New Amharic Standard Version

ማቴዎስ 21:1-46

ኢየሱስ በታላቅ ክብር ወደ ኢየሩሳሌም መግባቱ

21፥1-9 ተጓ ምብ – ማር 11፥1-10፤ ሉቃ 19፥29-38

21፥4-9 ተጓ ምብ – ዮሐ 12፥12-15

1ኢየሩሳሌም መቃረቢያ ደብረ ዘይት ተራራ ላይ ወደምትገኘው ቤተ ፋጌ ወደተባለችው ስፍራ እንደ ደረሱ፣ ኢየሱስ ሁለት ደቀ መዛሙርት ላከ፤ 2እንዲህ አላቸው “ባቅራቢያችሁ ወዳለው መንደር ሂዱ፤ እንደ ደረሳችሁም አንዲት አህያ ከነውርንጫዋ ታስራ ታገኛላችሁ፤ ፈትታችሁም ወደ እኔ አምጧቸው። 3ማንም ሰው ለምን እንዲህ ታደርጋላችሁ ቢላችሁ፣ ‘ጌታ ይፈልጋቸዋል’ በሉት፤ ወዲያውኑ ይሰዳቸዋል።”

4ይህ የሆነውም በነቢዩ እንዲህ በማለት የተነገረው ይፈጸም ዘንድ ነው።

5“ለጽዮን ልጅ እንዲህ በሏት፤

‘እነሆ፤ ንጉሥሽ ትሑት ሆኖ፣

በአህያዪቱና በግልገሏ፣

በውርንጫዪቱም ላይ ተቀምጦ ወደ አንቺ ይመጣል።’ ”

6ደቀ መዛሙርቱም ሄደው ኢየሱስ እንዳዘዛቸው አደረጉ። 7አህያዪቱንና ውርንጫዋን አምጥተው ልብሶቻቸውን በላያቸው ላይ አኖሩ፤ እርሱም ተቀመጠባቸው። 8ከሕዝቡም አብዛኛው ልብሶቻቸውን፣ በመንገድ ላይ አነጠፉ፤ ሌሎቹም ከዛፎች ቅርንጫፍ እየዘነጠፉ በመንገዱ ላይ ጣል ጣል አደረጉ። 9ቀድሞት ከፊቱ የሚሄደውና ከኋላው ይከተለው የነበረው ሕዝብም እንዲህ እያለ ይጮኽ ነበር፣

“ሆሣዕና21፥9 በዕብራይስጡ አገላለጽ አሁን አድን! ማለት ሲሆን የምስጋና አገላለጽ ነው፤ ቍ 15 ይመ ለዳዊት ልጅ፤”

“በጌታ ስም የሚመጣ የተባረከ ነው፤”

“ሆሣዕና በአርያም!”

10ኢየሩሳሌም በገባ ጊዜም ከተማዋ በመላ፣ “ይህ ማነው?” በማለት ታወከች።

11ሕዝቡም፣ “ይህ በገሊላ ከምትገኘው ከናዝሬት የመጣው ነቢዩ ኢየሱስ ነው” አሉ።

ኢየሱስ በቤተ መቅደስ ሲነግዱ ያገኛቸውን አስወጣቸው

21፥12-16 ተጓ ምብ – ማር 11፥15-18፤ ሉቃ 19፥45-47

12ከዚያም ኢየሱስ ወደ ቤተ መቅደስ ገብቶ በቤተ መቅደስ ውስጥ ይሸጡና ይገዙ የነበሩትን አባረራቸው፤ የገንዘብ ለዋጮችን ጠረጴዛና የርግብ ሻጮችን መቀመጫ በመገለባበጥ፣ 13“ ‘ቤቴ የጸሎት ቤት ይባላል’ ተብሎ ተጽፎአል፤ እናንተ ግን፣ ‘የዘራፊዎች ዋሻ’ አደረጋችሁት” አላቸው።

14በቤተ መቅደሱም ውስጥ ዐይነ ስውሮችና ሽባዎች ወደ እርሱ ቀረቡ፤ እርሱም ፈወሳቸው። 15ነገር ግን የካህናት አለቆችና የኦሪት ሕግ መምህራን ያደረጋቸውን ታምራትና፣ “ሆሣዕና፤ ለዳዊት ልጅ” እያሉ የሚጮኹትን ሕፃናት ባዩ ጊዜ በቍጣ ተሞሉ።

16እነርሱም፣ “እነዚህ ሕፃናት የሚሉትን ትሰማለህ” አሉት።

ኢየሱስም፣ “አዎን እሰማለሁ፤ እንዲህ የሚለውን ከቶ አላነበባችሁምን?”

“ ‘ከልጆችና ጡት ከሚጠቡ፣

ሕፃናት አፍ ምስጋናን አዘጋጀህ።’ ”

17ትቶአቸው ከከተማው ወጣ፤ ወደ ቢታንያም ሄዶ በዚያው አደረ።

ፍሬ አልባ የሆነችው በለስ

21፥18-22 ተጓ ምብ – ማር 11፥12-14፡20-24

18ኢየሱስ በማግስቱ ማለዳ ወደ ከተማዪቱ በመመለስ ላይ ሳለ ተራበ፤ 19በመንገድ ዳርም አንድ የበለስ ዛፍ አይቶ ወደ እርሷ ሲሄድ ከቅጠል በስተቀር ምንም ስላላገኘባት፣ “ከእንግዲህ ፍሬ አይኑርብሽ!” አላት፤ የበለሷ ዛፍ ወዲያውኑ ደረቀች።

20ደቀ መዛሙርቱም የሆነውን አይተው በመደነቅ፣ “የበለሷ ዛፍ እንዴት ባንዴ ልትደርቅ ቻለች?” አሉ።

21ኢየሱስም እንዲህ አላቸው፤ “እውነት እላችኋለሁ፤ እምነት ቢኖራችሁ ባትጠራጠሩ፣ በበለሷ ዛፍ ላይ የሆነውን ማድረግ ብቻ ሳይሆን፣ ይህንን ተራራ፣ ‘ከዚህ ተነቅለህ ባሕር ውስጥ ግባ’ ብትሉት እንኳ ይሆናል፤ 22እምነት ካላችሁ በጸሎት የምትለምኑትን ሁሉ ትቀበላላችሁ።”

በኢየሱስ ሥልጣን ላይ የቀረበ ጥያቄ

21፥23-27 ተጓ ምብ – ማር 11፥27-33፤ ሉቃ 20፥1-8

23ኢየሱስ ወደ ቤተ መቅደስ ገብቶ በማስተማር ላይ ሳለ፣ የካህናት አለቆችና የሕዝብ ሽማግሌዎች ቀርበው፣ “ይህን ሁሉ ነገር የምታደርገው በምን ሥልጣን ነው? ሥልጣንስ የሰጠህ ማን ነው?” ብለው ጠየቁት።

24ኢየሱስም መልሶ እንዲህ አላቸው፤ “እኔም አንድ ጥያቄ እጠይቃችኋለሁ፤ መልሱን ብትነግሩኝ፣ እኔም እነዚህን ነገሮች በምን ሥልጣን እንደማደርግ እነግራችኋለሁ፤ 25የዮሐንስ ጥምቀት የመጣው ከየት ነበር? ከሰማይ ወይስ ከሰዎች?”

እነርሱም እርስ በርስ በመነጋገር እንዲህ ተባባሉ፤ “ ‘ከሰማይ ነው?’ ካልን ‘ታዲያ ለምን አላመናችሁበትም?’ ይለናል፤ 26‘ከሰዎች ነው’ ካልን ደግሞ፣ ‘ሕዝቡ ዮሐንስን ነቢይ ነው’ ብሎ ስለሚያምን እንፈራለን።”

27ስለዚህ፣ “አናውቅም” ብለው ለኢየሱስ መለሱለት።

እርሱም፣ “እኔም እነዚህን ነገሮች በምን ሥልጣን እንደማደርግ አልነግራችሁም” አላቸው።

የመታዘዝ ትርጒም

28ኢየሱስም እንዲህ አላቸው፤ “ምን ይመስላችኋል? ሁለት ወንዶች ልጆች ያሉት አንድ ሰው ነበረ፤ ወደ መጀመሪያው ልጁ ሄዶ፣ ‘ልጄ ሆይ፤ ዛሬ ወደ ወይኑ ቦታ ሄደህ ሥራ’ አለው።

29“ልጁም፣ ‘አልሄድም’ አለው፤ ኋላ ግን ተጸጽቶ ሄደ።

30“ወደ ሁለተኛው ልጁ ሄዶ እንደዚያው አለው፤ ልጁም ‘እሺ ጌታዬ እሄዳለሁ’ አለው፤ ነገር ግን ሳይሄድ ቀረ።

31“ከሁለቱ የአባቱን ፈቃድ የፈጸመው የትኛው ነው?”

እነርሱም፣ “የመጀመሪያው ልጅ” አሉት።

ኢየሱስም እንዲህ አላቸው፤ “እውነት እላችኋለሁ፣ ቀረጥ ሰብሳቢዎችና አመንዝራዎች ወደ እግዚአብሔር መንግሥት በመግባት ይቀድሟችኋል፤ 32መጥምቁ ዮሐንስ የጽድቅን መንገድ ሊያሳያችሁ ወደ እናንተ መጣ፤ እናንተ አላመናችሁትም፤ ቀረጥ ሰብሳቢዎችና አመንዝራዎች ግን አመኑት። የሆነውን ካያችሁ በኋላ እንኳ ንስሓ ገብታችሁ አላመናችሁትም።

የወይን ዕርሻ ገበሬዎች ምሳሌ

21፥33-46 ተጓ ምብ – ማር 12፥1-12፤ ሉቃ 20፥9-19

33“ሌላም ምሳሌ ስሙ፤ አንድ የወይን ዕርሻ ባለቤት ነበረ፤ በዕርሻው ዙሪያ አጥር አጠረ፤ ለወይኑ መጭመቂያ ጕድጓድ ቈፈረ፤ ለጥበቃ የሚሆን ማማ ሠራ፤ ከዚያም ዕርሻውን ለገበሬዎች አከራይቶ ወደ ሌላ አገር ሄደ። 34የመከር ወራት ሲደርስ፣ ፍሬውን ለመቀበል አገልጋዮቹን ወደ ገበሬዎቹ ላካቸው።

35“ገበሬዎቹም አገልጋዮቹን ይዘው አንዱን ደበደቡት፤ ሌላውን ገደሉት፤ ሌላውን ደግሞ በድንጋይ ወገሩት። 36እርሱም ከፊተኞቹ የሚበልጡ ሌሎች አገልጋዮቹን ላከ፤ ገበሬዎቹም ተመሳሳይ ድርጊት ፈጸሙባቸው። 37በመጨረሻም፣ ‘ልጄን ያከብሩታል’ በማለት ልጁን ላከ።

38“ነገር ግን ገበሬዎቹ ልጁን ባዩት ጊዜ፣ ‘ይህማ ወራሹ ነው፤ ኑ፣ እንግደለውና ርስቱን እንውረስ’ ተባባሉ። 39ይዘውም ከወይኑ ዕርሻ ውጭ አውጥተው ገደሉት።

40“ታዲያ የወይኑ ዕርሻ ባለቤት ሲመጣ እነዚያን ገበሬዎች ምን የሚያደርጋቸው ይመስላችኋል?”

41እነርሱም፣ “እነዚያን ክፉዎች በአሰቃቂ ሁኔታ ገድሎ ከወይኑ ዕርሻ ተገቢውን ፍሬ በወቅቱ ለሚያስረክቡት ለሌሎች ገበሬዎች ያከራያል” አሉት።

42ኢየሱስም እንዲህ ተብሎ በቅዱሳት መጻሕፍት የተጻፈውን አላነበባችሁምን? አላቸው፤

“ ‘ግንበኞች የናቁት ድንጋይ፣

የማእዘን ራስ21፥42 ወይም የማእዘን ድንጋይ ሆነ፤

እግዚአብሔር ይህን አድርጎአል፤

ሥራውም ለዐይናችን ድንቅ ነው።’

43“ስለዚህ እላችኋለሁ፤ የእግዚአብሔር መንግሥት ከእናንተ ተወስዳ ፍሬዋን ለሚያፈራ ሕዝብ ትሰጣለች፤ 44በዚህ ድንጋይ ላይ የሚወድቅ ይሰባበራል፤ ድንጋዩ የሚወድቅበት ሰው ግን ይደቅቃል።”21፥44 አንዳንድ ቅጆች ቍጥር 44 የላቸውም

45የካህናት አለቆችና ፈሪሳውያን ምሳሌዎቹን በሰሙ ጊዜ፣ ስለ እነርሱ የሚናገር መሆኑን ዐወቁ። 46ነገር ግን ይዘው ሊያስሩት ቢፈልጉም ሕዝቡ ኢየሱስን እንደ ነቢይ አድርጎ ይመለከት ስለ ነበር ፈሩ።

New Chhattisgarhi Translation (नवां नियम छत्तीसगढ़ी)

मत्ती 21:1-46

बिजय उल्लास के संग यीसू के यरूसलेम म प्रवेस

(मरकुस 11:1-11; लूका 19:28-40; यूहन्ना 12:12-19)

1जब ओमन यरूसलेम सहर के लकठा म हबरिन अऊ जैतून पहाड़ ऊपर बैतफगे गांव करा आईन, त यीसू ह दू झन चेलामन ला ए कहिके पठोईस, 2“आघू के गांव म जावव। जइसने ही तुमन उहां हबरहू, तुमन ला एक गदही खूंटा म बंधाय मिलही अऊ ओकर संग म ओकर बछरू घलो होही। ओमन ला ढिल के मोर करा ले आवव। 3अऊ यदि कोनो तुमन ला कुछू कहिथे, त ओला कहव कि परभू ला एमन के जरूरत हवय। तब ओह तुरते ओमन ला पठो दिही।”

4एह एकरसेति होईस ताकि अगमजानी के दुवारा कहे गय ए बात ह पूरा होवय:

5“सियोन के बेटी ले कहव, देख, तोर राजा ह तोर करा आवत हवय। ओह नम्र अय अऊ गदही ऊपर बईठे हवय, ओह गदही के बछरू ऊपर बईठे हवय21:5 पद 5 म “सियोन के बेटी” के मतलब यरूसलेम सहर अय।।”21:5 जकरयाह 9:9

6तब दूनों चेलामन गीन, अऊ जइसने यीसू ह ओमन ला करे बर कहे रिहिस, वइसनेच करिन। 7ओमन गदही अऊ ओकर बछरू ला लानिन अऊ ओमन के ऊपर अपन कपड़ा ला दसा दीन; तब यीसू ह ओमन ऊपर बईठ गीस। 8भीड़ के बहुंत मनखेमन अपन-अपन कपड़ा ला सड़क म दसा दीन अऊ दूसर मनखेमन रूख के डारामन ला काटके सड़क ऊपर बगरा दीन। 9भीड़ के मनखेमन यीसू के आघू-आघू अऊ पाछू-पाछू घलो चलत रहंय अऊ ओमन चिचिया-चिचियाके कहत रहंय, “दाऊद के संतान के होसाना! धइन ए ओ, जऊन ह परभू के नांव म आथे!21:9 भजन-संहिता 118:25-26 ऊंच स्‍वरग म होसाना!21:9 “होसाना” (इबरानी) के मतलब होथे “बचा” या “उद्धार कर”, पर बाद म ए सबद के उपयोग “परसंसा” या “इस्तुति” के रूप म करे गीस।10जब यीसू ह यरूसलेम म आईस, त जम्मो सहर म हलचल मच गीस अऊ मनखेमन पुछन लगिन, “एह कोन ए?”

11भीड़ के मनखेमन कहिन, “एह अगमजानी यीसू ए, अऊ गलील प्रदेस के नासरत के रहइया ए।”

मंदिर म यीसू

(मरकुस 11:15-19; लूका 19:45-48; यूहन्ना 2:13-22)

12यीसू ह मंदिर म गीस, अऊ ओ जम्मो मनखेमन ला निकार दीस, जऊन मन मंदिर म लेन-देन करत रिहिन। ओह साहूकारमन के मेज अऊ परेवा बेचइयामन के बेंचमन ला खपल दीस। 13अऊ ओह ओमन ला कहिस, “परमेसर के बचन म ए लिखे हवय कि मोर घर ह पराथना के घर कहे जाही, पर तुमन एला डाकूमन के अड्डा बनावत हवव।”

14अंधरा अऊ खोरवामन यीसू करा मंदिर म आईन अऊ ओह ओमन ला चंगा करिस। 15पर जब मुखिया पुरोहित अऊ मूसा के कानून के गुरू मन ओकर अद्भूत काम ला देखिन अऊ लइकामन ला मंदिर के इलाका म चिचियाके ए कहत सुनिन – “दाऊद के संतान के होसाना” त ओमन नाराज होईन।

16ओमन यीसू ला कहिन, “का तेंह सुनत हवस कि ए लइकामन का कहत हवंय?” यीसू ह कहिस, “हव, का तुमन परमेसर के बचन म ए कभू नइं पढ़ेव – ‘लइका अऊ छोटे लइकामन के मुहूं ले तेंह इस्तुति करवाय।’21:16 भजन-संहिता 8:2

17तब यीसू ह ओमन ला छोंड़के सहर के बाहिर बैतनियाह गांव म गीस अऊ उहां रात बिताईस।

अंजीर के रूख ह सूख जाथे

(मरकुस 11:12-14, 20-24)

18बिहनियां, जब यीसू ह सहर ला वापिस जावत रिहिस, त ओला भूख लगिस। 19सड़क के तीर म एक ठन अंजीर के रूख ला देखके, ओह उहां गीस, पर ओला पान के छोंड़ ओम अऊ कुछू नइं मिलिस। तब यीसू ह ओ रूख ला कहिस, “अब ले तोर म फेर कभू फर झन लगय।” अऊ तुरते ओ अंजीर के रूख ह सूख गीस।

20जब चेलामन एला देखिन, त ओमन अचम्भो करिन अऊ कहिन, “अंजीर के रूख ह तुरते कइसने सूख गीस?”

21यीसू ह ओमन ला जबाब दीस, “मेंह तुमन ला सच कहत हंव, यदि तुमन बिसवास करव अऊ संका झन करव, त तुमन न सिरिप ए करहू, जऊन ह में ए अंजीर के रूख के संग करे हवंव, पर यदि तुमन ए पहाड़ ले कहिहू, ‘जा अऊ समुंदर म गिर जा।’ अऊ एह हो जाही। 22यदि तुमन बिसवास करथव, त जऊन कुछू तुमन पराथना म मांगव, ओह तुमन ला मिल जाही।”

यीसू के अधिकार ऊपर सवाल

(मरकुस 11:27-33; लूका 20:1-8)

23यीसू ह मंदिर म गीस, अऊ जब ओह उपदेस देवत रिहिस, त मुखिया पुरोहित अऊ मनखेमन के अगुवामन ओकर करा आईन अऊ पुछिन, “तेंह कोन अधिकार ले ए काममन ला करत हवस? अऊ तोला कोन ह ए अधिकार दे हवय?”

24यीसू ह ओमन ला जबाब दीस, “मेंह घलो तुमन ला एक सवाल पुछत हंव, यदि तुमन मोला जबाब दूहू, त मेंह घलो तुमन ला बताहूं कि कोन अधिकार ले मेंह ए काममन ला करत हवंव। 25यूहन्ना के बतिसमा ह कहां ले रिहिस? स्‍वरग ले रिहिस या फेर मनखेमन के तरफ ले?”

ओमन आपस म बिचार करिन अऊ कहिन, “यदि हमन कहन – ‘स्‍वरग ले’ त ओह हमन ला कहिही, ‘तब तुमन यूहन्ना ऊपर बिसवास काबर नइं करेव?’ 26पर यदि हमन कहन – ‘मनखेमन के तरफ ले,’ त हमन ला मनखेमन के डर हवय, काबरकि ओ जम्मो झन बिसवास करथें कि यूहन्ना ह एक अगमजानी रिहिस।”

27एकरसेति ओमन यीसू ला जबाब दीन, “हमन नइं जानन।”

तब यीसू ह ओमन ला कहिस, “त मेंह घलो नइं बतावंव कि कोन अधिकार ले मेंह ए काममन ला करत हवंव।”

दू बेटामन के पटं‍तर

28“तुमन का सोचथव? एक मनखे रिहिस, जेकर दू झन बेटा रिहिन। ओह पहिला करा गीस अऊ कहिस, ‘बेटा, जा अऊ आज अंगूर के बारी म काम कर।’

29ओह जबाब दीस, ‘मेंह नइं जावंव।’ पर बाद म ओह पछताईस अऊ गीस।

30तब ददा ह दूसर बेटा करा गीस अऊ ओहीच बात कहिस। ओह जबाब दीस, ‘हव ददा, मेंह जावत हंव।’ पर ओह नइं गीस।

31ए दूनों बेटा म ले कोन ह अपन ददा के ईछा ला पूरा करिस?”

ओमन कहिन, “पहिला ह।”

यीसू ह ओमन ला कहिस, “मेंह तुमन ला सच कहत हंव कि लगान लेवइया अऊ बेस्‍यामन तुम्‍हर ले आघू परमेसर के राज म जावत हवंय। 32काबरकि यूहन्ना ह तुमन ला धरमीपन के रसता देखाय बर आईस, अऊ तुमन ओकर ऊपर बिसवास नइं करेव, पर लगान लेवइया अऊ बेस्‍यामन ओकर ऊपर बिसवास करिन। एला देखे के बाद घलो, तुमन पछताप नइं करेव अऊ न ही ओकर ऊपर बिसवास करेव।”

दुस्‍ट किसानमन के पटं‍तर

(मरकुस 12:1-12; लूका 20:9-19)

33एक अऊ पटं‍तर सुनव: “एक जमींदार रिहिस, अऊ ओह एक अंगूर के बारी लगाईस। ओह बारी के चारों खूंट ला बाड़ा म घेरिस। ओह ओम एक ठन रस के कुन्‍ड खनवाईस अऊ एक ठन मचान बनाईस। तब ओह ओ अंगूर के बारी ला कुछू किसानमन ला रेगहा म देके आने देस चल दीस। 34जब फर के समय ह आईस, त ओह अपन सेवकमन ला किसानमन करा पठोईस ताकि ओमन ओकर बांटा के फर ला लानय।

35पर किसानमन ओकर सेवकमन ला पकड़ लीन, अऊ ओमन कोनो ला मारिन-पीटिन, कोनो ला जान सहित मार डारिन अऊ काकरो ऊपर पथरा फेंकिन। 36तब जमींदार ह आने सेवकमन ला पठोईस, जऊन मन संख्‍या म पहिली ले जादा रिहिन; पर किसानमन ओमन के संग घलो वइसनेच करिन। 37आखिरी म, ओह ए सोचके अपन बेटा ला पठोईस कि ओमन मोर बेटा के आदर करहीं।

38पर जब किसानमन जमींदार के बेटा ला देखिन, त एक-दूसर ला कहिन, ‘एह तो अंगूर के बारी के वारिस अय। आवव, हमन एला मार डारन अऊ एकर पुरखउती संपत्ति ला ले लेवन।’ 39ओमन ओला पकड़िन अऊ अंगूर के बारी के बाहिर ले जाके ओला मार डारिन।

40एकरसेति जब अंगूर के बारी के मालिक ह आही, त ओह ओ किसानमन के संग का करही?”

41ओमन ह यीसू ला कहिन, “ओह ओ दुस्‍टमन ला पूरा-पूरी नास कर दिही, अऊ अंगूर के बारी के रेगहा आने किसानमन ला दे दिही, जऊन मन समय म ओकर बांटा के फसल ओला दिहीं।”

42यीसू ह ओमन ला कहिस, “का तुमन परमेसर के बचन म ए बात कभू नइं पढ़ेव: ‘जऊन पथरा ला घर के बनइयामन बेकार समझे रिहिन, ओह कोना के मुख पथरा हो गीस; परभू ह ए काम ला करे हवय, अऊ हमर नजर म एह अचम्भो के बात अय।’21:42 भजन-संहिता 118:22-23

43एकरसेति मेंह तुमन ला कहत हंव कि परमेसर के राज ह तुम्‍हर ले लिये जाही, अऊ ओ मनखेमन ला दिये जाही, जऊन मन परमेसर बर फर पैदा करहीं। 44जऊन ह ए पथरा ऊपर गिरही, ओह चूर-चूर हो जाही, पर जेकर ऊपर ए पथरा ह गिरही, ओह पीसा जाही।”

45यीसू के पटं‍तर ला सुनके मुखिया पुरोहित अऊ फरीसी मन समझ गीन कि ओह ओमन के बारे म गोठियावत हवय। 46ओमन ओला पकड़े चाहत रिहिन, पर ओमन ला मनखेमन के डर रहय, काबरकि मनखेमन यीसू ला एक अगमजानी मानत रिहिन।