निर्गमन 10 – HCV & NAV

Hindi Contemporary Version

निर्गमन 10:1-29

आठवीं विपत्ति—टिड्डियां

1फिर याहवेह ने मोशेह से कहा, “फ़रोह के पास जाओ. मैंने ही उसका तथा उसके सेवकों का मन कठोर कर दिया है, ताकि मैं उनके बीच में अपने चिन्ह को दिखांऊ, 2कि तुम खुद अपने पुत्र एवं पोतों से कह सको कि मैंने किस तरह से मिस्रवासियों को अपमानित करते हुए उनके बीच अपने चिन्ह दिखाए ताकि तुम लोग सुरक्षित मिस्र से निकल सको और समझ सको कि मैं ही याहवेह हूं.”

3मोशेह एवं अहरोन ने फ़रोह के पास जाकर उससे यह कहा, “याहवेह, जो इब्रियों के परमेश्वर हैं, तुमसे कहते हैं, ‘तुम कब तक परमेश्वर के सामने अपने आपको नम्र नहीं करोगे? मेरी प्रजा को यहां से जाने दो, ताकि वे मेरी आराधना कर सकें. 4और यदि तुम मेरी प्रजा को जाने नहीं दोगे तो, कल मैं तुम्हारे देश में टिड्डियां ले आऊंगा. 5वे देश में ऐसे भर जाएंगी कि किसी को भी भूमि दिखाई न देगी. ये टिड्डियां वह सब नष्ट कर देंगी, जो कुछ ओलों के गिरने से बचा हुआ है और मैदान में लगे हर पेड़ को भी सूखा देंगी. 6फिर तुम्हारे तथा तुम्हारे सेवकों तथा पूरे मिस्रवासियों के घरों में टिड्डियां भर जाएंगी. ऐसा तो तुम्हारे पिता ने और उनके पूर्वजों ने जन्म से लेकर अब तक कभी नहीं देखा होगा.’ ” यह कहने के बाद मोशेह फ़रोह के पास से चले गए.

7फ़रोह के मंत्रियों ने फ़रोह से पूछा, “और कब तक यह व्यक्ति हमारे लिए परेशानी का कारण बनेगा? इन्हें जाने दो ताकि वे याहवेह, अपने परमेश्वर की आराधना कर सकें. क्या आपको नहीं मालूम कि मिस्र देश नष्ट हो चुका है?”

8मोशेह तथा अहरोन को फ़रोह के पास लाया गया. फ़रोह ने उनसे कहा, “जाओ और याहवेह, अपने परमेश्वर की आराधना करो! कौन-कौन हैं, जो तुम्हारे साथ जाएंगे?”

9मोशेह ने उत्तर दिया, “हमारे साथ हमारे बालक और हमारे वृद्ध, हमारे पुत्र-पुत्रियां, हमारे पशु एवं भेड़-बकरियां सब जायेंगे, क्योंकि हम याहवेह के सम्मान में उत्सव मनाएंगे.”

10फ़रोह ने कहा, “याहवेह तुम्हारे साथ रहें, लेकिन मुझे लगता है कि तुम्हारे मन में कोई ओर योजना छिपी हुई है! 11केवल पुरुषों को ही लेकर याहवेह की वंदना करो, क्योंकि यही तुम्हारी इच्छा है.” ऐसा कहकर वहां से मोशेह तथा अहरोन को उनके सामने से निकाल दिया.

12तब याहवेह ने मोशेह से कहा, “मिस्र की ओर अपना हाथ बढ़ाओ कि टिड्डियां आकर मिस्र देश पर छा जाएं तथा हर पौधे को नष्ट कर दें.”

13तब मोशेह ने अपनी लाठी मिस्र देश की ओर बढ़ाई तब याहवेह ने मिस्र देश में पूरा दिन और पूरी रात तेज हवा चलाई. और सुबह हवा के साथ टिड्डियां भी आईं. 14टिड्डियां पूरे मिस्र देश पर फैल गईं, वे असंख्य थीं. इससे पहले इतनी टिड्डियां कभी देखी नहीं गई थीं. और न ही इसके बाद ये ऐसी बड़ी संख्या में देखी जाएंगी. 15इन टिड्डियों ने पूरे देश की धरती को भर दिया था, जिससे देश में अंधेरा सा हो गया. इन्होंने देश के हर पौधे को तथा सभी वृक्षों के फलों को, जो ओलों से बचे थे नष्ट कर दिया. इस कारण पूरे मिस्र देश में वृक्षों तथा मैदान के पौधों में कोई भी फल फूल न बचे.

16तब फ़रोह ने जल्दी से मोशेह तथा अहरोन को बुलवाया और उनसे कहा, “मैंने याहवेह, तुम्हारे परमेश्वर तथा तुम्हारे विरुद्ध पाप किया है. 17इसलिये कृपा कर मेरे पाप क्षमा कर दो और याहवेह, अपने परमेश्वर से विनती करो, कि वह इस मृत्यु को मुझसे दूर कर दें.”

18मोशेह फ़रोह के पास से बाहर चले गए और उन्होंने याहवेह से विनती की, 19तब याहवेह ने हवा की दिशा को बदलकर, टिड्डियों को लाल सागर में डाल दिया—तब पूरे देश में एक भी टिड्डी नहीं बची. 20किंतु याहवेह ने फ़रोह के मन को कठोर बना दिया. उसने इस्राएलियों को जाने नहीं दिया.

देश पर अंधकार

21तब याहवेह ने मोशेह से कहा, “अपना हाथ आकाश की ओर बढ़ाओ, ताकि पूरे मिस्र देश पर अंधेरा छा जाए—इतना गहरा अंधकार कि उसे स्पर्श कर सके.” 22तब मोशेह ने अपना हाथ आकाश की ओर बढ़ाया और पूरे मिस्र देश में तीन दिनों के लिए घोर अंधकार छाया रहा. 23कोई भी एक दूसरे को देख नहीं पाया और कोई भी अपनी जगह से तीन दिन तक नहीं हटा, लेकिन पूरे इस्राएलियों के घर में रोशनी थी.

24फ़रोह ने मोशेह को बुलवाया और कहा, “जाओ, याहवेह की वंदना करो! लेकिन अपने पशुओं और भेड़-बकरी यहीं छोड़ जाना. तुम्हारे बालक भी तुम्हारे साथ जा सकते हैं.”

25किंतु मोशेह ने उत्तर दिया, “हमें बलि तथा होमबलि के लिए पशु और भेड़-बकरी ले जाना ज़रूरी है ताकि हम याहवेह अपने परमेश्वर को बलि चढ़ा सकें. 26इसलिये हमारे पशु भी हमारे ही साथ जाएंगे; हम कुछ भी यहां नहीं छोड़ेंगे. जब तक हम अपनी जगह नहीं पहुंच जाते, हमें नहीं मालूम कि हमें याहवेह हमारे परमेश्वर की आराधना किस प्रकार करनी होगी.”

27किंतु याहवेह ने फ़रोह का मन कठोर बना दिया. वह उन्हें जाने नहीं दे रहा था. 28फ़रोह ने उनसे कहा, “दूर हो जाओ मेरे सामने से! फिर मत आना मेरे सामने! जिस दिन तुम मेरा मुंह देखोगे, तुम अवश्य मर जाओगे!”

29मोशेह ने जवाब दिया, “ठीक कहा तुमने! अब मैं तुम्हारा मुंह कभी न देखूंगा!”

New Arabic Version

الخروج 10:1-29

ضربة الجراد

1وَقَالَ الرَّبُّ لِمُوسَى: «امْثُلْ أَمَامَ فِرْعَوْنَ لأَنَّنِي قَدْ قَسَّيْتُ قَلْبَهُ وَقُلُوبَ حَاشِيَتِهِ لِكَيْ أُجْرِيَ آيَاتِي هَذِهِ بَيْنَهُمْ، 2لِكَيْ تُخْبِرَ فِي مَسَامِعِ بَنِيكَ وَأَحْفَادِكَ عَمَّا ابْتَلَيْتُ بِهِ الْمِصْرِيِّينَ وَبِآيَاتِي الَّتِي أَجْرَيْتُهَا بَيْنَهُمْ فَتَعْلَمُونَ أَنِّي أَنَا الرَّبُّ».

3فَمَثَلَ مُوسَى وَهَرُونُ أَمَامَ فِرْعَوْنَ وَقَالا لَهُ: «هَذَا مَا يُعْلِنُهُ الرَّبُّ إِلَهُ الْعِبْرَانِيِّينَ: إِلَى مَتَى تَأْبَى أَنْ تَخْضَعَ لِي؟ أَطْلِقْ شَعْبِي لِيَعْبُدَنِي. 4وَإذَا أَبَيْتَ أَنْ تُطْلِقَ شَعْبِي، فَهَا أَنَا أَجْلِبُ غَداً الْجَرَادَ عَلَى تُخُومِكَ، 5فَيُغَطِّي وَجْهَ الأَرْضِ، فَيَعْسُرُ عَلَى أَحَدٍ أَنْ يَرَاهَا، وَيَلْتَهِمُ الْبَقِيَّةَ الْمُتَخَلِّفَةَ لَكُمْ عَنِ الْبَرَدِ، وَكُلَّ شَجَرَةٍ نَابِتَةٍ لَكُمْ فِي الْحَقْلِ، 6وَيَمْلأُ بُيُوتَكَ وَبُيُوتَ حَاشِيَتِكَ وَبُيُوتَ جَمِيعِ الْمِصْرِيِّينَ، الأَمْرُ الَّذِي لَمْ يَشْهَدْ مِثْلَهُ آبَاؤُكَ وَلا أَجْدَادُكَ مُنْذُ أَنِ اسْتَوْطَنُوا هَذِهِ الأَرْضَ إِلَى الآنَ». ثُمَّ تَحَوَّلَ وَانْصَرَفَ مِنْ لَدُنْ فِرْعَوْنَ.

7فَقَالَتْ حَاشِيَةُ فِرْعَوْنَ لَهُ: «إِلَى مَتَى يَظَلُّ هَذَا الرَّجُلُ شَرَكاً لَنَا؟ أَطْلِقِ الشَّعْبَ لِيَعْبُدُوا الرَّبَّ إِلَهَهُمْ. أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ مِصْرَ قَدْ عَمَّهَا الْخَرَابُ؟» 8فَاسْتُدْعِيَ مُوسَى وَهَرُونُ ثَانِيَةً لِلْمُثُولِ أَمَامَ فِرْعَوْنَ، وَقَالَ لَهُمَا: «امْضُوا وَاعْبُدُوا الرَّبَّ إِلَهَكُمْ، وَلَكِنْ مَنْ هُمُ الَّذِينَ سَيَذْهَبُونَ؟» 9فَأَجَابَ مُوسَى: «نَذْهَبُ بِفِتْيَانِنَا وَشُيُوخِنَا. نَذْهَبُ بِبَنِينَا وَبَنَاتِنَا، بِمَوَاشِينَا وَقُطْعَانِنَا لأَنَّهُ يَجِبُ أَنْ نُقِيمَ عِيداً لِلرَّبِّ». 10فَقَالَ فِرْعَوْنُ: «لِيَكُنِ الرَّبُّ بِعَوْنِكُمْ إنْ أَنَا أَطْلَقْتُكُمْ مَعَ نِسَائِكُمْ وَأَوْلادِكُمْ. فَمِنَ الْجَلِيِّ أَنَّكُمْ عَازِمُونَ عَلَى الشَّرِّ. 11لا، فَلْيَمْضِ الرِّجَالُ فَقَطْ لِعِبَادَةِ الرَّبِّ، لأَنَّ هَذَا هُوَ مَا تَطْلُبُونَهُ». ثُمَّ طُرِدَا مِنْ حَضْرَةِ فِرْعَوْنَ.

12فَقَالَ الرَّبُّ لِمُوسَى: «ابْسُطْ يَدَكَ عَلَى أَرْضِ مِصْرَ لِتُبْتَلَى بِالجَّرَادِ، فَيُغَطِّي بِلادَ مِصْرَ وَيَلْتَهِمَ كُلَّ نَبَاتِ الأَرْضِ الْمُتَخَلِّفِ عَنِ الْبَرَدِ». 13فَمَدَّ مُوسَى عَصَاهُ عَلَى أَرْضِ مِصْرَ، فَأَرْسَلَ الرَّبُّ عَلَيْهِمْ رِيحاً شَرْقِيَّةً طَوَالَ ذَلِكَ النَّهَارِ وَاللَّيْلِ، وَمَا إِنْ أَقْبَلَ الصَّبَاحُ حَتَّى حَمَلَتِ الرِّيحُ الشَّرْقِيَّةُ الْجَرَادَ. 14فَانْتَشَرَ الْجَرَادُ فِي كُلِّ بِلادِ مِصْرَ، وَحَلَّ فِي جَمِيعِ تُخُومِهَا بِأَسْرَابٍ عَظِيمَةٍ، فَلَمْ يَكُنْ لَهُ نَظِيرٌ مِنْ قَبْلُ وَلَنْ يَحْدُثَ مِثْلُهُ فِيمَا بَعْدُ. 15فَقَدْ غَطَّى وَجْهَ كُلِّ الأَرْضِ حَتَّى أَظْلَمَتْ، وَالْتَهَمَ كُلَّ عُشْبٍ فِيهَا وَكُلَّ أَثْمَارِ الأَشْجَارِ الَّتِي خَلَّفَهَا الْبَرَدُ، فَلَمْ يَبْقَ شَيْءٌ أَخْضَرُ لَا عَلَى الأَشْجَارِ وَلا فِي حُقُولِ الْمَزْرُوعَاتِ فِي كُلِّ أَرْجَاءِ مِصْرَ.

16عِنْدَئِذٍ أَسْرَعَ فِرْعَوْنُ فَاسْتَدْعَى مُوسَى وَهَرُونَ قَائِلاً: «لَقَدْ أَخْطَأْتُ إِلَى الرَّبِّ إِلَهِكُمْ وَإِلَيْكُمَا. 17فَاصْفَحَا هَذِهِ الْمَرَّةَ فَقَطْ عَنْ خَطِيئَتِي وَابْتَهِلا إِلَى الرَّبِّ إِلَهِكُمَا كَيْ يُزِيلَ عَنِّي هَذَا الْبَلاءَ الْمُمِيتَ». 18فَانْصَرَفَ مُوسَى مِنْ لَدُنْ فِرْعَوْنَ وَابْتَهَلَ إِلَى الرَّبِّ، 19فَأَرْسَلَ الرَّبُّ رِيحاً غَرْبِيَّةً عَاصِفَةً حَمَلَتِ الْجَرَادَ وَطَرَحَتْهُ فِي الْبَحْرِ الأَحْمَرِ، فَلَمْ تَبْقَ جَرَادَةٌ وَاحِدَةٌ فِي جَمِيعِ أَرْجَاءِ مِصْرَ. 20وَلَكِنَّ الرَّبَّ صَلَّبَ قَلْبَ فِرْعَوْنَ فَلَمْ يُطْلِقْ بَنِي إِسْرَائِيلَ.

ضربة الظلام

21فَقَالَ الرَّبُّ لِمُوسَى: «ابْسُطْ يَدَكَ نَحْوَ السَّمَاءِ فَيَطْغَى ظَلامٌ عَلَى كُلِّ أَرْجَاءِ مِصْرَ حَتَّى يَكَادَ يُلْمَسُ لِكَثَافَتِهِ». 22فَبَسَطَ مُوسَى يَدَهُ نَحْوَ السَّمَاءِ، فَطَغَى ظَلامٌ كَثِيفٌ عَلَى كُلِّ أَرْجَاءِ أَرْضِ مِصْرَ لِمُدَّةِ ثَلاثَةِ أَيَّامٍ. 23فَلَمْ يَتَمَكَّنْ أَحَدٌ مِنْ أَنْ يَرَى أَخَاهُ، وَلا غَادَرَ أَحَدٌ مَكَانَهُ طَوَالَ ثَلاثَةِ أَيَّامٍ. غَيْرَ أَنَّ النُّورَ كَانَ يَغْمُرُ بَنِي إِسْرَائِيلَ فِي أَمَاكِنِ إِقَامَتِهِمْ.

24فَاسْتَدْعَى فِرْعَوْنُ مُوسَى وَقَالَ: «اذْهَبُوا وَاعْبُدُوا الرَّبَّ، وَلَكِنِ اتْرُكُوا وَرَاءَكُمْ مَاشِيَتَكُمْ وَقُطْعَانَكُمْ: أَمَّا صِغَارُكُمْ فَلْيَمْضُوا مَعَكُمْ أَيْضاً». 25فَقَالَ مُوسَى: «عَلَيْكَ أَنْ تَسْمَحَ لَنَا بِأَخْذِ ذَبَائِحَ مُحْرَقَاتٍ لِنُقَدِّمَهَا لِلرَّبِّ إِلَهِنَا. 26لِذَلِكَ تَذْهَبُ مَوَاشِينَا مَعْنَا أَيْضاً، فَلا يَبْقَى مِنْهَا ظِلْفٌ وَاحِدٌ، لأَنَّ عَلَيْنَا أَنْ نَخْتَارَ مِنْهَا لِعِبَادَةِ الرَّبِّ إِلَهِنَا، وَلا يُمْكِنُنَا أَنْ نَعْرِفَ مَاذَا نَخْتَارُ مِنْهَا لِنَعْبُدَ الرَّبَّ حَتَّى نَصِلَ إِلَى هُنَاكَ». 27وَلَكِنَّ الرَّبَّ صَلَّبَ قَلْبَ فِرْعَوْنَ فَلَمْ يُطْلِقْ سَرَاحَهُمْ. 28وَقَالَ لَهُ فِرْعَوْنُ: «اذْهَبْ عَنِّي، وَاحْذَرْ لِنَفْسِكَ. لَا تَمْثُلْ أَمَامِي مَرَّةً أُخْرَى، فَيَوْمَ تَرَى وَجْهِي تَمُوتُ». 29فَقَالَ مُوسَى: «حَسَناً قُلْتَ، فَأَنَا لَنْ أَرَى وَجْهَكَ مَرَّةً أُخْرَى».