उत्पत्ति 31 HCV – Genesis 31 TCB

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Hindi Contemporary Version

उत्पत्ति 31:1-55

याकोब का गुप्त रूप से पलायन

1याकोब के कानों में यह समाचार पड़ा कि लाबान के पुत्र बड़बड़ा रहे थे, “याकोब ने तो वह सब हड़प लिया है, जो हमारे पिता का था और अब वह हमारे पिता ही की संपत्ति के आधार पर समृद्ध बना बैठा है.” 2यहां याकोब का ध्यान भी लाबान की अभिवृत्ति की ओर गया और उसने पाया कि उसकी अभिवृत्ति उनके प्रति अब पहले जैसी मैत्रीपूर्ण नहीं रह गई थी.

3इस स्थिति के प्रकाश में याहवेह ने याकोब को आदेश दिया, “अपने पिता एवं अपने संबंधियों के देश को लौट जाओ. मैं इसमें तुम्हारे पक्ष में हूं.”

4इसलिये याकोब ने राहेल तथा लियाह को वहीं बुला लिया, जहां वह भेड़-बकरियों के साथ थे. 5उन्होंने उनसे कहा, “मैं तुम्हारे पिता की अभिवृत्ति स्पष्ट देख रहा हूं; अब यह मेरे प्रति पहले जैसी सौहार्दपूर्ण नहीं रह गई; किंतु मेरे पिता के परमेश्वर मेरे साथ रहे हैं. 6तुम दोनों को ही यह उत्तम रीति से ज्ञात है कि मैंने यथाशक्ति तुम्हारे पिता की सेवा की है, 7इतना होने पर भी तुम्हारे पिता ने मेरे साथ छल किया और दस अवसरों पर मेरे पारिश्रमिक में परिवर्तन किए हैं; फिर भी परमेश्वर ने उन्हें मेरी कोई हानि न करने दी. 8यदि उन्होंने कहा, ‘चित्तीयुक्त पशु तुम्हारे पारिश्रमिक होंगे,’ तो सभी भेड़ चित्तीयुक्त मेमने ही उत्पन्न करने लगे; यदि उन्होंने कहा, ‘अच्छा, धारीयुक्त पशु तुम्हारा पारिश्रमिक होंगे,’ तो भेड़ धारीयुक्त मेमने उत्पन्न करने लगे. 9यह तो परमेश्वर का ही कृत्य था, जो उन्होंने तुम्हारे पिता के ये पशु मुझे दे दिए हैं.

10“तब पशुओं के समागम के अवसर पर मैंने एक स्वप्न देखा कि वे बकरे, जो संभोग कर रहे थे, वे धारीयुक्त, चित्तीयुक्त एवं धब्बे युक्त थे. 11परमेश्वर के स्वर्गदूत ने स्वप्न में मुझसे कहा, ‘याकोब,’ मैंने कहा, ‘क्या आज्ञा है, प्रभु?’ 12और उसने कहा, ‘याकोब, देखो-देखो, जितने भी बकरे इस समय संभोग कर रहे हैं, वे धारीयुक्त हैं, चित्तीयुक्त हैं तथा धब्बे युक्त हैं; क्योंकि मैंने वह सब देख लिया है, जो लाबान तुम्हारे साथ करता रहा है. 13मैं बेथ-एल परमेश्वर हूं, जहां तुमने उस शिलाखण्ड का अभ्यंजन किया था, जहां तुमने मेरे समक्ष संकल्प लिया था; अब उठो. छोड़ दो इस स्थान को और अपने जन्मस्थान लौट जाओ.’ ”

14राहेल तथा लियाह ने उनसे कहा, “क्या अब भी हमारे पिता की संपत्ति में हमारा कोई अंश अथवा उत्तराधिकार शेष रह गया है? 15क्या अब हम उनके आंकलन में विदेशी नहीं हो गई हैं? उन्होंने हमें विक्रीत भी कर दिया है तथा हमारे अंश की धनराशि भी हड़प ली है. 16निस्संदेह अब तो, जो संपत्ति परमेश्वर ने हमारे पिता से छीन ली है, हमारी तथा हमारी संतान की हो चुकी है. तब इस स्थिति में तो आप वही कीजिए, जिसका निर्देश आपको परमेश्वर दे चुके हैं.”

17तब याकोब ने अपने बालकों एवं पत्नियों को ऊंटों पर बैठा दिया, 18याकोब ने अपने समस्त पशुओं को, अपनी समस्त संपत्ति को, जो उनके वहां रहते हुए संकलित होती गई थी तथा वह पशु धन, जो पद्दन-अराम में उनके प्रवासकाल में संकलित होता चला गया था, अपने पिता यित्सहाक के आवास कनान की ओर प्रस्थित कर दिया.

19जब लाबान ऊन कतरने के लिए बाहर गया हुआ था, राहेल ने अपने पिता के गृहदेवता—प्रतिमाओं की चोरी कर ली. 20तब याकोब ने भी अरामी लाबान के साथ प्रवंचना की; याकोब ने लाबान को सूचित ही नहीं किया कि वह पलायन कर रहे थे. 21इसलिये याकोब अपनी समस्त संपत्ति को लेकर पलायन कर गए. उन्होंने फरात नदी पार की और पर्वतीय प्रदेश गिलआद की दिशा में आगे बढ़ गए.

लाबान द्वारा याकोब का पीछा करना

22तीसरे दिन जब लाबान को यह सूचना दी गई कि याकोब पलायन कर चुके हैं. 23तब लाबान ने अपने संबंधियों को साथ लेकर याकोब का पीछा किया. सात दिन पीछा करने पर वे गिलआद के पर्वतीय प्रदेश में उनके निकट पहुंच गए. 24परमेश्वर ने अरामी लाबान पर रात्रि में स्वप्न में प्रकट होकर उसे चेतावनी दी, “सावधान रहना कि तुम याकोब से कुछ प्रिय-अप्रिय न कह बैठो.”

25लाबान याकोब तक जा पहुंचा. याकोब के शिविर पर्वतीय क्षेत्र में थे तथा लाबान ने भी अपने शिविर अपने संबंधियों सदृश गिलआद के पर्वतीय क्षेत्र में खड़े किए हुए थे. 26लाबान ने याकोब से कहा, “यह क्या कर रहे हो तुम? यह तो मेरे साथ छल है! तुम तो मेरी पुत्रियों को ऐसे लिए जा रहे हो, जैसे युद्धबन्दियों को तलवार के आतंक में ले जाया जाता है. 27क्या आवश्यकता थी ऐसे छिपकर भागने की, मुझसे छल करने की. यदि तुमने मुझे इसकी सूचना दी होती, तो मैं तुम्हें डफ तथा किन्नोर की संगत पर गीतों के साथ सहर्ष विदा करता? 28तुमने तो मुझे सुअवसर ही न दिया कि मैं अपने पुत्र-पुत्रियों को चुंबन के साथ विदा कर सकता. तुम्हारा यह कृत्य मूर्खतापूर्ण है. 29मुझे यह अधिकार है कि तुम्हें इसके लिए प्रताड़ित करूं; किंतु तुम्हारे पिता के परमेश्वर ने कल रात्रि मुझ पर प्रकट हो मुझे आदेश दिया है कि मैं तुमसे कुछ भी प्रिय-अप्रिय न कहूं. 30ठीक है, तुम्हें अपने पिता के निकट रहने की इच्छा है, मान लिया; किंतु क्या आवश्यकता थी तुम्हें मेरे गृह देवताओं की चोरी करने की?”

31तब याकोब ने लाबान को उत्तर दिया, “मेरे इस प्रकार आने का कारण था मेरी यह आशंका, कि आप मुझसे अपनी पुत्रियां बलात छीन लेते. 32किंतु आपको जिस किसी के पास से वे गृहदेवता प्राप्त होंगे, उसे जीवित न छोड़ा जाएगा. आपके ही संबंधियों की उपस्थिति में आप हमारी संपत्ति में से जो कुछ आपका है, ले लीजिए.” याकोब को इस तथ्य का कोई संज्ञान न था कि राहेल ने उन गृह देवताओं को चुरा लिया था.

33इसलिये लाबान याकोब के शिविर के भीतर गया, उसके बाद लियाह के शिविर में, इसलिये परिचारिकाओं के शिविर में किंतु वे देवता उसे वहां प्राप्त न हुए. तब वह लियाह के शिविर से निकलकर राहेल के शिविर में गया. 34राहेल ने ही वे गृहदेवता छिपाए हुए थे, जिन्हें उसने ऊंट की काठी में रखा हुआ था. वह स्वयं उन पर बैठ गई थी. लाबान ने समस्त शिविर में खोज कर ली थी, किंतु उसे कुछ प्राप्त न हुआ था.

35उसने अपने पिता से आग्रह किया, “पिताजी, आप क्रुद्ध न हों. मैं आपके समक्ष खड़ी होने के असमर्थ हूं; क्योंकि इस समय मैं रजस्वला हूं.” तब लाबान के खोजने पर भी उसे वे गृहदेवता प्राप्त न हो सके.

36तब याकोब का क्रोध उद्दीप्त हो उठा. वह लाबान से तर्क-वितर्क करने लगे, “क्या अपराध है मेरा?” क्या पाप किया है मैंने, जो आप इस प्रकार मेरा पीछा करते हुए आ रहे हैं? 37आपने मेरी समस्त वस्तुओं में उन देवताओं की खोज कर ली है किंतु आपको कोई भी अपनी वस्तु प्राप्त हुई है? आपके तथा मेरे संबंधियों के समक्ष यह स्पष्ट हो जाए, कि वे हम दोनों के मध्य अपना निर्णय दे सकें.

38“इन बीस वर्षों में मैं आपके साथ रहा हूं. आपकी भेड़ों एवं बकरियों में कभी गर्भपात नहीं हुआ. अपने भोजन के लिए मैंने कभी आपके पशुवृन्द में से मेढ़े नहीं उठाए. 39जब कभी किसी वन्य पशु ने हमारे पशु को फाड़ा, मैंने उसे कभी आपके वृन्द में सम्मिलित नहीं किया; इसे मैंने अपनी ही हानि में सम्मिलित किया था. चाहे कोई पशु दिन में चोरी हुआ अथवा रात्रि में, आपने लेखा मुझसे ही लिया. 40मेरी स्थिति तो ऐसी रही कि दिन में मुझ पर ऊष्मा का प्रहार होता रहा तथा रात्रि में ठंड का. मेरे नेत्रों से निद्रा दूर ही दूर रही. 41इन बीस वर्षों में मैं आपके परिवार में रहा हूं चौदह वर्ष आपकी पुत्रियों के लिए तथा छः वर्ष आपके भेड़-बकरियों के लिए. इन वर्षों में आपने दस बार मेरा पारिश्रमिक परिवर्तित किया है. 42यदि मेरे पिता के परमेश्वर, अब्राहाम के परमेश्वर तथा यित्सहाक का भय मेरे साथ न होता, तो आपने तो मुझे रिक्त हस्त ही विदा कर दिया होता. परमेश्वर की दृष्टि में थी मेरा कष्ट एवं मेरे हाथों का श्रम जिसका प्रतिफल उन्होंने मुझे कल रात्रि प्रदान कर दिया है.”

मिज़पाह की प्रसम्विदा

43यह सब सुनकर लाबान ने याकोब को उत्तर दिया, “ये स्त्रियां मेरी पुत्रियां हैं, ये बालक मेरे बालक हैं, ये भेड़-बकरी भी मेरे ही हैं तथा जो कुछ तुम्हें दिखाई दे रहा है, वह मेरा ही है; किंतु अब मैं अपनी पुत्रियों एवं इन बालकों का क्या करूं, जो इनकी सन्तति हैं? 44इसलिये आओ, हम परस्पर यह वाचा स्थापित कर लें, तुम और मैं, और यही हमारे मध्य साक्ष्य हो जाए.”

45इसलिये याकोब ने एक शिलाखण्ड को स्तंभ स्वरूप खड़ा किया. 46याकोब ने अपने संबंधियों से कहा “पत्थर एकत्र करो.” इसलिये उन्होंने पत्थर एकत्र कर एक ढेर बना दिया तथा उस ढेर के निकट बैठ उन्होंने भोजन किया. 47लाबान ने तो इसे नाम दिया येगर-सहरदूथा किंतु याकोब ने इसे गलएद कहकर पुकारा.

48लाबान ने कहा, “पत्थरों का यह ढेर आज मेरे तथा तुम्हारे मध्य एक साक्ष्य है.” इसलिये इसे गलएद तथा मिज़पाह नाम दिया गया, 49क्योंकि उनका कथन था, “जब हम एक दूसरे की दृष्टि से दूर हों, याहवेह ही तुम्हारे तथा मेरे मध्य चौकसी बनाए रखें. 50यदि तुम मेरी पुत्रियों के साथ दुर्व्यवहार करो अथवा मेरी पुत्रियों के अतिरिक्त पत्नियां ले आओ, यद्यपि कोई मनुष्य यह देख न सकेगा, किंतु स्मरण रहे, तुम्हारे तथा मेरे मध्य परमेश्वर साक्ष्य हैं.”

51लाबान ने याकोब से कहा, “इस ढेर को तथा इस स्तंभ को देखो, जो मैंने तुम्हारे तथा मेरे मध्य में स्थापित किया है. 52यह स्तंभ तथा पत्थरों ढेर साक्ष्य है, कि मैं इसके निकट से होकर तुम्हारी हानि करने के लक्ष्य से आगे नहीं बढ़ूंगा, वैसे ही तुम भी इस ढेर तथा इस स्तंभ के निकट से होकर मेरी हानि के उद्देश्य से आगे नहीं बढ़ोगे. 53इसके लिए अब्राहाम के परमेश्वर, नाहोर के परमेश्वर तथा उनके पिता के परमेश्वर हमारा न्याय करें.”

इसलिये याकोब ने अपने पिता यित्सहाक के प्रति भय-भाव में शपथ ली. 54फिर याकोब ने उस पर्वत पर ही बलि अर्पित की तथा अपने संबंधियों को भोज के लिए आमंत्रित किया. उन्होंने भोजन किया तथा पर्वत पर ही रात्रि व्यतीत की.

55बड़े तड़के लाबान उठा, अपने पुत्र-पुत्रियों का चुंबन लिया तथा उन्हें आशीर्वाद दिया. फिर लाबान स्वदेश लौट गया.

Tagalog Contemporary Bible

Genesis 31:1-55

Tumakas si Jacob kay Laban

1Narinig ni Jacob na ang mga anak na lalaki ni Laban ay nagsasabi, “Kinuha ni Jacob ang halos lahat ng ari-arian ng ating ama. Ang lahat ng kayamanan niya ay nanggaling sa ari-arian ng ating ama.” 2Napansin din ni Jacob na nag-iba na ang pakikitungo ni Laban sa kanya di tulad nang dati.

3Sinabi ng Panginoon kay Jacob, “Bumalik ka na sa lupain ng iyong mga ninuno, doon sa mga kamag-anak mo, at makakasama mo ako.”

4Kaya ipinatawag ni Jacob ang mga asawa niyang sina Raquel at Lea na naroon sa pastulan ng mga hayop niya. 5Sinabi niya sa kanila, “Napansin ko na nag-iba na ang pakikitungo ng inyong ama sa akin di tulad nang dati. Pero hindi ako pababayaan ng Dios ng aking Ama. 6Alam naman ninyo na naglingkod ako sa inyong ama hanggang sa makakaya ko, 7pero dinaya pa niya ako. Sampung beses niyang binago ang kabayaran ko. Pero hindi ako pinabayaan ng Dios na api-apihin lang niya. 8Nang sinabi nga ni Laban na ang batik-batik na mga kambing ang siyang bayad ko, panay din batik-batik ang anak ng mga kambing. 9Kinuha ng Dios ang mga hayop ng inyong ama at ibinigay sa akin.”

10Sinabi pa ni Jacob, “Nang panahon ng pagkakastahan ng mga hayop, nanaginip ako. Nakita ko na ang mga lalaking kambing na kumakasta sa mga babaeng kambing ay mga batik-batik. 11Sa panaginip ko tinawag ako ng anghel ng Dios. Sinabi niya, ‘Jacob!’ Sumagot ako sa kanya, ‘Narito po ako.’ 12At sinabi niya, ‘Masdan mo ang lahat ng lalaking kambing na kumakasta sa mga babaeng kambing ay mga batik-batik. Ginawa ko ito dahil nakita ko ang lahat ng ginagawa sa iyo ni Laban. 13Ako ang Dios na nagpakita sa iyo roon sa Betel, sa lupain kung saan binuhusan mo ng langis ang bato na itinayo mo bilang alaala. At doon ka rin nangako sa akin. Ngayon maghanda ka at umalis sa lugar na ito, at bumalik sa lugar kung saan ka isinilang.’ ”

14Sumagot si Raquel at si Lea kay Jacob, “Wala na kaming mamanahin sa aming ama. 15Ibang tao na kami sa paningin niya. Ipinagbili na kami at naubos na niya ang perang pinagbilhan namin. 16Ang lahat ng yaman na binawi sa kanya ng Dios at ibinigay na sa iyo ay maituturing namin na mamanahin namin at ng aming mga anak. Kaya gawin mo ang sinabi sa iyo ng Dios.”

17-18Naghanda agad si Jacob para bumalik sa Canaan, sa lupain ng ama niyang si Isaac. Pinasakay niya ang mga anak niya at mga asawa sa mga kamelyo. Dinala niya ang mga hayop niya at ang lahat ng ari-arian niya na naipon niya sa Padan Aram.

19Nagkataon naman na umalis si Laban para gupitan ang kanyang mga tupa, at habang wala siya kinuha ni Raquel ang mga dios-diosang pag-aari ng kanyang ama. 20Niloko ni Jacob si Laban na Arameo dahil hindi siya nagpaalam sa pag-alis niya. 21Nang umalis si Jacob, dala niya ang lahat ng ari-arian niya. Tumawid siya sa Ilog Eufrates at pumunta sa bundok ng Gilead.

Hinabol ni Laban si Jacob

22Nakalipas ang tatlong araw bago malaman ni Laban na lumayas sina Jacob. 23Kayaʼt hinabol niya si Jacob kasama ang mga kamag-anak niya sa loob ng pitong araw. Naabutan nila sina Jacob doon sa bundok ng Gilead. 24Nang gabing iyon, nagpakita ang Dios kay Laban na Arameo sa panaginip. Sinabi ng Dios sa kanya, “Huwag mong gagawan ng masama si Jacob.”

25Nagtatayo noon si Jacob ng tolda niya sa bundok ng Gilead nang maabutan siya ni Laban. At doon din nagtayo sina Laban ng mga tolda nila. 26Sinabi ni Laban kay Jacob, “Bakit ginawa mo ito sa akin? Bakit mo ako niloko? At dinala mo ang mga anak ko na parang mga bihag sa labanan. 27Bakit niloko mo ako at umalis nang hindi nagpapaalam sa akin? Kung nagsabi ka lang, paglalakbayin pa sana kita nang may kagalakan sa pamamagitan ng tugtugan ng tamburin at alpa. 28Hindi mo man lang ako binigyan ng pagkakataon na mahagkan ang mga apo ko at mga anak bago sila umalis. Hindi maganda itong ginawa mo. 29May dahilan ako para gawan ka ng masama, kaya lang binalaan ako kagabi ng Dios ng iyong ama na huwag kitang gagawan ng masama. 30Alam kong sabik na sabik ka nang umuwi. Pero bakit ninakaw mo ang mga dios ko?”

31Sumagot si Jacob sa kanya, “Hindi ako nagpaalam sa iyo dahil natatakot ako na baka pilitin nʼyong bawiin sa akin ang mga anak mo. 32Pero kung tungkol sa mga nawawala ninyong dios-diosan, kapag nakita nʼyo ito sa kahit sino sa amin, parurusahan siya ng kamatayan. Sa harapan ng mga kamag-anak natin bilang mga saksi, tingnan nʼyo kung may pag-aari po kayo rito na nasa amin, at kung mayroon ay kunin nʼyo.” Hindi alam ni Jacob na si Raquel pala ang kumuha ng mga dios-diosan ni Laban.

33Kaya hinanap ni Laban ang mga dios-diosan niya sa tolda ni Jacob, sa tolda ni Lea, at pati sa tolda ng dalawang aliping babae na mga asawa ni Jacob. Pero hindi niya nakita ang mga ito. Paglabas niya sa tolda ni Lea, pumasok siya sa tolda ni Raquel. 34Pero naitago na ni Raquel ang mga dios-diosan sa lalagyan na ginagamit na upuan sa pagsakay sa kamelyo, at inupuan niya. Hinanap ni Laban ang mga dios-diosan sa tolda ni Raquel pero hindi niya ito makita.

35Sinabi ni Raquel sa kanya, “Ama, huwag po kayong magalit kung hindi po ako makatayo dahil mayroon akong buwanang dalaw.” At patuloy na naghahanap si Laban pero hindi niya makita ang mga dios-diosan niya.

36Hindi na mapigilan ni Jacob ang kanyang galit, kaya sinabi niya kay Laban, “Ano ba ang kasalanang nagawa ko at hinabol mo pa ako? 37Ngayong nahalungkat mo na ang lahat ng ari-arian ko, may nakita ka bang sa iyo? Kung mayroon, ilagay mo rito sa harap para makita ng aking mga kamag-anak at ng iyong mga kamag-anak, at bahala na sila ang humatol sa atin. 38Sa loob ng 20 taon nang akoʼy nasa inyo, ni minsan hindi nakunan ang iyong mga kambing at tupa. At ni isang lalaking tupa ay hindi ko pinangahasang kainin. 39Hindi ko na dinadala sa iyo ang mga hayop na pinatay ng mababangis na hayop; pinapalitan ko na lang ito agad. Pinabayaran mo rin sa akin ang mga hayop na ninakaw araw man o gabi. 40Ganito ang naging kalagayan ko: Kapag araw ay nagtitiis ako sa init, at kung gabi ay nagtitiis ako sa lamig. At palaging kulang ang tulog ko. 41Sa loob ng 20 taon na pagtira ko sa inyo, 14 na taon akong naglingkod sa iyo para sa iyong dalawang anak na babae. Naglingkod pa ako ng anim na taon para bantayan ang iyong mga hayop. Pero ano ang ginawa mo? Sampung beses mong binago ang pagbabayad mo sa akin. 42Kung hindi siguro ako sinamahan ng Dios na ginagalang ng aking ama na si Isaac, na siya ring Dios ni Abraham, baka pinalayas mo na ako nang walang dalang anuman. Pero nakita ng Dios ang paghihirap ko at pagtatrabaho, kaya binalaan ka niya kagabi.”

Ang Kasunduan nina Jacob at Laban

43Sumagot si Laban, “Ang mga babaeng iyan ay anak ko at ang mga anak nila ay mga apo ko. At ang mga hayop na iyan ay akin din. Lahat ng nakikita mo ay akin. Pero ngayon, ano pa ang magagawa ko sa mga anak at apo ko? 44Ang mabuti siguro, gumawa tayo ng kasunduan. Magtayo tayo ng batong magpapaalala sa atin at magpapatunay ng kasunduan natin.”

45Kaya kumuha si Jacob ng malaking bato at itinayo niya ito bilang alaala. 46Pagkatapos, inutusan niya ang mga kamag-anak niya na magtumpok ng mga bato. At kumain sila roon sa tinumpok na mga bato. 47Pinangalanan ni Laban ang tinumpok na mga bato na Jegar Sahaduta.31:47 Jegar Sahaduta: Ang ibig sabihin nito sa Aramico na wika, tinumpok bilang patunay. Pero pinangalanan ito ni Jacob na Galeed.31:47 Galeed: Ang ibig sabihin nito sa wikang Hebreo, tinumpok bilang patunay.

48Sinabi ni Laban, “Ang mga batong ito na tinumpok ang magpapatunay sa kasunduan nating dalawa.” Ito ang dahilan kung bakit pinangalanan itong tinumpok sa Galeed. 49Tinawag din iyon na Mizpa,31:49 Mizpa: Ang ibig sabihin, bantayang tore. dahil sinabi pa ni Laban, “Nawaʼy ingatan tayo ng Panginoon sa ating paghihiwalay. 50At kung hindi mabuti ang pakikitungo mo sa mga anak ko, o kayaʼy mag-aasawa ka pa ng iba, alalahanin mo na kahit hindi ko man ito nalalaman, ang Dios ang magpapatunay ng kasunduan natin.”

51Muli pang sinabi ni Laban kay Jacob, “Narito ang tinumpok na mga bato at ang bato na alaalang magpapatunay ng kasunduan natin. 52Ang mga tinumpok na batong ito at ang bato na alaala ang siyang magpapatunay ng ating kasunduan na hindi ako lalampas sa tinumpok na mga batong ito para lusubin ka, at hindi ka rin lalampas sa tinumpok na mga batong ito at sa bato na alaala para lusubin ako. 53Nawaʼy ang Dios ng lolo mong si Abraham at ang Dios ng aking ama na si Nahor, na siya ring Dios ng kanilang amang si Tera, ang siyang humatol sa ating dalawa.”

Nakipagkasundo rin si Jacob kay Laban sa pangalan ng Dios na iginagalang ng ama niyang si Isaac. 54Naghandog si Jacob ng hayop doon sa bundok, at tinawag niya ang mga kamag-anak niya para kumain. Kinagabihan, doon sila natulog sa bundok.

55Kinabukasan, maaga pa ay hinagkan ni Laban at binasbasan ang mga anak at apo niya, at umalis siya pauwi.