New Chhattisgarhi Translation (नवां नियम छत्तीसगढ़ी)

मत्ती 16:1-28

एक चिन्‍हां देखाय के मांग

(मरकुस 8:11-13; लूका 12:54-56)

1फरीसी अऊ सदूकी मन यीसू करा आईन अऊ ओला परखे खातिर ओकर ले पुछिन, “हमन ला स्‍वरग ले कोनो चिन्‍हां देखा।”

2यीसू ह ओमन ला जबाब दीस, “जब संझा होथे, त तुमन कहिथव कि मौसम ह साफ रहिही, काबरकि अकास म लाली हवय, 3अऊ बिहनियां के बखत तुमन कहिथव कि आज गर्रा आही, काबरकि अकास म लाली हवय अऊ बादर छाय हवय। तुमन ह अकास के चिन्‍हां ला देखके, मौसम के बारे म बता देथव, पर तुमन समय के चिन्‍हां के बारे नइं बता सकव। 4ए दुस्‍ट अऊ बेभिचारी पीढ़ी के मनखेमन अचरज के चिन्‍हां खोजथें, पर योना अगमजानी के चिन्‍हां के छोंड़, एमन ला अऊ कुछू चिन्‍हां नइं दिये जावय।”16:4 मत्ती 12:39-40 तब यीसू ह ओमन ला छोंड़के चल दीस।

फरीसी अऊ सदूकी मन के खमीर

(मरकुस 8:14-21)

5जब ओमन झील के ओ पार गीन, त चेलामन अपन संग रोटी लाने बर भुला गे रिहिन। 6यीसू ह ओमन ला कहिस, “फरीसी अऊ सदूकी मन के खमीर ले सचेत रहव।”

7ओमन आपस म ए बात ला बिचार करिन अऊ कहिन, “हमन रोटी नइं लाने हवन, एकरसेति ओह अइसने कहत हवय।”

8ओमन के बिचार ला जानके, यीसू ह ओमन ला कहिस, “हे अल्‍प बिसवासीमन हो! तुमन ए काबर गोठियावत हव कि तुम्‍हर करा रोटी नइं ए? 9का तुमन अभी तक ले नइं समझेव? पांच हजार मनखेमन बर पांच ठन रोटी के बात, का तुमन सुरता नइं करत हव, अऊ कतेक ठन टुकना भरके तुमन संकेले रहेव? 10या फेर ओ चार हजार मनखेमन बर सात ठन रोटी के बात, का तुमन ला सुरता नइं ए, अऊ कतेक ठन टुकना भरके तुमन संकेले रहेव? 11तुमन ए काबर नइं समझव कि मेंह तुमन ला रोटी के बारे म नइं कहत रहेंव? पर तुमन ला फरीसी अऊ सदूकी मन के खमीर ले सचेत रहे बर कहत रहेंव।”

12तब ओमन समझिन कि यीसू ह ओमन ला रोटी के खमीर के बारे म नइं गोठियावत रिहिस, पर ओह ओमन ला फरीसी अऊ सदूकी मन के सिकछा ले सचेत रहे बर कहत रिहिस।

पतरस ह यीसू ला मसीह मान लेथे

(मरकुस 8:27-30; लूका 9:18-21)

13जब यीसू ह कैसरिया-फिलिप्‍पी के सीमना म आईस, त ओह अपन चेलामन ले पुछिस, “मनखेमन मनखे के बेटा ला कोन ए, कहिथें?”

14ओमन ह कहिन, “कुछू मनखेमन कहिथें कि ओह यूहन्ना बतिसमा देवइया अय; कुछू मन एलियाह अय, कहिथें; अऊ कुछू मनखेमन कहिथें कि ओह यरमियाह या अगमजानीमन ले एक झन अय।”

15यीसू ह ओमन ले पुछिस, “पर तुमन मोला कोन ए, कहत हव?”

16सिमोन पतरस जबाब दीस, “तेंह जीयत परमेसर के बेटा – मसीह अस।”

17यीसू ह ओला कहिस, “सिमोन, योना के बेटा! धइन अस तेंह, काबरकि ए बात तोला कोनो मनखे ह नइं बताय हवय, पर मोर ददा जऊन ह स्‍वरग म हवय, ए बात तोर ऊपर उजागर करे हवय। 18अऊ मेंह तोला कहत हंव कि तेंह पतरस अस, अऊ ए चट्टान ऊपर मेंह अपन कलीसिया बनाहूं, अऊ पाताल-लोक के सक्तिमन एकर ऊपर जय नइं पा सकंय16:18 पतरस के मतलब “चट्टान” होथे।19मेंह तोला स्‍वरग राज के चाबीमन ला दूहूं। जऊन कुछू तेंह धरती ऊपर बांधबे, ओह स्‍वरग म बंधाही, अऊ जऊन कुछू तेंह धरती ऊपर खोलबे, ओह स्‍वरग म खुलही।”16:19 मत्ती 18:15-20; 1 कुरिन्थ 5:1-5; प्रेरितमन 15:22-29 20तब यीसू ह अपन चेलामन ला ए चेतउनी दीस, “तुमन कोनो ला, ए झन बतावव कि मेंह मसीह अंव।”

यीसू ह अपन मिरतू के बारे म अगमबानी करथे

(मरकुस 8:31-33; लूका 9:22)

21ओ समय ले यीसू ह अपन चेलामन ला ए बताय लगिस, “एह जरूरी अय कि मेंह यरूसलेम जावंव अऊ यहूदीमन के अगुवा, मुखिया पुरोहित अऊ कानून के गुरू मन के हांथ म ले बहुंते दुःख भोगंव; अऊ मार डारे जावंव; अऊ तीसरा दिन जी उठंव।”

22पतरस ह यीसू ला अलग ले गीस अऊ ओला ए कहिके डांटे लगिस, “परमेसर ह अइसने झन करय, परभू! तोर संग ए बात कभू झन होवय।”

23यीसू ह पतरस कोति मुड़ के कहिस, “मोर नजर ले दूर हट, सैतान! तेंह मोर रसता म एक बाधा अस। तोर मन म परमेसर के बात नइं, पर मनखेमन के बात हवय।”

24तब यीसू ह अपन चेलामन ला कहिस, “यदि कोनो मोर चेला बने चाहत हवय, त ओह अपन-आप के इनकार करय, अऊ अपन कुरुस ला उठाके, मोर पाछू हो लेवय। 25काबरकि जऊन ह अपन परान ला बचाय चाहथे, ओह ओला गंवाही; पर जऊन ह मोर खातिर अपन परान ला गंवाथे, ओह ओला बचाही। 26यदि मनखे ह जम्मो संसार ला पा जाथे, पर अपन परान ला गंवा देथे, त ओला का फायदा? या मनखे ह अपन परान के बदले म का दे सकथे? 27काबरकि मनखे के बेटा ह अपन स्वरगदूतमन के संग अपन ददा के महिमा म अवइया हवय, अऊ तब ओह हर एक मनखे ला ओकर काम के मुताबिक इनाम दिही। 28मेंह तुमन ला सच कहत हंव कि जऊन मन इहां ठाढ़े हवंय, ओमन म कुछू झन अइसने हवंय कि ओमन तब तक नइं मरंय, जब तक कि ओमन मनखे के बेटा ला ओकर राज म आवत नइं देख लिहीं।”

La Bible du Semeur

Matthieu 16:1-28

Jésus et les chefs religieux juifs

(Mc 8.11-13 ; Lc 12.54-56)

1Des pharisiens et des sadducéens abordèrent Jésus pour lui tendre un piège. Ils lui demandèrent de leur montrer un signe miraculeux venant du ciel.

2Il leur répondit : [Au crépuscule, vous dites bien : « Demain, il fera beau, car le ciel est rouge. » 3Ou bien, à l’aurore : « Aujourd’hui, on aura de l’orage, car le ciel est rouge sombre. » Ainsi, vous savez reconnaître ce qu’indique l’aspect du ciel ; mais vous êtes incapables de reconnaître les signes de notre temps16.3 Les versets 2 et 3 sont absents de plusieurs manuscrits..] 4Ces gens de notre temps qui sont mauvais et infidèles à Dieu réclament un signe miraculeux ! Un signe … il ne leur en sera pas accordé d’autre que celui de Jonas.

Là-dessus, il les quitta et partit de là.

(Mc 8.14-21)

5En passant de l’autre côté du lac, les disciples avaient oublié d’emporter du pain. 6Jésus leur dit : Faites bien attention : gardez-vous du levain des pharisiens et des sadducéens !

7Les disciples discutaient entre eux : Il dit cela parce que nous n’avons pas pris de pain !

8Jésus, sachant ce qui se passait, leur dit : Pourquoi discutez-vous entre vous parce que vous n’avez pas de pain ? Ah, votre foi est bien petite ! 9Vous n’avez donc pas encore compris ? Ne vous souvenez-vous pas des cinq pains distribués aux cinq mille hommes et du nombre de paniers que vous avez remplis avec les restes ? 10Et des sept pains distribués aux quatre mille hommes et du nombre de corbeilles que vous avez emportées ? 11Comment se fait-il que vous ne compreniez pas que je ne parlais pas de pain quand je vous disais : Gardez-vous du levain des pharisiens et des sadducéens !

12Alors ils comprirent qu’il leur avait dit de se garder, non pas du levain que l’on met dans le pain, mais de l’enseignement des pharisiens et des sadducéens.

Qui est vraiment Jésus ?

(Mc 8.27-30 ; Lc 9.18-21)

13Jésus se rendit dans la région de Césarée de Philippe. Il interrogea ses disciples : Que disent les gens au sujet du Fils de l’homme ? Qui est-il d’après eux ?

14Ils répondirent : Pour les uns, c’est Jean-Baptiste ; pour d’autres, Elie ; pour d’autres encore, Jérémie ou un autre prophète.

15– Et vous, leur demanda-t-il, qui dites-vous que je suis ?

16Simon Pierre lui répondit : Tu es le Messie, le Fils du Dieu vivant.

17Jésus lui dit alors : Tu es heureux, Simon, fils de Jonas, car ce n’est pas de toi-même que tu as trouvé cela. C’est mon Père céleste qui te l’a révélé. 18Et moi, je te déclare : Tu es Pierre, et sur cette pierre je bâtirai mon Eglise, contre laquelle la mort elle-même ne pourra rien. 19Je te donnerai les clés du royaume des cieux : tout ce que tu interdiras sur la terre sera interdit aux yeux de Dieu et tout ce que tu autoriseras sur la terre sera autorisé aux yeux de Dieu16.19 Autre traduction : tous ceux que tu excluras sur la terre seront exclus aux yeux de Dieu et tous ceux que tu accueilleras sur la terre seront accueillis aux yeux de Dieu (voir 18.18)..

20Puis Jésus interdit à ses disciples de dire à qui que ce soit qu’il était le Messie.

Comment suivre Jésus

(Mc 8.31 à 9.1 ; Lc 9.22-27)

21A partir de ce moment, Jésus commença à exposer à ses disciples qu’il devait se rendre à Jérusalem, y subir de cruelles souffrances de la part des responsables du peuple, des chefs des prêtres et des spécialistes de la Loi, être mis à mort et ressusciter le troisième jour.

22Alors Pierre le prit à part et se mit à lui faire des reproches : Que Dieu t’en préserve, Seigneur ! Cela ne t’arrivera pas !

23Mais Jésus, se retournant, lui dit : Arrière, « Satan » ! Eloigne-toi de moi ! Tu es pour moi un obstacle, car tes pensées ne sont pas celles de Dieu ; ce sont des pensées tout humaines.

24Puis, s’adressant à ses disciples, Jésus dit : Si quelqu’un veut marcher à ma suite, qu’il renonce à lui-même, qu’il se charge de sa croix et qu’il me suive. 25Car celui qui est préoccupé de sauver sa vie la perdra ; mais celui qui perdra sa vie à cause de moi, la retrouvera. 26Si un homme parvient à posséder le monde entier, à quoi cela lui sert-il s’il perd sa vie ? Et que peut-on donner pour racheter sa vie ?

27Le Fils de l’homme viendra dans la gloire de son Père, avec ses anges, et alors il donnera à chacun ce que lui auront valu ses actes. 28Vraiment, je vous l’assure, plusieurs de ceux qui sont ici ne mourront pas avant d’avoir vu le Fils de l’homme venir comme Roi.