Habrit Hakhadasha/Haderekh

הבשורה על-פי מתי 18:1-35

1באותה שעה באו התלמידים אל ישוע ושאלו: ”מי מאיתנו יהיה הגדול ביותר במלכות השמים?“

2ישוע קרא אליו ילד קטן והציג אותו לפניהם. 3לאחר מכן אמר: ”אם לא תחזרו בתשובה ותהיו כמו ילדים, לא תיכנסו למלכות השמים. 4לכן מי שיהיה עניו כמו הילד הזה, הוא הגדול ביותר במלכות השמים. 5וכל מי שמקבל ילד כזה בשמי, מקבל למעשה אותי. 6אבל אוי למי שיגרום לילד המאמין בי לאבד את אמונתו! לאדם כזה מוטב שיקשרו אבן כבדה לצווארו ויטביעו אותו בים!

7”אוי לעולם על כל הרוע שבו! הפיתוי לעשות את הרע הוא בלתי נמנע, אולם אוי לאדם שיגרום לפיתוי! 8לכן אם ידך או רגלך גורמת לך לחטוא, כרות אותה והשלך אותה ממך והלאה! מוטב שתיכנס למלכות השמים בעל מום, מאשר שתהיה באש עולם עם שתי ידיך או שתי רגליך. 9ואם עינך גורמת לך לחטוא, עקור אותה והשלך אותה. מוטב שתיכנס למלכות השמים עם עין אחת, מאשר שתהיה בגיהינום עם שתי עיניים ולראות את אש העולם!

10”אני מזהיר אתכם שלא לבוז לאחד מן הילדים האלה, כי אני אומר לכם שהמלאכים שלהם יכולים תמיד לגשת אל אבי. 11ואני, בן־האדם, באתי להושיע את האובדים.

12”אם יש לאדם מאה כבשים, ואחת מהן הולכת לאיבוד – מה יעשה אותו אדם? האם לא יעזוב את תשעים ותשע הכבשים לבדן, ויחזור אל ההרים כדי לחפש את האובדת? 13כשימצא אותה, האם לא ישמח על הכבשה שנמצאה יותר מאשר על התשעים ותשע שלא אבדו? 14כך גם אבי אינו רוצה שאף אחד מהקטנים האלה יאבד!

15”אם אחיך חטא לך, הוכח אותו לבד. אם הוא מקשיב לך ומודה באשמתו – רכשת לך אח. 16אם לא יקשיב, קח איתך עוד אח או שניים, וחיזרו אליו כששני העדים מאשרים את טענותיך. 17אם עדיין יסרב להקשיב, הבא את הבעיה לפני הקהילה. אם הקהילה תפסוק לטובתך, והוא בכל זאת יעמוד על דעתו ולא ייכנע, היא רשאית לגרשו משורותיה ולהחרים אותו. 18ואני אומר לכם: כל מה שתאסרו על הארץ יהיה אסור בשמים, וכל מה שתתירו על הארץ יהיה מותר בשמים.

19”אומר לכם עוד דבר: אם שניים מכם מסכימים ביניכם לבקש דבר מה, אבי שבשמים ייתן לכם את אשר תבקשו. 20כי בכל מקום שבו נפגשים שניים או שלושה אנשים המאמינים בי, אני שם בתוכם.“

21לאחר מכן בא פטרוס אל ישוע ושאל: ”אדוני, כמה פעמים עלי לסלוח לאדם שחטא לי? שבע פעמים?“

22”לא“, ענה ישוע, ”שבעים כפול שבע פעמים!“

23”אפשר להמשיל את מלכות השמים למלך שהחליט לעדכן את ספרי החשבונות שלו. 24במהלך יישוב החשבונות הובא לפניו אדם שהיה חייב לו עשרת אלפים ככרי כסף. 25מכיוון שלא היה לאיש כסף לשלם, ציווה המלך למכור אותו, את אשתו, את ילדיו ואת כל רכושו תמורת החוב.“

26”אולם האיש נפל לרגלי המלך, בכה והתחנן: ’אנא, אדוני, תן לי חסד ואשלם לך את כל החוב!‘

27”המלך ריחם על האיש, שיחרר אותו וויתר לו על החוב.

28”אולם כשיצא האיש מלפני המלך, הלך אל אדם שהיה חייב לו אלף שקלים, תפס אותו ודרש ממנו לשלם מיד את חובו. 29החייב נפל על ברכיו והתחנן: ’אנא, עשה עמי חסד; חכה בסבלנות ואשלם לך הכל!‘

30”אולם המלווה לא הסכים לחכות, וציווה לכלוא את החייב בבית־הסוהר עד שיגמור לשלם את חובו.

31”כשראו חבריו העבדים את הנעשה התעצבו מאוד והלכו אל המלך וסיפרו לו מה שקרה. 32המלך קרא אליו את האדם שעל חובו ויתר, ואמר: ’נבזה מרושע שכמוך! אני ויתרתי לך על חוב עצום רק משום שביקשת זאת ממני! 33האם לא היה עליך לרחם על חברך העבד, כשם שאני ריחמתי עליך?‘

34”המלך הנרגז שלח את האיש לתא העינויים, עד שיגמור לשלם את חובו עד הפרוטה האחרונה. 35כך יעשה לכם אבי שבשמים אם תסרבו לסלוח לאחיכם בכל לבכם.“

Hindi Contemporary Version

मत्तियाह 18:1-35

सबसे बड़ा कौन

1तब शिष्यों ने येशु के पास आकर उनसे पूछा, “स्वर्ग-राज्य में सबसे बड़ा कौन है?”

2येशु ने एक बालक को पास बुलाकर उसे उनके सामने खड़ा करते हुए कहा, 3मैं तुम्हें एक सच्चाई बताना चाहता हूं: “जब तक तुम बदलकर बालक के समान न हो जाओ, तुम्हारा प्रवेश स्वर्ग-राज्य में किसी प्रकार न होगा. 4जो कोई स्वयं को इस बालक के समान विनम्र कर लेगा, वही स्वर्ग-राज्य में सबसे बड़ा है; 5और जो कोई ऐसे बालक को मेरे नाम में ग्रहण करता है, मुझे ग्रहण करता है.

अन्यों को दिशा से भटकाने के विषय में

6“इसके विपरीत जो कोई इन बालकों के लिए, जो मुझमें विश्वास करते हैं, ठोकर का कारण बनता है, उसके लिए सही यही होगा कि उसके गले में चक्की का पाट लटका कर उसे समुद्र की गहराई में डुबो दिया जाए. 7ठोकर के कारकों के लिए धिक्कार है संसार पर! ठोकरों का होना तो निश्चित है किंतु धिक्कार है उस व्यक्ति पर जिसके कारण ठोकर लगती है! 8यदि तुम्हारा हाथ या तुम्हारा पांव तुम्हारे लिए ठोकर लगने का कारण बनता है तो उसे काटकर फेंक दो. तुम्हारे लिए भला यही होगा कि तुम एक अपंग या लंगड़े के रूप में जीवन में प्रवेश करो—बजाय इसके कि तुम दोनों हाथ और दोनों पांवों के साथ अनंत आग में झोंके जाओ. 9यदि तुम्हारी आंख के कारण तुम्हें ठोकर लगे तो उसे निकाल फेंको. तुम्हारे लिए भला यही होगा कि तुम मात्र एक आंख के साथ जीवन में प्रवेश करो बजाय इसके कि तुम्हारी दोनों आंख हों और तुम नर्क की आग में फेंके जाओ.

अन्यों को तुच्छ समझने के विषय में चेतावनी

10“ध्यान रखो कि तुम इन छोटों में से किसी को तुच्छ दृष्टि से न देखो. मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि स्वर्ग में इनके स्वर्गदूत इनके लिए मेरे पिता के सामने विनती करने के उद्देश्य से हमेशा उपस्थित रहते हैं. 11मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को बचाने के उद्देश्य से ही आया है.18:11 कुछ प्राचीनतम पाण्डुलिपियों मूल हस्तलेखों में पद 11 नहीं पाया जाता.

12“क्या विचार है तुम्हारा? यदि किसी व्यक्ति के पास सौ भेड़ें हों और उनमें से एक भटक जाए तो क्या वह निन्यानवे को वहीं पहाड़ियों पर छोड़ उसको खोजने न निकलेगा, जो भटक गई है? 13तब सच तो यह है कि यदि वह उसे खोज लेता है, तो वह उन निन्यानवे की बजाय, जो भटकी नहीं थी, उस एक के लिए कहीं अधिक उल्लसित होता है, जो भटक गई थी. 14इसलिये तुम्हारे स्वर्गीय पिता नहीं चाहते कि इन छोटों में से एक भी छोटे का नाश हो.

पापिष्ठ विश्वासी के विषय में निर्देश

15“यदि कोई सहविश्वासी तुम्हारे विरुद्ध18:15 कुछ प्राचीनतम पाण्डुलिपियों मूल हस्तलेखों में: “तुम्हारे विरुद्ध” शब्द पाए नहीं जाते. कोई अपराध करे तो जाकर उस पर उसका दोष प्रकट कर दो, किंतु यह मात्र तुम दोनों के मध्य ही हो. यदि वह तुम्हारी सुन ले तो तुमने उसे पुनः प्राप्त कर लिया. 16किंतु यदि वह तुम्हारी न माने तब अपने साथ एक या दो को उसके पास ले जाओ कि एक बात की पुष्टि के लिए दो या तीन गवाहों की ज़रूरत होती है.18:16 व्यव 19:15 17यदि वह उनका भी इनकार करे तब कलीसिया पर यह सच प्रकट कर दिया जाए. यदि वह कलीसिया की भी न माने तब उसे अन्यजाति और समाज से बहिष्कृत व्यक्ति समझो.

18“तुम पर मैं यह सच प्रकाशित कर रहा हूं कि जो कुछ पृथ्वी पर तुम्हारे द्वारा इकट्ठा किया जाएगा,18:18 अथवा जा चुका है. वह स्वर्ग में भी इकट्ठा होगा और जो कुछ तुम्हारे द्वारा पृथ्वी पर खुलेगा, वह स्वर्ग में भी खोला जाएगा.

19“मैं तुम्हें दोबारा याद दिला रहा हूं: यदि तुममें से दो व्यक्ति पृथ्वी पर किसी विषय पर एक मत होकर विनती करें, वह मेरे पिता के द्वारा, जो स्वर्ग में हैं, पूरा किया जाएगा. 20यह इसलिये कि जहां दो या तीन व्यक्ति मेरे नाम में इकट्ठा होते हैं, वहां मैं उनके साथ हूं.”

क्षमा की सीमा

21तब पेतरॉस ने येशु के पास आकर उनसे प्रश्न किया, “प्रभु! कितनी बार मेरा भाई मेरे विरुद्ध अपराध करे और मैं उसे क्षमा करूं—सात बार?”

22येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “मैं तो तुमसे यह तो नहीं कहूंगा सात बार तक परंतु सत्तर के सात गुणा तक.

23“इसलिये स्वर्ग-राज्य की तुलना उस राजा से की जा सकती है, जिसने अपने दासों से हिसाब-किताब लेना चाहा. 24जब उसने प्रारंभ किया तब उसके सामने वह दास प्रस्तुत किया गया, जो उसके लाखों तालंतों18:24 मूल में: दस हजार तालंत. एक तालंत करीब बीस साल की मेहनत का वेतन रहा का कर्ज़दार था, किंतु 25यह मालूम होने पर कि उसके पास कर्ज़ चुकाने का कोई साधन नहीं है, स्वामी ने आज्ञा दी कि उसे उसकी पत्नी, बालकों तथा सारे संपत्ति सहित बेच दिया जाए कि कर्ज़ चुकाया जा सके.

26“इस पर वह दास अपने स्वामी के सामने भूमि पर दंडवत हो उससे विनती करने लगा, ‘कृपया थोड़ा धीरज रखें, मैं सब कुछ चुका दूंगा.’ 27उसके स्वामी ने दया से भरकर उसे मुक्त करके उसका सारा कर्ज़ क्षमा कर दिया.

28“उस मुक्त हुए दास ने बाहर जाते ही उस दास को जा पकड़ा जिसने उससे सौ दीनार कर्ज़ लिए थे. उसने उसे पकड़कर उसका गला घोंटते हुए कहा, ‘मुझसे जो कर्ज़ लिया है, उसे लौटा दे!’

29“वह दास इस दास के पांवों पर गिर पड़ा और विनती करने लगा, ‘थोड़ा धीरज रखो. मैं सब लौटा दूंगा.’

30“किंतु उस दास ने उसकी विनती पर ज़रा भी ध्यान न दिया और उसे ले जाकर कारागार में डाल दिया कि जब तक वह कर्ज़ न लौटाए, वहीं रहे. 31इसलिये जब अन्य दासों ने यह सब देखा, वे अत्यंत उदास हो गए और आकर स्वामी को इसकी सूचना दी.

32“तब स्वामी ने उस दास को बुलवाकर उससे कहा, ‘अरे दुष्ट! मैंने तो तेरा सारा ही कर्ज़ क्षमा कर दिया क्योंकि तूने मुझसे इसके लिए विनती की थी. 33क्या यह सही न था कि तू भी अपने साथी पर कृपा करता जिस प्रकार मैंने तुझ पर कृपा की?’ 34क्रुद्ध स्वामी ने उस दास को यातना देने के लिए चुने हुए अधिकारियों के हाथ में सौंप दिया कि जब तक वह सारा कर्ज़ चुका न दे, वहीं रहे.

35“मेरे स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे साथ यही करेंगे यदि तुममें से हर एक अपने भाई को हृदय से क्षमा नहीं करता.”