Nueva Versión Internacional

Salmo 1:1-6

LIBRO I

Salmos 1–41

Salmo 1

1Dichoso el hombre

que no sigue el consejo de los malvados,

ni se detiene en la senda de los pecadores

ni cultiva la amistad de los blasfemos,

2sino que en la ley del Señor se deleita,

y día y noche medita en ella.

3Es como el árbol

plantado a la orilla de un río

que, cuando llega su tiempo, da fruto

y sus hojas jamás se marchitan.

¡Todo cuanto hace prospera!

4En cambio, los malvados

son como paja arrastrada por el viento.

5Por eso no se sostendrán los malvados en el juicio,

ni los pecadores en la asamblea de los justos.

6Porque el Señor cuida el camino de los justos,

mas la senda de los malos lleva a la perdición.

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 1:1-6

प्रथम पुस्तक

स्तोत्र 1–41

स्तोत्र 1

1कैसा धन्य है वह पुरुष

जो दुष्टों के सम्मति का आचरण नहीं करता,

न पापियों के मार्ग पर खड़ा रहता

और न ही उपहास करनेवालों की बैठक में बैठता है,

2इसके विपरीत उसका उल्लास याहवेह की व्यवस्था का पालन करने में है,

उसी का मनन वह दिन-रात करता रहता है.

3वह बहती जलधाराओं के तट पर लगाए उस वृक्ष के समान है,

जो उपयुक्त ऋतु में फल देता है

जिसकी पत्तियां कभी मुरझाती नहीं.

ऐसा पुरुष जो कुछ करता है उसमें सफल होता है.

4किंतु दुष्ट ऐसे नहीं होते!

वे उस भूसे के समान होते हैं

जिसे पवन उड़ा ले जाती है.

5तब दुष्ट न्याय में टिक नहीं पाएंगे,

और न ही पापी धर्मियों के मण्डली में.

6निश्चयतः याहवेह धर्मियों के आचरण को सुख समृद्धि से सम्पन्न करते हैं,

किंतु दुष्टों को उनका आचरण ही नष्ट कर डालेगा.