Japanese Living Bible

ルカの福音書 1

神を愛する親愛なる友へ

11-2 イエス・キリストの伝記は、最初からの目撃者であり弟子であった人たちの証言をもとに、すでに幾つかでき上がっています。 しかし私は、すべての記録をもう一度初めから検証し、徹底的に調査した上で、あなたのために順序正しく書いて差し上げたいと思うようになりました。 それによって、あなたが教えを受けられたことはみな、正確な事実であることがよくおわかりいただけると思います。

ザカリヤへの約束

私の話は、ヘロデがユダヤの王であった時代に、ユダヤの祭司(神殿で神に仕える人)をしていたザカリヤという人のことから始まります。ザカリヤは神殿で奉仕するアビヤの組の一員で、妻エリサベツも祭司の家系でアロンの子孫でした。 この夫婦は神を愛し、神のおきてを忠実に守り、心から従っていました。 しかし、エリサベツは子どものできない体だったので、夫婦には子どもがなく、二人ともすっかり年をとっていました。

さて、ザカリヤの組が週の当番となり、彼は神殿で祭司の務めをしていましたが、 祭司職の習慣に従ってくじを引いたところ、聖所に入って主の前に香をたくという光栄ある務めが当たりました。 10 香がたかれている間、民衆は神殿の庭で祈るのです。大ぜいの人が集まっていました。 11 ザカリヤが聖所で香をたいていると、突然、天使が現れ、香をたく壇の右側に立ったではありませんか。 12 ザカリヤはびっくりし、言い知れぬ恐怖に襲われました。 13 しかし、天使は言いました。「ザカリヤよ。こわがることはありません。うれしい知らせなのだから。神が、あなたの祈りをかなえてくださったのです。エリサベツは男の子を産みます。その子にヨハネという名前をつけなさい。 14 その子はあなたがたの喜びとなり、楽しみとなります。また多くの人もあなたがたと共に喜びます。 15 その子が、主の前に偉大な者となるからです。彼はぶどう酒や強い酒は絶対に飲みません。生まれる前から聖霊に満たされており、 16 やがて多くのユダヤ人を神に立ち返らせるのです。 17 昔の預言者(神に託されたことばを伝える人)エリヤのように、たくましい霊と力にあふれて、メシヤ(ヘブル語で、救い主)の来られる前ぶれをし、人々にメシヤを迎える準備をさせます。大人には子どものような素直な心を呼び覚まし、逆らう者には信仰心を起こさせるのです。」 18 ザカリヤは答えました。「そんなことは信じられません。私はもう老いぼれですし、妻も年をとっているのです。」 19 「私はガブリエル、神の前に立つ者です。神がこの喜びの知らせを伝えるために、私を遣わされたのです。 20 その私のことばをあなたは信じなかったので、あなたは神に打たれて口がきけなくなります。子どもが生まれるまで話すことはできません。その時が来れば、必ず私の言ったとおりになるのです。」

21 外の人たちは、ザカリヤが出て来るのを、今や遅しと待ちかまえていましたが、なぜそんなに手間どっているのか不思議でなりません。 22 そして、ようやく彼が出てきたのですが、口がきけません。しかし人々は、ザカリヤの身ぶりから、きっと神殿の中で幻を見たのだろうと考えました。 23 ザカリヤは残りの期間の奉仕をすませ、家に帰りました。

24 まもなくエリサベツは妊娠し、五か月間、家に引きこもっていました。 25 エリサベツは、「主は私に子どもを与えて、恥を取り除いてくださった。なんとあわれみ深いお方でしょう」と言いました。

マリヤへの約束

26 その翌月、神は天使ガブリエルを、ガリラヤのナザレという町に住むマリヤという処女のところへお遣わしになりました。 27 この娘は、ダビデ王の子孫にあたるヨセフという人の婚約者でした。 28 ガブリエルはマリヤに声をかけました。「おめでとう、恵まれた女よ。主が共におられます。」

29 これを聞いたマリヤは、すっかり戸惑い、このあいさつは、いったいどういう意味なのかと考え込んでしまいました。 30 すると、天使が言いました。「こわがらなくてもいいのです、マリヤ。神様があなたにすばらしいことをしてくださるのです。 31 あなたはみごもって、男の子を産みます。その子を『イエス』と名づけなさい。 32 彼は非常に偉大な人になり、神の子と呼ばれます。神である主は、その子に先祖ダビデの王座をお与えになります。 33 彼は永遠にイスラエルを治め、その国はいつまでも続くのです。」 34 マリヤは尋ねました。「どうして私に子どもができましょう。まだ結婚もしておりませんのに。」 35 「聖霊があなたに下り、神の力があなたをおおうのです。ですから、生まれてくる子どもは聖なる者、神の子と呼ばれます。 36 ちょうど半年前、あなたのいとこのエリサベツも、『不妊の女』と言われていたのに、あの年になってみごもりました。 37 神の約束は、必ずそのとおりになるのです。」 38 「私は主のはしためにすぎません。何もかも主のお言いつけどおりにいたします。どうぞ、いま言われたとおりになりますように。」マリヤがこう言うと、天使は見えなくなりました。

39-40 数日後、マリヤはユダヤの山地へ急ぎました。そして、ザカリヤの住む町へ行き、エリサベツを訪ねました。 41 マリヤのあいさつを聞くと、エリサベツの子が、お腹の中で跳びはね、エリサベツは聖霊に満たされました。 42 彼女は喜びを抑えきれず、大声でマリヤに言いました。「あなたほどすばらしい恵みを受けた女性はいないでしょう。あなたの子が、神様の大きな誉れを表すようになるのですから。 43 主のお母様がおいでくださるとは光栄です。 44 あなたが入って来てあいさつされた時、私の子どもがお腹の中で喜び躍りました。 45 神様が語られたことは必ずそのとおりになると信じたので、神様はあなたに、このような祝福をくださったのです。」

46 マリヤは言いました。

「ああ、心から主を賛美します。

47 救い主である神様を心から喜びます。

48 神様は取るに足りない私のような者さえ、

お心にとめてくださいました。
これから永遠に、どの時代の人々も、
私を神に祝福された者と呼ぶでしょう。
49 力ある聖なる方が、
私に大きなことをしてくださったからです。
50 そのあわれみは、いつまでも、
神を恐れ敬う者の上にとどまります。
51 その御手はどんなに力強いことでしょう。
主は心の高ぶった者を追い散らし、
52 権力をふるう者を王座から引きずり降ろし、
身分の低い者を高く引き上げ、
53 飢え渇いた者を満ち足らせ、
金持ちを何も持たせずに追い返されました。
54 主は約束を忘れず、
しもべイスラエルをお助けになりました。
55 先祖アブラハムとその子孫を、
永遠にあわれむと約束してくださったとおりに。」

56 マリヤは、エリサベツの家に三か月ほどいてから、家に帰りました。

ヨハネの誕生

57 さて、エリサベツの待ちに待った日が来て、男の子が生まれました。 58 このニュースはたちまち近所の人たちや親類の間に伝わり、人々は、神がエリサベツを心にかけてくださったことを心から喜び合いました。 59 子どもが生まれて八日目に、友人や親類が集まりました。その子に割礼(男子の性器の包皮を切り取る儀式)を行うためです。だれもが、子どもの名前は父親の名を継いで、「ザカリヤ」になるものとばかり思っていました。 60 ところがエリサベツは、「いいえ、この子にはヨハネという名をつけます」と言うのです。 61 「親族にそのような名前の者は一人もいないのに。」 62 人々は、父親のザカリヤに身ぶりで尋ねました。 63 ザカリヤは、書くものがほしいと合図し、それに「この子の名はヨハネ」と書いたので、みんなはびっくりしました。 64 すると、とたんにザカリヤの口が開き、話せるようになったのです。彼は神を賛美し始めました。 65 これには近所の人たちも驚き、このニュースはユダヤの山地一帯に広まりました。 66 人々はその出来事を心にとめ、「この子はいったい、将来どんな人物になるのだろう。確かにこの子には、主の守りと助けがある」とうわさしました。

67 さて、父親のザカリヤは聖霊に満たされ、こう預言しました。

68 「イスラエルの神、主をほめたたえよう。
主は来て、ご自分の民を解放し、
69 そのしもべダビデ王の血筋から、
力ある救い主を遣わされた。
70 ずっと昔から、聖なる預言者を通して
約束されたとおりに。
71 救い主は、私たちを憎むすべての敵から
救い出してくださる。
72-73 主は私たちの先祖をあわれみ、
特にアブラハムをあわれみ、
彼と結んだ聖なる契約を果たされた。
74 私たちを敵の手から解放し、
恐れず主に仕える者としてくださった。
75 私たちはきよい者、
神の前に立つにふさわしい者とされた。
76 幼い息子よ。
おまえは栄光ある神の預言者と呼ばれよう。
おまえがメシヤのために道を備え、
77 主の民に、罪を赦され、
救われる道を教えるからだ。
78 これはみな、ただ神の深いあわれみによることだ。
天の夜明けがいま訪れようとしている。
79 その光は、
暗黒と死の陰にうずくまる者たちを照らし、
私たちを平和の道へと導くのだ。」

80 ヨハネは成長し、心から神を愛する者となり、イスラエルの人々の前で公に語り始めるまで、たった一人、荒野に住んでいました。

Saral Hindi Bible

लूकॉ 1

अभिलेख का उद्देश्य

1अनेक व्यक्तियों ने उन घटनाओं को लिखकर इकट्ठा करने का कार्य किया है, जो हमारे बीच में घटी. ये सबूत हमें उनसे प्राप्त हुए हैं, जो प्रारम्भ ही से इनके प्रत्यक्षदर्शी और परमेश्वर के वचन के सेवक रहे. मैंने स्वयं हर एक घटनाओं की शुरुआत से सावधानीपूर्वक जांच की है. इसलिए परम सम्मान्य थियोफ़िलॉस महोदय, मुझे भी यह उचित लगा कि आपके लिए मैं यह सब क्रम के अनुसार लिखूँ कि जो शिक्षाएं आपको दी गई हैं, आप उनकी विश्वसनीयता को जान लें.

बपतिस्मा देने वाले योहन के जन्म की भविष्यवाणी

यहूदिया प्रदेश के राजा हेरोदेस के शासनकाल में अबियाह दल के एक याजक थे, जिनका नाम ज़कर्याह था. उनकी पत्नी का नाम एलिज़ाबेथ था, जो हारोन की वंशज थीं. वे दोनों ही परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी तथा प्रभु के सभीं आदेशों और नियमों के पालन में दोषहीन थे. उनके कोई सन्तान न थी क्योंकि एलिज़ाबेथ बाँझ थीं और वे दोनों ही अब बूढ़े हो चुके थे.

अपने दल की बारी के अनुसार जब ज़कर्याह एक दिन परमेश्वर के सामने अपनी याजकीय सेवा भेंट कर रहे थे, उन्हें पुरोहितों की रीति के अनुसार पर्ची द्वारा चुनाव कर प्रभु के मन्दिर में प्रवेश करने और धूप जलाने का काम सौंपा गया था. 10 धूप जलाने के समय बाहर सभी लोगों का विशाल समूह प्रार्थना कर था.

11 तभी ज़कर्याह के सामने प्रभु का एक स्वर्गदूत प्रकट हुआ, जो धूपवेदी की दायीं ओर खड़ा था. 12 स्वर्गदूत को देख ज़कर्याह चौंक पड़े और भयभीत हो गए 13 किन्तु उस स्वर्गदूत ने उनसे कहा, “मत डरो, ज़कर्याह! तुम्हारी प्रार्थना सुन ली गई है. तुम्हारी पत्नी एलिज़ाबेथ एक पुत्र जनेगी. तुम उसका नाम योहन रखना. 14 तुम आनन्दित और प्रसन्न होंगे तथा अनेक उसके जन्म के कारण आनन्द मनाएंगे. 15 यह बालक प्रभु की दृष्टि में महान होगा. वह दाख़रस और मदिरा का सेवन कभी न करेगा तथा माता के गर्भ से ही पवित्रात्मा से भरा हुआ होगा. 16 वह इस्राएल के वंशजों में से अनेकों को प्रभु—उनके परमेश्वर—की ओर लौटा ले आएगा. 17 वह एलियाह की आत्मा और सामर्थ में प्रभु के आगे चलने वाला बन कर पिताओं के हृदय सन्तानों की ओर तथा अनाज्ञाकारियों को धर्मी के ज्ञान की ओर फेरेगा कि एक राष्ट्र को प्रभु के लिए तैयार करें.”

18 ज़कर्याह ने स्वर्गदूत से प्रश्न किया, “मैं कैसे विश्वास करूँ—क्योंकि मैं ठहरा एक बूढ़ा व्यक्ति और मेरी पत्नी की आयु भी ढ़ल चुकी है?”

19 स्वर्गदूत ने उन्हें उत्तर दिया, “मैं गब्रिएल हूँ. मैं नित परमेश्वर की उपस्थिति में रहता हूँ. मुझे तुम्हें यह बताने और इस शुभ समाचार की घोषणा करने के लिए ही भेजा गया है. 20 और सुनो! जब तक मेरी ये बातें पूरी न हो जाए, तब तक के लिए तुम गूँगे हो जाओगे, बोलने में असमर्थ, क्योंकि तुमने मेरे वचनों पर विश्वास नहीं किया, जिसका नियत समय पर पूरा होना निश्चित है.”

21 बाहर ज़कर्याह का इंतज़ार कर रहे लोग असमंजस में पड़ गए कि उन्हें मन्दिर में इतनी देर क्यों हो रही है. 22 जब ज़कर्याह बाहर आए, वह उनसे बातें करने में असमर्थ रहे. इसलिए वे समझ गए कि ज़कर्याह को मन्दिर में कोई दर्शन प्राप्त हुआ है. वह उनसे संकेतों द्वारा बातचीत करते रहे और मौन बने रहे.

23 अपने याजकीय सेवाकाल की समाप्ति पर ज़कर्याह घर लौट गए. 24 उनकी पत्नी एलिज़ाबेथ ने गर्भधारण किया और यह कहते हुए पाँच माह तक अकेले में रहीं, 25 “प्रभु ने मुझ पर यह कृपादृष्टि की है और समूह में मेरी लज्जित स्थिति से मुझे उबार लिया है.”

मसीह येशु के जन्म की ईश्वरीय घोषणा

26 छठे माह में स्वर्गदूत गब्रिएल को परमेश्वर द्वारा गलील प्रदेश के नाज़रेथ नामक नगर में 27 एक कुँवारी कन्या के पास भेजा गया, जिसका विवाह योसेफ़ नामक एक पुरुष से होना निश्चित हुआ था. योसेफ़, राजा दाविद के वंशज थे. कन्या का नाम था मरियम. 28 मरियम को सम्बोधित करते हुए स्वर्गदूत ने कहा, “प्रभु की कृपापात्री, नमस्कार! प्रभु आपके साथ हैं.”

29 इस कथन को सुन वह बहुत ही घबरा गईं कि इस प्रकार के नमस्कार का क्या अर्थ हो सकता है. 30 स्वर्गदूत ने उनसे कहा, “मत डरिए, मरियम! क्योंकि आप परमेश्वर की कृपा की पात्र हैं. 31 सुनिए! आप गर्भधारण कर एक पुत्र को जन्म देंगी. आप उनका नाम येशु रखें. 32 वह महान होंगे. परमप्रधान के पुत्र कहलाएँगे और प्रभु परमेश्वर उन्हें उनके पूर्वज दाविद का सिंहासन सौंपेंगे, 33 वह याक़ोब के वंश पर हमेशा के लिए राज्य करेंगे तथा उनके राज्य का अन्त कभी न होगा.”

34 मरियम ने स्वर्गदूत से प्रश्न किया, “यह कैसे सम्भव होगा क्योंकि मैं तो कुँवारी हूँ?” 35 स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, “पवित्रात्मा आप पर उतरेंगे तथा परमप्रधान का सामर्थ्य आप पर छाया करेगा. इसलिए जो जन्म लेंगे, वह पवित्र और परमेश्वर-पुत्र कहलाएँगे. 36 और यह भी सुनिए: आपकी परिजन एलिज़ाबेथ ने अपनी वृद्धावस्था में एक पुत्र गर्भधारण किया है. वह, जो बाँझ कहलाती थीं, उन्हें छः माह का गर्भ है. 37 परमेश्वर के लिए असम्भव कुछ भी नहीं.” 38 मरियम ने कहा, “देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ. मेरे लिए वही सब हो, जैसा आपने कहा है.” तब वह स्वर्गदूत उनके पास से चला गया.

मरियम की एलिज़ाबेथ से भेंट

39 मरियम तुरन्त यहूदिया प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र के एक नगर को चली गईं. 40 वहाँ उन्होंने ज़कर्याह के घर पर जाकर एलिज़ाबेथ को नमस्कार किया. 41 जैसे ही एलिज़ाबेथ ने मरियम का नमस्कार सुना, उनके गर्भ में शिशु उछल पड़ा और एलिज़ाबेथ पवित्रात्मा से भर गईं. 42 वह उल्लसित शब्द में बोल उठी, “तुम सभी नारियों में धन्य हो और धन्य है तुम्हारे गर्भ का फल! 43 मुझ पर यह कैसी कृपादृष्टि हुई है, जो मेरे प्रभु की माता मुझसे भेंट करने आई हैं! 44 देखो तो, जैसे ही तुम्हारा नमस्कार मेरे कानों में पड़ा, हर्षोल्लास से मेरे गर्भ में शिशु उछल पड़ा. 45 धन्य है वह, जिसने प्रभु द्वारा कही हुई बातों के पूरा होने का विश्वास किया है!”

मरियम का स्तुति गान

46 इस पर मरियम के वचन ये थे:

“मेरा प्राण प्रभु की प्रशंसा करता है
47     और मेरी अन्तरात्मा परमेश्वर, मेरे उद्धारकर्ता में आनन्दित हुई है,
48 क्योंकि उन्होंने अपनी दासी की
    दीनता की ओर दृष्टि की है.
अब से सभी पीढ़ियाँ मुझे धन्य कहेंगी,
49     क्योंकि सामर्थी ने मेरे लिए बड़े-बड़े काम किए हैं. पवित्र है उनका नाम.
50 उनकी दया उनके श्रद्धालुओं पर पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहती है.
51 अपने भुजबल से उन्होंने प्रतापी काम किए हैं और अभिमानियों को बिखरा दिया है.
52 परमेश्वर ने राजाओं को उनके सिंहासनों से नीचे उतार दिया
    तथा विनम्रों को उठाया है.
53 उन्होंने भूखों को उत्तम पदार्थों से तृप्त किया
    तथा सम्पन्नों को खाली लौटा दिया.
54-55 उन्होंने अपने सेवक इस्राएल की सहायता अपनी उस करूणा के स्मरण में की,
    जिसकी प्रतिज्ञा उसने हमारे बाप-दादों से करी थी और जो अब्राहाम तथा उनके वंशजों पर सदा सर्वदा रहेगी”.

56 लगभग तीन माह एलिज़ाबेथ के साथ रह कर मरियम अपने घर लौट गईं.

बपतिस्मा देने वाले योहन का जन्म

57 एलिज़ाबेथ का प्रसवकाल पूरा हुआ और उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया. 58 जब पड़ोसियों और परिजनों ने यह सुना कि एलिज़ाबेथ पर यह अनुग्रह हुआ है, तो वे भी उनके इस आनन्द में सम्मिलित हो गए.

बपतिस्मा देने वाले योहन का ख़तना

59 आठवें दिन वे शिशु के ख़तना के लिए इकट्ठा हुए. वे शिशु को उसके पिता के नाम पर ज़कर्याह पुकारने लगे 60 किन्तु शिशु की माता ने उत्तर दिया; “नहीं! इसका नाम योहन होगा!”

61 इस पर उन्होंने एलिज़ाबेथ से कहा, “आपके परिजनों में तो इस नाम का कोई भी व्यक्ति नहीं है!”

62 तब उन्होंने शिशु के पिता से संकेत में प्रश्न किया कि वह शिशु का नाम क्या रखना चाहते हैं? 63 ज़कर्याह ने एक लेखन पट्ट मँगा कर उस पर लिख दिया, “इसका नाम योहन है.” यह देख सभी चकित रह गए. 64 उसी क्षण उनकी आवाज़ लौट आई. उनकी जीभ के बन्धन खुल गए और वह परमेश्वर का स्तुति करने लगे. 65 सभी पड़ोसियों में परमेश्वर के प्रति श्रद्धाभाव आ गया और यहूदिया प्रदेश के सभी पर्वतीय क्षेत्र में इसकी चर्चा होने लगी. 66 निस्सन्देह प्रभु का हाथ उस बालक पर था. जिन्होंने यह सुना, उन्होंने इसे याद रखा और यह विचार करते रहे: “क्या होगा यह बालक!”

ज़कर्याह का मंगल-गान

67 पवित्रात्मा से भरकर उनके पिता ज़कर्याह इस प्रकार भविष्यवाणियों का वर्णानुभाषण करना शुरू किया:

68 “धन्य हैं प्रभु, इस्राएल के परमेश्वर,
    क्योंकि उन्होंने अपनी प्रजा की सुधि ली और उसका उद्धार किया.
69 उन्होंने हमारे लिए अपने सेवक दाविद के वंश में
    एक उद्धारकर्ता उत्पन्न किया है,
70 (जैसा उन्होंने प्राचीन काल के अपने पवित्र भविष्यद्वक्ताओं के माध्यम से प्रकट किया)
71 शत्रुओं तथा उन सब से, जो हमसे घृणा करते हैं, बचाए रखा
72 कि वह हमारे पूर्वजों पर अपनी कृपादृष्टि प्रदर्शित करें
    तथा अपनी पवित्र वाचा को पूरा करें;
73 वही वाचा,
जो उन्होंने हमारे पूर्वज अब्राहाम से स्थापित की थी:
74-75 वह हमें हमारे शत्रुओं से छुड़ाएंगे कि हम पवित्रता और धार्मिकता में
    निर्भय हो जीवन भर उनकी सेवा कर सकें.

76 “और बालक तुम, मेरे पुत्र, परमप्रधान परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता कहलाओगे;
    क्योंकि तुम उनका मार्ग तैयार करने के लिए प्रभु के आगे-आगे चलोगे,
77 तुम परमेश्वर की प्रजा को
    उसके पापों की क्षमा के द्वारा उद्धार का ज्ञान प्रदान करोगे.
78 हमारे परमेश्वर की अत्याधिक कृपा के कारण स्वर्ग से हम पर प्रकाश का उदय
79 होगा उन पर, जो अन्धकार और मृत्यु की छाया में हैं;
    कि इसके द्वारा शान्ति के मार्ग पर हमारा मार्गदर्शन हो.”

80 बालक योहन का विकास होता गया तथा वह आत्मिक रूप से भी बलवन्त होते गए. इस्राएल के सामने सार्वजनिक रूप से प्रकट होने के पहले वह जंगल में निवास करते रहे.