New Amharic Standard Version

ሉቃስ 7:1-50

የመቶ አለቃው እምነት

7፥1-10 ተጓ ምብ – ማቴ 8፥5-13

1ኢየሱስ ይህን ሁሉ በሕዝቡ ፊት ተናግሮ ከጨረሰ በኋላ ወደ ቅፍርናሆም ገባ። 2በዚያም አንድ የመቶ አለቃ ነበረ፤ እጅግ የሚወደው አገልጋዩም ታሞበት ለሞት ተቃርቦ ነበር። 3እርሱም ስለ ኢየሱስ በሰማ ጊዜ አገልጋዩን እንዲፈውስለት ይለምኑት ዘንድ አንዳንድ የአይሁድ ሽማግሌዎችን ላከበት። 4መልእክተኞቹም ወደ ኢየሱስ በመጡ ጊዜ እንዲህ ብለው አጥብቀው ለመኑት፤ “ይህን ልታደርግለት ይገባዋል፤ 5ምክንያቱም ይህ ሰው ሕዝባችንን ይወዳል፤ ምኵራባችንንም ያሠራልን እርሱ ነው።” 6ኢየሱስም ከእነርሱ ጋር ሄደ።

እርሱም ወደ ቤቱ በተቃረበ ጊዜ፣ የመቶ አለቃው ወዳጆቹን ልኮ እንዲህ አለው፤ “ጌታ ሆይ፤ ከቤቴ ጣራ በታች ልትገባ የሚገባኝ ሰው አይደለሁምና አትድከም፤ 7ከዚህም የተነሣ በአንተ ፊት ለመቅረብ እንኳ እንደሚገባኝ ራሴን አልቈጠርሁም፤ ብቻ አንድ ቃል ተናገር፤ አገልጋዬ ይፈወሳል። 8እኔ ራሴ የበላይ አለቃ አለኝ፤ ከበታቼም የማዛቸው ወታደሮች አሉኝ፤ አንዱን፣ ‘ሂድ’ ስለው ይሄዳል፤ ሌላውን፣ ‘ና’ ስለው ይመጣል፤ አገልጋዬንም፣ ‘ይህን አድርግ’ ስለው የታዘዘውን ያደርጋል።”

9ኢየሱስም ይህን ሲሰማ በእርሱ ተደነቀ፤ ዘወር ብሎም ይከተለው ለነበረው ሕዝብ፣ “እላችኋለሁ፤ እንዲህ ያለ ትልቅ እምነት በእስራኤል እንኳ አላገኘሁም” አላቸው። 10የተላኩት ሰዎችም ወደ ቤት በተመለሱ ጊዜ፣ አገልጋዩን ድኖ አገኙት።

ኢየሱስ የመበለቲቱን ልጅ ከሞት አስነሣው

7፥11-16 ተጓ ምብ – 1ነገ 17፥17-24፤ 2ነገ 4፥32-37፤ ማር 5፥21-24፡35-43፤ ዮሐ 11፥1-44

11ከዚህ በኋላ ኢየሱስ ብዙ ሳይቈይ፣ ናይን ወደምትባል ከተማ ሄደ፤ ደቀ መዛሙርቱና ብዙ ሕዝብም አብረውት ሄዱ። 12ወደ ከተማዋ መግቢያ በር ሲደርስም፣ እነሆ፤ ሰዎች የአንድ ሰው አስከሬን ተሸክመው ከከተማዋ ወጡ፤ ሟቹም ለእናቱ አንድ ልጅ ብቻ ነበር፤ እናቱም መበለት ነበረች፤ ብዙ የከተማውም ሕዝብ ከእርሷ ጋር ነበረ። 13ጌታም ባያት ጊዜ ራራላትና፣ “አይዞሽ፤ አታልቅሺ” አላት።

14ቀረብ ብሎም ቃሬዛውን ነካ፤ የተሸከሙትም ሰዎች ቀጥ ብለው ቆሙ፤ ኢየሱስም፣ “አንተ ጐበዝ፤ ተነሥ እልሃለሁ” አለው። 15የሞተውም ሰው ቀና ብሎ ተቀመጠ፤ መናገርም ጀመረ። ኢየሱስም ወስዶ ለእናቱ ሰጣት።

16ሁሉም በፍርሀት ተውጠው እግዚአብሔርን እያመሰገኑ፣ “ታላቅ ነቢይ በመካከላችን ተነሥቶአል፤ እግዚአብሔርም ሕዝቡን ጐብኝቶአል” አሉ። 17ይህም የኢየሱስ ዝና በመላው ይሁዳና7፥17 ወይም በአይሁድ ምድር በአካባቢው ባለው አገር ሁሉ ወጣ።

ኢየሱስና መጥምቁ ዮሐንስ

7፥18-35 ተጓ ምብ – ማቴ 11፥2-19

18የመጥምቁ ዮሐንስ ደቀ መዛሙርትም ይህንን ሁሉ ለዮሐንስ ነገሩት። እርሱም ከመካከላቸው ሁለቱን ጠርቶ፣ 19“ይመጣል የተባለልህ አንተ ነህ? ወይስ ሌላ እንጠብቅ? በሉት” ብሎ ወደ ጌታ ላካቸው።

20ሰዎቹም ወደ ኢየሱስ መጥተው፣ “መጥምቁ ዮሐንስ፣ ‘ይመጣል የተባለልህ አንተ ነህ? ወይስ ሌላ እንጠብቅ? ብሎ ወደ አንተ ልኮናል’ አሉት።

21በዚያኑ ጊዜ ኢየሱስ ብዙ ሰዎችን ከበሽታ፣ ከደዌና ከርኩሳን መናፍስት ፈወሳቸው፤ የብዙ ዐይነ ስውራንንም ዐይን አበራ። 22ከዮሐንስ ተልከው የመጡትንም እንዲህ አላቸው፤ “ሄዳችሁ ያያችሁትንና የሰማችሁትን ለዮሐንስ ንገሩት፤ ዐይነ ስውራን ያያሉ፤ ዐንካሶች በትክክል ይራመዳሉ፤ ለምጻሞች7፥22 የግሪኩ ቃል የግድ ከለምጽ ጋር ብቻ የተያያዘ ሳይሆን የተለያዩ የቈዳ በሽታዎች ለመግለጽ ጥቅም ላይ ይውላል ነጽተዋል፤ ደንቈሮዎች ይሰማሉ፤ ሙታን ተነሥተዋል፤ ለድኾችም ወንጌል ይሰበካል፤ 23በእኔ የማይሰናከል ሰው ሁሉ የተባረከ ነው።”

24የዮሐንስ መልእክተኞች ከሄዱ በኋላ፣ ኢየሱስ ለሕዝቡ ስለ ዮሐንስ ይናገር ጀመር፤ እንዲህም አለ፤ “ወደ በረሓ የወጣችሁት ምን ልታዩ ነው? ነፋስ የሚያወዛውዘውን ሸምበቆ? 25እኮ! ምን ልታዩ ወጣችሁ? ያማረ ልብስ የለበሰውን ሰው ነውን? ባማረ ልብስ የሚሽሞነሞኑና በድሎት የሚኖሩ በቤተ መንግሥት አሉላችሁ። 26እኮ! ምን ልታዩ ወጣችሁ? ነቢይን ለማየት ይሆን? አዎን፣ እላችኋለሁ፤ ለማየት የወጣችሁት ከነቢይም የሚበልጠውን ነው። 27እንዲህ ተብሎ የተጻፈለትም እርሱ ነው፤

“ ‘መንገድህን በፊትህ የሚያስተካክል፣

መልእክተኛዬን ከአንተ አስቀድሜ እልካለሁ።’

28እላችኋለሁ፤ ከሴት ከተወለዱት መካከል ከዮሐንስ የሚበልጥ የለም፤ በእግዚአብሔር መንግሥት ግን ከሁሉ የሚያንሰው ይበልጠዋል።”

29ቀረጥ ሰብሳቢዎች እንኳ ሳይቀሩ፣ ይህን የሰሙ ሁሉ፣ የዮሐንስን ጥምቀት በመጠመቅ ለእግዚአብሔር ተገቢውን ክብር ሰጡት፤ 30ፈሪሳውያንና ሕግ ዐዋቂዎች ግን በዮሐንስ እጅ ባለ መጠመቃቸው፣ እግዚአብሔር ለእነርሱ ያለውን ዐላማ አቃለሉ።

31ኢየሱስ በመቀጠል እንዲህ አለ፤ “እንግዲህ የዚህን ትውልድ ሰዎች በምን ልመስላቸው? ምንስ ይመስላሉ? 32በገበያ ቦታ ተቀምጠው እርስ በርሳቸው እየተጠራሩ እንዲህ የሚባባሉ ልጆችን ይመስላሉ፤

“ ‘ዋሽንት ነፋንላችሁ፤

አልጨፈራችሁም፤

ሙሾ አወረድንላችሁ፤

አላለቀሳችሁም።’

33ምክንያቱም መጥምቁ ዮሐንስ እህል ሳይ በላና የወይን ጠጅ ሳይጠጣ ቢመጣ፣ ጋኔን አለበት አላችሁት፤ 34የሰው ልጅ ደግሞ እየበላና እየጠጣ ቢመጣ፣ ‘በላተኛና ጠጪ፣ የቀረጥ ሰብሳቢዎችና “የኀጢአተኞች” ወዳጅ’ አላችሁት። 35እንግዲህ የጥበብ ትክክለኛነት በልጆቿ ሁሉ ዘንድ ተረጋገጠ።”

አንዲት ሴት ኢየሱስን ሽቶ ቀባች

7፥37-39 ተጓ ምብ – ማቴ 26፥6-13፤ ማር 14፥3-9፤ ዮሐ 12፥1-8

7፥14፡42 ተጓ ምብ – ማቴ 18፥23-34

36ከዚህ በኋላ ከፈሪሳውያን አንዱ ምግብ አብሮት እንዲበላ ኢየሱስን ጋበዘው፤ እርሱም ወደ ፈሪሳዊው ቤት ሄዶ በማእድ ተቀመጠ። 37በዚያ ከተማ የምትኖር አንዲት ኀጢአተኛ ሴት፣ ኢየሱስ በፈሪሳዊው ቤት በማእድ መቀመጡን በሰማች ጊዜ አንድ የአልባስጥሮስ ብልቃጥ ሽቶ ይዛ መጣች፤ 38ከበስተ ኋላው እግሩ አጠገብ ቆማ እያለቀሰች እግሩን በእንባዋ ታርስ፣ በራሷም ጠጒር ታብሰው ጀመር፤ እግሩንም እየሳመች ሽቱውን ቀባችው።

39የጋበዘውም ፈሪሳዊ ይህን ባየ ጊዜ፣ “ይህ ሰው ነቢይ ቢሆን ኖሮ፣ የነካችው ሴት ማን እንደሆነች፣ ደግሞም ምን ዐይነት ሰው እንደሆነች ባወቀ ነበር፤ ኀጢአተኛ ናትና” ብሎ በልቡ አሰበ።

40ኢየሱስም፣ “ስምዖን ሆይ፤ የምነግርህ ነገር አለኝ” አለው።

እርሱም፣ “መምህር ሆይ፤ ንገረኝ” አለው።

41ኢየሱስም እንዲህ አለው፤ “ከአንድ አበዳሪ ገንዘብ የተበደሩ ሁለት ሰዎች ነበሩ፤ አንደኛው አምስት መቶ ዲናር፣ ሁለተኛው ደግሞ አምሳ ዲናር ነበረበት። 42የሚከፍሉትም ቢያጡ ዕዳቸውን ለሁለቱም ተወላቸው። እንግዲህ ከሁለቱ አበዳሪውን አብልጦ የሚወደው የትኛው ነው?”

43ስምዖንም፣ “ብዙው ዕዳ የተተወለት ይመስለኛል” ሲል መለሰ።

ኢየሱስም፣ “ትክክል ፈርደሃል” አለው።

44ወደ ሴቲቱም ዘወር ብሎ ስምዖንን እንዲህ አለው፤ “ይህቺን ሴት ታያታለህን? እኔ ወደ ቤትህ ገባሁ፤ አንተ ለእግሬ ውሃ እንኳ አላቀረብህልኝም፤ እርሷ ግን እግሬን በእንባዋ እያራሰች በጠጒሯ አበሰች። 45አንተ ከቶ አልሳምኸኝም፤ እርሷ ግን ከገባሁ ጀምራ እግሬን ከመሳም አላቋረጠችም። 46አንተ ራሴን ዘይት አልቀባህም፤ እርሷ ግን እግሬን ሽቶ ቀባች። 47ስለዚህ እልሃለሁ፤ እጅግ ወዳለችና ብዙው ኀጢአቷ ተሰርዮላታል፤ በትንሹ የተሰረየለት ግን የሚወደው በትንሹ ነው።”

48ኢየሱስም ሴቲቱን፣ “ኀጢአትሽ ተሰርዮልሻል” አላት።

49አብረውት በማእድ ተቀምጠው የነበሩ እንግዶችም፣ “ይህ ኀጢአትን እንኳ የሚያስተስረይ እርሱ ማን ነው?” ብለው በልባቸው አሰቡ።

50ኢየሱስም ሴቲቱን፣ “እምነትሽ አድኖሻል፤ በሰላም ሂጂ” አላት።

Hindi Contemporary Version

लूकॉ 7:1-50

रोमी अधिकारी का विश्वास

1लोगों को ऊपर लिखी शिक्षा देने के बाद प्रभु येशु कफ़रनहूम नगर लौट गए. 2वहां एक सेनापति का एक अत्यंत प्रिय सेवक रोग से बिस्तर पर था. रोग के कारण वह लगभग मरने पर था. 3प्रभु येशु के विषय में मालूम होने पर सेनापति ने कुछ वरिष्ठ यहूदियों को प्रभु येशु के पास इस विनती के साथ भेजा, कि वह आकर उसके सेवक को चंगा करें. 4उन्होंने प्रभु येशु के पास आकर उनसे विनती कर कहा, “यह सेनापति निश्चय ही आपकी इस दया का पात्र है 5क्योंकि उसे हमारे राष्ट्र से प्रेम है तथा उसने हमारे लिए सभागृह भी बनाया है.” 6इसलिये प्रभु येशु उनके साथ चले गए.

प्रभु येशु उसके घर के पास पहुंचे ही थे कि सेनापति ने अपने मित्रों के द्वारा उन्हें संदेश भेजा, “प्रभु! आप कष्ट न कीजिए. मैं इस योग्य नहीं हूं कि आप मेरे घर पधारें. 7अपनी इसी अयोग्यता को ध्यान में रखते हुए मैं स्वयं आप से भेंट करने नहीं आया. आप मात्र वचन कह दीजिए और मेरा सेवक स्वस्थ हो जाएगा. 8मैं स्वयं बड़े अधिकारियों के अधीन नियुक्त हूं और सैनिक मेरे अधिकार में हैं. मैं किसी को आदेश देता हूं, ‘जाओ!’ तो वह जाता है और किसी को आदेश देता हूं, ‘इधर आओ!’ तो वह आता है. अपने सेवक से कहता हूं, ‘यह करो!’ तो वह वही करता है.”

9यह सुनकर प्रभु येशु अत्यंत चकित हुए और मुड़कर पीछे आ रही भीड़ को संबोधित कर बोले, “मैं यह बताना सही समझता हूं कि मुझे इस्राएलियों तक में ऐसा दृढ़ विश्वास देखने को नहीं मिला.” 10वे, जो सेनापति द्वारा प्रभु येशु के पास भेजे गए थे, जब घर लौटे तो यह पाया कि वह सेवक स्वस्थ हो चुका था.

विधवा के पुत्र का जी उठना

11इसके कुछ ही समय बाद प्रभु येशु नाइन नामक एक नगर को गए. एक बड़ी भीड़ और उनके शिष्य उनके साथ थे. 12जब वह नगर द्वार पर पहुंचे, एक मृत व्यक्ति अंतिम संस्कार के लिए बाहर लाया जा रहा था—अपनी माता का एकलौता पुत्र और वह स्वयं विधवा थी; और उसके साथ नगर की एक बड़ी भीड़ थी. 13उसे देख प्रभु येशु करुणा से भर उठे. उन्होंने उससे कहा, “रोओ मत!”

14तब उन्होंने जाकर उस अर्थी को स्पर्श किया. यह देख वे, जिन्होंने उसे उठाया हुआ था, रुक गए. तब प्रभु येशु ने कहा, “युवक! मैं तुमसे कहता हूं, उठ जाओ!” 15मृतक उठ बैठा और वार्तालाप करने लगा. प्रभु येशु ने माता को उसका जीवित पुत्र सौंप दिया.

16वे सभी श्रद्धा में परमेश्वर का धन्यवाद करने लगे. वे कह रहे थे, “हमारे मध्य एक तेजस्वी भविष्यवक्ता का आगमन हुआ है. परमेश्वर ने अपनी प्रजा की सुधि ली है.” 17प्रभु येशु के विषय में यह समाचार यहूदिया प्रदेश तथा पास के क्षेत्रों में फैल गया.

बपतिस्मा देनेवाले योहन की शंका का समाधान

18योहन के शिष्यों ने उन्हें इस विषय में सूचना दी. 19योहन ने अपने दो शिष्यों को प्रभु के पास इस प्रश्न के साथ भेजा, “जिनके आगमन की प्रतीक्षा की जा रही है क्या वह आप ही हैं या हम किसी अन्य की प्रतीक्षा करें?”

20जब वे दोनों प्रभु येशु के पास पहुंचे उन्होंने कहा, “बपतिस्मा देनेवाले योहन ने हमें आपके पास यह पूछने भेजा है, ‘जिनके आगमन की प्रतीक्षा की जा रही है, क्या वह आप ही हैं या हम किसी अन्य की प्रतीक्षा करें?’ ”

21ठीक उसी समय प्रभु येशु अनेकों को स्वस्थ कर रहे थे, जो रोगी, पीड़ित और दुष्टात्मा के सताए हुए थे. वह अनेक अंधों को भी दृष्टि प्रदान कर रहे थे. 22इसलिये प्रभु येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “तुमने जो कुछ सुना और देखा है उसकी सूचना योहन को दे दो: अंधे दृष्टि पा रहे हैं, अपंग चल रहे हैं, कोढ़ी शुद्ध होते जा रहे हैं, बहरे सुनने लगे हैं, मृतक जीवित किए जा रहे हैं तथा कंगालों में सुसमाचार का प्रचार किया जा रहा है. 23धन्य है वह, जिसका विश्वास मुझ पर से नहीं उठता.”

24योहन का संदेश लानेवालों के विदा होने के बाद प्रभु येशु ने भीड़ से योहन के विषय में कहना प्रारंभ किया, “तुम्हारी आशा जंगल में क्या देखने की थी? हवा में हिलते हुए सरकंडे को? 25यदि यह नहीं तो फिर? कीमती वस्त्र पहने हुए व्यक्ति को? सुनो! जो ऐसे वस्त्र पहनते हैं, उनका निवास राजमहलों में होता है. 26तुम क्यों गए थे? किसी भविष्यवक्ता से भेंट करने? हां! मैं तुम्हें बता रहा हूं कि यह वह हैं, जो भविष्यवक्ता से भी बढ़कर हैं 27यह वही हैं, जिनके विषय में लिखा गया है:

“ ‘मैं अपना दूत तुम्हारे आगे भेज रहा हूं,

जो तुम्हारे आगे-आगे चलकर तुम्हारे लिए मार्ग तैयार करेगा.’7:27 मला 3:1

28सच तो यह है कि आज तक जितने भी मनुष्य हुए हैं उनमें से एक भी (बपतिस्मा देनेवाले) योहन से बढ़कर नहीं. फिर भी, परमेश्वर के राज्य में छोटे से छोटा भी योहन से बढ़कर है.”

29जब सभी लोगों ने, यहां तक कि चुंगी लेनेवालों ने, प्रभु येशु के वचन, सुने तो उन्होंने योहन का बपतिस्मा लेने के द्वारा यह स्वीकार किया कि परमेश्वर की योजना सही है. 30किंतु फ़रीसियों और शास्त्रियों ने बपतिस्मा न लेकर उनके लिए तय परमेश्वर के उद्देश्य को अस्वीकार कर दिया.

31प्रभु येशु ने आगे कहा, “इस पीढ़ी के लोगों की तुलना मैं किससे करूं? किसके समान हैं ये? 32ये हाट में बैठे हुए उन बालकों के समान हैं, जो एक दूसरे से पुकार-पुकारकर कह रहे हैं:

“ ‘हमने तुम्हारे लिए बांसुरी बजाई,

किंतु तुम नहीं नाचे,

हमने तुम्हारे लिए शोक गीत भी गाया,

फिर भी तुम न रोए.’

33बपतिस्मा देनेवाले योहन रोटी नहीं खाते थे और दाखरस का सेवन भी नहीं करते थे इसलिये तुमने घोषित कर दिया, ‘उसमें प्रेत का वास है.’ 34मनुष्य के पुत्र का खान-पान सामान्य है और तुम घोषणा करते हैं, ‘अरे, वह तो पेटू और पियक्कड़ है; वह तो चुंगी लेनेवालों और अपराधी व्यक्तियों का मित्र है!’ बुद्धि अपनी संतान द्वारा साबित हुई है 35फिर भी ज्ञान की सच्चाई उसकी सभी संतानों द्वारा प्रकट की गई है.”

पापी स्त्री द्वारा प्रभु येशु के चरणों का अभ्यंजन

36एक फ़रीसी ने प्रभु येशु को भोज पर आमंन्रित किया. प्रभु येशु आमंत्रण स्वीकार कर वहां गए और भोजन के लिए बैठ गए. 37नगर की एक पापिन स्त्री, यह मालूम होने पर कि प्रभु येशु वहां आमंत्रित हैं, संगमरमर के बर्तन में इत्र लेकर आई 38और उनके चरणों के पास रोती हुई खड़ी हो गई. उसके आंसुओं से उनके पांव भीगने लगे. तब उसने प्रभु के पावों को अपने बालों से पोंछा, उनके पावों को चूमा तथा उस इत्र को उनके पावों पर उंडेल दिया.

39जब उस फ़रीसी ने, जिसने प्रभु येशु को आमंत्रित किया था, यह देखा तो मन में विचार करने लगा, “यदि यह व्यक्ति वास्तव में भविष्यवक्ता होता तो अवश्य जान जाता कि जो स्त्री उसे छू रही है, वह कौन है—एक पापी स्त्री!”

40प्रभु येशु ने उस फ़रीसी को कहा, “शिमओन, मुझे तुमसे कुछ कहना है.”

“कहिए, गुरुवर,” उसने कहा.

41प्रभु येशु ने कहा, “एक साहूकार के दो कर्ज़दार थे—एक पांचसौ दीनार7:41 मत्ति 20:2 देखिये का तथा दूसरा पचास का. 42दोनों ही कर्ज़ चुकाने में असमर्थ थे इसलिये उस साहूकार ने दोनों ही के कर्ज़ क्षमा कर दिए. यह बताओ, दोनों में से कौन उस साहूकार से अधिक प्रेम करेगा?”

43शिमओन ने उत्तर दिया, “मेरे विचार से वह, जिसकी बड़ी राशि क्षमा की गई.”

“तुमने सही उत्तर दिया,” प्रभु येशु ने कहा.

44तब उस स्त्री से उन्मुख होकर प्रभु येशु ने शिमओन से कहा, “इस स्त्री की ओर देखो. मैं तुम्हारे घर आया, तुमने तो मुझे पांव धोने के लिए भी जल न दिया किंतु इसने अपने आंसुओं से मेरे पांव भिगो दिए और अपने केशों से उन्हें पोंछ दिया. 45तुमने चुंबन से मेरा स्वागत नहीं किया किंतु यह स्त्री मेरे पांवों को चूमती रही. 46तुमने मेरे सिर पर तेल नहीं मला किंतु इसने मेरे पांवों पर इत्र उंडेल दिया है. 47मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि यह मुझसे इतना अधिक प्रेम इसलिये करती है कि इसके बहुत पाप क्षमा कर दिए गए हैं; किंतु वह, जिसके थोड़े ही पाप क्षमा किए गए हैं, प्रेम भी थोड़ा ही करता है.”

48तब प्रभु येशु ने उस स्त्री से कहा, “तुम्हारे पाप क्षमा कर दिए गए हैं.”

49आमंत्रित अतिथि आपस में विचार-विमर्श करने लगे, “कौन है यह, जो पाप भी क्षमा करता है?”

50प्रभु येशु ने उस स्त्री से कहा, “तुम्हारा विश्वास ही तुम्हारे उद्धार का कारण है. परमेश्वर की शांति में विदा हो जाओ.”