उत्पत्ति 50 HCV – Matouš 50 SNC

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Hindi Contemporary Version

उत्पत्ति 50:1-26

इस्राएल की मृत्यु

1योसेफ़ अपने पिता से लिपट कर बहुत रोये. 2योसेफ़ ने अपने सेवकों से, जो वैद्य थे उनसे कहा कि वे पिता के शव में सुगंध द्रव्य भर दें. वैद्यों ने इस्राएल के शव का संलेपन किया, 3इस काम में चालीस दिन लग जाते थे. मिस्रवासियों ने याकोब के लिए सत्तर दिन तक शोक मनाया.

4जब शोक के दिन पूरे हुए तब योसेफ़ ने जाकर फ़रोह के परिवार से कहा, “यदि आपका अनुग्रह मुझ पर है तो फ़रोह से कहिये, 5‘कि मेरे पिता ने मरने से पहले मुझसे यह प्रतिज्ञा करवाई उन्होंने कहा कि, मैं मरने पर हूं मुझे कनान देश में उस कब्र में दफनाना, जो मैंने अपने लिये खोदी हैं, इसलिये मुझे अपने पिता के शव को कनान देश ले जाने की आज्ञा दें ताकि मैं वहां जाकर अपने पिता को दफना कर लौट आऊं.’ ”

6फ़रोह ने कहा, “जाकर अपने पिता को जैसी उन्होंने तुमसे प्रतिज्ञा करवाई थी वैसे दफना कर आओ.”

7इसलिये योसेफ़ अपने पिता के शव को लेकर रवाना हुए और फ़रोह के सब सेवक उनके साथ गये. उनके साथ उनके परिवार के तथा मिस्र देश के सारे प्रधान थे. 8योसेफ़ का पूरा परिवार, उनके भाई तथा उनके पिता का परिवार भी था. वे गोशेन में बच्चों और अपने भेड़-बकरी तथा पशुओं को छोड़कर गये. 9उनके साथ घोड़े तथा रथ और लोगों की बड़ीं भीड़ थी.

10जब वे अताद के खलिहान तक जो यरदन के पार हैं पहुंचे वे बड़े दुखी हुए और रोने लगे; उन्होंने वहां अपने पिता के लिए सात दिन का शोक रखा. 11जब कनान के लोगों ने अताद के खलिहान में यह विलाप देखा तो कहा, “मिस्रवासियों के लिए यह वास्तव में गहरा शोक हैं.” इसलिये यरदन पार उस स्थान का नाम अबेल-मिजराईम रखा.

12इस प्रकार याकोब के पुत्रों ने उनके लिए ठीक वैसा ही किया, जैसा याकोब ने कहा था: 13याकोब के पुत्रों ने उन्हें कनान देश में ममरे के पास माखपेलाह के खेत की गुफा में दफना दिया, जो अब्राहाम ने हित्ती एफ्रोन से कब्रस्थान के लिए खरीदी थी. 14अपने पिता को दफनाने के बाद योसेफ़ मिस्र देश लौट गए. उनके साथ उनके भाई भी लौट गए तथा वे सब भी, जो उनके साथ यहां आए थे.

15जब योसेफ़ के भाइयों ने सोचा, “हमारे पिता का निधन हो चुका है, अब यदि योसेफ़ हमसे नफरत करके पिछली बातों का बदला लेगा तो हम क्या करेंगे?” 16इसलिये उन्होंने योसेफ़ से कहा “पिता ने हमसे कहा था कि 17‘योसेफ़ से कहना कि कृपा कर अपने भाइयों के अत्याचार और गलतियों को माफ कर दे जो उन्होंने तुमसे किए थे,’ इसलिये अब, कृपा कर अपने पिता के परमेश्वर के नाम से हमारी गलतियों को माफ कर दो.” योसेफ़ उनकी यह बात सुन रोने लगे.

18तब उनके भाई भी रोने लगे और योसेफ़ के सामने झुककर कहने लगे, “हम सभी आपके दास हैं.”

19किंतु योसेफ़ ने उनसे कहा “आप लोग मत डरो. क्या मैं कोई परमेश्वर हूं? 20मैं जानता हूं कि आप लोगों ने भले ही मेरी हानि कि योजना बनाई हो लेकिन परमेश्वर ने उसे अच्छे के लिये किया कि बहुतों का जीवन बचा लिया गया, 21इसलिये भयभीत ना हो; मैं स्वयं तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को भोजन दूंगा.” इस प्रकार योसेफ़ ने अपने भाइयों को सांत्वना दी और उनसे कोमलता से बातें करी.

योसेफ़ की मृत्यु

22योसेफ़ मिस्र में अपने पिता के पूरे परिवार के साथ रहे. योसेफ़ की उम्र एक सौ दस वर्ष हुई. 23योसेफ़ ने एफ्राईम की तीसरी पीढ़ी भी देखी तथा मनश्शेह के पोते, जो माखीर के पुत्र थे, उन्हें भी जन्म के बाद योसेफ़ के घुटनों पर रखा गया.

24योसेफ़ ने अपने भाइयों को कहा “मैं अब मरने पर हूं, लेकिन परमेश्वर अवश्य आप सबकी रक्षा करेंगे और वही तुम्हें इस देश से उस देश में ले जाएंगे, जिसकी प्रतिज्ञा उन्होंने अब्राहाम, यित्सहाक तथा याकोब से की थी.” 25तब योसेफ़ ने इस्राएल के पुत्रों से शपथ ली कि “परमेश्वर आप सभी की मदद के लिये आएंगे और तब आप लोग मेरी हड्डियों को यहां से लेकर जाना.”

26योसेफ़ की मृत्यु एक सौ दस वर्ष में हुई. उनके शव को सुगंध द्रव्य से भरा गया और उन्हें मिस्र देश में ही एक संदूक में रख दिया गया.

Slovo na cestu

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