New Amharic Standard Version

ማቴዎስ 27:1-66

ይሁዳ ራሱን ሰቀለ

1ጠዋት በማለዳ ላይ፣ የካህናት አለቆችና የሕዝብ ሽማግሌዎች ሁሉ ኢየሱስ ስለሚገደልበት ሁኔታ ተመካከሩ፤ 2ካሰሩትም በኋላ ወስደው ለገዥው ለጲላጦስ አሳልፈው ሰጡት።

3አሳልፎ የሰጠው ይሁዳም ኢየሱስ እንደ ተፈረደበት ባየ ጊዜ ተጸጸተ፤ የወሰደውን ሠላሳ ጥሬ ብር ለካህናት አለቆችና ለሕዝቡ ሽማግሌዎች መልሶ በመስጠት፣ 4“ንጹሕ ሰው አሳልፌ በመስጠቴ በድያለሁ” አለ።

እነርሱም፣ “ታዲያ እኛ ምን አገባን፤ የራስህ ጕዳይ ነው!” አሉት።

5ስለዚህ ይሁዳ ብሩን በቤተ መቅደስ ውስጥ ወርውሮ ወጣ፤ ሄዶም ራሱን ሰቅሎ ሞተ።

6የካህናት አለቆች ብሩን አንሥተው፣ “የደም ዋጋ ስለ ሆነ ወደ መባ ልንጨምረው አይፈቀድም” አሉ፤ 7ተመካክረውም ለእንግዶች የመቃብር ስፍራ እንዲሆን በገንዘቡ የሸክላ ሠሪውን ቦታ ገዙበት። 8ስለዚህም ያ ቦታ እስከ ዛሬ ድረስ “የደም መሬት” ተብሎ ይጠራል። 9በዚህም በነቢዩ ኤርምያስ እንዲህ ተብሎ የተነገረው ተፈጸመ፤ “ለእርሱ ዋጋ ይሆን ዘንድ የእስራኤል ልጆች የገመቱትን ሠላሳ ጥሬ ብር ተቀበሉ፤ 10እግዚአብሔርም ባዘዘኝ መሠረት ለሸክላ ሠሪው ቦታ ከፈሉ።”

ኢየሱስ በጲላጦስ ፊት

27፥11-26 ተጓ ምብ – ማር 15፥2-15፤ ሉቃ 23፥2፡3፡18-25፤ ዮሐ 18፥29–19፥16

11በዚህ ጊዜ ኢየሱስ አገረ ገዥው ፊት ቀረበ፤ አገረ ገዥውም፣ “አንተ የአይሁድ ንጉሥ ነህን?” በማለት ጠየቀው።

ኢየሱስም፣ “አንተው እንዳልኸው ነው” ሲል መለሰለት።

12የካህናት አለቆችና ሽማግሌዎች ሲከሱት ግን ምንም መልስ አልሰጠም። 13በዚህ ጊዜ ጲላጦስ፣ “ስንት ነገር አቅርበው እንደሚከሱህ አትሰማምን?” አለው። 14እርሱ ግን አገረ ገዥው እስኪገረም ድረስ ለቀረበበት ክስ አንዲት ቃል እንኳ አልመለሰም።

15አገረ ገዥው ሕዝቡ በበዓሉ እንዲፈታላቸው የሚጠይቁትን አንድ እስረኛ የመፍታት ልማድ ነበረው። 16በዚያን ጊዜ በዐመፅ የታወቀ በርባን የሚባል እስረኛ ነበር። 17ሕዝቡ እንደተሰበሰቡ ጲላጦስ፣ “ከበርባንና ክርስቶስ ከሚባለው ከኢየሱስ፣ ማንን እንድፈታላችሁ ትፈልጋላችሁ?” አላቸው፤ 18ጲላጦስም በቅናት አሳልፈው እንደሰጡት ያውቅ ነበርና።

19በፍርድ ወንበር ላይ ተቀምጦ ሳለ ሚስቱ፣ “በእርሱ ምክንያት ዛሬ በሕልም ብዙ ስለተሠቃየሁ፣ በዚያ ንጹሕ ሰው ላይ ምንም ነገር እንዳታደርግ” የሚል መልእክት ላከችበት።

20ነገር ግን የካህናት አለቆችና ሽማግሌዎች በርባን እንዲፈታላቸው ኢየሱስ ግን እንዲገደል ይለምኑ ዘንድ ሕዝቡን ያግባቡ ነበር።

21አገረ ገዥውም፣ “ከሁለቱ ማንን እንድፈታላችሁ ትፈልጋላችሁ?” በማለት ጠየቀ።

እነርሱም፤ “በርባንን!” በማለት መለሱ።

22ጲላጦስም፣ “ታዲያ ክርስቶስ የተባለውን ኢየሱስንስ ምን ላድርገው?” አላቸው።

ሁሉም፣ “ይሰቀል!” አሉ።

23ጲላጦስም፣ “ለምን? ምን ክፉ ነገር አድርጎአል?” በማለት ጠየቃቸው።

እነርሱ ግን አብዝተው እየጮኹ፣ “ይሰቀል!” አሉ።

24ጲላጦስ ሁኔታው ሽብር ከማስነሣት በስተቀር ምንም ፋይዳ የሌለው መሆኑን ተመልክቶ፣ “እኔ ከዚህ ሰው ደም ንጹሕ ነኝ፤ ከእንግዲህ ኀላፊነቱ የራሳችሁ ነው” በማለት ውሃ አስመጥቶ በሕዝቡ ፊት እጆቹን ታጠበ።

25ሕዝቡም በሙሉ፣ “ደሙ በእኛና በልጆቻችን ላይ ይሁን!” ብለው መለሱ።

26በዚህ ጊዜ በርባንን ፈታላቸው፤ ኢየሱስን ግን ካስገረፈው በኋላ እንዲሰቀል አሳልፎ ሰጠው።

ኢየሱስ በሮማውያን ወታደሮች እጅ

27፥27-31 ተጓ ምብ – ማር 15፥16-20

27ከዚያም የአገረ ገዥው ወታደሮች ኢየሱስን ወደ ገዥው ግቢ ወሰዱት፤ ሰራዊቱንም ሁሉ በዙሪያው አሰባሰቡ። 28ልብሱን ገፈው ቀይ ልብስ አጠለቁለት፤ 29እሾኽ ጐንጕነው አክሊል በመሥራት ራሱ ላይ ደፉበት፤ የሸምበቆ በትር በቀኝ እጁ በማስያዝ በፊቱ ተንበርክከው፣ “የአይሁድ ንጉሥ ሆይ፤ ሰላም ለአንተ ይሁን” በማለት አሾፉበት፤ 30ተፉበትም፤ የሸምበቆ በትሩን ከእጁ ወስደው ራሱ ላይ በሸምበቆው ደግመው ደጋግመው መቱት፤ 31ካሾፉበት በኋላም ቀዩን ልብስ ገፈው የራሱን መጐናጸፊያ አለበሱት፤ ሊሰቅሉትም ይዘውት ሄዱ።

የኢየሱስ መሰቀል

27፥33-44 ተጓ ምብ – ማር 15፥22-32፤ ሉቃ 23፥33-43፤ ዮሐ 19፥17-24

32ይዘውትም ሲሄዱ ስምዖን ተብሎ የሚጠራ የቀሬና ሰው አገኙ፤ መስቀሉንም እንዲሸከም አስገደዱት። 33ትርጕሙ፣ “የራስ ቅል ስፍራ” ከሆነው ጎልጎታ ከተባለው ቦታ ሲደርሱ፣ 34ከሐሞት ጋር የተቀላቀለ የወይን ጠጅ እንዲጠጣ ሰጡት፤ እርሱ ግን ቀምሶ ሊጠጣው አልፈቀደም። 35ከሰቀሉትም በኋላ ዕጣ ጥለው ልብሱን ተካፈሉ፤27፥35 ጥቂት የጥንት ቅጆች “በነቢዩ ልብሶቼን ለራሳቸው ተከፋፈሉ፤ በቀሚሴም ላይ ዕጣ ተጣጣሉ የተባለው ይፈጸም ዘንድ” የሚል አላቸው 36በዚያም ተቀምጠው ይጠብቁት ነበር። ከራስጌውም፣ 37“ይህ የአይሁድ ንጉሥ ኢየሱስ ነው” የሚል የክስ ጽሑፍ አኖሩ። 38ሁለት ወንበዴዎች አንዱ በቀኙ፣ አንዱ በግራው አብረውት ተሰቅለው ነበር። 39መንገድ ዐላፊዎችም በኀይል እየተሳደቡና ራሳቸውን እየነቀነቁ፣ 40“ቤተ መቅደስን አፍርሰህ በሦስት ቀን ውስጥ የምትሠራው፤ እስቲ ራስህን አድን! የእግዚአብሔር ልጅ ከሆንህ በል ከመስቀል ውረድ!” ይሉት ነበር።

41የካህናት አለቆችም ከኦሪት ሕግ መምህራንና ከሽማግሌዎች ጋር ሆነው እያሾፉበት እንዲህ ይሉ ነበር፤ 42“ሌሎችን አዳነ፤ ራሱን ግን ማዳን አይችልም! የእስራኤል ንጉሥ ከሆነ አሁን ከመስቀል ይውረድ፤ እኛም እናምንበታለን። 43በእግዚአብሔር ታምኖአል፤ ‘የእግዚአብሔር ልጅ ነኝ’ ይል ስለ ነበር እስቲ ከወደደው አሁን ያድነው!” 44ከእርሱ ጋር የተሰቀሉት ወንበዴዎችም እንደዚሁ የስድብ ናዳ ያወርዱበት ነበር።

የኢየሱስ መሞት

27፥45-56 ተጓ ምብ – ማር 15፥33-41፤ ሉቃ 23፥44-49

45ከቀኑ ስድስት ሰዓት ጀምሮ እስከ ዘጠኝ ሰዓት ድረስ በምድር ሁሉ ላይ ጨለማ ሆነ። 46በዘጠኝ ሰዓት ገደማ፣ ኢየሱስ ድምፁን ከፍ አድርጎ፣ “ኤሎሄ! ኤሎሄ! ላማ ሰበቅታኒ?” እያለ ጮኸ፤ ትርጕሙም “አምላኬ፤ አምላኬ፤ ለምን ተውኸኝ?” ማለት ነው።

47በዚያ ቆመው ከነበሩት አንዳንዶቹ ጩኸቱን ሲሰሙ፣ “ኤልያስን እየተጣራ ነው!” አሉ።

48ወዲያውም ከእነርሱ አንዱ ሮጦ ሰፍነግ በመውሰድ የኮመጠጠ ወይን ጠጅ ውስጥ ነከረው፤ ሰፍነጉንም በሸምበቆ ዘንግ ጫፍ ላይ በማድረግ እንዲጠጣው ለኢየሱስ አቀረበለት። 49የቀሩት ግን፣ “ተዉት፤ እስቲ ኤልያስ መጥቶ ሲያድነው እናያለን!” አሉ።

50ኢየሱስ እንደ ገና ከፍ ባለ ድምፅ ጮኸ፤ መንፈሱንም አሳልፎ ሰጠ።

51በዚያን ጊዜ የቤተ መቅደስ መጋረጃ ከላይ እስከ ታች ለሁለት ተቀደደ፤ ምድር ተናወጠች፤ ዐለቶችም ተሰነጣጠቁ፤ 52መቃብሮች ተከፈቱ፤ አንቀላፍተው የነበሩትም ብዙዎች ቅዱሳን ተነሡ፤ 53ከመቃብርም በመውጣት ከኢየሱስ ትንሣኤ በኋላ ወደ ቅድስት ከተማ ገብተው ለብዙዎች ታዩ።

54የመቶ አለቃውና አብረውት ኢየሱስን ይጠብቁት የነበሩት የመሬት መናወጡንና የሆነውን ነገር ሁሉ ባዩ ጊዜ እጅግ ፈርተው፤ ይህስ፣ “በእውነት የእግዚአብሔር ልጅ ነበር!” አሉ። 55ከገሊላ የመጡና ኢየሱስን በሚያስፈልገው ነገር ለማገልገል የተከተሉት ብዙ ሴቶች ሁኔታውን ከርቀት እየተመለከቱ በአካባቢው ነበሩ። 56ከእነርሱም መካከል ማርያም መግደላዊት፣ ማርያም የያዕቆብና የዮሴፍ እናት እንዲሁም የዘብዴዎስ ልጆች እናት ነበሩ።

የኢየሱስ መቀበር

27፥57-61 ተጓ ምብ – ማር 15፥42-47፤ ሉቃ 23፥50-56፤ ዮሐ 19፥38-42

57ምሽት ላይ ዮሴፍ የሚባል ሀብታም ሰው ከአርማትያስ መጣ፤ እርሱ ራሱም የኢየሱስ ደቀ መዝሙር ነበረ። 58ጲላጦስ ፊት ቀርቦ የኢየሱስን በድን ለመነው፤ ጲላጦስም እንዲሰጠው አዘዘ። 59ዮሴፍም በድኑን ወስዶ በንጹሕ የበፍታ ጨርቅ ከፈነው፤ 60ለራሱ ከዐለት አስፈልፍሎ ባዘጋጀው መቃብር ውስጥ አኖረው፤ ከዚያም ትልቅ ድንጋይ አንከባሎ የመቃብሩን በር ዘግቶ ሄደ። 61በዚህ ጊዜ ማርያም መግደላዊትና ሌላዋ ማርያም ከመቃብሩ ትይዩ ተቀምጠው ነበር።

የመቃብሩ ጥበቃ

62በማግሥቱ፣ ከሰንበት ዝግጅት በኋላ ባለው ቀን፣ የካህናት አለቆችና ፈሪሳውያን ጲላጦስ ፊት ቀርበው እንዲህ አሉት፤ 63“ክቡር ሆይ፤ ያ አሳች በሕይወት ሳለ፣ ‘ከሦስት ቀን በኋላ እነሣለሁ’ ያለው ትዝ ብሎናል፤ 64ስለዚህ ደቀ መዛሙርቱ አስከሬኑን ሰርቀው ለሕዝቡ፣ ‘ከሙታን ተነሥቶአል’ ብለው እንዳያስወሩ መቃብሩ እስከ ሦስተኛው ቀን ድረስ እንዲጠበቅ ትእዛዝ ስጥልን፤ አለዚያ የኋለኛው ስሕተት ከፊተኛው የባሰ ይሆናል!”

65ጲላጦስም፣ “ጠባቂዎች አሏችሁ፤ ሄዳችሁ በምታውቁት መንገድ አስጠብቁ” አላቸው። 66እነርሱም ሄደው መቃብሩን በማኅተም አሽገው ጠባቂ አቆሙበት።

Hindi Contemporary Version

मत्तियाह 27:1-66

पिलातॉस के न्यायालय में येशु

1प्रातःकाल सभी प्रधान पुरोहितों तथा पुरनियों ने आपस में येशु को मृत्यु दंड देने की सहमति की. 2येशु को बेड़ियों से बांधकर वे उन्हें राज्यपाल पिलातॉस के यहां ले गए.

3इसी समय, जब येशु पर दंड की आज्ञा सुनाई गई, यहूदाह, जिसने येशु के साथ धोखा किया था, दुःख और पश्चाताप से भर उठा. उसने प्रधान पुरोहितों और पुरनियों के पास जाकर चांदी के वे तीस सिक्के यह कहते हुए लौटा दिए, 4“एक निर्दोष के साथ धोखा करके मैंने पाप किया है.”

“हमें इससे क्या?” वे बोले, “यह तुम्हारी समस्या है!”

5वे सिक्के मंदिर में फेंक यहूदाह चला गया और जाकर फांसी लगा ली.

6उन सिक्कों को इकट्ठा करते हुए उन्होंने विचार किया, “इस राशि को मंदिर के कोष में डालना उचित नहीं है क्योंकि यह लहू का दाम है.” 7तब उन्होंने इस विषय में विचार-विमर्श कर उस राशि से परदेशियों के अंतिम संस्कार के लिए कुम्हार का एक खेत मोल लिया. 8यही कारण है कि आज तक उस खेत को लहू का खेत नाम से जाना जाता है. 9इससे भविष्यवक्ता येरेमियाह द्वारा की गई यह भविष्यवाणी पूरी हो गई: उन्होंने चांदी के तीस सिक्के लिए—यह उसका दाम है, जिसका दाम इस्राएल वंश के द्वारा निर्धारित किया गया था 10और उन्होंने वे सिक्के कुम्हार के खेत के लिए दे दिए, जैसा निर्देश प्रभु ने मुझे दिया था.

येशु दोबारा पिलातॉस के सामने

11येशु राज्यपाल के सामने लाए गए और राज्यपाल ने उनसे प्रश्न करने प्रारंभ किए, “क्या तुम यहूदियों के राजा हो?”

येशु ने उसे उत्तर दिया, “यह आप स्वयं ही कह रहे हैं.”

12जब येशु पर प्रधान पुरोहितों और पुरनियों द्वारा आरोप पर आरोप लगाए जा रहे थे, येशु मौन बने रहे. 13इस पर पिलातॉस ने येशु से कहा, “क्या तुम सुन नहीं रहे ये लोग तुम पर कितने आरोप लगा रहे हैं?” 14येशु ने पिलातॉस को किसी भी आरोप का कोई उत्तर न दिया. राज्यपाल के लिए यह अत्यंत आश्चर्यजनक था.

15फ़सह उत्सव पर परंपरा के अनुसार राज्यपाल की ओर से उस बंदी को, जिसे लोग चाहते थे, छोड़ दिया जाता था. 16उस समय बंदीगृह में बार-अब्बास नामक एक कुख्यात अपराधी बंदी था. 17इसलिये जब लोग इकट्ठा हुए पिलातॉस ने उनसे प्रश्न किया, “मैं तुम्हारे लिए किसे छोड़ दूं, बार-अब्बास को या येशु को, जो मसीह कहलाता है? क्या चाहते हो तुम?” 18पिलातॉस को यह मालूम हो चुका था कि मात्र जलन के कारण ही उन्होंने येशु को उनके हाथों में सौंपा था.

19जब पिलातॉस न्यायासन पर बैठा था, उसकी पत्नी ने उसे यह संदेश भेजा, “उस धर्मी व्यक्ति को कुछ न करना क्योंकि पिछली रात मुझे स्वप्न में उसके कारण घोर पीड़ा हुई है.”

20इस पर प्रधान पुरोहितों और पुरनियों ने भीड़ को उकसाया कि वे बार-अब्बास की मुक्ति की और येशु के मृत्यु दंड की मांग करें.

21राज्यपाल ने उनसे पूछा, “क्या चाहते हो, दोनों में से मैं किसे छोड़ दूं?” भीड़ का उत्तर था.

“बार-अब्बास को.”

22इस पर पिलातॉस ने उनसे पूछा, “तब मैं येशु का, जो मसीह कहलाता है, क्या करूं?”

उन सभी ने एक साथ कहा. “उसे क्रूस पर चढ़ाया जाए!”

23पिलातॉस ने पूछा, “क्यों? क्या अपराध है उसका?”

किंतु वे और अधिक चिल्लाने लगे, “क्रूस पर चढ़ाया जाए उसे!”

24जब पिलातॉस ने देखा कि वह कुछ भी नहीं कर पा रहा परंतु हुल्लड़ की संभावना है तो उसने भीड़ के सामने अपने हाथ धोते हुए यह घोषणा कर दी, “मैं इस व्यक्ति के लहू का दोषी नहीं हूं. तुम ही इसके लिए उत्तरदायी हो.”

25लोगों ने उत्तर दिया, “इसकी हत्या का दोष हम पर तथा हमारी संतान पर हो!”

26तब पिलातॉस ने उनके लिए बार-अब्बास को मुक्त कर दिया किंतु येशु को कोड़े लगवाकर क्रूसित करने के लिए भीड़ के हाथों में सौंप दिया.

येशु के सिर पर कांटों का मुकुट

27तब पिलातॉस के सैनिक येशु को प्राइतोरियम (किले में) ले गए और सारे सैनिकों ने उन्हें घेर लिया. 28जो वस्त्र येशु पहने हुए थे, उतारकर उन्होंने उन्हें एक चमकीला लाल वस्त्र पहना दिया. 29उन्होंने एक कंटीली लता को गूंधकर उसका मुकुट बना उनके सिर पर रख दिया और उनके दायें हाथ में एक नरकुल की एक छड़ी थमा दी. तब वे उनके सामने घुटने टेककर यह कहते हुए उनका मज़ाक करने लगे, “यहूदियों के राजा की जय!” 30उन्होंने येशु पर थूका भी और फिर उनके हाथ से उस नरकुल छड़ी को लेकर उसी से उनके सिर पर प्रहार करने लगे. 31इस प्रकार जब वे येशु का उपहास कर चुके, उन्होंने वह लाल वस्त्र उतारकर उन्हीं के वस्त्र उन्हें पहना दिए और उन्हें उस स्थल पर ले जाने लगे जहां उन्हें क्रूस पर चढ़ाया जाना था.

क्रूस-मार्ग पर येशु

32जब वे बाहर निकले, उन्हें शिमओन नामक एक व्यक्ति, जो कुरेनावासी था, दिखाई दिया. उन्होंने उसे येशु का क्रूस उठाकर चलने के लिए मजबूर किया. 33जब वे सब गोलगोथा नामक स्थल पर पहुंचे, जिसका अर्थ है (खोपड़ी का स्थान). 34उन्होंने येशु को पीने के लिए दाखरस तथा कड़वे रस का मिश्रण दिया किंतु उन्होंने मात्र चखकर उसे पीना अस्वीकार कर दिया. 35येशु को क्रूसित करने के बाद उन्होंने उनके वस्त्रों को आपस में बांट लेने के लिए पासा फेंका 36और वहीं बैठकर उनकी चौकसी करने लगे. 37उन्होंने उनके सिर के ऊपर दोषपत्र लगा दिया था, जिस पर लिखा था:

“यह येशु है—यहूदियों का राजा.”

38उसी समय दो अपराधियों को भी उनके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया था, एक को उनकी दायीं ओर, दूसरे को उनकी बायीं ओर. 39जो भी उस रास्ते से निकलता था, निंदा करता हुआ निकलता था. वे सिर हिला-हिला कर कहते जाते थे, 40“अरे तू! तू तो कहता था कि मंदिर को ढाह दो और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूंगा, अब स्वयं को तो बचाकर दिखा! यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो उतर आ क्रूस से!” 41इसी प्रकार प्रधान पुरोहित भी शास्त्रियों और पुरनियों के साथ मिलकर उनका उपहास करते हुए कह रहे थे, 42“दूसरों को तो बचाता फिरा है, स्वयं को नहीं बचा सकता! इस्राएल का राजा है! क्रूस से नीचे आकर दिखाए तो हम इसका विश्वास कर लेंगे. 43यह परमेश्वर में विश्वास करता है क्योंकि इसने दावा किया था, ‘मैं ही परमेश्वर-पुत्र हूं,’ तब परमेश्वर इसे अभी छुड़ा दें—यदि वह इससे प्रेम करते हैं.” 44उनके साथ क्रूस पर चढ़ाये गए राजद्रोही भी इसी प्रकार उनकी उल्लाहना कर रहे थे.

येशु की मृत्यु

45छठे घंटे से लेकर नवें घंटे तक उस सारे प्रदेश पर अंधकार छाया रहा. 46नवें घंटे के लगभग येशु ने ऊंची आवाज में पुकारकर कहा, “एली, एली, लमा सबख़थानी?” जिसका अर्थ है, “मेरे परमेश्वर! मेरे परमेश्वर! आपने मुझे क्यों छोड़ दिया?”27:46 स्तोत्र 22:1

47उनमें से कुछ ने, जो वहां खड़े थे, यह सुनकर कहा, “अरे! सुनो-सुनो! एलियाह को पुकार रहा है!”

48उनमें से एक ने तुरंत दौड़कर एक स्पंज सिरके में भिगोया और एक नरकुल की एक छड़ी पर रखकर येशु के ओंठों तक बढ़ा दिया. 49किंतु औरों ने कहा, “ठहरो, ठहरो, देखें एलियाह उसे बचाने आते भी हैं या नहीं.”

50येशु ने एक बार फिर ऊंची आवाज में पुकारा और अपने प्राण त्याग दिए.

51उसी क्षण मंदिर का पर्दा ऊपर से नीचे तक दो भागों में विभाजित कर दिया गया, पृथ्वी कांप उठी, चट्टानें फट गईं 52और कब्रें खुल गईं. येशु के पुनरुत्थान के बाद उन अनेक पवित्र लोगों के शरीर जीवित कर दिए गये, जो बड़ी नींद में सो चुके थे. 53कब्रों से बाहर आकर उन्होंने पवित्र नगर में प्रवेश किया तथा अनेकों को दिखाई दिए.

54सेनापति और वे, जो उसके साथ येशु की पहरा दे रहे थे, उस भूकंप तथा अन्य घटनाओं को देखकर अत्यंत भयभीत हो गए और कहने लगे, “सचमुच यह परमेश्वर के पुत्र थे!”

55अनेक स्त्रियां दूर खड़ी हुई यह सब देख रही थी. वे गलील प्रदेश से येशु की सेवा करती हुई उनके पीछे-पीछे आ गई थी. 56उनमें थी मगदालावासी मरियम, याकोब और योसेफ़ की माता मरियम तथा ज़ेबेदियॉस की पत्नी.

येशु को कब्र में रखा जाना

57जब संध्या हुई तब अरिमथिया नामक नगर के एक धनी व्यक्ति, जिनका नाम योसेफ़ था, वहां आए. वह स्वयं येशु के चेले बन गए थे. 58उन्होंने पिलातॉस के पास जाकर येशु के शव को ले जाने की आज्ञा मांगी. पिलातॉस ने उन्हें शव ले जाने की आज्ञा दे दी. 59योसेफ़ ने शव को एक स्वच्छ चादर में लपेटा 60और उसे नई कंदरा-क़ब्र में रख दिया, जो योसेफ़ ने स्वयं अपने लिए चट्टान में खुदवाई थी. उन्होंने कब्र के द्वार पर एक विशाल पत्थर लुढ़का दिया और तब वह अपने घर चले गए. 61मगदालावासी मरियम तथा अन्य मरियम, दोनों ही कंदरा-क़ब्र के सामने बैठी रहीं.

येशु की कब्र पर प्रहरियों की नियुक्ति

62दूसरे दिन, जो तैयारी के दिन के बाद का दिन था, प्रधान पुरोहित तथा फ़रीसी पिलातॉस के यहां इकट्ठा हुए और पिलातॉस को सूचित किया, 63“महोदय, हमको यह याद है कि जब यह छली जीवित था, उसने कहा था, ‘तीन दिन बाद मैं जीवित हो जाऊंगा’; 64इसलिये तीसरे दिन तक के लिए कंदरा-क़ब्र पर कड़ी सुरक्षा की आज्ञा दे दीजिए, अन्यथा संभव है उसके शिष्य आकर शव चुरा ले जाएं और लोगों में यह प्रचार कर दें, ‘वह मरे हुओं में से जीवित हो गया है’; तब तो यह छल पहले से कहीं अधिक हानिकर सिद्ध होगा.”

65पिलातॉस ने उनसे कहा, “प्रहरी तो आपके पास हैं न! आप जैसा उचित समझें करें.” 66अतः उन्होंने जाकर प्रहरी नियुक्त कर तथा पत्थर पर मोहर लगाकर कब्र को पूरी तरह सुरक्षित बना दिया.