናገራቸው በኋላ ሄዱ፤ “መንፈስ ቅዱስ በነቢዩ በኢሳይያስ አማካይነት ለአባቶቻችሁ በትክክል እንዲህ ብሎ ተናግሮአል፤

26“ ‘ወደዚህ ሕዝብ ሂድ፤ እንዲህም በላቸው፤

“መስማትን ትሰማላችሁ፤ ነገር ግን አታስተውሉም፤

ማየትን ታያላችሁ፤ ነገር ግን አትመለከቱም።”

27የዚህ ሕዝብ ልብ ደንድኖአልና፤

ጆሮአቸውም ተደፍኖአል፤

ዐይናቸውንም ጨፍነዋል።

አለዚያማ፣ በዐይናቸው አይተው፣

በጆሮአቸው ሰምተው፣

በልባቸው አስተውለው፣

ይመለሱና እፈውሳቸዋለሁ።’

28“ስለዚህ የእግዚአብሔር ማዳን ለአሕዛብ እንደ ተላከ እንድታውቁ እፈልጋለሁ፤ እነርሱም ይሰሙታል።” 29ይህንንም ከተናገረ በኋላ፣ አይሁድ እርስ በርሳቸው እጅግ እየተከራከሩ ሄዱ።28፥29 አንዳንድ የጥንት ትርጒሞች ይህ ቍጥር የላቸውም።

30ጳውሎስም ራሱ በተከራየው ቤት ሁለት ዓመት ሙሉ ተቀመጠ፤ ወደ እርሱ የሚመጡትንም ሁሉ በደስታ ይቀበል ነበር፤ 31ማንም ሳይከለክለው የእግዚአብሔርን መንግሥት እየሰበከ፣ ስለ ጌታ ኢየሱስ ክርስቶስ በፍጹም ግልጽነት ያስተምር ነበር።

Hindi Contemporary Version

प्रेरित 28:1-31

मैलिते द्वीप में प्रतीक्षा

1जब सभी यात्री वहां सुरक्षित आ गए. तब हमें मालूम हुआ कि इस द्वीप का नाम मैलिते था. 2वहां के निवासियों ने हमारे प्रति अनोखी दया दिखाई. लगातार वर्षा के कारण तापमान में गिरावट आ गई थी. ठंड के कारण उन्होंने आग जलाकर हमारा स्वागत किया. 3जब पौलॉस ने लकड़ियों का एक गट्ठा आग पर रखा ही था कि ताप के कारण एक विषैला सांप उसमें से निकलकर उनकी बांह पर लिपट गया. 4वहां के निवासियों ने इस जंतु को उनकी बांह से लटका देखा तो आपस में कहने लगे, “सचमुच यह व्यक्ति हत्यारा है. समुद्री बाढ़ से तो यह बच निकला है किंतु न्याय-देवी नहीं चाहती कि यह जीवित रहे.” 5किंतु पौलॉस ने उस जंतु को आग में झटक दिया और उनका कोई बुरा नहीं हुआ. 6वे सभी यह इंतजार करते रहे कि उनकी बांह सूज जाएगी या वह किसी भी क्षण मरकर गिर पड़ेंगे. वे देर तक इसी की प्रतीक्षा करते रहे किंतु उनके साथ कुछ भी असामान्य नहीं हुआ. इसलिये लोगों का नज़रिया ही बदल गया और वे कहने लगे कि पौलॉस एक देवता हैं.

7उस स्थान के पास ही एक भूमिखंड था, जो उस द्वीप के प्रधान शासक पुब्लियुस की संपत्ति था. उसने हमें अपने घर में आमंत्रित किया और तीन दिन तक हमारी विशेष आवभगत की. 8उसका पिता बीमार था. वह ज्वर और आंव से पीड़ित पड़ा था. पौलॉस उसे देखने गए. उसके लिए प्रार्थना करने तथा उस पर हाथ रखने के द्वारा उन्होंने उस व्यक्ति को स्वस्थ कर दिया. 9परिणामस्वरूप उस द्वीप के अन्य रोगी भी पौलॉस के पास आने लगे और स्वस्थ होते चले गए. 10उन्होंने अनेक प्रकार से हमारा सम्मान किया. जब हमने वहां से जल-यात्रा शुरु की, उन्होंने वे सारी वस्तुएं, जो हमारे लिए ज़रूरी थी, जलयान पर रख दीं.

मैलिते द्वीप से रोम नगर की ओर

11तीन महीने बाद हमने अलेक्सान्द्रिया जा रहे जलयान पर यात्रा शुरु की. यह जलयान ठंड के कारण इस द्वीप में ठहरा हुआ था. इस यान के अगले भाग पर एक जोड़ी देवताओं की एक आकृति—दिओस्कूरोईस गढ़ी हुई थी. 12सायराक्यूज़ नगर पहुंचने पर हम वहां तीन दिन रहे. 13वहां से आगे बढ़कर हम रेगियम नगर पहुंचे. एक दिन बाद जब हमें दक्षिण वायु मिली हम फिर आगे बढ़े और दूसरे दिन पुतेओली नगर जा पहुंचे. 14वहां कुछ शिष्य थे, जिन्होंने हमें अपने घर में ठहरने के लिए आमंत्रित किया. हम वहां सात दिन ठहरे. आखिरकार हम रोम नगर पहुंच गए. 15हमारे विषय में समाचार मिलने पर शिष्य हमसे भेंट करने अप्पियुस के चौक तथा त्रिओन ताबेरनॉन नामक स्थान तक आए. उन्हें देख पौलॉस ने बहुत आनंदित हो परमेश्वर के प्रति धन्यवाद प्रकट किया. 16रोम पहुंचने पर पौलॉस को अकेले रहने की आज्ञा मिल गई किंतु उन पर पहरे के लिए एक सैनिक को ठहरा दिया गया था.

रोम नगर के यहूदियों से पौलॉस की भेंट

17तीन दिन बाद उन्होंने यहूदी प्रधानों की एक सभा बुलाई. उनके इकट्ठा होने पर पौलॉस ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा, “मेरे प्रिय भाइयो, यद्यपि मैंने स्वजातीय यहूदियों तथा हमारे पूर्वजों की प्रथाओं के विरुद्ध कुछ भी नहीं किया है फिर भी मुझे येरूशलेम में बंदी बनाकर रोमी सरकार के हाथों में सौंप दिया गया है. 18मेरी जांच करने के बाद वे मुझे रिहा करने के लिए तैयार थे क्योंकि उन्होंने मुझे प्राण-दंड का दोषी नहीं पाया. 19किंतु जब यहूदियों ने इसका विरोध किया तो मुझे मजबूर होकर कयसर के सामने दोहाई देनी पड़ी—इसलिये नहीं कि मुझे अपने राष्ट्र के विरुद्ध कोई आरोप लगाना था. 20मैंने आप लोगों से मिलने की आज्ञा इसलिये ली है कि मैं आप से विचार-विमर्श कर सकूं क्योंकि यह बेड़ी मैंने इस्राएल की आशा की भलाई में धारण की है.”

21उन्होंने पौलॉस को उत्तर दिया, “हमें यहूदिया प्रदेश से आपके संबंध में न तो कोई पत्र प्राप्त हुआ है और न ही किसी ने यहां आकर आपके विषय में कोई प्रतिकूल सूचना दी है. 22हमें इस मत के विषय में आप से ही आपके विचार सुनने की इच्छा थी. हमें मालूम है कि हर जगह इस मत का विरोध हो रहा है.”

23तब इसके लिए एक दिन तय किया गया और निर्धारित समय पर बड़ी संख्या में लोग उनके घर पर आए. सुबह से लेकर शाम तक पौलॉस सच्चाई से परमेश्वर के राज्य के विषय में शिक्षा देते रहे तथा मसीह येशु के विषय में मोशेह की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के लेखों से स्पष्ट करके उन्हें दिलासा दिलाते रहे. 24उनकी बातों को सुनकर उनमें से कुछ तो मान गए किंतु कुछ अन्यों ने इसका विश्वास नहीं किया. 25जब वे एक दूसरे से सहमत न हो सके तो वे पौलॉस की इस अंतिम बात को सुनकर जाने लगे: “भविष्यवक्ता यशायाह ने पवित्रात्मा के द्वारा आप लोगों के पूर्वजों पर एक ठीक सच्चाई ही प्रकाशित की थी:

26“ ‘इन लोगों से जाकर कहो,

“तुम लोग सुनते तो रहोगे, किंतु समझोगे नहीं.

तुम लोग देखते भी रहोगे, किंतु पहचान न सकोगे.”

27क्योंकि इन लोगों का हृदय जड़ हो चुका है.

अपने कानों से वे कदाचित ही कुछ सुन पाते हैं

और आंखें तो उन्होंने मूंद ही रखी हैं,

कि कहीं वे आंखों से देख न लें

और कानों से सुन न लें

और अपने हृदय से समझकर लौट आएं और मैं, परमेश्वर,

उन्हें स्वस्थ और पूर्ण बना दूं.’28:27 यशा 6:9, 10

28“इसलिये यह सही है कि आपको यह मालूम हो जाए कि परमेश्वर का यह उद्धार अब गैर-यहूदियों के लिए भी मौजूद है. वे भी इसे स्वीकार करेंगे.” 29उनकी इन बातों के बाद यहूदी वहां से आपस में झगड़ते हुए चले गए.28:29 कुछ प्राचीनतम मूल हस्तलेखों में यह पाया नहीं जाता

30पौलॉस वहां अपने भाड़े के मकान में पूरे दो साल रहे. वह भेंट करने आए व्यक्तियों को पूरे दिल से स्वीकार करते थे. 31वह निडरता से, बिना रोक-टोक के, पूरे साफ़-साफ़ शब्दों में परमेश्वर के राज्य का प्रचार करते और प्रभु मसीह येशु के विषय में शिक्षा देते रहे.