Habrit Hakhadasha/Haderekh

הבשורה על-פי מרקוס 10:1-52

1ישוע עזב את כפר־נחום והלך דרומה, לגבול יהודה ולאזור שממזרח לנהר הירדן. שוב התאסף סביבו קהל גדול, וישוע לימד אותם כמנהגו. 2פרושים אחדים שבאו לנסותו שאלו: ”האם מותר לאיש להתגרש מאשתו?“

3”מה אמר משה רבנו בקשר לגירושין?“ שאל ישוע. 4”משה אמר שמותר להתגרש“, השיבו הפרושים. ”הוא אמר שבעל הרוצה לגרש את אשתו צריך לכתוב לה ספר כריתות (מכתב גירושין), וזה כל מה שנדרש ממנו.“ 5”האם אתם יודעים מדוע כתב לכם משה את המצוה הזאת?“ השיב ישוע. ”אני אגיד לכם למה: משה לקח בחשבון את האופי העקשני שלכם. 6‏-7הרי מובן מאליו שאלוהים לא ברא איש ואישה כדי שייפרדו, אלא להיפך – אלוהים ברא איש ואישה כדי שיתאחדו לעולם בברית הנישואין. על כן יעזוב איש את אביו ואת אמו, 8ודבק באשתו והיו לבשר אחד.10‏.8 י 8 בראשית ב 24 9וכך אסור לאיש להפריד את מה שאלוהים איחד.“

10מאוחר יותר, כשנשאר ישוע בבית לבד עם התלמידים, שוב העלו את הנושא. 11ישוע הסביר להם: ”בעל המגרש את אשתו משום שברצונו להתחתן עם אישה אחרת, נחשב לנואף. 12ואישה המגרשת את בעלה ומתחתנת בשנית נחשבת גם היא לנואפת.“

13פעם הביאו אליו מספר אמהות את ילדיהן, כדי שיברך אותם, אולם התלמידים גירשו את האמהות וביקשו מהן שלא להטריד את ישוע.

14כשראה ישוע מה עושים תלמידיו, זה לא מצא חן בעיניו. ”תנו לילדים לבוא אלי ואל תמנעו מהם, כי לכאלה שייכת מלכות האלוהים. 15אני אומר לכם: מי שלא מקבל את מלכות האלוהים כמו ילד, לא יוכל להיכנס אליה.“ 16ישוע חיבק את הילדים, הניח ידיו על ראשם וברך אותם.

17יום אחד כאשר ישוע יצא לאחד ממסעותיו, בא אליו אדם בריצה שנפל לרגליו ושאל: ”רבי הטוב, מה עלי לעשות כדי לזכות בחיי נצח?“

18”מדוע אתה קורא לי טוב?“ שאל ישוע. ”רק אלוהים טוב. 19אך בתשובה לשאלתך, אתה הרי מכיר את המצוות: לא תרצח, לא תנאף, לא תגנוב, לא תענה ברעך עד שקר, לא תעשוק, כבד את אביך ואת אמך?“

20”רבי,“ ענה האיש, ”תמיד שמרתי את כל המצוות האלה.“

21ישוע הביט בו באהבה. ”עליך לעשות עוד דבר אחד: עליך למכור את רכושך ולתרום את הכסף לעניים – כדי שאוצרך יהיה בשמים – ולאחר מכן לך אחרי.“

22האיש התעצב מאוד והלך לדרכו, כי היה עשיר מאוד.

23ישוע הסתכל ואז אמר לתלמידיו: ”לאיש עשיר קשה מאוד להיכנס למלכות האלוהים.“ 24דבריו של ישוע הדהימו את התלמידים, ולכן חזר ואמר: ”ילדים יקרים, מי שבוטח בכסף וברכוש קשה לו מאוד להיכנס למלכות האלוהים. 25קל יותר לגמל לעבור דרך חור המחט, מאשר לאיש עשיר להיכנס למלכות האלוהים.“ 26דבריו אך הגבירו את תמיהת התלמידים. הם שאלו זה את זה: ”מי, אם כן, יוכל להיוושע?“

27ישוע הביט בהם ואמר: ”למעשה, לבני־האדם זה לא אפשרי, אולם לא לאלוהים: עם אלוהים הכול אפשרי!“

28פטרוס החל למנות בקול רם את כל הדברים שהוא ושאר התלמידים עזבו למען ישוע. ”אנחנו ויתרנו על הכול כדי ללכת אחריך!“ אמר פטרוס.

29”אני מבטיח לכם,“ אמר ישוע, ”שכל מי שוויתר על בית, אחים, אחיות, אמא, אבא, ילדים או רכוש למעני ולמען הבשורה, 30יקבל ממני חזרה פי מאה ממה שלכאורה הפסיד: בתים, אחים, אחיות, אמהות, ילדים, אדמות – אך עם כל אלה גם רדיפות, ובעולם הבא יקבל חיי נצח. 31אולם רבים מאלה שהם ראשונים עתה יהיו אז אחרונים, ואחדים מהאחרונים עתה יהיו אז ראשונים.“

32בדרך לירושלים הלך ישוע בראש, והתלמידים הלכו אחריו בחרדה. ישוע המשיך לספר להם מה יקרה לו בירושלים. 33ודיבר איתם על הצפוי לו בירושלים: ”מישהו יסגיר אותי לידי ראשי הכוהנים ולסופרים. הם ידונו אותי למוות וימסרו אותי לידי הרומאים. 34הם יִרקו עלי, ילעגו לי, יצליפו בי בשוטים ויהרגו אותי. אבל לאחר שלושה ימים אקום לתחייה.“

35יעקב ויוחנן בני זבדי לחשו באוזנו: ”רבי, אנחנו רוצים לבקש ממך טובה.“

36”איזו טובה אתם רוצים?“ שאל ישוע.

37”כאשר תשב על כסא המלכות, אנו רוצים לשבת אחד לימינך ואחד לשמאלך.“

38”אינכם יודעים מה אתם מבקשים!“ התפלא ישוע. ”האם תוכלו לשתות מהכוס שאני חייב לשתות? האם תוכלו להיטבל בטבילה שאני מוכרח להיטבל?“

39”כן!“ השיבו.

”אתם באמת תשתו מכוסי ותיטבלו בטבילתי“, אמר ישוע. 40”אבל איני יכול להבטיח לכם לשבת לימיני ולשמאלי, מפני שמקומות אלה כבר שמורים!“ 41עד מהרה גילו שאר התלמידים את בקשתם של יעקב ויוחנן וכעסו עליהם מאוד. 42ישוע קיבץ סביבו את התלמידים ואמר: ”אתם הרי יודעים שאלה הנחשבים למנהיגי הגויים רודים בנתיניהם, ומעניקים כוח וסמכות למי שהם רוצים. 43אולם ביניכם אין הדבר כך; מי שרוצה להיות מנהיג ביניכם צריך להיות לכם למשרת. 44מי שרוצה לעמוד בראש צריך להיות המשרת של כולכם. 45אף אני, בן־האדם, לא באתי לכאן כדי שישרתו אותי, אלא כדי לשרת אחרים ולתת את חיי כופר בעד רבים.“

46ישוע ותלמידיו באו ליריחו. בצאתם מהעיר הלך אחריהם קהל גדול. בצד הדרך ישב קבצן עיוור בשם ברטמי בן־טימי, 47ששמע שישוע מנצרת מתקרב. ברטמי החל לצעוק: ”ישוע בן דוד, רחם עלי!“

48”שתוק!“ ציוו עליו מספר אנשים. אך העיוור לא שתק, אלא הגביר את קולו: ”בן דוד, רחם עלי!“

49ישוע שמע את תחינותיו של העיוור ועמד מלכת. הוא ביקש לקרוא לעיוור. ”התעודד,“ אמרו לו, ”קום! הוא קורא לך.“ 50ברטמי השליך מעליו את שמיכותיו ובא לישוע.

51”מה אוכל לעשות למענך?“ שאל ישוע.

”רבי, אני רוצה לראות!“ בכה האיש.

52”כמובן“, השיב ישוע. ”אמונתך ריפאה אותך; לך לשלום.“ ואכן עיניו נרפאו והוא הלך בדרך אחרי ישוע.

Hindi Contemporary Version

मार्का 10:1-52

तलाक का विषय

1मसीह येशु वहां से निकलकर यहूदिया के उस क्षेत्र में चले गए, जो यरदन नदी के पार था. भीड़ फिर से उनके चारों ओर इकट्ठी हो गई. अपनी रीति के अनुसार मसीह येशु ने एक बार फिर उन्हें शिक्षा देना प्रारंभ किया.

2उन्हें परखने के उद्देश्य से कुछ फ़रीसी उनके पास आ गए. उन्होंने मसीह येशु से प्रश्न किया, “क्या पुरुष के लिए पत्नी से तलाक लेना व्यवस्था के अनुसार है?”

3मसीह येशु ने ही उनसे प्रश्न किया, “तुम्हारे लिए मोशेह का आदेश क्या है?”

4फ़रीसियों ने उन्हें उत्तर दिया, “मोशेह ने तलाक पत्र लिखकर पत्नी का त्याग करने की अनुमति दी है.”

5मसीह येशु ने उन्हें समझाया, “तुम्हारे कठोर हृदय के कारण मोशेह ने तुम्हारे लिए यह आज्ञा रखी 6किंतु वास्तव में सृष्टि के प्रारंभ ही से परमेश्वर ने उन्हें नर और नारी बनाया. 7इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा तथा वे दोनों एक देह होंगे.10:7 उत्प 1:27 8वे दोनों एक शरीर हो जाएंगे; परिणामस्वरूप अब वे दोनों दो नहीं परंतु एक शरीर हैं 9इसलिये जिन्हें स्वयं परमेश्वर ने जोड़ा है, उन्हें कोई मनुष्य अलग न करे.”

10जब वे दोबारा अपने घर पर आए, शिष्यों ने मसीह येशु से इसके विषय में जानना चाहा. 11मसीह येशु ने उन्हें समझाया, “यदि कोई अपनी पत्नी से तलाक लेकर अन्य स्त्री से विवाह करता है, वह उस अन्य स्त्री के साथ व्यभिचार करता है. 12यदि स्वयं स्त्री अपने पति से तलाक लेकर अन्य पुरुष से विवाह कर लेती है, वह भी व्यभिचार करती है.”

मसीह येशु तथा बालक

13मसीह येशु को छू लेने के उद्देश्य से लोग बालकों को उनके पास ला रहे थे. इस पर शिष्य उन्हें डांटने लगे. 14यह देख मसीह येशु ने अप्रसन्न होते हुए उनसे कहा, “बालकों को यहां आने दो, उन्हें मेरे पास आने से मत रोको क्योंकि स्वर्ग-राज्य ऐसों का ही है. 15मैं तुम पर एक अटल सच्चाई प्रकट कर रहा हूं; जो कोई परमेश्वर के राज्य को बालकों के समान स्वीकार नहीं करता, उसका इसमें प्रवेश संभव ही नहीं है.” 16तब मसीह येशु ने बालकों को अपनी गोद में लिया और उन पर हाथ रख उन्हें आशीर्वाद दिया.

अनंत जीवन का अभिलाषी धनी युवक

17मसीह येशु अपनी यात्रा प्रारंभ कर ही रहे थे कि एक व्यक्ति उनके पास दौड़ता हुआ आया और उनके सामने घुटने टेकते हुए उनसे पूछने लगा, “उत्तम गुरु, अनंत काल का जीवन प्राप्त करने के लिए मैं क्या करूं?”

18मसीह येशु ने उससे कहा, “उत्तम मुझे क्यों कह रहे हो? परमेश्वर के अलावा उत्तम कोई भी नहीं है. 19आज्ञा तो तुम्हें मालूम ही हैं: हत्या न करो, व्यभिचार न करो, चोरी न करो, झूठी गवाही न दो, छल न करो, माता-पिता का सम्मान करो.”10:19 निर्ग 20:12-16; व्यव 5:16-20

20उसने उत्तर दिया, “गुरुवर, मैं बाल्यावस्था से इनका पालन करता आया हूं.”

21युवक को एकटक देखते हुए मसीह येशु का हृदय उस युवक के प्रति स्नेह से भर गया. उन्होंने उससे कहा, “एक ही कमी है तुममें: जाओ, अपनी सारी संपत्ति बेचकर प्राप्त राशि गरीबों में बांट दो. धन तुम्हें स्वर्ग में प्राप्त होगा. लौटकर आओ और मेरा अनुगमन करो.”

22ये शब्द सुनते ही उसका मुंह लटक गया. वह शोकित हृदय से लौट गया क्योंकि वह बड़ी संपत्ति का स्वामी था.

23मसीह येशु ने अपने आस-पास इकट्ठा शिष्यों से कहा, “परमेश्वर के राज्य में धनवानों का प्रवेश कितना कठिन होगा!”

24मसीह येशु के इन विचारों से शिष्य चकित रह गए. एक बार फिर मसीह येशु ने उनसे कहा, “अज्ञानियो! कितना कठिन होगा!10:24 कुछ अभिलेखों में: उनके लिए, जो धन पर भरोसा करते हैं, परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कितना कठिन होगा! परमेश्वर के राज्य में प्रवेश! 25परमेश्वर के राज्य में किसी धनवान के प्रवेश की अपेक्षा ऊंट का सुई के छेद में से पार हो जाना सरल है.”

26यह सुन शिष्य और भी अधिक चकित हो गए और मसीह येशु से पूछने लगे, “तब उद्धार किसका हो सकेगा?”

27उनकी ओर देखते हुए मसीह येशु ने कहा, “मनुष्यों के लिए तो यह असंभव है किंतु परमेश्वर के लिए नहीं—परमेश्वर के लिए सभी कुछ संभव है.”

28पेतरॉस मसीह येशु से बोले, “हम तो अपना सब कुछ त्यागकर आपके पीछे हो लिए हैं.”

29मसीह येशु ने उत्तर दिया, “मैं तुम पर एक अटल सच प्रकट कर रहा हूं: ऐसा कोई भी नहीं, जिसने मेरे तथा सुसमाचार के हित में अपने परिवार, भाई-बहन, माता-पिता, संतान या संपत्ति का त्याग किया हो, 30उसे इस युग में उत्पीड़न के साथ प्रतिफल स्वरूप परिवार, भाई-बहन, माता-पिता, संतान तथा संपत्ति का सौ गुणा तथा आनेवाले समय में अनंत काल का जीवन प्राप्त न होगा. 31किंतु अनेक, जो पहले हैं अंतिम होंगे तथा जो अंतिम हैं वे पहले.”

दुःख-भोग और क्रूस की मृत्यु की तीसरी भविष्यवाणी

32येरूशलेम नगर की ओर जाते हुए मसीह येशु उन सबके आगे-आगे चल रहे थे. शिष्य चकित थे तथा अन्य पीछे चलनेवाले लोग डरे हुए थे. बारहों को अलग ले जाकर मसीह येशु ने उन्हें बताना प्रारंभ किया कि स्वयं उनके साथ क्या-क्या होना ज़रूरी है. 33“हम येरूशलेम नगर को जा रहे हैं, वहां मनुष्य के पुत्र को प्रधान पुरोहितों तथा शास्त्रियों के हाथों में सौंप दिया जाएगा. वे उस पर मृत्यु दंड की आज्ञा प्रसारित करेंगे तथा उसे गैर-यहूदियों को सौंप देंगे. 34वे सब उसका ठट्ठा करेंगे, उस पर थूकेंगे, कोड़े लगाएंगे, और उसकी हत्या कर देंगे तथा तीन दिन बाद वह मरे हुओं में से फिर जीवित हो जाएगा.”

ज़ेबेदियॉस के पुत्रों की विनती

35ज़ेबेदियॉस के दोनों पुत्र, याकोब तथा योहन, मसीह येशु के पास आकर विनती कर कहने लगे, “गुरुवर, हमारी इच्छा है कि हम आप से जो भी विनती करें, आप उसे हमारे लिए पूरी कर दें.”

36मसीह येशु ने उनसे पूछा, “क्या चाहते हो?”

37“हमारी इच्छा है कि आपकी महिमा के समय में हम आपकी दायीं तथा बायीं ओर में बैठें,” उन्होंने विनती की.

38इस पर मसीह येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “तुम्हें तो यह मालूम ही नहीं कि तुम क्या मांग रहे हो. क्या तुममें वह प्याला पीने की क्षमता है जिसे मैं पीने पर हूं, या तुममें उस बपतिस्मा में बपतिस्मित होने की क्षमता है, जिसमें मुझे बपतिस्मा दिया गया है?”

39उन्होंने उत्तर दिया, “अवश्य.”

मसीह येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “वह प्याला, जो मैं पियूंगा, तुम भी पिओगे तथा तुम्हें वही बपतिस्मा दिया जाएगा, जो मुझे दिया गया है 40किंतु किसी को अपने दायें या बायें पक्ष में बैठाना मेरा अधिकार नहीं है. ये स्थान उन्हीं के लिए सुरक्षित हैं, जिन्हें इनके लिए तैयार किया गया है.”

41जब शेष दस ने यह सब सुना तो वे याकोब और योहन पर नाराज़ हो गए. 42उन सबको अपने पास बुलाकर मसीह येशु ने उनसे कहा, “वे, जो गैर-यहूदियों में शासकों के रूप में जाने जाते हैं, उनको दबाया करते तथा उनके बड़े अधिकारी उन पर अपना अधिकार दिखाया करते हैं 43किंतु तुम्हारे विषय में ऐसा नहीं है. तुममें जो बड़ा बनने का इच्छुक है, उसको तुम्हारा सेवक हो जाना ज़रूरी है. 44तुममें जो कोई श्रेष्ठ होना चाहता है, वह सबका दास हो. 45क्योंकि मनुष्य का पुत्र यहां इसलिये नहीं आया कि अपनी सेवा करवाए परंतु इसलिये कि सेवा करे और अनेकों की छुड़ौती के लिए अपना जीवन बलिदान कर दे.”

येरीख़ो नगर में अंधा व्यक्ति

46इसके बाद मसीह येशु येरीख़ो नगर आए. जब वह अपने शिष्यों तथा एक विशाल भीड़ के साथ येरीख़ो नगर से निकलकर जा रहे थे, उन्हें मार्ग के किनारे बैठा हुआ एक अंधा व्यक्ति, तिमाऊ का पुत्र बारतिमाऊ, भीख मांगता हुआ मिला. 47जब उसे यह मालूम हुआ कि वह यात्री नाज़रेथवासी मसीह येशु हैं, वह पुकारने लगा, “दावीद-पुत्र, येशु! मुझ पर कृपा कीजिए!”

48उनमें से अनेक उसे पुकारने से रोकने की भरपूर कोशिश करने लगे किंतु वह और भी अधिक पुकारता गया, “दावीद की संतान, येशु! मुझ पर कृपा कीजिए!”

49मसीह येशु ने रुक कर आज्ञा दी, “उसे यहां लाओ!”

तब उन्होंने उस अंधे व्यक्ति के पास जाकर उससे कहा, “उठो, आनंद मनाओ! प्रभु तुम्हें बुला रहे हैं.” 50अंधा व्यक्ति बाहरी वस्त्र फेंक, उछलकर खड़ा हो गया तथा मसीह येशु के पास आ गया.

51मसीह येशु ने उससे पूछा, “क्या चाहते हो मुझसे?”

“अपनी आंखों की रोशनी दुबारा पाना चाहता हूं, रब्बी!” अंधे ने उत्तर दिया.

52मसीह येशु ने उसे आज्ञा दी, “जाओ, यह तुम्हारा विश्वास है, जिसके द्वारा तुम स्वस्थ हो गए हो.” उसी क्षण उस व्यक्ति की आंखों की रोशनी लौट आई और वह उनके पीछे चलने लगा.