Slovo na cestu

Jan 7:1-53

Ježíš je nepochopen svými bratry

1Pak Ježíš chodil po Galileji, v Judsku mu ukládali o život. 2Když se blížily židovské svátky díkůvzdání, 3Ježíšovi bratři naléhali: „Jdi do Judska, ať lidé vidí tvoje činy! 4Neskrývej se v ústraní, ale snaž se prosadit na veřejnosti.“ 5Oni ho totiž nechápali.

6Ježíš jim řekl: „Půjdu, až přijde můj čas. Vy můžete jít kdykoliv, 7protože vás lidé nebudou nenávidět tak jako mne. Neradi slyší, když je obviňuji z jejich zlých činů. 8Jděte klidně sami a já přijdu, až bude vhodná chvíle.“

Ježíš káže veřejně v chrámu

9-10Ježíš zůstal v Galileji, ale brzy po odchodu svých bratrů se tajně vydal na cestu. Chtěl totiž dojít do Jeruzaléma nepoznán. 11-12O svátcích ho tam lidé hledali a všude se o něm hovořilo. Někteří ho chválili, jiní zase říkali, že plete lidem hlavu. 13Ale to se jen šeptalo, protože mluvit o něm na veřejnosti bylo nebezpečné.

14Uprostřed oslav se Ježíš objevil v chrámu a začal kázat. 15Překvapení Židé se divili: „Jak to, že se tak vyzná v Písmu, když na to nemá školy?“

16Ježíš jim odpověděl: „Nepředkládám vám své vlastní názory. Tlumočím jen to, co vám chce sdělit Bůh. 17Jste-li ochotni plnit Boží vůli, jistě poznáte, že to nejsou má vlastní slova. 18Kdo přináší světu jen vlastní myšlenky, ten touží po slávě a lidské chvále. Ale ten je upřímný a pravdomluvný, kdo svou řečí oslavuje Boha. 19Mojžíš vám dal zákon, ale nikdo z vás ho neplní. Jakým právem mne osočujete? Proč mi ukládáte o život?“

20„Ty ses snad pomátl na rozumu! Copak tě chce někdo zabít?“ ozvalo se z davu.

21Ježíš jim řekl: „Uzdravil jsem v sobotu nemocného člověka, a vyvedlo vás to z míry.

22-23Přitom vy sami nepovažujete za porušení, když připadne na sobotu povinnost udělat obřízku, a klidně ji vykonáte. Proč vás tedy tak rozčiluje, že jsem v sobotu vrátil člověku zdraví? 24Neulpívejte na povrchu, ale pronikejte k jádru věci.“

25Někteří z jeruzalémských občanů povstali: „Je to opravdu ten, kterého chtějí zabít? 26-27Veřejně káže v chrámu, a oni ho nechají. Že by ho přece uznali za Mesiáše? To se nám nezdá. O Mesiáši prý nikdo nebude vědět, odkud přišel, ale Ježíšův původ známe.“

28„Znáte mne a víte, odkud pocházím,“ zvolal Ježíš. „Ale neznáte toho, který mne poslal. 29Já ho znám dobře a vím, že si zaslouží naši důvěru. On za mnou stojí, neprosazuji svou vlastní věc.“

30Chtěli ho zatknout, ale nikdo se k tomu neodhodlal, protože ještě nepřišla chvíle, kdy se to mělo stát. Mnozí z posluchačů v Ježíše uvěřili.

31Řekli si: „Mesiáš by určitě nedělal více zázraků než on!“

Náboženští vůdcové usilují o zatčení Ježíše

32Když se to doneslo farizejům a velekněžím, poslali chrámovou stráž, aby ho zatkla.

33Ježíš pokračoval: „Zůstanu s vámi ještě nějaký čas a pak se vrátím k tomu, který mne poslal. 34Až odejdu, budete mne marně hledat, ale za mnou se nedostanete.“

35-36Židé se překvapeně ptali: „Kam chce odejít, že se za ním nedostaneme? Chce snad jít mezi pohany a učit je?“ 37-38Poslední den svátků, když kněží v průvodu nesli vodu do chrámu, stál tam Ježíš a volal: „Kdo má žízeň, pojď se ke mně napít. Písmo říká, že nitro každého, kdo ve mne uvěří, vydá životodárný pramen.“

39Mluvil o Božím Duchu, který měl být seslán až po dovršení Ježíšova díla na zemi. Měl ho dostat každý, kdo v Ježíše uvěří.

40Ze zástupu se ozvaly dohady: „To je asi Mesiáš.“ 41Někteří však namítali: „Ne, to může být nanejvýš jeho předchůdce. Pochází přece z Galileje! 42A Písmo říká, že Mesiáš se narodí v Betlémě a že bude potomkem krále Davida.“

43Nakonec se pohádali. 44-45Chrámová stráž se neodvážila Ježíše zatknout. Vrátili se ke kněžím a farizejům, kteří se na ně obořili: „Kde ho máte? Proč jste ho nepřivedli?“

46„Nemohli jsme, takového člověka jsme ještě neslyšeli.“

47„Tak i vy jste se nechali svést?“ zlobili se farizejové. 48„Uvěřil mu snad někdo z velerady nebo z nás? 49Co se dá čekat od nevzdělaného davu! Nevyznají se v Bibli a takhle to dopadá.“

50Jeden z farizejů – Nikodém, který před časem Ježíše navštívil, namítl: 51„Jak můžete odsoudit člověka, kterého jste nevyslechli? Odpovídá to našemu zákonu?“ 52„Nejsi snad jeho krajan?“ zeptali se ho. „Ukaž nám v Bibli, že má přijít prorok z Galileje.“ 53A s tím se rozešli.

Hindi Contemporary Version

योहन 7:1-53

मसीह येशु का येरूशलेम में अपने ही भाइयों द्वारा उपहास

1इन बातों के बाद मसीह येशु गलील प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में यात्रा करने लगे. वह यहूदिया प्रदेश में जाना नहीं चाहते थे क्योंकि यहूदी उनकी हत्या की ताक में थे. 2यहूदियों का एक पर्व—झोपड़ियों का उत्सव—पास था. 3मसीह येशु के भाइयों ने उनसे कहा, “यहूदिया चले जाओ जिससे तुम्हारे चेले तुम्हारे इन कामों को देख सकें; 4ख्याति चाहनेवाला व्यक्ति अपने काम गुप्त में नहीं करता. जब तुम ये काम करते ही हो तो स्वयं को संसार पर प्रकट कर दो.” 5मसीह येशु के भाइयों तक को उनमें विश्वास नहीं था.

6इस पर मसीह येशु ने उनसे कहा, “तुम्हारा सही समय तो कभी भी आ सकता है किंतु मेरा सही समय अभी नहीं आया. 7संसार तुमसे घृणा नहीं कर सकता—वह मुझसे घृणा करता है क्योंकि मैं यह प्रकट करता हूं कि उसके काम बुरे हैं. 8तुम पर्व में जाओ. मैं अभी नहीं जाऊंगा क्योंकि मेरा समय अभी नहीं आया है.” 9यह कहकर मसीह येशु गलील प्रदेश में ही ठहरे रहे.

10अपने भाइयों के झोपड़ियों के उत्सव में चले जाने के बाद वे भी गुप्त रूप से वहां गए. 11उत्सव में कुछ यहूदी मसीह येशु को खोजते हुए पूछताछ कर रहे थे, “कहां है वह?”

12यद्यपि मसीह येशु के विषय में लोगों में बड़ा विवाद हो रहा था—कुछ कह रहे थे, “वह भला व्यक्ति है”.

और कुछ का कहना था, “नहीं, वह भरमानेवाला है—सबके साथ छल करता है,” 13तौभी कोई भी व्यक्ति यहूदियों के भय के कारण मसीह येशु के विषय में खुल कर बात नहीं करता था.

उत्सव के समय मसीह येशु के प्रवचन

14जब उत्सव के मध्य मसीह येशु मंदिर में जाकर शिक्षा देने लगे, 15यहूदी चकित होकर कहने लगे, “यह व्यक्ति बिना पढ़े ज्ञानी कैसे बन गया?”

16मसीह येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “यह शिक्षा मेरी नहीं परंतु उनकी है, जिन्होंने मुझे भेजा है. 17यदि कोई व्यक्ति उनकी इच्छा पूरी करने के लिए प्रण करे तो उसे यह मालूम हो जाएगा कि यह शिक्षा परमेश्वर की ओर से है या मेरी ओर से. 18वह, जो अपने ही विचार प्रस्तुत करता है, अपना ही आदर चाहता है, परंतु वह, जो अपने भेजनेवाले का आदर चाहता है, वह बिलकुल सच्चा है और उसमें कोई छल नहीं. 19क्या मोशेह ने तुम्हें व्यवस्था नहीं दी? फिर भी तुममें से कोई उसका पालन नहीं करता. मेरी हत्या की ताक में क्यों हो तुम?”

20भीड़ ने उत्तर दिया, “कौन तुम्हारी हत्या करना चाहता है? तुम प्रेतात्मा से पीड़ित हो.”

21मसीह येशु ने कहा, “मैंने शब्बाथ पर एक चमत्कार किया और तुम सब क्रोधित हो गए. 22मोशेह ने तुम्हें ख़तना विधि दी—परंतु इसको आरंभ करनेवाले मोशेह नहीं, हमारे कुलपिता हैं—जिसके अनुसार तुम शब्बाथ पर भी ख़तना करते हो. 23तुम शब्बाथ पर भी ख़तना करते हो कि मोशेह का व्यवस्था भंग न हो, तो तुम लोग इससे गुस्से में क्यों हो कि मैंने शब्बाथ पर किसी को पूरी तरह स्वस्थ किया? 24तुम्हारा न्याय बाहरी रूप पर नहीं परंतु सच्चाई पर आधारित हो.”

लोगों द्वारा मसीह के आने पर विचार-विमर्श

25येरूशलेम वासियों में से कुछ ने यह प्रश्न किया, “क्या यह वही नहीं, वे जिसकी हत्या की ताक में हैं? 26परंतु देखो, वह भीड़ से खुल कर, बिना डर के बातें करता है और अधिकारी कुछ भी नहीं कहते! कहीं ऐसा तो नहीं कि अधिकारियों को मालूम हो गया है कि यही वास्तव में मसीह हैं? 27इस व्यक्ति की पृष्ठभूमि हमें मालूम है, किंतु जब मसीह प्रकट होंगे तो किसी को यह मालूम नहीं होगा कि वह कहां के हैं.”

28मंदिर में शिक्षा देते हुए मसीह येशु ने ऊंचे शब्द में कहा, “तुम मुझे जानते हो और यह भी जानते हो कि मैं कहां से आया हूं. सच यह है कि मैं स्वयं नहीं आया. जिन्होंने मुझे भेजा है, वह सच्चा है किंतु तुम उन्हें नहीं जानते, 29मैं उन्हें जानता हूं क्योंकि उन्हीं में से मैं हूं और मुझे उन्हीं ने भेजा है.”

30यह सुनकर उन्होंने मसीह येशु को बंदी बनाना चाहा किंतु किसी ने उन पर हाथ न डाला क्योंकि उनका समय अब तक नहीं आया था. 31फिर भी भीड़ में से अनेकों ने मसीह येशु में विश्वास रखा तथा विचार-विमर्श करने लगे, “क्या प्रकट होने पर मसीह इस व्यक्ति से अधिक अद्भुत चिह्न प्रदर्शित करेंगे?”

32फ़रीसियों ने भीड़ को इस विषय में आपस में विचार-विमर्श करते हुए सुन लिया. इसलिये मसीह येशु को बंदी बनाने के लिए प्रधान पुरोहितों व फ़रीसियों ने मंदिर के पहरेदारों को भेजा.

33मसीह येशु ने उनसे कहा, “थोड़े समय के लिए मैं तुम्हारे साथ हूं, उसके बाद मैं अपने भेजनेवाले के पास लौट जाऊंगा. 34तुम मुझे खोजोगे किंतु पाओगे नहीं क्योंकि जहां मैं होऊंगा, तुम वहां नहीं आ सकते.”

35इस पर यहूदी विचार-विमर्श करने लगे, “यह व्यक्ति कहां जाने पर है कि हम उसे खोज नहीं पाएंगे? क्या यह यूनानियों के मध्य प्रवासी यहूदियों में बसना चाहता है कि यूनानियों को भी शिक्षा दे? 36यह क्या कह रहा है कि तुम मुझे खोजोगे और नहीं पाओगे क्योंकि जहां मैं होऊंगा तुम वहां नहीं आ सकते?”

37उत्सव के अंतिम दिन, जब उत्सव चरम सीमा पर होता है, मसीह येशु ने खड़े होकर ऊंचे शब्द में कहा, “यदि कोई प्यासा है तो मेरे पास आए और पिए. 38जो मुझमें विश्वास करता है, जैसा कि पवित्र शास्त्र का लेख है: उसके अंदर से जीवन के जल की नदियां बह निकलेंगीं.” 39यह उन्होंने पवित्रात्मा के विषय में कहा था, जिन्हें उन पर विश्वास करनेवाले प्राप्त करने पर थे. पवित्रात्मा अब तक उतरे नहीं थे क्योंकि मसीह येशु अब तक महिमा को न पहुंचे थे.

40यह सब सुनकर भीड़ में से कुछ ने कहा, “सचमुच यह व्यक्ति ही वह भविष्यवक्ता है”.

41कुछ अन्य ने कहा, “यह मसीह हैं”.

परंतु कुछ ने कहा, “मसीह का आना गलील से तो नहीं होगा न? 42क्या पवित्र शास्त्र के अनुसार मसीह का आना दावीद के वंश और उनके नगर बैथलहम से न होगा?” 43इस प्रकार मसीह येशु के कारण भीड़ में मतभेद हो गया. 44कुछ उन्हें बंदी बनाना चाहते थे फिर भी किसी ने भी उन पर हाथ न डाला.

यहूदी नायकों का अविश्वास

45संतरियों के लौटने पर प्रधान पुरोहितों और फ़रीसियों ने उनसे पूछा, “तुम उसे लेकर क्यों नहीं आए?”

46संतरियों ने उत्तर दिया, “ऐसा बतानेवाला हमने आज तक नहीं सुना.”

47तब फ़रीसियों ने कटाक्ष किया, “कहीं तुम भी तो उसके बहकावे में नहीं आ गए? 48क्या प्रधानों या फ़रीसियों में से किसी ने भी उसमें विश्वास किया है? 49व्यवस्था से अज्ञान भीड़ तो वैसे ही शापित है.”

50तब निकोदेमॉस ने, जो प्रधानों में से एक थे तथा मसीह येशु से पहले मिल चुके थे, उनसे कहा, 51“क्या हमारी व्यवस्था किसी व्यक्ति की सुने बिना और उसकी गतिविधि जाने बिना उसे अपराधी घोषित करती है?”

52इस पर उन्होंने निकोदेमॉस से पूछा, “कहीं तुम भी तो गलीली नहीं हो? शास्त्रों का मनन करो और देखो कि किसी भी भविष्यवक्ता का आना गलील प्रदेश से नहीं होता.”

53वे सभी अपने-अपने घर लौट गएं7:53 कुछ प्राचीनतम मूल हस्तलेखों में यह पाया नहीं जाता.