Galatians 2 – NIRV & NCA

New International Reader’s Version

Galatians 2:1-21

Paul Is Accepted by the Apostles

1Then after fourteen years, I went up again to Jerusalem. This time I went with Barnabas. I took Titus along also. 2I went because God showed me what he wanted me to do. I spoke in private to those who are respected as leaders. I told them the good news that I preach among the Gentiles. I wanted to be sure I wasn’t running my race for no purpose. And I wanted to know that I had not been running my race for no purpose. 3Titus was with me. He was a Greek. But even he was not forced to be circumcised. 4This matter came up because some people had slipped in among us. They had pretended to be believers. They wanted to find out about the freedom we have because we belong to Christ Jesus. They wanted to make us slaves again. 5We didn’t give in to them for a moment. We did this so that the truth of the good news would be kept safe for you.

6Some people in Jerusalem were thought to be important. But it makes no difference to me what they were. God does not treat people differently. Those people added nothing to my message. 7In fact, it was just the opposite. They recognized the task I had been trusted with. It was the task of preaching the good news to the Gentiles. My task was like Peter’s task. He had been trusted with the task of preaching to the Jews. 8God was working in Peter as an apostle to the Jews. God was also working in me as an apostle to the Gentiles. 9James, Peter and John are respected as pillars in the church. They recognized the special grace given to me. So they shook my hand and the hand of Barnabas. They wanted to show they accepted us. They agreed that we should go to the Gentiles. They would go to the Jews. 10They asked only one thing. They wanted us to continue to remember poor people. That was what I had wanted to do all along.

Paul Opposes Peter

11When Peter came to Antioch, I told him to his face that I was against what he was doing. He was clearly wrong. 12He used to eat with the Gentiles. But certain men came from a group sent by James. When they arrived, Peter began to draw back. He separated himself from the Gentiles. That’s because he was afraid of the circumcision group sent by James. 13Peter’s actions were not honest, and other Jews in Antioch joined him. Even Barnabas was led astray.

14I saw what they were doing. It was not in line with the truth of the good news. So I spoke to Peter in front of them all. “You are a Jew,” I said. “But you live like one who is not. So why do you force Gentiles to follow Jewish ways?”

15We are Jews by birth. We are not sinful Gentiles. 16Here is what we know. No one is made right with God by obeying the law. It is by believing in Jesus Christ. So we too have put our faith in Christ Jesus. This is so we can be made right with God by believing in Christ. We are not made right by obeying the law. That’s because no one can be made right with God by obeying the law.

17We are seeking to be made right with God through Christ. As we do, what if we find that we who are Jews are also sinners? Does that mean that Christ causes us to sin? Certainly not! 18Suppose I build again what I had destroyed. Then I would really be breaking the law.

19By the law, I died as far as the law is concerned. I died so that I might live for God. 20I have been crucified with Christ. I don’t live any longer, but Christ lives in me. Now I live my life in my body by faith in the Son of God. He loved me and gave himself for me. 21I do not get rid of the grace of God. What if a person could become right with God by obeying the law? Then Christ died for nothing!

New Chhattisgarhi Translation (नवां नियम छत्तीसगढ़ी)

गलातिया 2:1-21

प्रेरितमन पौलुस ला गरहन करथें

1चौदह साल के बाद, मेंह बरनबास के संग फेर यरूसलेम सहर गेंव। मेंह अपन संग तीतुस ला घलो ले गेंव। 2मेंह उहां गेंव काबरकि परमेसर ह अगुवई करिस कि मेंह उहां जावंव अऊ ओमन ला, ओ सुघर संदेस बतावंव, जेकर परचार मेंह आनजातमन के बीच म करथंव। पर मेंह ए सुघर संदेस सिरिप ओमन ला निजी तौर म बताएंव, जऊन मन मोला मुखिया सहीं लगिन, काबरकि मेंह नइं चाहत रहेंव कि मोर पहिली के या अभी के काम ह बेकार हो जावय। 3पर अऊ त अऊ तीतुस, जऊन ह एक यूनानी मनखे रिहिस अऊ मोर संग रिहिस, ओकर ऊपर खतना कराय बर दबाव नइं डाले गीस। 4ए बात ह उठिस काबरकि कुछू लबरा भाईमन हमर बीच म चुपेचाप आ गे रिहिन, ताकि मसीह यीसू म हमर जऊन सुतंतरता हवय, ओमन ओकर बारे म पता लगावंय अऊ हमन ला यहूदी रीति-रिवाज अऊ कानून के गुलाम बना लेवंय। 5ओमन के अधीन होवई हमन एक छिन बर घलो तियार नइं होएन, ताकि सुघर संदेस के सच्‍चई ह तुमन म बने रहय। 6पर जऊन मन बड़े मनखे जान पड़त रिहिन, ओमन जऊन कुछू घलो रिहिन, एकर ले मोला कोनो फरक नइं पड़य; परमेसर ह बाहिरी रूप ला देखके फैसला नइं करय – ओ बड़े मनखेमन ले मोला कोनो नवां बात नइं मिलिस। 7एकर उल्टा, ओमन देखिन कि जइसने यहूदीमन ला सुघर संदेस सुनाय के काम पतरस ला दिये गे रिहिस, वइसने आनजातमन ला सुघर संदेस सुनाय के काम मोला दिये गे हवय। 8काबरकि परमेसर, जऊन ह पतरस के सेवा के जरिये काम करिस, ओह मोर सेवा के जरिये घलो काम करिस। पतरस ह यहूदीमन बर प्रेरित ए अऊ मेंह आनजातमन बर। 9याकूब, पतरस अऊ यूहन्ना के खियाती, कलीसिया के खम्भा के रूप म रिहिस। जब ओमन मोला दिये गय परमेसर के अनुग्रह ला जानिन, त ओमन बरनबास अऊ मोर संग हांथ मिलाईन, अऊ संगी करमी के रूप म, हमर बीच म ए सहमती होईस कि हमन आनजातमन करा जावन अऊ ओमन यहूदीमन करा। 10ओमन हमन ला सिरिप ए सलाह दीन कि हमन गरीबमन ला हमेसा सुरता करत रहन, अऊ एहीच काम ला करे बर, मेंह खुद उत्सुक रहेंव।

पौलुस ह पतरस के बिरोध करथे

11जब पतरस ह अंताकिया सहर म आईस, त मेंह ओकर सामने ही ओकर बिरोध करंय, काबरकि ओह गलत करत रिहिस। 12याकूब के इहां ले कुछू मनखेमन के आय के पहिली, पतरस ह आनजातमन के संग खाय करत रिहिस। पर जब ओमन आईन, त ओह पाछू हटे लगिस अऊ अपन-आप ला आनजातमन ले अलग करे लगिस, काबरकि ओह ओमन ले डरत रिहिस, जऊन मन ए कहत रिहिन कि खतना करवाना जम्मो बिसवासी बर जरूरी ए। 13आने यहूदीमन घलो ओकर ढोंग म सामिल हो गीन। अऊ त अऊ बरनबास घलो ओमन के ढोंग के कारन, बहकावा म आ गीस।

14जब मेंह देखेंव कि ओमन सुघर संदेस के सच्‍चई के मुताबिक सही बरताव नइं करत हवंय, त मेंह जम्मो झन के आघू म पतरस ला कहेंव, “तेंह एक यहूदी अस, पर तोर चाल-चलन ह एक आनजात सहीं हवय, यहूदी सहीं नइं। तब तेंह कइसने आनजातमन ऊपर यहूदी रीति-रिवाज ला माने बर दबाव डालथस?”

15हमन जनम ले यहूदी अन अऊ पापी आनजात के नो हन2:15 “पापी आनजात” के मतलब ओ मनखेमन नो हंय, जऊन मन पाप करिन; पर आनजातमन ला यहूदीमन के दुवारा अइसने कहे जावय, काबरकि आनजातमन यहूदी कानून के बाहिर रिहिन।16हमन जानथन कि मनखे ह मूसा के कानून ला पालन करे के दुवारा सही नइं ठहिरय, पर ओह यीसू मसीह म बिसवास करे के दुवारा सही ठहिरथे। एकरसेति, हमन घलो मसीह यीसू ऊपर अपन बिसवास रखे हवन, ताकि हमन मसीह म हमर बिसवास के दुवारा सही ठहिरन, मूसा के कानून ला पालन करे के दुवारा नइं। काबरकि मूसा के कानून ला पालन करे के दुवारा कोनो सही नइं ठहिरंय।

17यदि हमन मसीह म सही ठहिरे के खोज म रहिथन, त एह साबित करथे कि हमन खुदे पापी अन, त का एकर मतलब ए अय कि मसीह ह पाप ला बढ़ावा देथे? बिलकुल नइं। 18ओ चीज जऊन ला मेंह नास कर दे हवंव, यदि मेंह ओला फेर बनाथंव, त मेंह ए साबित करथंव कि मेंह एक कानून टोरइया अंव। 19काबरकि कानून के जरिये, मेंह कानून बर मर गेंव, ताकि मेंह परमेसर बर जीयंव। 20मेंह मसीह के संग कुरुस म चघाय जा चुके हवंव अऊ अब मेंह जीयत नइं अंव, पर मसीह ह मोर म जीयत हवय। ओ जिनगी जऊन ला मेंह देहें म जीयत हवंव, ओला मेंह परमेसर के बेटा म बिसवास के दुवारा जीयत हवंव, जऊन ह मोर ले मया करिस अऊ अपन-आप ला मोर बर दे दीस। 21मेंह परमेसर के अनुग्रह ला खारिज नइं करथंव, काबरकि कहूं मूसा के कानून के जरिये मनखे ह धरमी ठहिरतिस, त मसीह के मिरतू ह बेकार होतिस।