New Chhattisgarhi Translation (नवां नियम छत्तीसगढ़ी)

मत्ती 27:1-66

यहूदा ह अपन-आप ला फांसी लगा लेथे

(प्रेरितमन के काम 1:18-19)

1जब बिहनियां होईस, त जम्मो मुखिया पुरोहित अऊ मनखेमन के अगुवामन यीसू ला मार डारे के फैसला करिन। 2ओमन यीसू ला बांधिन अऊ ओला ले जाके राजपाल पीलातुस के हांथ म सऊंप दीन27:2 पीलातुस ह रोमी राजपाल रिहिस।

3यीसू के संग बिस‍वासघात करइया यहूदा ह जब देखिस कि यीसू ला दोसी ठहराय गे हवय, त ओह पछताईस अऊ ओह मुखिया पुरोहित अऊ अगुवामन ला चांदी के तीस सिक्‍का वापिस कर दीस, 4अऊ कहिस, “मेंह पाप करे हवंव काबरकि मेंह एक निरदोस मनखे ला मरवाय बर ओकर संग बिस‍वासघात करेंव।”

ओमन ह कहिन, “हमन ला एकर ले का मतलब! एला तें जान।”

5तब यहूदा ह ओ चांदी के सिक्‍कामन ला मंदिर म फटिक दीस अऊ उहां ले चले गीस अऊ जाके फांसी लगा लीस।

6मुखिया पुरोहितमन ओ सिक्‍कामन ला उठाईन अऊ कहिन, “ए पईसा ला खजाना म रखना कानून के मुताबिक सही नो हय, काबरकि एह लहू के कीमत अय।” 7एकरसेति ओमन ओ पईसा ले कुम्‍हार के खेत ला बिसोय के फैसला करिन ताकि ओ जगह ह परदेसीमन बर मसानघाट के रूप म काम आवय। 8एकरे कारन, ओ खेत ला आज तक ले लहू के खेत कहे जाथे। 9ए किसम ले यरमियाह अगमजानी के दुवारा कहे गय ए बचन ह पूरा होईस: “ओमन चांदी के तीस सिक्‍कामन ला ले लीन, जऊन ला इसरायली मनखेमन ओकर कीमत ठहराय रिहिन। 10अऊ ओमन ओ पईसा के उपयोग कुम्‍हार के खेत बिसोय म करिन जइसने परभू ह मोला हुकूम दे रिहिस।”27:10 जकरयाह 11:12-13; यिरमियाह 32:6-9

यीसू ह रोमन राजपाल पीलातुस के आघू म

(मरकुस 15:2-5; लूका 23:3-5; यूहन्ना 18:33-38)

11जब यीसू ह राजपाल के आघू म ठाढ़ होईस, त राजपाल ह ओकर ले पुछिस, “का तेंह यहूदीमन के राजा अस?”

यीसू ह ओला जबाब दीस, “हव जी, जइसने तेंह कहत हवस।”

12जब मुखिया पुरोहित अऊ अगुवामन यीसू ऊपर दोस लगाईन, त ओह कुछू जबाब नइं दीस। 13तब पीलातुस ह यीसू ला कहिस, “का तेंह नइं सुनत हवस कि ओमन तोर ऊपर कइसने दोस लगावत हवंय।” 14पर यीसू ह जबाब म एको सबद नइं कहिस। जेकर ले राजपाल ला बहुंत अचरज होईस।

15राजपाल के ए रीति रिहिस कि फसह तिहार के मऊका म, ओह एक झन कैदी ला छोंड़ देवय, जऊन ला मनखेमन चाहंय। 16ओ समय म बरब्‍बा नांव के एक बदनाम कैदी जेल म रिहिस। 17जब भीड़ ह जुरे रिहिस, त पीलातुस ह भीड़ के मनखेमन ले पुछिस, “तुमन कोन ला चाहत हव कि मेंह ओला तुम्‍हर बर छोंड़ देवंव – बरब्‍बा ला या यीसू ला, जऊन ला मसीह कहे जाथे?” 18काबरकि पीलातुस ह जानत रिहिस कि ओमन जलन के कारन यीसू ला ओकर हांथ म सऊंपे रिहिन।

19जब पीलातुस ह नियाय के आसन म बईठे रिहिस, त ओकर घरवाली ह ओकर करा ए संदेस पठोईस, “ओ धरमी मनखे संग कुछू झन कर, काबरकि मेंह आज सपना म ओकर कारन बहुंत दुःख उठाय हवंव।”

20पर मुखिया पुरोहित अऊ अगुवामन भीड़ के मनखेमन ला राजी कर लीन कि ओमन बरब्‍बा ला छोंड़े के अऊ यीसू ला मार डारे के मांग करंय।

21राजपाल ह ओमन ला फेर पुछिस, “ए दूनों म ले तुमन कोन ला चाहथव कि मेंह तुम्‍हर खातिर छोंड़ देवंव?”

ओमन कहिन, “बरब्‍बा ला।”

22पीलातुस ह ओमन ले पुछिस, “तब मेंह यीसू के का करंव, जऊन ला मसीह कहे जाथे।”

ओ जम्मो झन जबाब दीन, “एला कुरुस ऊपर चघाय जावय।”

23पीलातुस ह पुछिस, “काबर? ओह का अपराध करे हवय?” फेर ओमन अऊ चिचियाके कहिन, “एला कुरुस ऊपर चघाय जावय।”

24जब पीलातुस ह देखिस कि ओकर दुवारा कुछू नइं हो सकथे, पर हुल्‍लड़ होवत हवय, त ओह पानी लीस अऊ भीड़ के आघू म अपन हांथ ला धोके कहिस, “मेंह ए मनखे के मिरतू के दोसी नो हंव। एकर जिम्मेदार तुमन अव।”

25जम्मो मनखेमन जबाब दीन, “एकर मिरतू के दोस हमर अऊ हमर संतान ऊपर होवय।”

26तब पीलातुस ह ओमन खातिर बरब्‍बा ला छोंड़ दीस अऊ यीसू ला कोर्रा म पीटवाईस, अऊ ओला कुरुस ऊपर चघाय बर सैनिकमन के हांथ म सऊंप दीस।

सैनिकमन यीसू के हंसी उड़ाथें

(मरकुस 15:16-20; यूहन्ना 19:2-3)

27तब राजपाल के सैनिकमन यीसू ला राजपाल के महल म ले गीन अऊ सैनिकमन के पूरा दल ला यीसू करा संकेलिन। 28ओमन यीसू के कपड़ा ला उतारिन अऊ ओला लाल सिंदूरी रंग के चोगा पहिराईन, 29अऊ तब कांटा के एक मुकुट गुंथके ओकर मुड़ी ऊपर रखिन, अऊ ओकर जेवनी हांथ म एक ठन लउठी धरा दीन अऊ ओकर आघू म माड़ी टेकिन अऊ ए कहिके ओकर हंसी उड़ाईन, “हे यहूदीमन के राजा, तोला जोहार।” 30ओमन ओकर ऊपर थूकिन अऊ लउठी म ओकर मुड़ी ला मारिन। 31यीसू के हंसी उड़ाय के बाद, ओमन ओकर चोगा ला उतार लीन अऊ ओला ओकर खुद के कपड़ा पहिरा दीन। तब ओमन ओला कुरुस ऊपर चघाय बर ले गीन।

यीसू के कुरुस ऊपर चघाय जवई

(मरकुस 15:21-32; लूका 23:26-43; यूहन्ना 19:17-27)

32जब ओमन सहर ले बाहिर निकरत रिहिन, त ओमन ला कुरेन सहर के सिमोन नांव के एक झन मनखे मिलिस। ओमन ओकर ले जबरदस्‍ती कुरुस ला उठवाके ले गीन27:32 कुरेन ह आफ्रिका देस म एक सहर रिहिस।33ओमन “गुलगुता” नांव के जगह म आईन (गुलगुता के मतलब होथे – खोपड़ी के जगह)। 34उहां ओमन यीसू ला पित्त मिले अंगूर के मंद पीये बर दीन। यीसू ह ओला चखिस, पर ओला पीये बर नइं चाहिस। 35जब ओमन यीसू ला कुरुस ऊपर चघा लीन, त ओकर कपड़ा ला बांटा करे बर चिट्ठी डालिन अऊ चिट्ठी के मुताबिक कपड़ा ला बांट लीन। 36तब ओमन उहां बईठके ओकर पहरा देवन लगिन। 37अऊ ओकर मुड़ी ऊपर ओकर दोस पतर लिखके टांग दीन, जऊन म ए लिखाय रहय – “एह यहूदीमन के राजा यीसू अय।”27:37 यूहन्ना 19:19-22 38यीसू के संग दू झन डाकूमन घलो कुरुस ऊपर चघाय गे रिहिन, एक झन ओकर जेवनी कोति अऊ दूसर झन ओकर डेरी कोति। 39उहां ले अवइया-जवइयामन यीसू के ठट्ठा करंय अऊ अपन मुड़ी ला डोला-डोला के ए कहंय, 40“तेंह तो मंदिर ला गिराके ओला तीन दिन म बनवइया अस, अपन-आप ला बंचा ले। कहूं तेंह परमेसर के बेटा अस, त फेर कुरुस ऊपर ले उतर आ।”

41अइसनेच मुखिया पुरोहित, कानून के गुरू अऊ अगुवामन घलो ए कहिके ओकर ठट्ठा करत रिहिन, 42“एह आने मन ला बंचाईस, फेर एह अपन-आप ला नइं बंचा सकय। एह तो इसरायल के राजा अय। अब एह कुरुस ऊपर ले उतरके आवय, त हमन एकर ऊपर बिसवास करबो। 43एह परमेसर ऊपर भरोसा रखथे। यदि परमेसर एला चाहथे, त ओह एला छुड़ा ले, काबरकि एह कहे रिहिस, ‘मेंह परमेसर के बेटा अंव।’ ” 44अइसनेच ओ डाकूमन घलो जऊन मन ओकर संग कुरुस ऊपर चघाय गे रिहिन, ओकर ठट्ठा करिन।

यीसू के मिरतू

(मरकुस 15:33-41; लूका 23:44-49; यूहन्ना 19:28-30)

45ओ मंझनियां बारह बजे ले लेके तीन बजे तक जम्मो धरती ऊपर अंधियार छाय रिहिस। 46करीब तीन बजे यीसू ह जोर से नरियाके कहिस, “एली, एली, लमा सबकतनी?” – जेकर मतलब होथे, “हे मोर परमेसर, हे मोर परमेसर, तेंह मोला काबर तियाग देय?”

47जऊन मन उहां ठाढ़े रिहिन, ओम ले कुछू झन एला सुनके कहिन, “एह एलियाह ला बलावत हवय।”

48ओमन ले एक झन तुरते दऊड़के एक स्‍पंज ला लानिस, अऊ ओह ओला सिरका म बुड़ोईस अऊ एक ठन पातर लउठी म रखके यीसू ला पीये बर दीस। 49पर बाकि मनखेमन कहिन, “ओला रहन दे। आवव, हमन देखन, एलियाह ह एला बंचाय बर आथे कि नइं।”

50अऊ यीसू ह फेर जोर से गोहार पारिस अऊ अपन परान ला तियाग दीस।

51ओतकीच बेरा मंदिर के परदा ह ऊपर ले खाल्‍हे तक चीराके दू टुकड़ा हो गीस। धरती ह कांप उठिस अऊ चट्टानमन तड़क गीन। 52कबरमन उघर गीन अऊ कतको पबितर मनखे के मरे देहेंमन फेर जी उठिन। 53ओमन कबर म ले बाहिर निकरिन, अऊ यीसू के जी उठे के बाद, ओमन पबितर सहर म गीन अऊ कतको मनखेमन ला दिखिन।

54जब सूबेदार अऊ ओकर सैनिक जऊन मन यीसू के पहरा देवत रिहिन, भुइंडोल अऊ ओ जम्मो घटना ला देखिन, त अब्‍बड़ डर्रा गीन अऊ ओमन कहिन, “सही म एह परमेसर के बेटा रिहिस27:54 एक सूबेदार के अधीन एक सौ सैनिक रहंय।।”

55उहां कतको माईलोगन घलो रिहिन, जऊन मन दूरिहा ले यीसू ला देखत रिहिन। ओमन यीसू के सेवा करत गलील प्रदेस ले ओकर संगे-संग आय रिहिन। 56ओमन म मरियम मगदलिनी, याकूब अऊ यूसुफ के दाई मरियम अऊ जबदी के बेटामन के दाई रिहिन।

यीसू के दफनाय जवई

(मरकुस 15:42-47; लूका 23:50-56; यूहन्ना 19:38-42)

57जब संझा होईस, त अरमतिया सहर ले एक धनवान मनखे आईस। ओकर नांव यूसुफ रिहिस अऊ ओह खुदे यीसू के चेला रिहिस। 58ओह पीलातुस करा जाके यीसू के लास ला मांगिस अऊ पीलातुस ह यीसू के लास ला ओला सऊंप देय के हुकूम दीस। 59यूसुफ ह लास ला लीस अऊ ओला एक ठन साफ मलमल के कपड़ा म लपेटिस, 60अऊ ओला अपन खुद के नवां कबर म रखिस, जऊन ला ओह चट्टान ला काटके बनवाय रिहिस। तब ओह एक ठन बड़े पथरा ला कबर के मुंहाटी म टेका दीस अऊ उहां ले चले गीस। 61मरियम मगदलिनी अऊ दूसर मरियम उहां कबर के आघू म बईठे रिहिन।

कबर म पहरेदारी

62ओकर दूसर दिन, जऊन ह तियारी के दिन के बाद के दिन रिहिस, मुखिया पुरोहित अऊ फरीसी मन पीलातुस करा गीन27:62 बिसराम दिन के पहिली के दिन ला तियारी के दिन कहे जावय। 63अऊ कहिन, “महाराज, हमन ला सुरता हवय कि ओ धोखेबाज ह जब जीयत रिहिस, त कहे रिहिस, ‘तीन दिन के बाद मेंह फेर जी उठहूं।’ 64एकरसेति हुकूम दे कि तीसरा दिन तक ओ कबर के रखवारी करे जावय। अइसने झन होवय कि ओकर चेलामन आवंय अऊ ओकर लास ला चुरा के ले जावंय अऊ मनखेमन ला कहंय कि ओह मरे म ले जी उठे हवय। तब ए आखिरी धोखा ह पहिली ले घलो अऊ खराप होही।”

65पीलातुस ह ओमन ला कहिस, “तुम्‍हर करा पहरेदारमन हवंय। जावव, अऊ जइसने तुमन उचित समझथव, कबर के रखवारी के परबंध करव।” 66तब ओमन गीन अऊ कबर के पथरा ऊपर मुहर लगाईन अऊ उहां पहरेदार बईठाके ओमन कबर के रखवारी के परबंध करिन।

La Bible du Semeur

Matthieu 27:1-66

Jésus devant Pilate

(Mc 15.1 ; Lc 23.1 ; Jn 18.28)

1L’aube s’était levée. L’ensemble des chefs des prêtres et des responsables du peuple tinrent conseil contre Jésus pour le faire condamner à mort. 2Ils le firent lier et le conduisirent chez Pilate, le gouverneur, pour le remettre entre ses mains.

Le suicide de Judas

(voir Ac 1.18-19)

3En voyant que Jésus était condamné, Judas, qui l’avait trahi, fut pris de remords : il alla rapporter aux chefs des prêtres et aux responsables du peuple les trente pièces d’argent 4et leur dit : J’ai péché en livrant un innocent à la mort !

Mais ils lui répliquèrent : Que nous importe ? Cela te regarde !

5Judas jeta les pièces d’argent dans le Temple, partit, et alla se pendre.

6Les chefs des prêtres ramassèrent l’argent et déclarèrent : On n’a pas le droit de verser cette somme dans le trésor du Temple, car c’est le prix du sang27.6 Le prix du sang, c’est-à-dire le prix d’une vie humaine..

7Ils tinrent donc conseil et décidèrent d’acquérir, avec cet argent, le « Champ-du-Potier » et d’en faire un cimetière pour les étrangers. 8Voilà pourquoi ce terrain s’appelle encore de nos jours « le champ du sang ».

9Ainsi s’accomplit la parole du prophète Jérémie :

Ils ont pris les trente pièces d’argent, le prix auquel les descendants d’Israël l’ont estimé, 10et ils les ont données pour acheter le champ du potier, comme le Seigneur me l’avait ordonné27.10 Za 11.12-13. Voir Jr 18.2-3 ; 19.1-2 ; 32.6-15..

Jésus condamné à mort

(Mc 15.2-15 ; Lc 23.2-5, 13-25 ; Jn 18.29-40 ; 19.4-16)

11Jésus comparut devant le gouverneur qui l’interrogea.

– Es-tu le roi des Juifs ? lui demanda-t-il.

– Tu le dis toi-même, répondit Jésus.

12Mais ensuite, quand les chefs des prêtres et les responsables du peuple vinrent l’accuser, il ne répondit rien.

13Alors Pilate lui dit : Tu n’entends pas tout ce qu’ils disent contre toi ?

14Mais, au grand étonnement du gouverneur, Jésus ne répondit pas même sur un seul point.

15A chaque fête de la Pâque, le gouverneur avait l’habitude de relâcher un prisonnier, celui que la foule désignait. 16Or, à ce moment-là, il y avait sous les verrous, un prisonnier célèbre nommé Barabbas27.16 Barabbas : certains manuscrits ont Jésus Barabbas. De même qu’au v. 17..

17En voyant la foule rassemblée, Pilate lui demanda donc : Lequel de ces deux hommes voulez-vous que je vous relâche, Barabbas ou Jésus, qu’on appelle le Messie ?

18En effet, il s’était bien rendu compte que c’était par jalousie qu’on lui avait livré Jésus.

19Pendant qu’il siégeait au tribunal, sa femme lui fit parvenir un message disant : Ne te mêle pas de l’affaire de ce juste, car cette nuit, j’ai été fort tourmentée par des rêves à cause de lui.

20Cependant, les chefs des prêtres et les responsables du peuple persuadèrent la foule de réclamer la libération de Barabbas et l’exécution de Jésus.

21Le gouverneur prit la parole et redemanda à la foule : Lequel des deux voulez-vous que je vous relâche ?

– Barabbas ! crièrent-ils.

22– Mais alors, insista Pilate, que dois-je faire de Jésus, qu’on appelle le Messie27.22 Autre traduction : Christ. ?

Et tous répondirent : Crucifie-le !

23– Mais enfin, reprit Pilate, qu’a-t-il fait de mal ?

Eux, cependant, criaient de plus en plus fort : Crucifie-le !

24Quand Pilate vit qu’il n’aboutissait à rien, mais qu’au contraire, l’agitation de la foule augmentait, il prit de l’eau et, devant la foule, se lava les mains en disant : Je ne suis pas responsable de la mort de cet homme. Cela vous regarde.

25Et tout le peuple répondit : Que la responsabilité de sa mort retombe sur nous et sur nos enfants !

26Alors Pilate leur relâcha Barabbas. Quant à Jésus, après l’avoir fait battre à coups de fouet, il le livra pour qu’on le crucifie.

(Mc 15.16-20 ; Lc 23.11 ; Jn 19.2-3)

27Les soldats du gouverneur traînèrent Jésus vers l’intérieur du palais et rassemblèrent toute la cohorte autour de lui. 28Ils lui arrachèrent ses vêtements et le revêtirent d’un manteau écarlate. 29Ils lui posèrent sur la tête une couronne tressée de rameaux épineux ; dans sa main droite, ils placèrent un roseau en guise de sceptre. Ils s’agenouillèrent devant lui en disant sur un ton sarcastique : Salut, roi des Juifs !

30Ils crachaient sur lui et, prenant le roseau, ils le frappaient à la tête. 31Quand ils eurent fini de se moquer de lui, ils lui ôtèrent le manteau, lui remirent ses vêtements et l’emmenèrent pour le crucifier.

La mort de Jésus

(Mc 15.21-32 ; Lc 23.26-43 ; Jn 19.17-22)

32A la sortie de la ville, ils rencontrèrent un nommé Simon, originaire de Cyrène. Ils lui firent porter la croix de Jésus.

33Ils arrivèrent à un endroit nommé Golgotha (c’est-à-dire : « le lieu du crâne »). 34Là, ils donnèrent à boire à Jésus du vin mélangé avec du fiel27.34 Sorte d’anesthésique destiné à adoucir la douleur. Mais Jésus a voulu rester lucide jusqu’à la fin. ; mais quand il l’eut goûté, il refusa de le boire. 35Après l’avoir cloué sur la croix, les soldats se partagèrent ses vêtements en les tirant au sort. 36Puis ils s’assirent pour monter la garde.

37Ils avaient fixé au-dessus de la tête de Jésus un écriteau sur lequel était inscrit, comme motif de sa condamnation : « Celui-ci est Jésus, le roi des Juifs. » 38Deux brigands furent crucifiés en même temps que lui, l’un à sa droite, l’autre à sa gauche.

39Ceux qui passaient par là lui lançaient des insultes en secouant la tête, 40et criaient : Hé, toi qui démolis le Temple et qui le reconstruis en trois jours, sauve-toi toi-même. Si tu es le Fils de Dieu, descends de la croix !

41De même, les chefs des prêtres se moquaient de lui, avec les spécialistes de la Loi et les responsables du peuple, en disant : 42Dire qu’il a sauvé les autres, et qu’il est incapable de se sauver lui-même ! C’est ça le roi d’Israël ? Qu’il descende donc de la croix ; alors nous croirons en lui ! 43Il a mis sa confiance en Dieu. Eh bien, si Dieu trouve son plaisir en lui, qu’il le délivre27.43 Ps 22.9. ! N’a-t-il pas dit : « Je suis le Fils de Dieu » ?

44Les brigands crucifiés avec lui l’insultaient, eux aussi, de la même manière.

(Mc 15.33-41 ; Lc 23.44-49 ; Jn 19.25-30)

45A partir de midi, et jusqu’à trois heures de l’après-midi, le pays entier27.45 Autre traduction : sur toute la terre. fut plongé dans l’obscurité.

46Vers trois heures, Jésus cria d’une voix forte : Eli, Eli, lama sabachthani ? ce qui veut dire : Mon Dieu, mon Dieu, pourquoi m’as-tu abandonné27.46 Ps 22.2. ?

47En entendant ces paroles, quelques-uns de ceux qui étaient là disaient : Il appelle Elie !

48L’un d’entre eux courut aussitôt prendre une éponge, qu’il imbiba de vinaigre et piqua au bout d’un roseau. Il la présenta à Jésus pour qu’il boive, 49quand les autres lui dirent : Attends ! On va bien voir si Elie vient le délivrer.

50A ce moment, Jésus poussa de nouveau un grand cri et rendit l’esprit. 51Et voici qu’au même instant, le rideau du Temple se déchira en deux, de haut en bas ; la terre trembla, les rochers se fendirent. 52Des tombes s’ouvrirent et les corps de beaucoup d’hommes fidèles à Dieu qui étaient morts ressuscitèrent. 53Ils quittèrent leurs tombeaux et, après la résurrection de Jésus, ils entrèrent dans la ville sainte où beaucoup de personnes les virent.

54En voyant le tremblement de terre et tout ce qui se passait, l’officier romain et les soldats qui gardaient Jésus furent saisis d’épouvante et dirent : Cet homme était vraiment le Fils de Dieu27.54 Ou : un fils de Dieu ! !

55Il y avait aussi là plusieurs femmes qui regardaient de loin ; c’étaient celles qui avaient suivi Jésus depuis la Galilée27.55 Le ministère de Jésus avait commencé dans la province du nord du pays d’Israël, la Galilée., pour être à son service. 56Parmi elles, Marie de Magdala, Marie, la mère de Jacques et de Joseph et la mère des fils de Zébédée.

Jésus mis au tombeau

(Mc 15.42-47 ; Lc 23.50-56 ; Jn 19.38-42)

57Le soir venu, arriva un homme riche appelé Joseph, originaire de la ville d’Arimathée. Lui aussi était un disciple de Jésus. 58Il alla demander à Pilate le corps de Jésus. Alors Pilate donna l’ordre de le lui remettre. 59Joseph prit donc le corps, l’enroula dans un drap de lin pur 60et le déposa dans le tombeau tout neuf qu’il s’était fait tailler pour lui-même dans le roc. Puis il roula un grand bloc de pierre devant l’entrée du tombeau et s’en alla. 61Il y avait là Marie de Magdala et l’autre Marie, assises en face de la tombe.

62Le lendemain, le jour qui suivait la préparation du sabbat27.62 Le vendredi était appelé jour de la préparation (du sabbat) : les Juifs accomplissaient toutes les tâches qui leur éviteraient de travailler le jour du repos., les chefs des prêtres et des pharisiens se rendirent ensemble chez Pilate 63pour lui dire : Excellence, nous nous souvenons que cet imposteur a dit, pendant qu’il était encore en vie : « Après trois jours, je ressusciterai. » 64Fais donc surveiller étroitement la tombe jusqu’à ce troisième jour : il faut à tout prix éviter que ses disciples viennent dérober le corps pour dire ensuite au peuple qu’il est ressuscité. Cette dernière supercherie serait encore pire que la première.

65Pilate leur déclara : D’accord ! Prenez un corps de garde27.65 Autre traduction : vous avez une garde. et assurez la protection de ce tombeau à votre guise.

66Ils se rendirent donc au tombeau et le firent surveiller après avoir apposé les scellés sur la pierre en présence de la garde.