Slovo na cestu

Matouš 14:1-36

Herodes zabíjí Jana Křtitele

1Tehdy slyšel galilejský vládce Herodes Antipas vyprávění o Ježíšovi 2a řekl svým dvořanům: „To musí být Jan Křtitel! Vstal z mrtvých, a proto dělá takové zázraky!“

3Před časem dal tento Herodes Jana zatknout a uvěznit. 4Jan mu totiž vytýkal, že žije s Herodiadou, manželkou svého bratra Filipa. 5Herodes by se Jana rád zbavil, ale bál se, protože lidé v něm viděli proroka. 6Na oslavě Herodových narozenin tančila dcera Herodiady a okouzlila Heroda tak, 7že jí přísahal splnit každé přání. 8Herodiada navedla svou dceru a ta požádala: „Chci tady na míse hlavu Jana Křtitele.“

9To bylo i na Heroda příliš. Nechtěl se však zostudit před hosty tím, že by zrušil svou přísahu. 10Poručil proto, aby Jana sťali přímo ve vězení. 11Jeho hlavu přinesli na míse tanečnici a ta ji donesla své matce. 12Janovi žáci si vyžádali jeho tělo a pohřbili ho. Pak šli oznámit Ježíšovi, co se stalo.

Ježíš sytí pět tisíců

13Když to Ježíš slyšel, vstoupil do loďky a odplul na osamělé místo. Jakmile však lidé z okolí zjistili, kam jeho loďka míří, shromáždili se tam. 14Když Ježíš vystoupil na břeh, čekaly ho již davy lidí. Měl s nimi soucit a uzdravil jejich nemocné.

15Večer za ním přišli jeho učedníci a řekli: „Už je pozdě a tady v pustině se nedá koupit nic k jídlu. Rozluč se s nimi, ať si mohou po vesnicích něco opatřit.“

16Ježíš jim na to řekl: „Kam by chodili, dejte jim najíst vy!“

17Namítli: „Vždyť tu máme všeho všudy pět chlebů a dvě ryby!“

18„Přineste je sem,“ vybídl je. 19Potom řekl lidem, aby se usadili na trávě. A vzal těch pět chlebů a dvě ryby a poděkoval za ně Bohu. Pak ulamoval, dával učedníkům a ti rozdávali lidem. 20-21Najedlo se tam dosyta pět tisíc mužů kromě žen a dětí. A ještě nasbírali plných dvanáct košů zbytků.

Ježíš jde po vodě

22Hned potom Ježíš přiměl své učedníky, aby přepluli na druhý břeh, zatímco on propustí shromážděné lidi.

23Když se zástupy rozcházely, vystoupil Ježíš na horu, aby se o samotě modlil. Strávil tam skoro celou noc. 24Loď s učedníky stále nemohla dosáhnout druhého břehu, protože vítr hnal vlny proti ní. 25K ránu se Ježíš přiblížil k lodi po hladině jezera. 26Učedníci ho považovali za přízrak a vyděsili se. 27Ale Ježíš promluvil a uklidnil je: „Vzchopte se, to jsem já, nebojte se!“

28Petr zvolal: „Pane, když máš takovou moc, rozkaž, ať přijdu k tobě po vodě!“

29„Tak pojď!“ řekl Ježíš. A tak Petr opustil loď a šel k Ježíšovi. 30Velké vlny ho však přece poděsily a začal se topit. „Pane, pomoz!“ vykřikl.

31Ježíš ho rychle zachytil a řekl: „Kde je tvoje víra? Proč jsi pochyboval?“ 32Vstoupili na loď a vítr se hned utišil. 33Učedníci před Ježíšem poklekli a vyznávali: „Ty jsi určitě Boží Syn!“

Ježíš uzdravuje všechny, kdo se ho dotýkají

34Pak přistáli v genezaretském kraji. 35Jakmile ho tamější lidé poznali, rozneslo se to po širokém okolí a odevšad k němu nosili nemocné. 36Prosili ho, aby se mohli alespoň dotknout lemu jeho šatu. A kdo se dotkl, byl uzdraven.

Hindi Contemporary Version

मत्तियाह 14:1-36

राजा हेरोदेस तथा येशु

1उसी समय हेरोदेस ने, जो देश के एक चौथाई भाग का राजा था, येशु के विषय में सुना. 2उसने अपने सेवकों से कहा, “यह बपतिस्मा देनेवाला योहन है—मरे हुओं में से जी उठा! यही कारण है कि आश्चर्यकर्म करने का सामर्थ्य इसमें मौजूद है.”

3उनकी हत्या का कारण थी हेरोदेस के भाई फ़िलिप्पॉस की पत्नी हेरोदिअस. हेरोदेस ने बपतिस्मा देनेवाले योहन को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया था 4क्योंकि बपतिस्मा देनेवाले योहन बार-बार उसे यह चेतावनी देते रहते थे, “तुम्हारा हेरोदिअस को अपने पास रखना उचित न्याय नहीं है.” 5हेरोदेस योहन को समाप्त ही कर देना चाहता था किंतु उसे लोगों का भय था क्योंकि लोग उन्हें भविष्यवक्ता मानते थे.

6हेरोदेस के जन्मदिवस समारोह के अवसर पर हेरोदिअस की पुत्री के नृत्य-प्रदर्शन से हेरोदेस इतना प्रसन्न हुआ कि 7उसने उस किशोरी से शपथ खाकर वचन दिया कि वह जो चाहे मांग सकती है. 8अपनी माता के संकेत पर उसने कहा, “मुझे एक थाल में, यहीं, बपतिस्मा देनेवाले योहन का सिर चाहिए.” 9यद्यपि इस पर हेरोदेस दुःखित अवश्य हुआ किंतु अपनी शपथ और उपस्थित अतिथियों के कारण उसने इसकी पूर्ति की आज्ञा दे दी. 10उसने किसी को कारागार में भेजकर योहन का सिर कटवा दिया, 11उसे एक थाल में लाकर उस किशोरी को दे दिया गया और उसने उसे ले जाकर अपनी माता को दे दिया. 12योहन के शिष्य आए, उनके शव को ले गए, उनका अंतिम संस्कार कर दिया तथा येशु को इसके विषय में सूचित किया.

पांच हज़ार को भोजन

13इस समाचार को सुन येशु नाव पर सवार होकर वहां से एकांत में चले गए. जब लोगों को यह मालूम हुआ, वे नगरों से निकलकर पैदल ही उनके पीछे चल दिए. 14तट पर पहुंचने पर येशु ने इस बड़ी भीड़ को देखा और उनका हृदय करुणा से भर गया. उन्होंने उनमें, जो रोगी थे उनको स्वस्थ किया.

15संध्याकाल उनके शिष्य उनके पास आकर कहने लगे, “यह निर्जन स्थान है और दिन ढल रहा है इसलिये भीड़ को विदा कर दीजिए कि गांवों में जाकर लोग अपने लिए भोजन-व्यवस्था कर सकें.”

16किंतु येशु ने उनसे कहा, “उन्हें विदा करने की कोई ज़रूरत नहीं है—तुम उनके लिए भोजन की व्यवस्था करो!”

17उन्होंने येशु को बताया कि यहां उनके पास सिर्फ़ पांच रोटियां और दो मछलियां हैं.

18येशु ने उन्हें आज्ञा दी, “उन्हें यहां मेरे पास ले आओ.” 19लोगों को घास पर बैठने की आज्ञा देते हुए येशु ने पांचों रोटियां और दो मछलियां अपने हाथों में लेकर स्वर्ग की ओर आंखें उठाकर भोजन के लिए धन्यवाद देने के बाद रोटियां तोड़-तोड़ कर शिष्यों को देना प्रारंभ किया और शिष्यों ने भीड़ को. 20सभी ने भरपेट खाया. शेष रह गए टुकड़े इकट्ठा करने पर बारह टोकरे भर गए. 21वहां जितनों ने भोजन किया था उनमें स्त्रियों और बालकों को छोड़कर पुरुषों की संख्या ही कोई पांच हज़ार थी.

येशु का जल सतह पर चलना

22इसके बाद येशु ने शिष्यों को तुरंत ही नाव में सवार होने के लिए इस उद्देश्य से विवश किया कि शिष्य उनके पूर्व ही दूसरी ओर पहुंच जाएं, जबकि वह स्वयं भीड़ को विदा करने लगे. 23भीड़ को विदा करने के बाद वह अकेले पर्वत पर चले गए कि वहां जाकर वह एकांत में प्रार्थना करें. यह रात का समय था और वह वहां अकेले थे. 24विपरीत दिशा में हवा तथा लहरों के थपेड़े खाकर नाव तट से बहुत दूर निकल चुकी थी.

25रात के अंतिम प्रहर में येशु जल सतह पर चलते हुए उनकी ओर आए. 26उन्हें जल सतह पर चलते देख शिष्य घबराकर कहने लगे, “प्रेत है यह!” और वे भयभीत हो चिल्लाने लगे.

27इस पर येशु ने उनसे कहा, “डरो मत. साहस रखो! मैं हूं!”

28पेतरॉस ने उनसे कहा, “प्रभु! यदि आप ही हैं तो मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं जल पर चलते हुए आपके पास आ जाऊं.”

29“आओ!” येशु ने आज्ञा दी.

पेतरॉस नाव से उतरकर जल पर चलते हुए येशु की ओर बढ़ने लगे 30किंतु जब उनका ध्यान हवा की गति की ओर गया तो वह भयभीत हो गए और जल में डूबने लगे. वह चिल्लाए, “प्रभु! मुझे बचाइए!”

31येशु ने तुरंत हाथ बढ़ाकर उन्हें थाम लिया और कहा, “अरे, अल्प विश्वासी! तुमने संदेह क्यों किया?”

32तब वे दोनों नाव में चढ़ गए और वायु थम गई. 33नाव में सवार शिष्यों ने यह कहते हुए येशु की वंदना की, “सचमुच आप ही परमेश्वर-पुत्र हैं.”

34झील पार कर वे गन्नेसरत प्रदेश में आ गए. 35वहां के निवासियों ने उन्हें पहचान लिया और आस-पास के स्थानों में संदेश भेज दिया. लोग बीमार व्यक्तियों को उनके पास लाने लगे. 36वे येशु से विनती करने लगे, कि वह उन्हें मात्र अपने वस्त्र का छोर ही छू लेने दें. अनेकों ने उनका वस्त्र छुआ और स्वस्थ हो गए.