Habrit Hakhadasha/Haderekh

הבשורה על-פי לוקס 19:1-48

1ישוע הגיע ליריחו ועבר ברחובות העיר. 2אדם אחד בשם זכי, אשר היה מנהל בכיר ברשויות המכס, בעל השפעה וכמובן עשיר גדול, 3רצה לראות את פניו של ישוע. אבל זכי היה נמוך־קומה, והקהל הרב הסתיר ממנו את ישוע. 4זכי רץ לפני הקהל הרב וטיפס על עץ שיקמה בצד הדרך על מנת שיוכל להתבונן בישוע ללא הפרעה.

5כאשר עבר ישוע ליד העץ, הרים את עיניו והביט בזכי. ”זכי,“ קרא לו ישוע בשמו, ”רד מהר מהעץ, כי היום עלי להתארח בביתך.“ 6זכי מיהר לרדת מהעץ וקיבל את פניו של ישוע בשמחה ובששון.

7הדבר לא מצא־חן בעיני הקהל. ”ישוע עומד להתארח בביתו של חוטא ידוע!“ רטנו.

8אולם זכי עמד לפני האדון ואמר: ”אדוני, מהיום והלאה אתן את מחצית רכושי לעניים וכל מי שלקחתי ממנו כסף במרמה, אחזיר לו פי ארבע!“ 9”היום באה ישועה לבית הזה!“ קרא ישוע. ”כי זכי הוא בן־אברהם. 10ואכן בן־האדם בא לחפש ולהושיע את האובדים.“

11כשהתקרבו לירושלים, ישוע סיפר לתלמידיו משל, כדי לתקן את הרושם המוטעה שהיה להם שמלכות האלוהים עומדת לבוא בכל רגע. 12”אציל אחד נקרא לארץ רחוקה כדי לקבל את כתר המלוכה על מחוז מגוריו. 13לפני צאתו לדרך קרא לעשרה ממשרתיו, נתן לכל אחד מהם מטבע זהב ואמר: ’השקיעו את הכסף וסחרו בו עד שאחזור‘. 14רבים מבני ארצו של המלך המיועד שנאו אותו, ואף שלחו בעקבותיו משלחת שהודיעה לו: ’איננו רוצים שתמלוך עלינו!‘ “

15”מחאתם לא הועילה, והאציל הוכתר למלך. כשחזר המלך לביתו קרא אליו את עשרת המשרתים, ושאל אותם מה עשו בכסף שנתן להם וכמה הרוויחו. 16המשרת הראשון בא ואמר: ’אדוני, ממטבע הזהב שנתת לי הרווחתי עשרה מטבעות זהב‘.

17” ’יפה מאוד, משרתי הטוב!‘ שיבח אותו המלך. ’מאחר שהוכחת את נאמנותך במעט שהפקדתי בידך, אני ממנה אותך שליט על עשר ערים‘.

18”גם המשרת השני דיווח על רווח, פי חמישה ממה שקיבל.

19” ’אותך אני ממנה שליט על חמש ערים‘, אמר לו המלך. 20אחר כך בא המשרת השלישי ואמר: ’אדוני, הנה המטבע שנתת לי; שמרתי אותו במטפחת ולא נגעתי בו. 21כי פחדתי ממך, מפני שאתה איש קשה; אתה לוקח מה שלא שייך לך וקוצר את מה שלא זרעת‘.

22” ’רשע שכמוך!‘ קרא המלך בזעם. ’איש קשה אני? מיד אראה לך כמה קשה אני יכול להיות! אם ידעת שאני לוקח מה שלא שייך לי וקוצר את מה שלא זרעתי, 23מדוע לא הפקדת את הכסף בבנק? כך לפחות הייתי מקבל ריבית!‘

24”המלך פנה אל העומדים סביבו ופקד: ’קחו ממנו את המטבע ותנו לאיש שהרוויח את הסכום הגדול ביותר!‘

25” ’אבל, אדון‘, אמרו במחאה, ’יש לו מספיק!‘ 26’נכון‘, השיב המלך. ’אני אומר לכם, מי שיש לו – יינתן לו עוד; מי שאין לו – גם המעט שבידו יילקח ממנו. 27ובנוגע לאויבי אשר לא רצו שאמלוך עליהם – הביאו אותם הנה והוציאו אותם להורג לפני‘.“

28ישוע סיים את דבריו והמשיך בדרכו לעלות לירושלים עם תלמידיו. 29בהתקרבם אל בית־פגי ובית־עניה שעל הר הזיתים, קרא אליו ישוע שנים מתלמידיו ואמר: 30”לכו אל הכפר ממול, ובכניסה תראו עיר קשור שאיש עדיין לא רכב עליו. התירו את העיר והביאו אותו אלי. 31אם מישהו ישאל אתכם מה אתם עושים, אמרו לו: ’האדון זקוק לעיר‘. “

32שני התלמידים הלכו אל הכפר ומצאו את העיר ממש כפי שאמר להם ישוע. 33כשהתירו את העיר בא אליהם בעליו ושאל בתימהון: ”מדוע אתם מתירים את העיר שלי?“

34”האדון זקוק לו“, השיבו התלמידים בפשטות.

35הם הביאו את העיר אל ישוע, ריפדו את גבו במעיליהם וישוע רכב עליו. 36אנשים רבים פרשו את מעיליהם וגלימותיהם על השביל לפניו. 37כשהתקרב ישוע לראש השביל היורד מהר הזיתים, החלה חבורת תלמידיו לשיר ולשבח את אלוהים בקולי קולות על כל הנסים והנפלאות שחולל ישוע.

38”ברוך הבא בשם ה׳!“ צהל ההמון. ”יחי המלך! שמחו השמים והארץ! שבח ותהילה לאלוהים במרומים!“

39פרושים אחדים שהיו בקרב הקהל אמרו לישוע: ”רבי, נזוף בתלמידיך על הדברים שהם אומרים!“

40אך הוא השיב להם: ”אם הם ישתקו האבנים האלה תזעקנה!“

41כאשר התקרב ישוע לירושלים, הביט בה בעצב ובכה עליה. 42”הלוואי שידעת גם את כיצד לעשות שלום! אולם הדבר נסתר ממך“, אמר ישוע בצער ובדמעות. 43”יבוא היום שאויביך יקימו סוללות חול סביב חומותיך, יקיפו אותך ויצורו עליך מכל עבר. 44אויביך יהרסו כליל אותך ואת בניך; הם לא ישאירו אבן אחת במקומה, משום שדחית את הישועה שהציע לך ה׳.“

45לאחר מכן הוא נכנס אל בית־המקדש והחל לגרש משם את הסוחרים ואת הקונים. 46”בכתבי־הקודש כתוב:19‏.46 יט 46 ישעיה נו 7 ’ביתי בית־תפלה‘, “ קרא ישוע, ”אבל אתם הפכתם אותו למאורת גנבים!“

47ישוע לימד יום־יום בבית־המקדש. הסופרים, ראשי הכוהנים והזקנים חיפשו דרך להיפטר ממנו, 48אך הם לא ידעו מה לעשות, מפני שכל העם אהב אותו והקשיב לדבריו בתשומת לב מרובה.

Hindi Contemporary Version

लूकॉ 19:1-48

ज़क्ख़ाइयॉस परिवार में उद्धार का आगमन

1प्रभु येशु ने येरीख़ो नगर में प्रवेश किया. 2वहां ज़क्ख़ाइयॉस नामक एक व्यक्ति था, जो प्रधान चुंगी लेनेवाला और धनी व्यक्ति था. 3वह यह देखने का प्रयत्न कर रहा था कि प्रभु येशु कौन हैं. भीड़ में वह प्रभु येशु को देख नहीं पा रहा था क्योंकि वह नाटा था. 4इसलिये प्रभु येशु को देखने के लिए वह दौड़कर आगे बढ़ा और गूलर के एक पेड़ पर चढ़ गया क्योंकि प्रभु येशु उसी मार्ग से जाने को थे.

5जब प्रभु येशु वहां पहुंचे, उन्होंने ऊपर देखते हुए उससे कहा, “ज़क्ख़ाइयॉस, तुरंत नीचे आ जाओ. ज़रूरी है कि आज मैं तुम्हारे घर में ठहरूं.” 6वह तुरंत नीचे उतरा और खुशी से उन्हें अपने घर ले गया.

7यह देख सभी बड़बड़ाने लगे, “वह तो एक ऐसे व्यक्ति के घर गया है, जो अपराधी है.”

8किंतु ज़क्ख़ाइयॉस ने खड़े होकर प्रभु से कहा, “प्रभुवर! मैं अपनी आधी संपत्ति निर्धनों में दान कर दूंगा और यदि मैंने किसी से गलत ढंग से कुछ भी लिया है तो मैं उसे चौगुनी राशि लौटा दूंगा.”

9प्रभु येशु ने उससे कहा, “आज इस परिवार में उद्धार का आगमन हुआ है—यह व्यक्ति भी अब्राहाम की संतान है. 10मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को खोजने तथा उन्हें उद्धार देने आया है.”

दस सेवक तथा सराहनीय निवेश का दृष्टांत

11जब वे इन बातों को सुन रहे थे, प्रभु येशु ने एक दृष्टांत प्रस्तुत किया क्योंकि अब वे येरूशलेम नगर के पास पहुंच रहे थे और लोगों की आशा थी कि परमेश्वर का राज्य तुरंत ही प्रकट होने पर है. 12प्रभु येशु ने कहना प्रारंभ किया: “एक कुलीन व्यक्ति राजपद प्राप्त करने के लिए दूर देश की यात्रा पर निकला. 13यात्रा के पहले उसने अपने दस दासों को बुलाकर उन्हें दस सोने के सिक्के देते हुए कहा, ‘मेरे लौटने तक इस राशि से व्यापार करना.’

14“लोग उससे घृणा करते थे इसलिये उन्होंने उसके पीछे एक सेवकों की टुकड़ी को इस संदेश के साथ भेजा, ‘हम नहीं चाहते कि यह व्यक्ति हम पर शासन करे.’

15“इस पर भी उसे राजा बना दिया गया. लौटने पर उसने उन दासों को बुलवाया कि वह यह मालूम करे कि उन्होंने उस राशि से व्यापार कर कितना लाभ कमाया है.

16“पहले दास ने आकर बताया, ‘स्वामी, आपके द्वारा दिए गए सोने के सिक्कों से मैंने दस सिक्के और कमाए हैं.’

17“ ‘बहुत बढ़िया, मेरे योग्य दास!’ स्वामी ने उत्तर दिया, ‘इसलिये कि तुम बहुत छोटी ज़िम्मेदारी में भी विश्वासयोग्य पाए गए, तुम दस नगरों की ज़िम्मेदारी संभालो.’

18“दूसरे दास ने आकर बताया, ‘स्वामी, आपके द्वारा दिए गए सोने के सिक्कों से मैंने पांच सोने के सिक्के और कमाए हैं.’

19“स्वामी ने उत्तर दिया, ‘तुम पांच नगरों की ज़िम्मेदारी संभालो.’

20“तब एक अन्य दास आया और स्वामी से कहने लगा, ‘स्वामी, यह है आपका दिया हुआ सोने का सिक्का, जिसे मैंने बड़ी ही सावधानी से कपड़े में लपेट, संभाल कर रखा है. 21मुझे आप से भय था क्योंकि आप कठोर व्यक्ति हैं. आपने जिसका निवेश भी नहीं किया, वह आप ले लेते हैं, जो आपने बोया ही नहीं, उसे काटते हैं.’

22“स्वामी ने उसे उत्तर दिया, ‘अरे ओ दुष्ट! तेरा न्याय तो मैं तेरे ही शब्दों के आधार पर करूंगा. जब तू जानता है कि मैं एक कठोर व्यक्ति हूं; मैं वह ले लेता हूं जिसका मैंने निवेश ही नहीं किया और वह काटता हूं, जो मैंने बोया ही नहीं, तो 23तूने मेरा धन साहूकारों के पास जमा क्यों नहीं कर दिया कि मैं लौटने पर उसे ब्याज सहित प्राप्त कर सकता?’

24“तब उसने अपने पास खड़े दासों को आज्ञा दी, ‘इसकी स्वर्ण मुद्रा लेकर उसे दे दो, जिसके पास अब दस मुद्राएं हैं.’

25“उन्होंने आपत्ति करते हुए कहा, ‘स्वामी, उसके पास तो पहले ही दस हैं!’

26“स्वामी ने उत्तर दिया, ‘सच्चाई यह है: हर एक, जिसके पास है, उसे और भी दिया जाएगा किंतु जिसके पास नहीं है, उससे वह भी ले लिया जाएगा, जो उसके पास है. 27मेरे इन शत्रुओं को, जिन्हें मेरा उन पर शासन करना अच्छा नहीं लग रहा, यहां मेरे सामने लाकर प्राण-दंड दो.’ ”

विजयोल्लास में येरूशलेम प्रवेश

28इसके बाद प्रभु येशु उनके आगे-आगे चलते हुए येरूशलेम नगर की ओर बढ़ गए. 29जब प्रभु येशु ज़ैतून नामक पर्वत पर बसे गांव बैथफ़गे तथा बैथनियाह पहुंचे, उन्होंने अपने दो शिष्यों को इस आज्ञा के साथ आगे भेज दिया, 30“सामने उस गांव में जाओ. वहां प्रवेश करते ही तुम्हें गधे का एक बच्चा बंधा हुआ मिलेगा, जिसकी अब तक किसी ने सवारी नहीं की है उसे खोलकर यहां ले आओ. 31यदि कोई तुमसे यह प्रश्न करे, ‘क्यों खोल रहे हो इसे?’ तो उसे उत्तर देना, ‘प्रभु को इसकी ज़रूरत है.’ ”

32जिन्हें इसके लिए भेजा गया था, उन्होंने ठीक वैसा ही पाया, जैसा उन्हें सूचित किया गया था. 33जब वे उस बच्चे को खोल ही रहे थे, उसके स्वामियों ने उनसे पूछा, “क्यों खोल रहे हो इसे?”

34उन्होंने उत्तर दिया, “प्रभु को इसकी ज़रूरत है.”

35वे उसे प्रभु के पास ले आए और उस पर अपने वस्त्र डालकर प्रभु येशु को उस पर बैठा दिया. 36जब प्रभु जा रहे थे, लोगों ने अपने बाहरी वस्त्र मार्ग पर बिछा दिए.

37जब वे उस स्थान पर पहुंचे, जहां ज़ैतून पर्वत का ढाल प्रारंभ होता है, सारी भीड़ उन सभी अद्भुत कामों को याद करते हुए, जो उन्होंने देखे थे, ऊंचे शब्द में आनंदपूर्वक परमेश्वर की स्तुति करने लगी:

38“स्तुति के योग्य है वह राजा, जो प्रभु के नाम में आ रहा है!”19:38 स्तोत्र 118:26

“स्वर्ग में शांति और सर्वोच्च में महिमा हो!”

39भीड़ में से कुछ फ़रीसियों ने, आपत्ति उठाते हुए प्रभु येशु से कहा, “गुरु, अपने शिष्यों को डांटिए!”

40“मैं आपको यह बताना चाहता हूं,” प्रभु येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “यदि ये शांत हो गए तो स्तुति इन पत्थरों से निकलने लगेगी.”

41जब वह येरूशलेम नगर के पास आए तो नगर को देख वह यह कहते हुए रो पड़े, 42“यदि तुम, हां तुम, आज इतना ही समझ लेते कि शांति का मतलब क्या है! किंतु यह तुमसे छिपाकर रखा गया है. 43वे दिन आ रहे हैं जब शत्रु सेना तुम्हारे चारों ओर घेराबंदी करके तुम्हारे निकलने का रास्ता बंद कर देगी. 44वे तुम्हें तथा तुम्हारी संतानों को धूल में मिला देंगे. वे तुम्हारे घरों का एक भी पत्थर दूसरे पत्थर पर न छोड़ेंगे क्योंकि तुमने तुम्हें दिए गए सुअवसर को नहीं पहचाना.”

दूसरी बार प्रभु येशु द्वारा मंदिर की शुद्धि

45मंदिर में प्रवेश करने पर प्रभु येशु ने सभी बेचने वालों को यह कहते हुए वहां से बाहर करना प्रारंभ कर दिया, 46“लिखा है: मेरा घर प्रार्थना का घर होगा किंतु तुमने तो इसे डाकुओं की गुफ़ा बना रखी है!”19:46 यशा 56:7; येरे 7:11

47प्रभु येशु हर रोज़ मंदिर में शिक्षा दिया करते थे. प्रधान पुरोहित, शास्त्री तथा जनसाधारण में से प्रधान नागरिक उनकी हत्या की योजना कर रहे थे, 48किंतु उनकी कोई भी योजना सफल नहीं हो रही थी क्योंकि लोग प्रभु येशु के प्रवचनों से अत्यंत प्रभावित थे.