Habrit Hakhadasha/Haderekh

הבשורה על-פי מתי 15:1-39

1יום אחד הגיעו מירושלים מספר פרושים וסופרים כדי לחקור את ישוע.

2”מדוע תלמידיך אינם מקיימים את המסורת היהודית העתיקה?“ דרשו לדעת. ”מדוע תלמידיך אינם נוטלים את ידיהם לפני האוכל?“

3השיב להם ישוע: ”ומדוע עוברת המסורת שלכם על מצוותיו של אלוהים? 4למשל, כתוב בתורה:15‏.4 טו 4 שמות כ 12, כא 17 ’כבד את אביך ואת אמך… ומקלל אביו ואמו מות יומת!‘ 5‏-6אולם אתם אומרים שמותר לאדם להתעלם מצרכי הוריו העניים, אם ייתן ’לעבודת האלוהים‘ את מה שיכול היה לתת להם. וכך אתם מפרים את מצוותו של ה׳, כדי לקיים מסורת וחוקים שהומצאו על־ידי בני־אדם. 7צבועים שכמוכם! הנביא ישעיהו תיאר אתכם נכונה כשאמר:15‏.7 טו 7 ישעיהו כט 13

8’ניגש העם הזה בפיו,

ובשפתיו כבדוני ולבו רחק ממני;

9ותהי יראתם אותי מצות אנשים מלומדה‘. “

10ישוע אסף סביבו את הקהל ואמר: ”הקשיבו לדבריי והשתדלו להבינם: 11מה שמטמא את האדם זה לא מה שנכנס לפה אלא מה שיוצא מהפה – זה מטמא את האדם!“

12תלמידיו באו אליו ואמרו: ”בדבריך אלה העלבת את הפרושים!“

13ישוע השיב להם: ”כל צמח שלא נשתל על־ידי אבי – ייעקר. 14התעלמו מהם; הפרושים אינם אלא מורי־דרך עיוורים המדריכים עיוורים אחרים, ובסופו של דבר יפלו כולם יחד לתוך בור!“

15שמעון פטרוס ביקש מישוע שיסביר למה התכוון באמרו שאנשים מטמאים את עצמם ממה שיוצא מן הפה.

16”האם אינך מבין?“ שאל אותו ישוע. 17”האם אינך רואה שכל מה שאתה אוכל עובר דרך מערכת העיכול ויוצא שוב החוצה? 18אולם מילים רעות יוצאות מתוך לב רע ומטמאות את האומר אותן. 19כי מתוך הלב יוצאות מחשבות רעות, מעשי רצח, ניאוף, זנות, גניבה, שקר ורכילות. 20דברים אלה הם המטמאים את האדם. אכילה ללא נטילת ידיים אינה מטמאת את האדם.“

21ישוע עזב את האזור ההוא והלך אל אזור צור וצידון.

22אישה כנענית שגרה שם באה אל ישוע והתחננה: ”אדוני, בן־דוד, רחם עלי! שד אחז בבתי והוא מענה אותה ללא הרף.“ 23אולם ישוע לא ענה לה – אף לא מילה אחת. תלמידיו ביקשו ממנו לגרש אותה: ”אמור לה ללכת מכאן, כי היא מציקה לנו כל היום בתחינותיה.“

24”נשלחתי אל צאן האובדות של בית ישראל בלבד“, אמר ישוע לאישה. 25אולם האישה נפלה לרגליו ושוב ביקשה: ”אדוני, עזור לי!“

26”אין זה צודק לקחת את לחמם של הילדים ולהשליכו לכלבים“, ענה לה ישוע.

27”נכון, אדוני,“ השיבה האישה, ”אבל גם לגורי הכלבים מותר לאכול את הפירורים שנופלים מעל שולחן אדוניהם.“

28”אישה,“ אמר לה ישוע, ”יש בך אמונה רבה, ולכן תתמלא בקשתך.“ באותו רגע בתה נרפאה.

29ישוע חזר לכינרת, עלה על גבעה והתיישב שם. 30ההמונים הביאו אליו פיסחים, עיוורים, בעלי־מום, אילמים וחולים אחרים, הניחו אותם לפניו, והוא ריפא את כולם. 31כאשר העם ראה את האילמים מפטפטים בהתרגשות, קטועי האיברים מקבלים איברים חדשים, נכים קופצים ורוקדים והעיוורים מביטים סביבם, נדהמו ושבחו את אלוהי ישראל.

32לאחר מכן קרא ישוע לתלמידיו ואמר: ”אני מרחם על אנשים אלה; הם נמצאים אתי כאן שלושה ימים, ולא נשאר להם מה לאכול. אינני רוצה לשלוח אותם רעבים, כי הם עלולים להתעלף בדרך.“

33”מאין נשיג במדבר הזה מספיק אוכל לכל ההמון?“ שאלו התלמידים.

34”כמה ככרות לחם יש לכם?“ שאל אותם ישוע. ”שבע,“ ענו, ”וכמה דגים קטנים.“

35ישוע ציווה על העם לשבת על הארץ, 36לקח את שבע ככרות הלחם ואת הדגים, הודה לאלוהים עליהם, חילק אותם למנות ונתן לתלמידים, כדי שיגישו ליושבים. 37‏-38לא זו בלבד שכולם אכלו לשובע (כארבעת־אלפים איש לא כולל נשים וילדים), כאשר אספו את השאריות הם מילאו שבעה סלים!

39לאחר מכן שלח ישוע את האנשים לביתם, והוא עצמו עלה לסירה ושט למגדל.

Hindi Contemporary Version

मत्तियाह 15:1-39

अंदरूनी शुद्धता की शिक्षा

1तब येरूशलेम से कुछ फ़रीसी और शास्त्री येशु के पास आकर कहने लगे, 2“आपके शिष्य पूर्वजों की परंपराओं का उल्लंघन क्यों करते हैं? वे भोजन के पहले हाथ नहीं धोया करते.”

3येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “अपनी परंपराओं की पूर्ति में आप स्वयं परमेश्वर के आदेशों को क्यों तोड़ते हो? 4परमेश्वर की आज्ञा है, ‘अपने माता-पिता का सम्मान करो’15:4 निर्ग 20:12; व्यव 5:16 और वह, जो माता या पिता के प्रति बुरे शब्द बोले, उसे मृत्यु दंड दिया जाए.15:4 निर्ग 21:17; लेवी 20:9 5किंतु तुम हो कि कहते हो, ‘जो कोई अपने माता-पिता से कहता है, “आपको मुझसे जो कुछ प्राप्त होना था, वह सब अब परमेश्वर को भेंट किया जा चुका है,” 6उसे माता-पिता का सम्मान करना आवश्यक नहीं.’ ऐसा करने के द्वारा अपनी ही परंपराओं को पूरा करने की फिराक में तुम परमेश्वर की आज्ञा को तोड़ते हो. 7अरे पाखंडियों! भविष्यवक्ता यशायाह की यह भविष्यवाणी तुम्हारे विषय में ठीक ही है:

8“ये लोग मात्र अपने ओंठों से मेरा सम्मान करते हैं,

किंतु उनके हृदय मुझसे बहुत दूर हैं.

9व्यर्थ है उनके द्वारा की गई मेरी वंदना.

वे मनुष्यों द्वारा बनाए हुए विषयों की शिक्षा ईश्वरीय आदेश के रूप में देते हैं.”15:9 यशा 29:13

10तब येशु ने भीड़ को अपने पास बुलाकर उनसे कहा, “सुनो और समझो: 11वह, जो मनुष्य के मुख में प्रवेश करता है, मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता परंतु उसे अशुद्ध वह करता है, जो उसके मुख से निकलता है.”

12तब येशु के शिष्यों ने उनके पास आ उनसे प्रश्न किया, “क्या आप जानते हैं कि आपके इस वचन से फ़रीसी अपमानित हो रहे हैं?”

13येशु ने उनसे उत्तर में कहा, “ऐसा हर एक पौधा, जिसे मेरे पिता ने नहीं रोपा है, उखाड़ दिया जाएगा. 14फ़रीसियों से दूर ही रहो. वे तो अंधे मार्गदर्शक हैं, जो अंधों ही का मार्गदर्शन करने में लगे हुए हैं. अब यदि अंधा ही अंधे का मार्गदर्शन करेगा तो दोनों ही गड्ढे में गिरेंगे न!”

15पेतरॉस ने येशु से विनती की, “प्रभु हमें इसका अर्थ समझाइए.”

16येशु ने कहा, “क्या तुम अब तक समझ नहीं पाए? 17क्या तुम्हें यह समझ नहीं आया कि जो कुछ मुख में प्रवेश करता है, वह पेट में जाकर शरीर से बाहर निकल जाता है? 18किंतु जो कुछ मुख से निकलता है, उसका स्रोत होता है मनुष्य का हृदय. वही सब है जो मनुष्य को अशुद्ध करता है 19क्योंकि हृदय से ही बुरे विचार, हत्या, व्यभिचार, वेश्यागामी, चोरियां, झूठी गवाही तथा निंदा उपजा करती हैं. 20ये ही मनुष्य को अशुद्ध करती हैं, किंतु हाथ धोए बिना भोजन करने से कोई व्यक्ति अशुद्ध नहीं होता.”

कनानवासी स्त्री का सराहनीय विश्वास

21तब येशु वहां से निकलकर सोर और सीदोन प्रदेश में एकांतवास करने लगे. 22वहां एक कनानवासी स्त्री आई और पुकार-पुकारकर कहने लगी, “प्रभु! मुझ पर दया कीजिए. दावीद की संतान! मेरी पुत्री में एक क्रूर प्रेत समाया हुआ है और वह बहुत पीड़ित है.”

23किंतु येशु ने उसकी ओर लेश मात्र भी ध्यान नहीं दिया. शिष्य आकर उनसे विनती करने लगे, “प्रभु! उसे विदा कर दीजिए. वह चिल्लाती हुई हमारे पीछे लगी है.”

24येशु ने उससे कहा, “मुझे मात्र इस्राएल वंश के लिए, जिसकी स्थिति खोई हुई भेड़ों समान है, संसार में भेजा गया है.”

25किंतु उस स्त्री ने येशु के पास आ झुकते हुए उनसे विनती की, “प्रभु! मेरी सहायता कीजिए!”

26येशु ने उसे उत्तर दिया, “बालकों को परोसा भोजन उनसे लेकर कुत्तों को दे देना अच्छा नहीं है!”

27उस स्त्री ने उत्तर दिया, “सच है, प्रभु, किंतु यह भी तो सच है कि स्वामी की मेज़ से गिर जाते टुकड़ों से कुत्ते अपना पेट भर लेते हैं.”

28येशु कह उठे, “सराहनीय है तुम्हारा विश्वास! वैसा ही हो, जैसा तुम चाहती हो.” उसी क्षण उसकी पुत्री स्वस्थ हो गई.

झील तट पर स्वास्थ्यदान

29वहां से येशु गलील झील के तट से होते हुए पर्वत पर चले गए और वहां बैठ गए. 30एक बड़ी भीड़ उनके पास आ गयी. जिनमें लंगड़े, अपंग, अंधे, गूंगे और अन्य रोगी थे. लोगों ने इन्हें येशु के चरणों में लिटा दिया और येशु ने उन्हें स्वस्थ कर दिया. 31गूंगों को बोलते, अपंगों को स्वस्थ होते, लंगड़ों को चलते तथा अंधों को देखते देख भीड़ चकित हो इस्राएल के परमेश्वर का गुणगान करने लगी.

32येशु ने अपने शिष्यों को अपने पास बुलाकर कहा, “मुझे इन लोगों से सहानुभूति है क्योंकि ये मेरे साथ तीन दिन से हैं और इनके पास अब खाने को कुछ नहीं है. मैं इन्हें भूखा ही विदा करना नहीं चाहता—कहीं ये मार्ग में ही मूर्च्छित न हो जाएं.”

33शिष्यों ने कहा, “इस निर्जन स्थान में इस बड़ी भीड़ की तृप्ति के लिए भोजन का प्रबंध कैसे होगा?”

34येशु ने उनसे प्रश्न किया, “क्या है तुम्हारे पास?”

“सात रोटियां और कुछ मछलियां,” उन्होंने उत्तर दिया.

35येशु ने भीड़ को भूमि पर बैठ जाने का निर्देश दिया 36और स्वयं उन्होंने सातों रोटियां और मछलियां लेकर उनके लिए परमेश्वर के प्रति आभार प्रकट करने के बाद उन्हें तोड़ा और शिष्यों को देते गए तथा शिष्य भीड़ को. 37सभी ने खाया और तृप्त हुए और रोटी के शेष टुकड़ों से सात बड़े टोकरे भर गए. 38वहां जितनों ने भोजन किया था उनमें स्त्रियों और बालकों के अतिरिक्त पुरुषों ही की संख्या कोई चार हज़ार थी. 39भीड़ को विदा कर येशु नाव में सवार होकर मगादान क्षेत्र में आए.