Habrit Hakhadasha/Haderekh

הבשורה על-פי לוקס 14:1‏-35

1‏-2מנהיג פרושי אחד הזמין את ישוע לסעוד בביתו בשבת. האורחים האחרים שהיו בבית הפרוש הביטו בישוע בתשומת לב מרובה, כי רצו לראות אם ירפא איש חולה שהיה איתם. לאיש הייתה מחלה שמנפחת את הגוף בגלל עודף נוזלים. 3ישוע פנה אל הפרושים ואל חכמי־התורה ושאל: ”האם מותר לרפא חולה בשבת או אסור?“ 4משלא ענו לשאלתו אחז ישוע ביד החולה, ריפא אותו ושלח אותו לדרכו.

5לאחר מכן פנה ישוע אל הנוכחים ואמר: ”מי מכם אינו עובד בשבת? אם החמור או השור שלכם ייפול בשבת לתוך באר, לא ימהר לחלץ אותו?“ 6גם הפעם לא השיבו לו. 7ישוע שם לב לכך שכל אחד מהאורחים בבית הפרוש השתדל לתפוס מקום ישיבה מכובד, ולכן אמר להם: 8”אם הוזמנת לחתונה, אל תשב בראש השולחן, שמא יבוא אורח חשוב ממך, 9ואז יבוא המארח ויבקש ממך לפנות את מקומך לאורח הנכבד. בבושת פנים תאלץ לקום ולשבת בפינה, היכן שנותר כיסא פנוי.

10”נהג כך: בבואך לחתונה שב בפינה. כשיראה אותך המארח הוא יבוא ויאמר: ’ידידי היקר, מדוע אתה יושב בפינה? עליך לשבת במקום נכבד יותר!‘ וכך תכובד לעיני כל האורחים. 11כי מי שמכבד את עצמו יושפל ומי שמשפיל את עצמו יכובד.“ 12לאחר מכן פנה ישוע אל מארחו ואמר: ”כשאתה עורך סעודה אל תזמין את חבריך, אחיך, קרוביך או שכניך העשירים, כי יש להניח שהם יזמינו אותך לסעוד בביתם, וכך תקבל את גמולך המלא. 13הזמן במקומם את העניים, הצולעים, בעלי המום והעיוורים. 14אמנם אין באפשרותם להשיב לך כגמולך, אך בתחיית המתים אלוהים עצמו ישלם ויגמול לך ולכל עושה טוב.“

15אחד מהמסובים, שהקשיב בתשומת לב לדברי ישוע, קרא: ”זכות גדולה היא להשתתף בסעודת מלכות האלוהים!“

16ישוע ענה לו במשל: ”איש אחד ערך סעודה גדולה והזמין אורחים רבים. 17כאשר הושלמו ההכנות שלח את עבדו להודיע למוזמנים שהסעודה מוכנה. 18אך כל אחד מהמוזמנים מצא תירוץ וסיבה שלא לבוא. האחד אמר: ’אני באמת מצטער שאיני יכול לבוא, זה עתה קניתי חלקת אדמה ואני מוכרח ללכת לבדוק אותה‘. 19השני אמר: ’הבוקר קניתי חמישה צמדי שוורים, ואני מוכרח ללכת לראות איך הם עובדים, קבל בבקשה את התנצלותי‘. 20השלישי בדיוק נשא אישה, ולכן לא השתתף בסעודה.

21”העבד חזר אל אדוניו ומסר לו את דברי המוזמנים השונים. אדוניו התרגז מאוד וביקש מהעבד למהר אל הרחובות ואל הסמטאות ולהזמין את העניים, בעלי המום, העיוורים והפיסחים. 22העבד מילא את רצון אדוניו, אך עדיין היה מקום לאורחים נוספים.

23” ’לך אל הסמטאות, אל השבילים ואל מקומות־מחבוא‘, אמר בעל הבית לעבדו, ’והפצר בקבצנים ובנוודים לבוא לסעודה, כדי שהבית יתמלא עד אפס מקום. 24איש מהמוזמנים הראשונים לא יטעם מהסעודה שלי!‘ “

25כשהלך אחריו קהל גדול, פנה ישוע לאחור ודיבר אל האנשים: 26”מי שרוצה ללכת בעקבותיי עליו לאהוב אותי יותר מאשר את אביו, אמו, אשתו, ילדיו, אחיו ואחיותיו – אפילו יותר מחייו – אחרת לא יוכל להיות תלמיד שלי. 27מי שאינו נושא את צלבו ואינו בא אחרי איננו יכול להיות תלמידי. 28עליכם לחשוב ולשקול היטב לפני שאתם מחליטים ללכת אחרי. אם ברצונך לבנות בית, האם לא תשב תחילה ותחשב את המחיר, כדי לראות אם יש באפשרותך להשלים את הבנייה? 29אם לא תחשב את המחיר תיווכח, לאחר שתניח את היסודות, שאין לך מספיק כסף ולא תוכל להשלים את הבניין. כל מי שיראה את המבנה הלא־גמור ילעג לך ויאמר: 30’האיש הזה התחיל לבנות בית, אבל הפסיק באמצע משום שלא היה מספיק כסף!‘

31”או איזה מלך יאיים במלחמה נגד מלך אחר, לפני שיישב תחילה וישקול בכובד ראש אם צבאו המונה 10,000 חיילים, מסוגל להביס את 20,000 חיילי האויב? 32אם יגיע למסקנה שאין לו סיכוי לנצח הוא ישלח אל יריבו שליחים, לפני שיהיה מאוחר מדי, ויבקש לערוך משא ומתן לשלום. 33גם אתם צריכים לחשוב ולשקול היטב לפני שאתם מחליטים ללכת אחרי. מי שאינו מוכן לוותר על כל רכושו למעני לא יוכל להיות תלמידי.

34”מלח הוא דבר מועיל, אבל אם הוא מאבד את מליחותו, כיצד ניתן להשיב לו את טעמו? 35מלח חסר־טעם אינו מביא כל תועלת – אי־אפשר להשתמש בו אפילו כדשן. מי שמסוגל לשמוע שיקשיב.“

Hindi Contemporary Version

लूकॉ 14:1-35

जलोदर पीड़ित को स्वास्थ्यदान

1एक अवसर पर जब प्रभु येशु शब्बाथ पर फ़रीसियों के नायकों में से एक के घर भोजन करने गए, वे सभी उन्हें उत्सुकतापूर्वक देख रहे थे. 2वहां जलोदर रोग से पीड़ित एक व्यक्ति था. 3प्रभु येशु ने फ़रीसियों और वकीलों से प्रश्न किया, “शब्बाथ पर किसी को स्वस्थ करना व्यवस्था के अनुसार है या नहीं?” 4किंतु वे मौन रहे. इसलिये प्रभु येशु ने उस रोगी पर हाथ रख उसे स्वस्थ कर दिया तथा उसे विदा किया.

5तब प्रभु येशु ने उनसे प्रश्न किया, “यह बताओ, यदि तुममें से किसी का पुत्र या बैल शब्बाथ पर गड्ढे में गिर जाए तो क्या तुम उसे तुरंत ही बाहर न निकालोगे?” 6उनके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर न था.

7जब प्रभु येशु ने यह देखा कि आमंत्रित व्यक्ति अपने लिए किस प्रकार प्रधान आसन चुन लेते हैं, प्रभु येशु ने उन्हें यह विचार दिया: 8“जब भी कोई तुम्हें विवाह के उत्सव में आमंत्रित करे, तुम अपने लिए आदरयोग्य आसन न चुनना. यह संभव है कि उसने तुमसे अधिक किसी आदरयोग्य व्यक्ति को भी आमंत्रित किया हो. 9तब वह व्यक्ति, जिसने तुम्हें और उसे दोनों ही को आमंत्रित किया है, आकर तुमसे कहे ‘तुम यह आसन इन्हें दे दो,’ तब लज्जित हो तुम्हें वह आसन छोड़कर सबसे पीछे के आसन पर बैठना पड़े. 10किंतु जब तुम्हें कहीं आमंत्रित किया जाए, जाकर सबसे साधारण आसन पर बैठ जाओ जिससे कि जब जिसने तुम्हें आमंत्रित किया है तुम्हारे पास आए तो यह कहे, ‘मेरे मित्र, उठो और उस ऊंचे आसन पर बैठो.’ इस पर अन्य सभी आमंत्रित अतिथियों के सामने तुम आदरयोग्य साबित होगे. 11हर एक, जो स्वयं को बड़ा बनाता है, छोटा बना दिया जाएगा तथा जो स्वयं को छोटा बना देता है, बड़ा किया जाएगा.”

12तब फिर प्रभु येशु ने अपने न्योता देनेवाले से कहा, “जब तुम दिन या रात के भोजन पर किसी को आमंत्रित करो तो अपने मित्रों, भाई-बंधुओं, परिजनों या धनवान पड़ोसियों को आमंत्रित मत करो; ऐसा न हो कि वे भी तुम्हें आमंत्रित करें और तुम्हें बदला मिल जाए. 13किंतु जब तुम भोज का आयोजन करो तो निर्धनों, अपंगों, लंगड़ों तथा अंधों को आमंत्रित करो. 14तब तुम परमेश्वर की कृपा के भागी बनोगे. वे लोग तुम्हारा बदला नहीं चुका सकते. बदला तुम्हें धर्मियों के दोबारा जी उठने के अवसर पर प्राप्त होगा.”

महोत्सव के आमंत्रण का दृष्टांत

15यह सुन वहां आमंत्रित लोगों में से एक ने प्रभु येशु से कहा, “धन्य है वह, जो परमेश्वर के राज्य के भोज में सम्मिलित होगा.”

16यह सुन प्रभु येशु ने कहा, “किसी व्यक्ति ने एक बड़ा भोज का आयोजन किया और अनेकों को आमंत्रित किया. 17भोज तैयार होने पर उसने अपने सेवकों को इस सूचना के साथ आमंत्रितों के पास भेजा, ‘आ जाइए, सब कुछ तैयार है.’

18“किंतु वे सभी बहाने बनाने लगे. एक ने कहा, ‘मैंने भूमि मोल ली है और आवश्यक है कि मैं जाकर उसका निरीक्षण करूं. कृपया मुझे क्षमा करें.’

19“दूसरे ने कहा, ‘मैंने अभी-अभी पांच जोड़े बैल मोल लिए हैं और मैं उन्हें परखने के लिए बस निकल ही रहा हूं. कृपया मुझे क्षमा करें.’

20“एक और अन्य ने कहा, ‘अभी, इसी समय मेरा विवाह हुआ है इसलिये मेरा आना संभव नहीं.’

21“सेवक ने लौटकर अपने स्वामी को यह सूचना दे दी. अत्यंत गुस्से में घर के स्वामी ने सेवक को आज्ञा दी, ‘तुरंत नगर की गलियों-चौराहों में जाओ और निर्धनों, अपंगों, लंगड़ों और अंधों को ले आओ.’

22“सेवक ने लौटकर सूचना दी, ‘स्वामी, आपके आदेशानुसार काम पूरा हो चुका है किंतु अब भी कुछ जगह खाली है.’

23“तब घर के स्वामी ने उसे आज्ञा दी, ‘अब नगर के बाहर के मार्गों से लोगों को यहां आने के लिए विवश करो कि मेरा भवन भर जाए. 24यह निश्चित है कि वे, जिन्हें आमंत्रित किया गया था, उनमें से एक भी मेरे भोज को चख न सकेगा.’ ”

शिष्यता का दाम

25एक बड़ी भीड़ प्रभु येशु के साथ-साथ चल रही थी. प्रभु येशु ने मुड़कर उनसे कहा, 26“यदि कोई मेरे पास आता है और अपने माता-पिता, पत्नी, संतान तथा भाई-बहनों को, यहां तक कि स्वयं अपने जीवन को, मुझसे अधिक महत्व देता है, मेरा चेला नहीं हो सकता. 27वह, जो अपना क्रूस स्वयं उठाए हुए मेरा अनुसरण नहीं करता, वह मेरा चेला हो ही नहीं सकता.

28“तुममें ऐसा कौन है, जो भवन निर्माण करना चाहे और पहले बैठकर खर्च का अनुमान न करे कि उसके पास निर्माण काम पूरा करने के लिए पर्याप्त राशि है भी या नहीं? 29अन्यथा यदि वह नींव डाल ले और काम पूरा न कर पाए तो देखनेवालों के ठट्ठों का कारण बन जाएगा: 30‘देखो-देखो! इसने काम प्रारंभ तो कर दिया किंतु अब समाप्त नहीं कर पा रहा!’

31“या ऐसा कौन राजा होगा, जो दूसरे पर आक्रमण करने के पहले यह विचार न करेगा कि वह अपने दस हज़ार सैनिकों के साथ अपने विरुद्ध बीस हज़ार की सेना से टक्कर लेने में समर्थ है भी या नहीं? 32यदि नहीं, तो जब शत्रु की सेना दूर ही है, वह अपने दूतों को भेजकर उसके सामने शांति का प्रस्ताव रखेगा. 33इसी प्रकार तुममें से कोई भी मेरा चेला नहीं हो सकता यदि वह अपना सब कुछ त्याग न कर दे.

34“नमक उत्तम है किंतु यदि नमक ही स्वादहीन हो जाए तो किस वस्तु से उसका स्वाद लौटाया जा सकेगा? 35तब वह न तो भूमि के लिए किसी उपयोग का रह जाता है और न खाद के रूप में किसी उपयोग का. उसे फेंक दिया जाता है.

“जिसके सुनने के कान हों, वह सुन ले.”