Hoffnung für Alle

Ruth 1:1-22

Ruths Treue und ihre Reise nach Israel

(Kapitel 1)

»Dein Gott ist mein Gott!«

1-2Zu der Zeit, als das Volk Israel von Männern geführt wurde, die man Richter nannte, brach im Land eine Hungersnot aus. Darum verließ ein Mann namens Elimelech aus der Sippe Efrat die Stadt Bethlehem in Juda, wo er gewohnt hatte. Er ging mit seiner Frau Noomi und seinen beiden Söhnen Machlon und Kiljon ins Land Moab und ließ sich dort nieder.

3Doch dann starb Elimelech, und Noomi blieb mit ihren Söhnen allein zurück. 4Die beiden heirateten zwei Frauen aus Moab, sie hießen Orpa und Ruth. Nach etwa zehn Jahren 5starben auch Machlon und Kiljon. Nun hatte Noomi keinen Mann und keine Söhne mehr.

6-7Bald darauf erfuhr sie, dass der Herr sich über sein Volk erbarmt und ihm wieder eine gute Ernte geschenkt hatte. Sofort brach sie auf, um in ihre Heimat Juda zurückzukehren. Ihre Schwiegertöchter begleiteten sie.

8Unterwegs sagte Noomi zu ihnen: »Geht doch wieder zurück in euer Elternhaus, kehrt um! Möge der Herr euch so viel Liebe erweisen, wie ihr sie den Verstorbenen und mir entgegengebracht habt! 9Er gebe euch ein neues Zuhause an der Seite eines zweiten Mannes!«

Sie küsste ihre Schwiegertöchter. Die beiden fingen an zu weinen 10und widersprachen ihr: »Nein, wir wollen mit dir zu deinem Volk gehen!« 11Doch Noomi entgegnete: »Kehrt doch um, meine Töchter! Warum wollt ihr mich unbedingt begleiten? Ich werde keine Söhne mehr zur Welt bringen, die eure Männer werden könnten.1,11 Vgl. 5. Mose 25,5‒10. 12Kehrt um, meine Töchter, geht! Ich bin zu alt, um wieder zu heiraten. Und selbst wenn ich die Hoffnung nicht aufgeben würde, ja, wenn ich noch heute Nacht einen Mann bekommen und dann Söhne zur Welt bringen würde: 13Wollt ihr etwa so lange warten, bis sie erwachsen sind? Wollt ihr euch bis dahin von allen Männern fernhalten und jede Gelegenheit ausschlagen, noch einmal zu heiraten? Nein, meine Töchter! Der Herr hat sich gegen mich gewandt, euch jedoch möchte ich das harte Schicksal ersparen, das mich getroffen hat.«

14Da weinten die beiden noch mehr. Orpa küsste ihre Schwiegermutter zum Abschied, Ruth aber wollte sie auf keinen Fall verlassen. 15Da forderte Noomi sie auf: »Schau, deine Schwägerin kehrt zu ihrem Volk und zu ihrem Gott zurück. Geh doch mit ihr!«

16Aber Ruth erwiderte: »Besteh nicht darauf, dass ich dich verlasse! Ich will mich nicht von dir trennen. Wo du hingehst, da will auch ich hingehen. Wo du bleibst, da bleibe ich auch. Dein Volk ist mein Volk, und dein Gott ist mein Gott. 17Wo du stirbst, will ich auch sterben und begraben werden. Nur der Tod kann mich von dir trennen; wenn ich dieses Versprechen nicht halte, soll der Herr mich hart bestrafen!«

18Noomi merkte, dass Ruth darauf bestand, mit ihr zu gehen, und so versuchte sie nicht mehr, sie zur Umkehr zu überreden. 19Zu zweit setzten sie ihren Weg nach Bethlehem fort. Als sie dort ankamen, ging es wie ein Lauffeuer durch die Stadt. »Ist das nicht Noomi?«, riefen die Frauen.

20»Nennt mich nicht länger Noomi (›die Fröhliche‹)«, erwiderte sie, »nennt mich Mara (›die Betrübte‹), denn der allmächtige Gott hat mir ein schweres Schicksal auferlegt: 21Als ich von hier fortzog, hatte ich alles, was man sich nur wünschen kann. Jetzt lässt mich der Herr mit leeren Händen zurückkehren. Warum nennt ihr mich also noch Noomi? Der Herr hat sein Urteil gegen mich gesprochen; er, der Allmächtige, hat mir bitteres Leid zugefügt.«

22Als Noomi mit ihrer moabitischen Schwiegertochter Ruth nach Bethlehem kam, begann gerade die Gerstenernte.

Hindi Contemporary Version

रूथ 1:1-22

1न्यायधिशों के शासनकाल में सारे देश में अकाल पड़ा. यहूदिया के बेथलेहेम नगर का एक व्यक्ति अपनी पत्नी तथा पुत्रों के साथ मोआब देश में बस गया. 2इस व्यक्ति का नाम एलिमेलेख, उसकी पत्नी का नाम नावोमी तथा उसके पुत्रों के नाम महलोन तथा किलयोन थे. ये यहूदाह के बेथलेहेम के इफ्ऱथ परिवार से थे.

3कुछ समय बाद एलिमेलेख की मृत्यु हो गई. अब नावोमी अपने पुत्रों के साथ अकेली रह गई. 4उनके पुत्रों ने मोआब देश की ही युवतियों से विवाह कर लिया. एक नाम था ओरपाह और दूसरी का रूथ. मोआब देश में उनके लगभग दस वर्ष रहने के बाद, 5महलोन तथा किलयोन की मृत्यु हो गई. अब नावोमी अपने दोनों पुत्रों तथा पति के बिना अकेली रह गई थी.

नावोमी के प्रति रूथ की निष्ठा

6यह पता पड़ने पर कि याहवेह ने अपनी प्रजा को भोजन देकर उनकी सुधि ली है, नावोमी ने अपनी दोनों बहुओं के साथ मोआब देश से यहूदिया को लौट जाने का विचार किया. 7तब जहां वह रह रही थी वह स्थान छोड़कर अपनी बहुओं के साथ यहूदिया के मार्ग पर चल पड़ीं.

8मार्ग में नावोमी ने अपनी बहुओं से कहा, “तुम दोनों अपने-अपने मायके लौट जाओ. याहवेह तुम पर वैसे ही दयालु हों जैसी तुम मृतकों तथा मुझ पर दयालु रही हो. 9याहवेह की कृपादृष्टि में तुम्हें अपने-अपने होने वाले पति के घर में सुख-शांति प्राप्त हो.”

तब नावोमी ने उनको चूमा और वे फफक-फफक कर रोती रहीं. 10उन्होंने नावोमी को उत्तर दिया, “नहीं, हम आपके साथ, आपके ही लोगों में जा रहेंगी.”

11किंतु नावोमी ने उनसे कहा, “मेरी पुत्रियो, तुम भला क्यों मेरे साथ जाओगी? क्या अब भी मेरे गर्भ में पुत्र हैं, जो तुम्हारे पति बन सकें? 12लौट जाओ मेरी पुत्रियो, लौट जाओ, क्योंकि मेरी आयु वह नहीं रही, कि मैं दोबारा विवाह कर सकूं. यदि मैं यह भी कहूं कि मुझे आशा है, यदि मैं आज रात विवाह कर गर्भधारण भी कर लूं, 13तो क्या तुम उनके युवा होने का इंतजार करोगी? तो क्या तुम तब तक विवाह न करोगी? नहीं, मेरी पुत्रियो, मेरे हृदय का दुःख बहुत ही गहरा है, क्योंकि स्वयं याहवेह मेरे विरुद्ध हो गए हैं!”

14तब वे दोबारा फफक-फफक कर रोने लगीं. तब ओरपाह ने अपनी सास को चूमा और उनसे विदा हो गई, किंतु रूथ ने अपनी सास को न छोड़ा.

15नावोमी ने रूथ से कहा, “सुनो, तुम्हारी जेठानी तो अपने लोगों तथा अपने देवताओं के पास लौट गई है. तुम भी अपनी जेठानी के समान लौट जाओ.”

16किंतु रूथ ने उसे उत्तर दिया, “आप मुझे न तो लौट जाने के लिए मजबूर करें और न आपको छोड़ने के लिए, क्योंकि आप जहां भी जाएंगी, मैं आपके ही साथ जाऊंगी और जहां आप रहेंगी, मैं वहीं रहूंगी. आपके लोग मेरे लोग होंगे तथा आपके परमेश्वर मेरे परमेश्वर 17जिस स्थान पर आप आखिरी सांस लें, मैं भी वहीं आखिरी सांस लूं और वहीं मुझे भी मिट्टी दी जाए. अब यदि मृत्यु के अलावा मेरा आप से अलग होने का कोई और कारण हो तो याहवेह मुझे कठोर से कठोर दंड दें.” 18जब नावोमी ने यह देखा कि रूथ उनके साथ जाने के लिए दृढ़ निश्चयी है, तब उन्होंने रूथ को मजबूर करने की और कोशिश न की.

19तब वे आगे बढ़ती गई और वे बैथलेहम पहुंच गई. जब उन्होंने बेथलेहेम नगर में प्रवेश किया, उन्हें देख नगर में उत्तेजना की लहर दौड़ गई. अचंभे में स्त्रियां पूछने लगीं, “कहीं यह नावोमी तो नहीं?”

20“मत कहो मुझे नावोमी1:20 अर्थ: सुहानी! मारा1:20 अर्थ: कड़वा कहो मुझे, मारा! उसने उत्तर दिया, क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मेरे जीवन को कड़वाहट से भर दिया है. 21मैं यहां से तो भरी पूरी गई थी किंतु याहवेह मुझे यहां खाली हाथ लौटा लाएं हैं. तब मुझे नावोमी क्यों पुकारा जाए? जब याहवेह ने ही मुझे यह दंड दिया है तथा सर्वशक्तिमान द्वारा ही मुझ पर यह मुसीबत डाली गई है.”

22इस प्रकार नावोमी मोआब देश से अपनी बहू रूथ के साथ, जो मोआब की रहनेवाली थी लौट आई. बेथलेहेम नगर में यह जौ की कटाई का समय था.