Ketab El Hayat

التكوين 29:1-35

رحلة يعقوب

1وَتَابَعَ يَعْقُوبُ رِحْلَتَهُ حَتَّى وَصَلَ أَرْضَ حَارَانَ. 2وَتَطَلَّعَ حَوْلَهُ فَشَاهَدَ بِئْراً فِي الْحَقْلِ، تَرْبِضُ عِنْدَهَا ثَلاثَةُ قُطْعَانِ غَنَمٍ، لأَنَّهُمْ كَانُوا يَسْقُونَ الْقُطْعَانَ مِنْ تِلْكَ الْبِئْرِ. وَكَانَ الْحَجَرُ الَّذِي عَلَى فَمِ الْبِئْرِ كَبِيراً، 3فَكَانَ رُعَاةُ جَمِيعِ الْقُطْعَانِ يَجْتَمِعُونَ هُنَاكَ، وَيُدَحْرِجُونَ الْحَجَرَ عَنْ فَمِ الْبِئْرِ وَيَسْقُونَ الْغَنَمَ. ثُمَّ يَرُدُّونَ الْحَجَرَ إِلَى مَوْضِعِهِ عَلَى فَمِ الْبِئْرِ. 4فَقَالَ لَهُمْ يَعْقُوبُ: «يَا إِخْوَتِي مِنْ أَيْنَ أَنْتُمْ؟» فَأَجَابُوا: «نَحْنُ مِنْ حَارَانَ». 5فَسَأَلَهُمْ: «أَتَعْرِفُونَ لابَانَ بْنَ نَاحُورَ؟» فَأَجَابُوا: «نَعْرِفُهُ». 6فَقَالَ لَهُمْ: «أَهُوَ بِخَيْرٍ؟». فَأَجَابُوهُ: «هُوَ بِخَيْرٍ، وَهَا هِيَ رَاحِيلُ ابْنَتُهُ مُقْبِلَةٌ مَعَ الْغَنَمِ». 7فَقَالَ لَهُمْ: «هُوَذَا النَّهَارُ مَازَالَ طَوِيلاً، وَلَيْسَ هَذَا أَوَانَ اجْتِمَاعِ الْمَوَاشِي، فَاسْقُوا الْغَنَمَ وَامْضُوا بِها إلَى الْمَرَاعِي». 8فَقَالُوا: «لا يُمْكِنُنَا ذَلِكَ إِلّا بَعْدَ أَنْ تَجْتَمِعَ جَمِيعُ الْقُطْعَانِ وَرُعَاتُهَا فَيُدَحْرِجُوا الْحَجَرَ عَنْ فَمِ الْبِئْرِ، فَنَسْقِي الْغَنَمَ».

لقاء يعقوب براحيل

9وَفِيمَا هُوَ يُكَلِّمُهُمْ أَقْبَلَتْ رَاحِيلُ مَعَ غَنَمِ أَبِيهَا لأَنَّهَا كَانَتْ رَاعِيَةً أَيْضاً. 10وَعِنْدَمَا رَآهَا يَعْقُوبُ، تَقَدَّمَ وَدَحْرَجَ الْحَجَرَ عَنْ فَمِ الْبِئْرِ وَسَقَى غَنَمَ خَالِهِ لابَانَ. 11وَقَبَّلَ يَعْقُوبُ رَاحِيلَ وَأَجْهَشَ بِالْبُكَاءِ، 12ثُمَّ أَخْبَرَهَا أَنَّهُ قَرِيبُ وَالِدِهَا وَأَنَّهُ ابْنُ رِفْقَةَ. فَرَكَضَتْ وَأَخْبَرَتْ أَبَاهَا. 13فَعِنْدَمَا سَمِعَ لابَانُ بِخَبَرِ ابْنِ أُخْتِهِ أَسْرَعَ لِلِقَائِهِ وَعَانَقَهُ وَقَبَّلَهُ وَأَحْضَرَهُ إِلَى مَنْزِلِهِ. فَقَصَّ يَعْقُوبُ عَلَى لابَانَ جَمِيعَ هَذِهِ الأُمُورِ. 14فَقَالَ لَهُ لابَانُ: «حَقّاً إِنَّكَ عَظْمِي وَلَحْمِي». وَأَقَامَ عِنْدَهُ نَحْوَ شَهْرٍ مِنَ الزَّمَانِ.

زواج يعقوب من ليئة وراحيل

15وَقَالَ لابَانُ لِيَعْقُوبَ: «هَلْ لأَنَّكَ قَرِيبِي تَخْدُمُنِي مَجَّاناً؟ أَخْبِرْنِي مَا أُجْرَتُكَ؟» 16وَكَانَ لِلابَانَ ابْنَتَانِ، اسْمُ الْكُبْرَى لَيْئَةُ وَاسْمُ الصُّغْرَى رَاحِيلُ، 17وَكَانَتْ لَيْئَةُ ضَعِيفَةَ الْبَصَرِ، وَأَمَّا رَاحِيلُ فَكَانَتْ جَمِيلَةَ الصُّورَةِ وَحَسَنَةَ الْمَنْظَرِ. 18فَأَحَبَّ يَعْقُوبُ رَاحِيلَ. وَأَجَابَ يَعْقُوبُ خَالَهُ: «أَخْدِمُكَ سَبْعَ سِنِينَ لِقَاءَ زَوَاجِي بِرَاحِيلَ ابْنَتِكَ الصُّغْرَى». 19فَقَالَ لابَانُ: «أَنْ أُزَوِّجَهَا مِنْكَ خَيْرٌ مِنْ أَنْ أزَوِّجَهَا مِنْ رَجُلٍ آخَرَ، فَامْكُثْ عِنْدِي». 20فَخَدَمَ يَعْقُوبُ سَبْعَ سَنَوَاتٍ لِيَتَزَوَّجَ مِنْ رَاحِيلَ بَدَتْ فِي نَظَرِهِ كَأَيَّامٍ قَلِيلَةٍ، لِفَرْطِ مَحَبَّتِهِ لَهَا.

21ثُمَّ قَالَ يَعْقُوبُ لِلابَانَ: «أَعْطِنِي زَوْجَتِي لأَنَّ خِدْمَتِي قَدْ كَمُلَتْ فَأَدْخُلَ عَلَيْهَا». 22فَجَمَعَ لابَانُ سَائِرَ أَهْلِ النَّاحِيَةِ وَأَقَامَ لَهُمْ مَأْدُبَةً. 23وَعِنْدَمَا حَلَّ الْمَسَاءُ حَمَلَ ابْنَتَهُ لَيْئَةَ وَزَفَّهَا إِلَيْهِ فَدَخَلَ عَلَيْهَا 24وَوَهَبَ لابَانُ زِلْفَةَ جَارِيَتَهُ لِتَكُونَ جَارِيَةً لابْنَتِهِ لَيْئَةَ. 25وَفِي الصَّبَاحِ اكْتَشَفَ يَعْقُوبُ أَنَّهُ تَزَوَّجَ بِلَيْئَةَ، فَقَالَ لِلابَانَ: «مَاذَا فَعَلْتَ بِي؟ أَلَمْ أَخْدِمْكَ سَبْعَ سَنَوَاتٍ لِقَاءَ زَوَاجِي مِنْ رَاحِيلَ؟ فَلِمَاذَا خَدَعْتَنِي؟». 26فَأَجَابَهُ لابَانُ: «لَيْسَ مِنْ عَادَةِ بِلادِنَا أَنْ نُزَوِّجَ الصَّغِيرَةَ قَبْلَ الْبِكْرِ. 27أَكْمِلْ أُسْبُوعَ لَيْئَةَ ثُمَّ نُزَوِّجُكَ مِنْ رَاحِيلَ، لِقَاءَ خِدْمَتِكَ لِي سَبْعَ سِنِينَ أُخَرَ». 28فَوَافَقَ يَعْقُوبُ، وَأَكْمَلَ أُسْبُوعَ لَيْئَةَ، فَأَعْطَاهُ لابَانُ رَاحِيلَ ابْنَتَهُ زَوْجَةً أَيْضاً. 29وَوَهَبَ لابَانُ بِلْهَةَ جَارِيَتَهُ لِتَكُونَ جَارِيَةً لابْنَتِهِ رَاحِيلَ. 30فَدَخَلَ يَعْقُوبُ عَلَى رَاحِيلَ أَيْضاً، وَأَحَبَّ رَاحِيلَ أَكْثَرَ مِنْ لَيْئَةَ. وَخَدَمَ خَالَهُ سَبْعَ سِنِينَ أُخَرَ.

أبناء يعقوب

31وَعِنْدَمَا رَأَى الرَّبُّ أَنَّ لَيْئَةَ مَكْرُوهَةٌ جَعَلَهَا مُنْجِبَةً، أَمَّا رَاحِيلُ فَكَانَتْ عَاقِراً. 32فَحَمَلَتْ لَيْئَةُ وَأَنْجَبَتِ ابْناً دَعَتْهُ رَأُوبَيْنَ (وَمَعْنَاهُ: هُوَذَا ابْنٌ) لأَنَّهَا قَالَتْ: «حَقّاً قَدْ نَظَرَ الرَّبُّ إِلَى مَذَلَّتِي، فَالآنَ يُحِبُّنِي زَوْجِي». 33وَحَمَلَتْ مَرَّةً أُخْرَى وَأَنْجَبَتِ ابْناً، فَقَالَتْ: «لأَنَّ الرَّبَّ سَمِعَ أَنَّنِي كُنْتُ مَكْرُوهَةً رَزَقَنِي هَذَا الابْنَ أَيْضاً». فَدَعَتْهُ شِمْعُونَ (وَمَعْنَاهُ: سَمِيعٌ) 34ثُمَّ حَمَلَتْ مَرَّةً ثَالِثَةً وَأَنْجَبَتِ ابْناً فَقَالَتْ: «الآنَ فِي هَذِهِ الْمَرَّةِ يَتَّحِدُ بِي زَوْجِي، لأَنَّنِي أَنْجَبْتُ لَهُ ثَلاثَةَ بَنِينَ». لِذَلِكَ دُعِيَ اسْمُهُ لاوِي (وَمَعْنَاهُ: مُتَّحِدٌ) 35وَحَبِلَتْ مَرَّةً رَابِعَةً وَأَنْجَبَتِ ابْناً فَقَالَتْ: «فِي هَذِهِ الْمَرَّةِ أَحْمَدُ الرَّبَّ». لِذَلِكَ دَعَتْهُ يَهُوذَا (وَمَعْنَاهُ: حَمْدٌ). ثُمَّ تَوَقَّفَتْ عَنِ الْوِلادَةِ.

Hindi Contemporary Version

उत्पत्ति 29:1-35

याकोब की राहेल से भेंट

1याकोब अपनी यात्रा में आगे बढ़ते गए और पूर्वी देश में जा पहुंचे. 2तब उन्हें मैदान में एक कुंआ और भेड़-बकरियों के तीन झुंड बैठे नज़र आये और उन्होंने देखा कि जिस कुएं से भेड़-बकरियों को पानी पिलाते थे उस कुएं पर बड़ा पत्थर रखा हुआ था. 3जब भेड़-बकरियां एक साथ इकट्ठे हो जाती तब कुएं से पत्थर हटाकर भेड़-बकरियों को पानी पिलाया जाता था, फिर पत्थर कुएं पर वापस लुढ़का दिया जाता था.

4याकोब ने चरवाहों से पूछा, “मेरे भाइयो, आप कहां से आए हैं?”

उन्होंने कहा, “हम हारान के हैं.”

5याकोब ने पूछा, “क्या आप नाहोर के पुत्र लाबान को जानते हैं?”

उन्होंने कहा, “हां, हम जानते हैं.”

6फिर याकोब ने पूछा, “क्या वे ठीक हैं?”

उन्होंने कहा, “वे ठीक हैं और उनकी बेटी राहेल अपनी भेड़ों के साथ यहां आ रही है.”

7याकोब ने कहा, “देखो, अभी तो शाम नहीं हुई फिर इतनी जल्दी भेड़-बकरियों को क्यों इकट्ठा कर रहे हो, अभी उन्हें पानी पिलाकर चरने दो.”

8लेकिन उन्होंने कहा, “नहीं, सब भेड़-बकरियां एक साथ आने पर ही कुएं से पत्थर हटाकर भेड़-बकरियों को जल पिलाया जाता है.”

9जब वे बात कर रहे थे, राहेल अपने पिता की भेड़ें लेकर वहां आ गई, क्योंकि वह पशु चराया करती थी. 10जब याकोब ने अपने माता के भाई लाबान की पुत्री तथा भेड़-बकरी को देखा, उन्होंने जाकर कुएं के मुख से पत्थर हटाया और भेड़-बकरियों को पानी पिलाने लगे. 11तब याकोब ने राहेल को चुंबन दिया और रोने लगे. 12याकोब ने राहेल को बताया, कि वह उसके पिता के संबंधी हैं, और रेबेकाह के पुत्र हैं. राहेल दौड़ती हुई अपने पिता को यह बताने गई.

13जब लाबान ने अपनी बहन के पुत्र याकोब के बारे में सुना, वह भी दौड़कर उनसे मिलने आये. उन्होंने याकोब को चुंबन दिया और उन्हें अपने घर पर लाए. याकोब ने लाबान को अपने बारे में बताया. 14लाबान ने याकोब से कहा, “निःसंदेह तुम मेरी ही हड्डी एवं मांस हो.”

याकोब वहां एक महीने रुके. 15तब लाबान ने याकोब से कहा, “इसलिये कि तुम मेरे संबंधी हो, यह अच्छा नहीं, कि मेरे लिए तुम बिना दाम के काम करो इसलिये तुम दाम लेकर काम करना?”

16लाबान की दो पुत्रियां थी. बड़ी का नाम लियाह तथा छोटी का नाम राहेल था. 17लियाह की आंखें धुंधली थी पर राहेल सुंदर थी. 18याकोब राहेल को चाहने लगा, याकोब ने लाबान से कहा, “आपकी छोटी बेटी राहेल को पाने के लिए मैं सात वर्ष आपकी सेवा करने को तैयार हूं.”

19लाबान ने कहा, “ठीक हैं, तुम यहीं हमारे साथ रहो.” 20इसलिये याकोब ने राहेल को पाने के लिए सात वर्ष सेवा करी. लेकिन उसे यह समय बहुत कम लगा क्योंकि राहेल से बहुत प्रेम करता था.

लाबान का धोखा

21फिर याकोब ने लाबान से कहा, “सात वर्ष हो गये अब आपकी बेटी राहेल मुझे दीजिए ताकि मेरी शादी हो जाये.”

22लाबान ने अपने समाज के लोगों को बुलाकर सबको खाना खिलाया. 23शाम को उसने अपनी बेटी लियाह को याकोब को सौंप दी और याकोब ने उसके साथ शादी करी. 24लाबान ने अपनी दासी ज़िलपाह को भी लियाह को उसकी दासी होने के लिए दिया.

25जब याकोब को मालूम पड़ा कि वह तो लियाह थी! याकोब ने लाबान से पूछा, “यह क्या किया आपने मेरे साथ? मैं आपकी सेवा राहेल के लिए कर रहा था? फिर आपने मेरे साथ ऐसा धोखा क्यों किया?”

26लाबान ने कहा, “हमारे समाज में बड़ी को छोड़ पहले छोटी की शादी नहीं कर सकते. 27विवाह के उत्सव को पूरे सप्ताह मनाते रहो और मैं राहेल को भी तुम्हें विवाह के लिए दूंगा; परंतु तुम्हें और सात वर्ष तक मेरी सेवा करनी पड़ेगी.”

28इसलिये याकोब ने ऐसा ही किया. और समारोह का वह सप्ताह पूरा किया, तब लाबान ने याकोब को राहेल पत्नी स्वरूप सौंप दी. 29लाबान ने अपनी दासी बिलहाह को भी राहेल की दासी होने के लिए उसे सौंप दिया. 30याकोब राहेल के पास गया और उसे राहेल लियाह से अधिक प्रिय थी. और उसने लाबान के लिए और सात साल सेवा की.

31जब याहवेह ने देखा कि लियाह को प्यार नहीं मिल रहा याहवेह ने लियाह को गर्भ से आशीषित किया और राहेल को बांझ कर दिया. 32लियाह गर्भवती हुई और उसने एक बेटे को जन्म दिया और उसका नाम रियूबेन यह कहकर रखा कि “याहवेह ने मेरी दुख को देखा, और अब मेरे पति मुझसे प्रेम ज़रूर करेंगे.”

33लियाह के एक और पुत्र उत्पन्न हुआ. उसने कहां, “क्योंकि याहवेह ने यह सुन लिया कि मैं प्रिय नहीं हूं और मुझे यह एक और पुत्र दिया.” उसने उसका नाम शिमओन रखा.

34लियाह फिर से गर्भवती हुई और जब उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ तब उसने कहां, “अब मेरे पति मुझसे जुड़ जायेंगे क्योंकि मैनें उनके तीन पुत्रों को जन्म दिया है.” इसलिये लियाह ने तीसरे बेटे का नाम लेवी रखा.

35उसने एक और बेटे को जन्म दिया और कहा, “अब मैं याहवेह की स्तुति करूंगी,” इसलिये उसने उस बेटे का नाम यहूदाह रखा. उसके बाद लियाह के बच्चे होना बंद हो गया.