Habrit Hakhadasha/Haderekh

הבשורה על-פי לוקס 13:1-35

1אז באו אנשים לישוע וסיפרו לו שפילטוס רצח מספר יהודים מהגליל בעת שהקריבו זבחים בבית־המקדש.

2”האם אתם חושבים שהם נרצחו משום שהיו חוטאים גדולים יותר משאר אנשי הגליל?“ שאל ישוע. 3”ודאי שלא! אני אומר לכם שאם לא תחזרו בתשובה ותפנו לאלוהים יהיה סופכם כמו שלהם.

4”ומה בנוגע לשמונה־עשר האנשים שנהרגו כשהתמוטט עליהם המגדל בשילוח? האם הם היו החוטאים הגדולים ביותר בירושלים? 5ודאי שלא! אבל דעו לכם שאם לא תחזרו בתשובה יהיה סופכם שלהם.“

6ישוע סיפר להם את המשל הבא: ”אדם נטע בגנו עץ תאנה, אולם בכל פעם שבא לחפש תאנים ציפתה לו אכזבה כי העץ לא נשא כל פרי. 7לבסוף אמר לגנן: ’חיכיתי שלוש שנים ולא זכיתי אף בתאנה אחת! הבה נעקור את העץ וניטע אחר במקומו; חבל שיגזול חלקת אדמה יקרה‘.

8” ’חכה עוד שנה אחת, אדוני‘, ביקש הגנן. ’אני אקדיש לתאנה תשומת לב מיוחדת, אעדור סביבה ואזבל את האדמה. 9אם התאנה תשא פרי בשנה הבאה מה טוב, ואם לא – אעקור אותה‘. “

10בשבת אחת כשלימד ישוע בבית־הכנסת, 11ראה אישה שהייתה בעלת־מום במשך שמונה־עשרה שנה. הגב שלה היה כפוף והיא לא יכלה להזדקף.

12ישוע קרא אליו את האישה ואמר לה: ”אישה, הרפאי ממחלתך!“ 13הוא נגע בה, והיא מיד הזדקפה והחלה להלל את אלוהים.

14ראש בית־הכנסת כעס מאוד על שישוע ריפא את האישה בשבת. ”שישה ימים בשבוע נועדו לעבודה!“ קרא בזעם אל הקהל. ”בואו להירפא בימי חול ולא בשבת!“

15”צבוע שכמוך!“ הייתה תשובתו של האדון. ”אתם כולם, האם אינכם מתירים את הבהמות שלכם ומוליכים אותם אל השוקת בשבת לשתות מים? 16והאם אסור לי, רק משום ששבת היום, להתיר אישה זאת, יהודייה, מכבלי השטן שאסר אותה במשך שמונה־עשרה שנים?“

17דבריו ביישו את מתנגדיו ואילו כל העם שמח על הנפלאות שחולל.

18ישוע חזר ולימד את העם על מלכות האלוהים: ”כיצד אוכל לתאר לכם את מלכות האלוהים, למה היא דומה? 19מלכות האלוהים דומה לגרגר זעיר של צמח החרדל אשר נזרע בגינה. כעבור זמן מה גדל הגרגר הזעיר והופך לעץ, והציפורים בונות קן בין ענפיו. 20‏-21מלכות האלוהים דומה לשמרים בבצק – מעט השמרים מחמיצים את הבצק כולו.“

22בדרכו לירושלים עבר ישוע מעיר לעיר ומכפר לכפר ולימד את האנשים. 23פעם שאל מישהו את ישוע: ”אדון, האם ייוושעו רק אנשים מעטים?“

24‏-25השיב לו ישוע: ”הואיל ושער הכניסה צר מאוד, עליכם להתאמץ מאוד כדי להיכנס דרכו. דעו לכם שאנשים רבים ירצו להיכנס דרך השער, אבל הם לא יוכלו; לאחר שבעל־הבית ינעל את השער יהיה מאוחר מדי. גם אם תעמדו בחוץ, תדפקו על השער ותתחננו: ’אדוננו, פתח לנו את הדלת!‘ הוא יענה לכם: ’אינני מכיר אתכם כלל, מאיפה אתם?‘

26” ’אבל אכלנו ושתינו איתך ואף לימדת ברחוב שלנו‘, תגידו. 27והוא ישיב: ’אני אומר לכם שאני לא מכיר אתכם. הסתלקו מכאן, רשעים שכמותכם!‘

28”אתם תהיו מחוץ למלכות האלוהים, במקום שיש בכי וחריקת שיניים, כשתראו את אברהם, יצחק, יעקב וכל הנביאים. 29מכל קצוות תבל יבואו אנשים אל מלכות האלוהים. 30דעו לכם כי יש כאלה שעתה נחשבים נחותים, אולם במלכות האלוהים הם יהיו גדולים. לעומתם יש כאלה שעתה הם אנשים חשובים וגדולים, אולם במלכות האלוהים יהיו קטנים ולא חשובים.“

31באותה שעה באו פרושים אחדים אל ישוע והזהירו אותו: ”המלך הורדוס רוצה להרוג אותך! אם ברצונך לחיות, ברח מכאן!“

32ישוע השיב להם: ”לכו ואמרו לשועל הזה שאמשיך לגרש שדים ולרפא את החולים היום ומחר, וביום השלישי אשלים את משימתי. 33כן, עלי להמשיך בדרכי היום, מחר ומחרתיים, כי לא ייתכן שנביא אלוהים ייהרג מחוץ לירושלים.

34”ירושלים, ירושלים, ההורגת את הנביאים ורוגמת באבנים את שליחי אלוהים! פעמים רבות חפצתי לאסוף את בנייך, כתרנגולת האוספת את אפרוחיה תחת כנפיה, אולם לא רצית. 35והנה אלוהים נוטש את ביתכם, ואני אומר לכם שלא תראו אותי שוב עד אשר תאמרו: ’ברוך הבא בשם ה׳!‘ “

Hindi Contemporary Version

लूकॉ 13:1-35

पश्चाताप की विनती

1उसी समय वहां उपस्थित कुछ लोगों ने प्रभु येशु को उन गलीलवासियों की याद दिलायी, जिनका लहू पिलातॉस ने उन्हीं के बलिदानों में मिला दिया था. 2प्रभु येशु ने उनसे पूछा, “क्या तुम्हारे विचार से ये गलीली अन्य गलीलवासियों की तुलना में अधिक पापी थे कि उनकी यह स्थिति हुई? 3नहीं! मैं तुमसे कहता हूं कि यदि तुम मन न फिराओ तो तुम सब भी इसी प्रकार नाश हो जाओगे. 4या वे अठारह व्यक्ति, जिन पर सीलोअम का मीनार गिरा, जिससे उनकी मृत्यु हो गई, येरूशलेम वासियों की अपेक्षा अधिक दोषी थे? 5नहीं! मैं तुमसे कहता हूं कि यदि तुम मन न फिराओ तो तुम सब भी इसी प्रकार नाश हो जाओगे.”

6तब प्रभु येशु ने उन्हें इस दृष्टांत के द्वारा समझाना प्रारंभ किया, “एक व्यक्ति ने अपने बगीचे में एक अंजीर का पेड़ लगाया. वह फल की आशा में उसके पास आया. 7उसने माली से कहा, ‘देखो, मैं तीन वर्ष से इस पेड़ में फल की आशा लिए आ रहा हूं और मुझे अब तक कोई फल प्राप्त नहीं हुआ. काट डालो इसे! भला क्यों इसके कारण भूमि व्यर्थ ही घिरी रहे?’

8“किंतु माली ने स्वामी से कहा, ‘स्वामी, इसे इस वर्ष और रहने दीजिए. मैं इसके आस-पास की भूमि खोदकर इसमें खाद डाल देता हूं. 9यदि अगले वर्ष यह फल लाए तो अच्छा है, नहीं तो इसे कटवा दीजिएगा.’ ”

अपंग स्त्री को चंगाई

10शब्बाथ पर प्रभु येशु यहूदी सभागृह में शिक्षा दे रहे थे. 11वहां एक ऐसी स्त्री थी, जिसे एक प्रेत ने अठारह वर्ष से अपंग किया हुआ था. जिसके कारण उसका शरीर झुककर दोहरा हो गया था और उसके लिए सीधा खड़ा होना असंभव हो गया था. 12जब प्रभु येशु की दृष्टि उस पर पड़ी, उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और उससे कहा, “हे नारी, तुम अपने इस रोग से मुक्त हो गई हो,” 13यह कहते हुए प्रभु येशु ने उस पर अपने हाथ रखे और उसी क्षण वह सीधी खड़ी हो गई और परमेश्वर का धन्यवाद करने लगी.

14किंतु यहूदी सभागृह प्रधान इस पर अत्यंत रुष्ट हो गया क्योंकि प्रभु येशु ने उसे शब्बाथ पर स्वस्थ किया था. सभागृह प्रधान ने वहां इकट्ठा लोगों से कहा, “काम करने के लिए छः दिन निर्धारित किए गए हैं इसलिये इन छः दिनों में आकर अपना स्वास्थ्य प्राप्त करो, न कि शब्बाथ पर.”

15किंतु प्रभु ने इसके उत्तर में कहा, “पाखंडियों! क्या शब्बाथ पर तुममें से हर एक अपने बैल या गधे को पशुशाला से खोलकर पानी पिलाने नहीं ले जाता? 16और क्या इस स्त्री को, जो अब्राहाम ही की संतान है, जिसे शैतान ने अठारह वर्ष से बांध रखा था, शब्बाथ पर इस बंधन से मुक्त किया जाना उचित न था?”

17प्रभु येशु के ये शब्द सुन उनके सभी विरोधी लज्जित हो गए. सारी भीड़ प्रभु येशु द्वारा किए जा रहे इन महान कामों को देख आनंदित थी.

परमेश्वर के राज्य की शिक्षा

18इसलिये प्रभु येशु ने उनसे कहना प्रारंभ किया, “परमेश्वर का राज्य कैसा होगा? मैं इसकी तुलना किससे करूं? 19परमेश्वर का राज्य राई के बीज के समान है, जिसे किसी व्यक्ति ने अपनी वाटिका में बोया, और उसने विकसित होते हुए पेड़ का रूप ले लिया—यहां तक कि पक्षी भी आकर उसकी शाखाओं पर बसेरा करने लगे.”

20प्रभु येशु ने दोबारा कहा, “परमेश्वर के राज्य की तुलना मैं किससे करूं? 21परमेश्वर का राज्य खमीर के समान है, जिसे एक स्त्री ने तीन माप आटे में मिलाया और सारा आटा ही खमीर युक्त हो गया.”

स्वर्ग-राज्य में प्रवेश के विषय में शिक्षा

22नगर-नगर और गांव-गांव होते हुए और मार्ग में शिक्षा देते हुए प्रभु येशु येरूशलेम नगर की ओर बढ़ रहे थे. 23किसी ने उनसे प्रश्न किया, “प्रभु, क्या मात्र कुछ ही लोग उद्धार प्राप्त कर सकेंगे?”

प्रभु येशु ने उन्हें उत्तर दिया, 24“तुम्हारी कोशिश यह हो कि तुम संकरे द्वार से प्रवेश करो क्योंकि मैं तुम्हें बता रहा हूं कि अनेक इसमें प्रवेश तो चाहेंगे किंतु प्रवेश करने में असमर्थ रहेंगे. 25एक बार जब घर का स्वामी द्वार बंद कर दे तो तुम बाहर खड़े, द्वार खटखटाते हुए विनती करते रह जाओगे: ‘महोदय, कृपया हमारे लिए द्वार खोल दें.’

“किंतु वह उत्तर देगा, ‘तुम कौन हो और कहां से आए हो मैं नहीं जानता.’

26“तब तुम कहोगे, ‘हम आपके साथ खाया पीया करते थे और आप हमारी गलियों में शिक्षा दिया करते थे.’

27“परंतु उसका उत्तर होगा, ‘मैं तुमसे कह चुका हूं तुम कौन हो, मैं नहीं जानता. चले जाओ यहां से! तुम सब कुकर्मी हो!’

28“जब तुम परमेश्वर के राज्य में अब्राहाम, यित्सहाक, याकोब तथा सभी भविष्यद्वक्ताओं को देखोगे और स्वयं तुम्हें बाहर फेंक दिया जाएगा, वहां रोना और दांतों का पीसना ही होगा. 29चारों दिशाओं से लोग आकर परमेश्वर के राज्य के उत्सव में शामिल होंगे 30और सच्चाई यह है कि जो अंतिम हैं वे पहले होंगे तथा जो पहले वे अंतिम.”

येरूशलेम नगर पर विलाप

31उसी समय कुछ फ़रीसियों ने उनके पास आकर उनसे कहा, “यहां से चले जाओ क्योंकि हेरोदेस तुम्हारी हत्या कर देना चाहता है.”

32प्रभु येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “जाकर उस लोमड़ी से कहो, ‘मैं आज और कल प्रेतों को निकालूंगा और लोगों को चंगा करूंगा और तीसरे दिन मैं अपने लक्ष्य पर पहुंच जाऊंगा.’ 33फिर भी यह ज़रूरी है कि मैं आज, कल और परसों यात्रा करूं क्योंकि यह हो ही नहीं सकता कि किसी भविष्यवक्ता की हत्या येरूशलेम नगर के बाहर हो.

34“येरूशलेम! ओ येरूशलेम! तू भविष्यद्वक्ताओं की हत्या करता तथा उनका पथराव करता है, जिन्हें तेरे लिए भेजा जाता है. कितनी बार मैंने यह प्रयास किया कि तेरी संतान को इकट्ठा कर एकजुट करूं, जैसे मुर्गी अपने चूज़ों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करती है किंतु तूने न चाहा. 35इसलिये अब यह समझ ले कि तेरा घर तेरे लिए उजाड़ छोड़ा जा रहा है. मैं तुझे बताए देता हूं कि इसके बाद तू मुझे तब तक नहीं देखेगा जब तक तू यह नारा न लगाए. ‘धन्य है वह, जो प्रभु के नाम में आ रहा है!’13:35 स्तोत्र 118:26