उत्पत्ति 41 HCV – ዘፍጥረት 41 NASV

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Hindi Contemporary Version

उत्पत्ति 41:1-57

फ़रोह का स्वप्न

1पूरे दो साल बाद फ़रोह ने एक स्वप्न देखा कि: वह नील नदी के किनारे खड़ा हैं. 2नदी में से सात सुंदर एवं मोटी गायें निकली और घास चरने लगी. 3फिर और सात गायें नील नदी में से निकली, जो कुरूप तथा पतली थी. ये नदी के किनारे उन मोटी गायों के पास आकर खड़ी हो गईं. 4और कुरूप एवं दुर्बल गायों ने उन सुंदर एवं मोटी गायों को खा लिया. इससे फ़रोह की नींद खुल गई.

5जब उन्हें फिर नींद आई, तब एक और स्वप्न देखा: एक ही तने में से सात बालें उगी, जो अच्छी और मोटी मोटी थी. 6फिर सात बालें और उगी जो पतली और मुरझाई हुई थी, 7तब पतली बालों ने मोटी बालों को निगल लिया. इससे फ़रोह की नींद खुल गई और वह समझ गये कि यह स्वप्न था.

8सुबह होने पर राजा मन में बेचैन हुए, इसलिये इनका अर्थ जानने के लिए मिस्र देश के सब ज्योतिषियों एवं पंडितों को बुलवाया और फ़रोह ने उन्हें अपने दोनों स्वप्न बताये लेकिन कोई भी उनका अर्थ नहीं बता पाया.

9तब प्रधान पिलाने वाले ने फ़रोह से कहा, “आज मुझे अपनी गलती याद आ रही है. 10एक बार फ़रोह अपने नौकरों से गुस्सा हुए और मुझे और प्रधान खानसामे को अंगरक्षकों के नायक के घर के बंदीगृह में डाला. 11हमने उस कारावास में स्वप्न देखा, और दोनों ही स्वप्न का अपना अलग अर्थ था. 12एक इब्री युवक वहां था वह अंगरक्षकों के नायक का सेवक था जब हमने उसे अपना स्वप्न बताया उसने वह हमारे हर एक के स्वप्न की व्याख्या करी. 13जैसा उसने बताया था वैसा ही हुआ: फ़रोह ने मुझे तो अपना पद सौंप दिया, और खानसामें को प्राण-दंड दे दिया.”

14यह सुनकर फ़रोह ने कहा कि योसेफ़ को मेरे पास लाओ. उन्होंने जल्दी योसेफ़ को कारागार से बाहर निकाला. और उसके बाल कटाकर उसके कपड़े बदलकर फ़रोह के पास लेकर आये.

15फ़रोह ने योसेफ़ से कहा, “मैंने एक स्वप्न देखा है, उसका अर्थ कोई नहीं बता पा रहे हैं लेकिन मैंने तुम्हारे बारे में सुना है कि तुम स्वप्न का अर्थ बता सकते हों.”

16योसेफ़ ने यह सुनकर फ़रोह से कहा, “अर्थ मैं नहीं बल्कि. स्वयं परमेश्वर ही देंगे.”

17तब फ़रोह ने कहा, “मैंने स्वप्न में देखा कि मैं नील नदी के किनारे खड़ा हूं. 18वहां मैंने सात मोटी एवं सुंदर गायों को नील नदी से निकलते देखा. और वे घास चर रही थी. 19तभी मैंने देखा कि सात और गायें निकली—जो दुबली और कुरूप थी. ऐसी कुरूप गायें मैंने मिस्र देश में कभी नहीं देखीं. 20दुर्बल एवं तथा कुरूप गायों ने उन सात मोटी एवं सुंदर गायों को खा लिया. 21इतना होने पर भी यह समझ नहीं पाये कि इन्होंने उन सात मोटी गायों को कैसे खा लिया; लेकिन वे अब भी वैसी ही कुरूप बनी हुई थी. और मेरी नींद खुल गई.

22“स्वप्न में मैंने एक और स्वप्न देखा: कि एक ही तने में से सात मोटी एवं अच्छी बालें उगी. 23तभी मैंने देखा कि कमजोर और मुरझाई बालें उगी. 24तथा कमजोर बालों ने उन मोटी बालों को निगल लिया. मैंने अपने ज्योतिषियों से यह स्वप्न बताये लेकिन अर्थ कोई नहीं बता पाया.”

25तब योसेफ़ ने फ़रोह से कहा, “आपके दोनों स्वप्न एक ही हैं. इनमें परमेश्वर ने फ़रोह को बताया हैं कि परमेश्वर क्या करने जा रहे हैं. 26सात सुंदर और मोटी गायें सात वर्ष हैं, सात अच्छी बालें भी सात वर्ष हैं; दोनों ही स्वप्न एक ही हैं. 27कमजोर एवं कुरूप गायें, सात वर्ष हैं, और मुरझाई हुई बालें जो देखी वह भी सात वर्ष अकाल के होंगे.

28“जैसा मैंने फ़रोह को बताया, ठीक वैसा ही होगा; परमेश्वर ने आपको यह दिखा दिया है कि जल्दी ही क्या होनेवाला है. 29मिस्र देश में सात वर्ष बहुत ही अच्छी फसल हो, 30और उसके बाद सात वर्ष का अकाल होगा. तब मिस्र देश के लोग सारी उपज को भूल जायेंगे, और अकाल से देश का नाश होगा. 31अकाल इतना भयानक होगा कि अच्छी फसल और उपज किसी को याद तक नहीं रहेगी. 32फ़रोह आपने एक ही बात के विषय दो बार स्वप्न देखे यह इस बात को दिखाता है कि परमेश्वर निश्चय ही ऐसा होने देंगे और यह बताया है कि परमेश्वर इसे जल्दी ही होने देंगे. दो बार यह स्वप्न देखा क्योंकि परमेश्वर ने सोच लिया हैं अब जल्दी इसे पूरा करेंगे.

33“इसलिये फ़रोह जल्दी किसी समझदार एवं बुद्धिमान व्यक्ति को मिस्र देश का अधिकारी बनाएं. 34और फ़रोह सारे मिस्र देश में सर्वेक्षकों को नियुक्त करे और सात वर्ष जो अच्छी फसल और उपज का हैं उस समय भूमि की उपज का पंचमांश इकट्ठा करे. 35तब अच्छी फसल के सात वर्षों में सारी भोजन वस्तु एकत्रित करी जाये और अनाज को फ़रोह के अधिकार में भंडार नगरों में सुरक्षित रखते जायें. 36और यह भोजन सात वर्ष के अकाल से बचने के लिए पूरे मिस्र देश को देने के इकट्ठा करे ताकी लोग भोजन के अभाव में नहीं मरें.”

37फ़रोह तथा सब कर्मचारियों को लगा कि यह जवाब-दारी योसेफ़ को दी जाये. 38फ़रोह ने अपने सेवकों से पूछा, “क्या हमें ऐसा कोई व्यक्ति मिल सकता है जिसमें परमेश्वर की आत्मा हो?”

39फिर फ़रोह ने योसेफ़ से कहा, “इसलिये कि परमेश्वर ने ही तुम पर यह सब प्रकट किया है, इसलिये, तुम यह जवाब-दारी लो क्योंकि तुम जैसा समझदार तथा बुद्धिमान कोई नहीं. 40और तुम मेरे घर के अधिकारी होगे तथा मेरी प्रजा तुम्हारे ही आदेश का पालन करेगी. मैं सिंहासन पर बैठने के कारण राजा होकर तुमसे बड़ा रहूंगा.”

41और फ़रोह ने योसेफ़ से कहा, “मैंने तुम्हें सारे मिस्र देश पर अधिकार दे दिया है.” 42यह कहते हुए फ़रोह ने अपनी राजमुद्रा वालीं अंगूठी उतारकर योसेफ़ को पहना दी, और मलमल के वस्त्र तथा गले में सोने की माला भी पहना दी. 43तब फ़रोह ने योसेफ़ को अपने दूसरे रथ में चढ़ाकर सम्मान दिया. रथों के आगे-आगे चल रहे अधिकारी बोल रहे थे, कि “घुटने टेको!” इस प्रकार फ़रोह ने योसेफ़ को संपूर्ण मिस्र का अधिकार सौंप दिया.

44और फ़रोह ने योसेफ़ से कहा, “फ़रोह तो मैं हूं, किंतु अब से सारे मिस्र देश में बिना तुम्हारी आज्ञा के कोई भी न तो हाथ उठा सकेगा और न ही पांव.” 45फ़रोह ने योसेफ़ का नया नाम ज़ाफेनाथ-पानियाह रखा तथा उनका विवाह ओन के पुरोहित पोतिफेरा की पुत्री असेनाथ से कर दिया. इस प्रकार अब योसेफ़ समस्त मिस्र देश के प्रशासक हो गए.

46जब योसेफ़ को मिस्र के राजा फ़रोह के पास लाया गया, तब वे तीस वर्ष के थे. फ़रोह से अधिकार पाकर योसेफ़ समस्त मिस्र देश का निरीक्षण करने के लिए निकले. 47पहले सात वर्षों में बहुत उपज हुई. 48और योसेफ़ ने इन सात वर्षों में बहुत भोजन वस्तुएं जमा करी, जो मिस्र देश में उत्पन्न हो रही थी. वह सब अन्न योसेफ़ नगरों में जमा करते गए. जिस नगर के पास खेत था उसकी उपज वही जमा करते गए. 49इस तरह योसेफ़ ने इतना अन्न जमा कर लिया और योसेफ़ ने उसको गिनना ही छोड़ दिया क्योंकि उपज असंख्य हो चुकी थी.

50इससे पहले की अकाल के वर्ष शुरु हो, ओन के पुरोहित पोतिफेरा की पुत्री असेनाथ से योसेफ़ के दो पुत्र उत्पन्न हुए. 51पहले बेटे का नाम योसेफ़ ने मनश्शेह रखा क्योंकि उन्होंने विचार किया, “परमेश्वर ने सभी कष्टों एवं मेरे पिता के परिवार को भुलाने में मेरी सहायता की है.” 52उन्होंने दूसरे पुत्र का नाम एफ्राईम रखा, क्योंकि उनका कहना था, “कि मुझे दुख मिलने की जगह इस देश में परमेश्वर ने मुझे फलवंत किया.”

53जब मिस्र देश में फसल के वे सात वर्ष खत्म हुए, 54तब अकाल के सात वर्षों की शुरुआत हुई, जैसा योसेफ़ ने कहा था. सभी देशों में अकाल था, किंतु मिस्र देश में अन्न की कोई कमी न थी. 55जब मिस्र देश में भोजन की कमी होने लगी तब लोग फ़रोह से भोजन मांगने लगे. फ़रोह ने मिस्र की प्रजा से कहा तुम, “योसेफ़ के पास जाओ. वह जो कुछ कहे, वही करना.”

56जब पूरे देश में अकाल पड़ा, तब योसेफ़ ने अपने भंडार खोलकर मिस्रवासियों को अन्न बेचना शुरु किया, क्योंकि अकाल भयानक था. 57पृथ्वी के अलग-अलग देश से लोग योसेफ़ से अन्न खरीदने आने लगे, क्योंकि सारी पृथ्वी पर अकाल भयंकर हो चुका था.

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ዘፍጥረት 41:1-57

የፈርዖን ሕልም

1ድፍን ሁለት ዓመት ካለፈ በኋላ ፈርዖን ሕልም ዐለመ፤ በሕልሙም፣ በዐባይ ወንዝ ዳር ቆሞ ነበር፤ 2እነሆ መልቸው ያማረ፣ ሥጋቸው የወፈረ ሰባት ላሞች ከወንዙ ወጥተው በወንዙ ዳር የበቀለውን ሣር ይበሉ ጀመር። 3ቀጥሎም መልካቸው የከፋ ዐጥንታቸው የወጣ፣ ሌሎች ሰባት ላሞች ከወንዙ ወጥተው አስቀድመው ከወጡት ላሞች አጠገብ ቆሙ። 4እነዚህ መልካቸው የከፋና ዐጥንታቸው የወጣ ላሞች፣ እነዚያን ያማሩና የወፈሩ ላሞች ሲውጡአቸው አየ፤ ከዚያም ፈርዖን ከእንቅልፉ ነቃ።

5ፈርዖንም እንደ ገና እንቅልፍ ወስዶት ሳለ፣ ሌላ ሕልም አየ። በሕልሙም በአንድ የእህል አገዳ ላይ፣ ፍሬያቸው የተንዠረገገና ያማረ ሰባት የእሸት ዛላዎች ሲወጡ አየ። 6ከዚያም የቀጨጩና በምሥራቅ ነፋስ ተመትተው የደረቁ ሰባት የእሸት ዛላዎች ወጡ። 7የቀጨጩት የእሸት ዛላዎች፣ ፍሬያቸው የተንዠረገገውን ሰባቱን ያማሩ ዛላዎች ዋጡአቸው። በዚህ ጊዜ ፈርዖን ከእንቅልፉ ነቃ፤ ነገሩ ሕልም ነበር።

8በነጋታውም ፈርዖን መንፈሱ ታወከበት፤ ስለዚህ በግብፅ አገር ያሉትን አስማተኞችና ጥበበኞች በሙሉ አስጠርቶ ሕልሞቹን ነገራቸው፣ ይሁን እንጂ ሕልሞቹን ሊተረጒምለት የቻለ አንድም ሰው አልተገኘም።

9በዚያን ጊዜ የመጠጥ አሳላፊዎች አለቃ ፈርዖንን እንዲህ አለው፤ “የሠራሁት በደል ዛሬ ታወሰኝ። 10በአንድ ወቅት ፈርዖን እኔንና የእንጀራ ቤት አዛዡን ተቈጥቶ በዘበኞቹ አለቃ ግቢ አስሮን ነበር። 11ሁለታችንም በአንዲት ሌሊት የተለያየ ሕልም አየን፤ የእያንዳንዳችንም ሕልም የየራሱ ትርጒም ነበረው። 12በዚያን ጊዜ የዘበኞች አለቃ አገልጋይ የሆነ አንድ ዕብራዊ ወጣት ከእኛ ጋር እስር ቤት ነበር። ሕልማችንን በነገርነው ጊዜ፣ ፍቺውን ነገረን፤ ለእያንዳንዳችንም እንደ ሕልማችን ተረጐመልን፤ 13ነገሩም ልክ እርሱ እንደ ተረጐመልን ሆነ፤ እኔ ወደ ቀድሞ ሹመቴ ተመለስሁ፤ የእንጀራ ቤት አዛዡም ተሰቀለ41፥13 ወይም ተወጋ

14ፈርዖን ዮሴፍን እንዲያመጡት ትእዛዝ ሰጠ፤ ከእስር ቤትም በጥድፊያ ይዘውት መጡ፤ ጠጒሩንም ከተላጨና ልብሱን ከለወጠ በኋላ ፈርዖን ፊት ቀረበ።

15ፈርዖንም ዮሴፍን፣ “ሕልም አይቼ ነበር፤ ሕልሜን ሊተረጒምልኝ የቻለ አንድም ሰው አልተገኘም፤ አንተ ግን ሕልም ሲነገርህ የመተርጐም ችሎታ እንዳለህ ሰማሁ” አለው።

16ዮሴፍም ፈርዖንን፣ “እኔ የመተርጐም ችሎታ የለኝም፤ ነገር ግን እግዚአብሔር (ኤሎሂም) ለፈርዖን የሚሻውን ትርጒም ይሰጠዋል” አለው።

17ከዚህ በኋላ ፈርዖን ዮሴፍን እንዲህ አለው፤ “በሕልሜ በአባይ ወንዝ ዳር ቆሜ ነበር። 18ሥጋቸው የወፈረና መልካቸው ያማረ ሰባት ላሞች ከወንዙ ወጥተው በወንዙ ዳር የበቀለውን ሣር ሲበሉ አየሁ። 19ከእነርሱም በኋላ፣ ዐቅመ ደካማ፣ መልካቸው እጅግ የከፋና ዐጥንታቸው የወጣ ሌሎች ሰባት ላሞች ወጡ፤ እነዚያን የመሰሉ የሚያስከፋ መልክ ያላቸው ላሞች በግብፅ ምድር ከቶ አይቼ አላውቅም። 20ዐጥንታቸው የወጣና አስከፊ መልክ ያላቸው ላሞች መጀመሪያ የወጡትን፣ ሥጋቸው የወፈረውን ሰባቱን ላሞች ዋጧቸው። 21ከዋጧቸውም በኋላ፣ ያው የበፊቱ መልካቸው ስላልተለወጠ እንደ ዋጧቸው ማንም ሊያውቅ አይችልም ነበር፤ ከዚያም ከእንቅልፌ ነቃሁ።

22እንደዚሁም፣ በሕልሜ በአንድ የእህል አገዳ ላይ ፍሬያቸው የፋፋና ያማሩ ሰባት እሸት ዛላዎች ወጥተው አየሁ። 23ቀጥሎም በምሥራቅ ነፋስ ተመተው የቀጨጩና የደረቁ ሌሎች ሰባት ዛላዎች ወጡ። 24የቀጨጩት የእሸት ዛላዎችም ሰባቱን ያማሩ የእሸት ዛላዎች ዋጧቸው፤ ይህንኑም ለአስማተኞች ነገርሁ፤ ነገር ግን ማንም ሊፈታው አልቻለም።”

25ዮሴፍም ለፈርዖን እንዲህ አለው፤ “ሁለቱም የፈርዖን ሕልሞች ተመሳሳይና አንድ ዐይነት ናቸው፤ እግዚአብሔር (ኤሎሂም) ወደ ፊት የሚያደርገውን ለፈርዖን ገልጦለታል። 26ሰባቱ የሚያማምሩ ላሞች፣ ሰባት ዓመታት ናቸው፣ ሰባቱም የሚያማምሩ የእሸት ዛላዎች ሰባት ዓመታት ናቸው፤ ሕልሙም አንድና ተመሳሳይ ነው። 27ከእነርሱም በኋላ ዐጥንታቸው የወጣ አስከፊ መልክ ያላቸው ሰባት ላሞች፣ ሰባት ዓመታት ናቸው፤ እንደዚሁም ፍሬ አልባ የሆኑትና በምሥራቅ ነፋስ ተመትተው የደረቁት ሰባት የእሸት ዛላዎች ሰባት የራብ ዓመታት ናቸው።

28“አስቀድሜ ለፈርዖን እንደተናገርኩት፣ እግዚአብሔር (ኤሎሂም) ወደ ፊት የሚያደርገውን ነገር ለፈርዖን ገልጦለታል። 29በመላው የግብፅ ምድር እጅግ የተትረፈረፈ ጥጋብ የሚሆንባቸው ሰባት ዓመታት ይመጣሉ። 30ከዚህ በኋላ ግን በተከታታይ ሰባት የራብ ዓመታት ይሆናሉ። የራቡ ዘመን አገሪቱን እጅግ ስለሚጐዳት፣ በግብፅ የነበረው ያለፈው የጥጋብ ዘመን ሁሉ ጨርሶ አይታወስም። 31ከጥጋቡ ዓመታት በኋላ የሚመጣው የራብ ዘመን እጅግ ጽኑ ከመሆኑ የተነሣ፣ ቀደም ሲል የነበረው የጥጋብ ዘመን ፈጽሞ ይረሳል። 32ሕልሙ ለፈርዖን በሁለት መልክ በድጋሚ መታየቱ፣ ነገሩ ከእግዚአብሔር (ኤሎሂም) ዘንድ የተቈረጠ ስለ ሆነ ነው፤ ይህንንም እግዚአብሔር (ኤሎሂም) በቅርብ ጊዜ ይፈጽመዋል።

33እንግዲህ ፈርዖን ብልኅና አስተዋይ ሰው ፈልጎ፣ በመላው የግብፅ ምድር ላይ አሁኑኑ ይሹም። 34እንደዚሁም በሰባቱ የጥጋብ ዓመታት ከሚገኘው ምርት፣ አንድ አምስተኛው እንዲሰበሰብ የሚያደርጉ ኀላፊዎችን ይሹም። 35እነርሱም በሚመጡት የጥጋብ ዓመታት ከሚገኘው ምርት ሁሉ ይሰብስቡ፤ በፈርዖንም ሥልጣን ሥር ያከማቹ፤ ለምግብ እንዲሆኑም በየከተማው ይጠበቁ። 36የሚከማቸው እህል፣ ወደ ፊት በግብፅ አገር ላይ ለሚመጣው የሰባት ዓመት ራብ መጠባበቂያ ይሁን፤ በዚህም ሁኔታ አገሪቱ በራብ አትጠፋም።”

37ዕቅዱንም ፈርዖንና ሹማምቱ ሁሉ መልካም ሆኖ አገኙት። 38ፈርዖንም፣ “የእግዚአብሔር (ኤሎሂም) መንፈስ41፥38 ወይም የአማልክት መንፈስ ያለበት እንደዚህ ያለ ሰው ማንን ልናገኝ እንችላለን?” ብሎ ጠየቃቸው።

39ፈርዖን ዮሴፍን እንዲህ አለው፤ “እግዚአብሔር (ኤሎሂም) ይህን ሁሉ ስለ ገለጠልህ፣ እንዳንተ ያለ አስተዋይና ብልኅ ሰው የለም። 40አንተ በቤተ መንግሥቴ የበላይ ትሆናለህ፤ ሕዝቤም ሁሉ ለሥልጣንህ ይገዛል፤ እኔ ከአንተ የምበልጠው በዙፋኔ ብቻ ይሆናል።”

ዮሴፍ በግብፅ ተሾመ

41ከዚያም፣ ፈርዖን ዮሴፍን “በመላዪቱ የግብፅ ምድር ላይ ኀላፊ አድርጌሃለሁ” አለው። 42ፈርዖንም ባለማኅተሙን ቀለበት ከጣቱ አውልቆ በዮሴፍ ጣት ላይ አደረገው፤ እንዲሁም ከጥሩ የተልባ እግር የተሠራ ልብስ አለበሰው፤ በዐንገቱም የወርቅ ሐብል አጠለቀለት። 43በማዕረግ ከእርሱ ሁለተኛ ሰው አድርጎ፣ በሠረገላ ላይ አስቀመጠው።41፥43 ወይም በማዕረግ ሁለተኛ በሆነው የእርሱ ሠረገላ ላይ፤ ወይም በሁለተኛ ሠረገላው ላይ ሰዎችም በፊቱ፣ “እጅ ንሡ41፥43 ወይም ስገዱ” እያሉ ይጮኹ ነበር፤ በዚህ ሁኔታም በግብፅ ምድር ሁሉ ላይ ሾመው።

44ከዚህ በኋላ ፈርዖን ዮሴፍን፣ “እኔ ፈርዖን ነኝ፤ ሆኖም በመላዪቱ ግብፅ ያላንተ ትእዛዝ እጁንም ሆነ እግሩን ልውስ የሚያደርግ አይኖርም” አለው። 45ፈርዖንም ዮሴፍን ጸፍናት ፐዕናህ ብሎ ስም አወጣለት። እንዲሁም የሄልዮቱ41፥45 በቍ 50 ላይ ያለውንም ጨምሮ ሆልዮፓሊስን ያመለክታል ከተማ ካህን የጶጥፌራ ልጅ አስናትን አጋባው። ዮሴፍም በመላዪቱ የግብፅ ምድር ተዘዋወረ።

46ዮሴፍ የግብፅ ንጉሥ ፈርዖንን ማገልገል ሲጀምር፣ ዕድሜው ሠላሳ ዓመት ነበር። ዮሴፍም ከፈርዖን ፊት ወጥቶ የግብፅን ምድር በሙሉ ዞረ።

47በሰባቱም የጥጋብ ዓመታት ምድሪቱ የተትረፈረፈ ሰብል ሰጠች። 48በእነዚያ ሰባት የጥጋብ ዓመታት፣ ዮሴፍ በግብፅ አገር የተገኘውን ምርት ሰብስቦ በየከተሞቹ አከማቸ፤ በእያንዳንዱ ከተማ ከየአቅራቢያው የተመረተውን እህል እንዲከማች አደረገ። 49ዮሴፍ ብዛቱ እንደ ባሕር አሸዋ የሚሆን የእህል ሰብል አከማቸ፤ ሰብሉ እጅግ ከመብዛቱ የተነሣ ልኩን መስፈርና መመዝገብ አልቻለም ነበር።

50ሰባቱ የራብ ዓመታት ከመምጣቱ በፊት፣ የሄልዮቱ ካህን የጶጥፌራ ልጅ አስናት ለዮሴፍ ሁለት ወንዶች ልጆች ወለደችለት። 51ዮሴፍም፣ “እግዚአብሔር (ኤሎሂም) መከራዬን ሁሉ፣ የአባቴንም ቤት እንድረሳ አድርጎኛል” በማለት የመጀመሪያ ልጁን ስም ምናሴ41፥51 ምናሴ የሚለው ቃል መርሳት የሚል ትርጒም ካለው የዕብራይስጥ ቃል የወጣ ሲሆን ከዚሁ ቃል ጋር አንድ ዐይነት ድምፅ አለው አለው። 52እንደዚሁም፣ “መከራ በተቀበልኩበት ምድር እግዚአብሔር (ኤሎሂም) ፍሬያማ አደረገኝ” ሲል ሁለተኛ ልጁን ኤፍሬም41፥52 ኤፍሬም የሚለው ቃል በዕብራይስጥ ዕጥፍ ፍሬያማ የሚል ትርጒም ካለው ቃል ጋር አንድ ዐይነት ድምፅ አለው። አለው።

53በግብፅ ምድር የነበረው ሰባቱ የጥጋብ ዘመን ዐለፈና 54ዮሴፍ አስቀድሞ እንደ ተናገረው የሰባቱ ዓመት የራብ ዘመን ጀመረ። ሌሎች አገሮች ሁሉ ሲራቡ፣ በመላው የግብፅ ምድር ግን ምግብ ነበር። 55ራቡ በመላው የግብፅ ምድር መስፋፋት ሲጀምር፣ ሕዝቡ ምግብ ይሰጠን በማለት ወደ ፈርዖን ጮኸ። ፈርዖንም ግብፃውያኑን፣ “ወደ ዮሴፍ ሂዱና የሚላችሁን አድርጉ” አላቸው።

56ራቡ በአገሩ ላይ እየተስፋፋ ስለሄደ፣ ዮሴፍ ጐተራዎቹን ከፍቶ እህሉ ለግብፃውያን እንዲሸጥ አደረገ፤ ምክንያቱም ራቡ በመላዪቱ ግብፅ ጸንቶ ነበር። 57ራቡ በመላው ዓለም ጸንቶ ስለ ነበር፣ የየአገሩ ሰዎች ሁሉ ከዮሴፍ ዘንድ እህል ለመሸመት ወደ ግብፅ ምድር መጡ።