O Livro

Tiago 4:1-17

Sujeição a Deus

1Donde vêm as guerras e os conflitos entre vocês? Não vêm justamente das paixões que no vosso ser se confrontam? 2Cobiçam, mas não alcançam. Matam e desejam o que os outros têm, mas que não conseguem obtê-lo. Daí as lutas e as guerras. Não têm porque não pedem a Deus. 3Ou então, quando pedem, não recebem, porque fazem-no com más intenções; pedem com o fim de satisfazer os vossos apetites.

4Vocês são desleais como adúlteros! Não veem que gostar do mundo é estar contra Deus? Quem quiser ser amigo do mundo torna-se inimigo de Deus. 5Ou julgam sem razão aquela escritura que diz que o espírito que ele colocou dentro de nós tem ciúmes? 6Por isso, tanto maior é o seu auxílio. E também está escrito que “Deus opõe-se aos orgulhosos, mas favorece os humildes.”4.6 Pv 3.34.

7Sujeitem-se pois a Deus, resistam ao Diabo e ele fugirá de vocês. 8Cheguem-se a Deus e ele se chegará a vocês. Lavem as mãos da maldade, pecadores! E aqueles cuja vida não está decididamente com Deus, revejam os vossos intentos. 9Pensem na vossa miséria moral e lamentem o que fizeram, arrependidos. Que o vosso riso se transforme em tristeza e a vossa alegria em choro. 10Humilhem-se perante o Senhor que ele vos elevará.

11Irmãos, não falem mal uns dos outros. Quem fala mal de um irmão é como se fosse seu juiz. Coloca-se no lugar da Lei e está também a criticá-la. E se criticas a Lei, já não estás a segui-la, mas a substituí-la como juiz. 12Só Deus, que fez a Lei, tem poder para nos julgar, para nos salvar ou para nos condenar. Portanto, quem és tu que julgas o teu próximo?

Aviso contra o orgulho

13E quanto àqueles que dizem: “Hoje ou amanhã iremos a tal e tal sítio e aí passaremos um tempo, e negociaremos e ganharemos”, 14como é que sabem o que vai acontecer amanhã? A vossa vida não passa de um vapor que se forma e logo se esvai. 15O que deveriam dizer é: “Se o Senhor quiser, e se estivermos vivos, haveremos de fazer isto e aquilo.” 16Em vez disso, continuam a orgulhar-se das vossas capacidades, esquecendo-se de que essa segurança orgulhosa é um mal.

17Quem sabe fazer o bem e não o pratica está a pecar.

Hindi Contemporary Version

याकोब 4:1-17

मसीह के विश्वासियों में एकता का अभाव

1तुम्हारे बीच लड़ाई व झगड़े का कारण क्या है? क्या तुम्हारे सुख-विलास ही नहीं, जो तुम्हारे अंगों से लड़ते रहते हैं? 2तुम इच्छा तो करते हो किंतु प्राप्त नहीं कर पाते इसलिये हत्या कर देते हो. जलन के कारण तुम लड़ाई व झगड़े करते हो क्योंकि तुम प्राप्त नहीं कर पाते. तुम्हें प्राप्त नहीं होता क्योंकि तुम मांगते नहीं. 3तुम मांगते हो फिर भी तुम्हें प्राप्त नहीं होता क्योंकि मांगने के पीछे तुम्हारा उद्देश्य ही बुरी इच्छा से होता है—कि तुम उसे भोग विलास में उड़ा दो.

4अरे विश्वासघातियो!4:4 होशे 3:1 क्या तुम्हें यह मालूम नहीं कि संसार से मित्रता परमेश्वर से शत्रुता है? इसलिये उसने, जो संसार की मित्रता से बंधा हुआ है, अपने आपको परमेश्वर का शत्रु बना लिया है. 5कहीं तुम यह तो नहीं सोच रहे कि पवित्र शास्त्र का यह कथन अर्थहीन है: वह आत्मा, जिसको उन्होंने हमारे भीतर बसाया है, बड़ी लालसा से हमारे लिए कामना करते हैं? 6वह और अधिक अनुग्रह देते हैं, इसलिये लिखा है:

“परमेश्वर घमंडियों के विरुद्ध रहते

और दीनों को अनुग्रह देते हैं.”4:6 सूक्ति 3:34

7इसलिये परमेश्वर के अधीन रहो, शैतान का विरोध करो तो वह तुम्हारे सामने से भाग खड़ा होगा. 8परमेश्वर के पास आओ तो वह तुम्हारे पास आएंगे. पापियो! अपने हाथ स्वच्छ करो. तुम, जो दुचित्ते हो, अपने हृदय शुद्ध करो. 9आंसू बहाते हुए शोक तथा विलाप करो कि तुम्हारी हंसी रोने में तथा तुम्हारा आनंद उदासी में बदल जाए. 10स्वयं को प्रभु के सामने दीन बनाओ तो वह तुमको शिरोमणि करेंगे.

11प्रियजन, एक दूसरे की निंदा मत करो. जो साथी विश्वासी की निंदा करता फिरता या उस पर दोष लगाता फिरता है, वह व्यवस्था का विरोध करता है. यदि तुम व्यवस्था का विरोध करते हो, तुम व्यवस्था के पालन करनेवाले नहीं, सिर्फ उसके आलोचक बन जाते हो. 12व्यवस्था देनेवाला और न्यायाध्यक्ष एक ही हैं—वह, जिनमें रक्षा करने का सामर्थ्य है और नाश करने का भी. तुम कौन होते हो जो अपने पड़ोसी पर दोष लगाते हो?

धनवानों तथा घमंडियों के लिए चेतावनी

13अब तुम, सुनो, जो यह कहते हो, “आज या कल हम किसी और नगर में जाएंगे और वहां एक वर्ष रहकर धन कमाएंगे,” 14जबकि सच तो यह है कि तुम्हें तो अपने आनेवाले कल के जीवन के विषय में भी कुछ मालूम नहीं है, तुम तो सिर्फ वह भाप हो, जो क्षण भरके लिए दिखाई देती है और फिर लुप्त हो जाती है. सुनो! 15तुम्हारा इस प्रकार कहना सही होगा: “यदि प्रभु की इच्छा हो, तो हम जीवित रहेंगे तथा यह या वह काम करेंगे.” 16परंतु तुम अपने अहंकार में घमंड कर रहे हो. यह घमंड पाप से भरा है. 17यदि कोई भलाई करना जानते हुए भी उसको न करना पाप है.