Habrit Hakhadasha/Haderekh

הבשורה על-פי מרקוס 12:1-44

1ישוע סיפר לעם את המשל הבא: ”איש אחד נטע כרם ענבים ובנה גדר, יקב ומגדל שמירה. הוא השכיר את הכרם לכורמים ונסע לחוץ לארץ. 2בזמן הבציר שלח בעל־הכרם את אחד מאנשיו לאסוף את הרווח מיבול הענבים, 3אולם הכורמים התנפלו על השליח, הכו אותו ושלחו אותו חזרה אל בעל־הכרם בידיים ריקות.

4”בעל־הכרם שלח מישהו אחר אל הכורמים, אך גם אותו הכו ואף פצעו את ראשו. 5‏-6השליח הבא נרצח וכל השליחים שבאו לאחר מכן לכרם הוכו או נרצחו. לבסוף נשאר לבעל־הכרם עוד שליח אחד – בנו היחיד. בלית ברירה הוא שלח את בנו, בתקווה שלפחות אליו יתייחסו הכורמים בכבוד. 7אבל כשראו הכורמים את הבן מרחוק, אמרו: ’הנה בא יורש הכרם; הבה נהרוג אותו, ואז יהיה הכרם שלנו!‘ 8הם תפסו את הבן, רצחו אותו והשליכו את גופתו מעבר לגדר.

9”מה לדעתכם יעשה בעל־הכרם כאשר ישמע מה שקרה? מובן שיבוא בעצמו, יהרוג את כל הכורמים וישכיר את הכרם לאחרים. 10האם אינכם זוכרים שככה כתוב בתהלים? ’אבן מאסו הבונים היתה לראש פינה, 11מאת ה׳ היתה זאת; היא נפלאת בעינינו‘.“12‏.11 יב 11 כלשונו: ”אבן מאסו הבונים הייתה לראש פינה; מאת ה׳ הייתה זאת, היא נפלאת בעינינו.“ (תהלים קיח 22)

12ראשי הכוהנים, הזקנים והסופרים רצו לאסור אותו בו במקום, כי הבינו שבמשל זה הוא מתכוון אליהם – שהם הכורמים הרשעים. אולם הם פחדו לגעת בו בגלל ההמון הרב שהיה שם. על כן ויתרו לו והלכו לדרכם. 13אולם הם שלחו אליו כמה מאנשי הורדוס ופרושים, כדי שייכנסו איתו לשיחה וינסו לגרום לכך שיאמר משהו נגד החוק, על־מנת שתהיה להם עילה לאסור אותו.

14”רבי,“ פתחו המסתננים, ”אנחנו יודעים שאתה איש ישר ושאיש אינו יכול להשפיע עליך לשקר. אנחנו גם יודעים שאתה באמת מלמד את דבר אלוהים. אמור לנו, רבי, האם עלינו לשלם מס לקיסר הרומאי או לא?“

15ישוע הבין את מזימתם ולכן ענה: ”תנו לי מטבע ואומר לכם.“ 16הם נתנו לו מטבע, והוא שאל: ”של מי הדמות החקוקה על המטבע? של מי השם החקוק כאן?“

”של הקיסר!“ ענו כולם.

17”של הקיסר? אם כן תנו לו את מה ששייך לו, אך תנו לאלוהים את מה ששייך לאלוהים.“ הם נותרו פעורי פה וללא מילים.

18אחר כך באו צדוקים (שאינם מאמינים בתחיית המתים) ושאלו אותו:

19”רבי, משה רבנו לימד אותנו שאם אדם נשוי מת ואינו משאיר אחריו בן, חייב אחיו להתחתן עם האלמנה, כדי שתוכל ללדת בן שישא את שם המת. 20במשפחה אחת היו שבעה אחים; האח הבכור התחתן, וכעבור זמן קצר מת ולא השאיר אחריו בן. 21האח השני התחתן עם האלמנה, וגם הוא מת ולא השאיר בן. כך קרה גם עם האח השלישי. 22בקיצור, כל שבעת האחים התחתנו עם האישה האחת, כולם מתו ולא השאירו אחריהם בן. לבסוף מתה גם האישה.“

23”רבי, למי תהיה שייכת האישה בתחיית המתים? הלא כל השבעה התחתנו אתה!“ 24השיב להם ישוע: ”טעותכם נובעת מבורותכם בכל הנוגע לכתבי־הקודש ולגבורתו של אלוהים. 25כי בתחיית המתים לא יהיו עוד נשואים; כולם יהיו כמלאכים בשמים.

26”ובנוגע לתחיית המתים – טועים אתם מאוד. האם מעולם לא קראתם בספר שמות על משה והסנה הבוער? אלוהים אמר למשה:12‏.26 יב 26 שמות ג 6 ’אנוכי אלוהי אברהם, אלוהי יצחק ואלוהי יעקב‘.

27”אלוהים אמר למשה כי למרות שאנשים אלה מתו לפני מאות שנים, הם עדיין חיים. הרי אלוהים לא היה אומר: ’אנוכי האלוהים‘ של אנשים מתים!“

28אחד המנהיגים היהודיים שעמד שם נוכח כי ישוע השיב כהלכה, ולכן שאל אותו: ”מהי המצווה החשובה ביותר?“

29ישוע השיב: ” ’שמע ישראל, ה׳ אלוהינו, ה׳ אחד! 30ואהבת את ה׳ אלוהיך בכל לבבך ובכל נפשך ובכל מאודך‘. 31המצווה השנייה היא: ’ואהבת לרעך כמוך!‘ מצוות אלה הן החשובות ביותר!“

32השואל המשיך: ”רבי, אתה צודק. באמת יש רק אלוהים אחד ואין אחר מלבדו. 33אני יודע שחשוב יותר לאהוב את אלוהים בכל לבי, הבנתי וכוחי, ולאהוב אנשים אחרים כמו את עצמי, מאשר להקריב כל מיני קרבנות בבית־המקדש.“

34ישוע ראה שהאיש דיבר בחוכמה, ולכן אמר לו: ”אתה קרוב מאוד למלכות אלוהים!“ לאחר מכן לא העז איש לשאול אותו יותר שאלות.

35מאוחר יותר, כשלימד ישוע את האנשים בבית־המקדש, שאל אותם: ”מדוע טוענים הסופרים כי המשיח הוא בן־דוד? 36הרי דוד אמר בעצמו בהשראת רוח הקודש:12‏.36 יב 36 תהלים קי 1 ’נאום ה׳ לאדני, שב לימיני עד אשית אויביך הדום לרגליך‘. 37הלא דוד עצמו קרא לו ’אדון‘, אם כן כיצד הוא יכול להיות בנו?“ הקהל נהנה מאוד להקשיב לנימוקיו של ישוע ולמסקנותיו.

38ישוע המשיך ללמד את העם: ”היזהרו מהסופרים שאוהבים ללבוש גלימות ולהיראות לפני האנשים בשווקים, כדי שכולם ייתנו להם כבוד. 39הם אוהבים לשבת במושבות הנכבדים בבית־הכנסת ובסעודות וחגיגות. 40ללא בושה הם מגרשים אלמנות מבתיהן, וכדי לכסות על מעשיהם מעמידים פני קדושים תמימים ומתפללים בציבור תפילות ארוכות. משום כך יהיה עונשם חמור יותר.“

41ישוע התיישב מול תיבת האוצר והתבונן באנשים שהביאו תרומות. עשירים רבים תרמו סכומי כסף גדולים. 42אחריהם הופיעה אלמנה ענייה שתרמה שתי פרוטות בשווי של שתי אגורות.

43ישוע קרא לתלמידיו ואמר: ”אתם רואים את האלמנה הזאת? היא תרמה יותר מכל העשירים האלה גם יחד! 44כי העשירים תרמו סכומים קטנים ביחס לרכוש הרב שיש להם, ואילו האלמנה הזאת נתנה את כל מה שהיה לה.“

Hindi Contemporary Version

मार्का 12:1-44

बुरे किसानों का दृष्टांत

1मसीह येशु ने उन्हें दृष्टान्तों के माध्यम से शिक्षा देना प्रारंभ किया: “एक व्यक्ति ने बगीचे में अंगूर की बेल लगाई, उसके चारों ओर बाड़ लगाई, उसमें रसकुंड खोदा, रक्षा करने का मचान बनाया और उसे किसानों को पट्टे पर देकर यात्रा पर चला गया. 2उपज के अवसर पर उसने अपने एक दास को उन किसानों के पास भेजा कि वह उनसे उपज का कुछ भाग ले आए. 3किसानों ने उस दास को पकड़ा, उसकी पिटाई की तथा उसे खाली हाथ लौटा दिया. 4उस व्यक्ति ने फिर एक अन्य दास को भेजा. किसानों ने उसके सिर पर प्रहार कर उसे घायल कर दिया तथा उसके साथ शर्मनाक व्यवहार किया. 5उस व्यक्ति ने एक बार फिर एक और दास को उनके पास भेजा, जिसकी तो उन्होंने हत्या ही कर दी. उसके द्वारा भेजे हुए अन्य दासों के साथ भी उन्होंने ऐसा ही व्यवहार किया: उन्होंने कुछ को मारा-पीटा तथा बाकियों की हत्या कर दी.

6“अब उसके पास भेजने के लिए एक ही व्यक्ति शेष था—उसका प्रिय पुत्र. अन्ततः उसने उसे ही उनके पास भेज दिया. उसका विचार था, ‘वे मेरे पुत्र का तो सम्मान करेंगे.’

7“उन किसानों ने आपस में विचार किया, ‘सुनो, यह वारिस है. यदि इसकी हत्या कर दें तो यह संपत्ति ही हमारी हो जाएगी!’ 8उन्होंने उसे पकड़ उसकी हत्या कर दी तथा उसका शव बगीचे के बाहर फेंक दिया.

9“अब बगीचे के स्वामी के सामने इसके अतिरिक्त और कौन सा विकल्प शेष रह गया है कि वह आकर उन किसानों का नाश करे और उद्यान का पट्टा अन्य किसानों को दे दे? 10क्या तुमने पवित्र शास्त्र का यह लेख नहीं पढ़ा:

“ ‘जिस पत्थर को राजमिस्त्रियों ने निकम्मा घोषित कर दिया था,

वही कोने का मुख्य पत्थर बन गया;

11यह प्रभु की ओर से हुआ,

और यह हमारी दृष्टि में अद्भुत है’12:11 स्तोत्र 118:22, 23?”

12मुख्य पुरोहित, शास्त्री तथा प्राचीन मसीह येशु को पकड़ने की युक्ति तो कर ही रहे थे, किंतु उन्हें भीड़ की प्रतिक्रिया का भी भय था. वे यह भली-भांति समझ गए थे कि यह दृष्टांत उन्हीं के लिए था. वस्तुत: इस अवसर पर वे मसीह येशु को छोड़ वहां से चले गए.

कर का प्रश्न

13यहूदियों ने मसीह येशु के पास कुछ फ़रीसियों तथा हेरोदेस समर्थकों को भेजा कि मसीह येशु को उनकी ही किसी बात में फंसाया जा सके. 14उन्होंने आकर मसीह येशु से यह प्रश्न किया, “गुरुवर, यह तो हमें मालूम है कि आप एक सच्चे व्यक्ति हैं. आपको किसी के समर्थन की ज़रूरत नहीं है क्योंकि आप में पक्षपात है ही नहीं. आप पूरी सच्चाई में परमेश्वर संबंधी शिक्षा देते हैं. हमें यह बताइए: कयसर को कर देना व्यवस्था के अनुसार है या नहीं? 15हम कर दें या नहीं?”

उनका पाखंड भांप कर मसीह येशु ने उनसे कहा, “क्यों मुझे फंसाने की युक्ति कर रहे हो? दीनार की मुद्रा लाकर मुझे दिखाओ.” 16वे मसीह येशु के पास एक मुद्रा ले आए. मसीह येशु ने वह मुद्रा उन्हें दिखाते हुए उनसे प्रश्न किया, “यह छाप तथा नाम किसका है?”

“कयसर का,” उन्होंने उत्तर दिया.

17मसीह येशु ने उनसे कहा, “जो कयसर का है, वह कयसर को दो और जो परमेश्वर का, वह परमेश्वर को.”

यह सुन वे दंग रह गए.

मरे हुओं के जी उठने का प्रश्न

18फिर सदूकी लोग, जो पुनरुत्थान में विश्वास नहीं करते, प्रभु येशु के पास आए. उन्होंने उनसे प्रश्न किया, 19“गुरुवर,” हमारे लिए “मोशेह के निर्देश हैं यदि किसी निःसंतान पुरुष का पत्नी के रहते हुए निधन हो जाए तो उसका भाई उस स्त्री से विवाह कर अपने भाई के लिए संतान उत्पन्न करे. 20इसी संदर्भ में एक घटना इस प्रकार है: सात भाई थे. पहले ने विवाह किया और बिना संतान ही चल बसा. 21दूसरे भाई ने उसकी पत्नी से विवाह कर लिया, वह भी बिना संतान ही चल बसा. तीसरे भाई की भी यही स्थिति रही. 22इस प्रकार सातों भाइयों की मृत्यु बिना संतान ही हो गई. इसके बाद उस स्त्री की भी मृत्यु हो गई. 23पुनरुत्थान में दुबारा जी उठने पर वह किसकी पत्नी कहलाएगी—क्योंकि वह तो सातों भाइयों की पत्नी रह चुकी है?”

24मसीह येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “क्या तुम्हारी इस भूल का कारण यह नहीं कि तुम न तो पवित्र शास्त्र का भेद समझते हो और न ही परमेश्वर के सामर्थ्य को? 25पुनरुत्थान में लोग न तो विवाहित होते हैं और न ही वहां विवाह कराये जाते हैं—वहां वे स्वर्गदूतों के समान होंगे. 26जहां तक मरे हुओं के दुबारा जी उठने का प्रश्न है, क्या तुमने मोशेह के ग्रंथ में नहीं पढ़ा, जहां जलती हुई झाड़ी का वर्णन है? परमेश्वर ने मोशेह से कहा था, ‘मैं ही अब्राहाम का परमेश्वर, यित्सहाक का परमेश्वर तथा याकोब का परमेश्वर हूं’? 27आप लोग बड़ी गंभीर भूल में पड़े हैं! वह मरे हुओं के नहीं परंतु जीवितों के परमेश्वर हैं.”

सबसे बड़ी आज्ञा

28उसी समय एक शास्त्री वहां से जा रहा था. उसने उनका वार्तालाप सुन लिया. यह देख कि मसीह येशु ने उन्हें सटीक उत्तर दिया है, उसने मसीह येशु से पूछा, “सबसे बड़ी आज्ञा कौन सी है?”

29मसीह येशु ने उत्तर दिया, “सबसे बड़ी आज्ञा है: ‘सुनो, इस्राएलियो! याहवेह हमारे परमेश्वर अद्वितीय याहवेह हैं. 30तुम प्रभु तुम्हारे परमेश्वर से अपने सारे हृदय, सारे प्राण, सारे मस्तिष्क तथा सारी शक्ति से प्रेम करो.’ 31दूसरी आज्ञा है, ‘तुम अपने पड़ोसी से अपने ही समान प्रेम करो.’ इनसे बढ़कर कोई और आज्ञा है ही नहीं.”

32उस शास्त्री ने मसीह येशु से कहा, “अति सुंदर, गुरुवर! आपका कहना हमेशा ही सत्य है. वही एकमात्र हैं—उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है 33तथा उनसे ही सारे हृदय, सारे समझ तथा सारी शक्ति से प्रेम करना तथा अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना सभी बलियों तथा आग-बलियों से बढ़कर है.”

34जब मसीह येशु ने यह देखा कि उसने बुद्धिमानी से उत्तर दिया है, उन्होंने उससे कहा, “तुम परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं हो.”

इसके बाद किसी में भी उनसे और प्रश्न करने का साहस न रहा.

मसीह किसका पुत्र?

35मंदिर के आंगन, में शिक्षा देते हुए मसीह येशु ने उनके सामने यह प्रश्न रखा, “शास्त्री यह क्यों कहते हैं कि मसीह दावीद के वंशज हैं? 36दावीद ने, पवित्रात्मा, में आत्मलीन हो कहा था:

“ ‘प्रभु याहवेह ने मेरे प्रभु से कहा:

“मेरी दायीं ओर बैठे रहो

जब तक मैं तुम्हारे शत्रुओं को

तुम्हारे अधीन न कर दूं.” ’

37स्वयं दावीद उन्हें प्रभु कहकर संबोधित कर रहे हैं इसलिये किस भाव में प्रभु दावीद के पुत्र हुए?”

भीड़ उनके इस वाद-विवाद का आनंद ले रही थी.

शास्त्रियों और फ़रीसियों का पाखंड

38आगे शिक्षा देते हुए मसीह येशु ने कहा, “उन शास्त्रियों से सावधान रहना, जो लंबे ढीले लहराते वस्त्र पहने हुए घूमा करते हैं, जिन्हें सार्वजनिक स्थलों पर सम्मानपूर्ण नमस्कार की इच्छा रहती है. 39उन्हें सभागृहों में प्रधान आसन तथा भोज के अवसरों पर मुख्य स्थान की आशा रहती है. 40वे विधवाओं के घर हड़प जाते हैं तथा मात्र दिखावे के उद्देश्य से लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएं करते हैं. कठोर होगा इनका दंड!”

कंगाल विधवा का दान

41मसीह येशु मंदिर के कोष के सामने बैठे हुए थे. वह देख रहे थे कि लोग मंदिर कोष में किस प्रकार दान दे रहे हैं. अनेक धनी लोग बड़ी-बड़ी राशि डाल रहे थे. 42एक निर्धन विधवा भी वहां आई और उसने कोष में तांबे की मात्र दो बहुत छोटी मुद्राएं डालीं.

43मसीह येशु ने अपने शिष्यों का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा, “मैं तुम पर एक अटल सच्चाई प्रकट कर रहा हूं: जितनों ने भी कोष में दान दिया है, इस विधवा का दान उन सबसे बढ़कर है 44क्योंकि शेष सभी ने तो अपने धन की बढ़ती में से दिया है किंतु इस विधवा ने अपनी निर्धनता में से अपनी सारी संपत्ति ही दे दी—यह उसकी सारी जीविका थी.”