Hoffnung für Alle

2. Mose 1:1-22

Die Befreiung des Volkes Israel aus Ägypten

(Kapitel 1,1–15,21)

Das Volk Israel in Ägypten

1Dies sind die Namen der Israeliten, die mit ihrem Vater Jakob und ihren Familien nach Ägypten gekommen waren: 2Ruben, Simeon, Levi, Juda, 3Issachar, Sebulon, Benjamin, 4Dan, Naftali, Gad und Asser. 5Insgesamt waren es siebzig Personen, und alle stammten von Jakob ab. Josef, auch ein Sohn Jakobs, hatte bereits vorher in Ägypten gelebt.

6Nach und nach waren Josef und seine Brüder gestorben, und schließlich lebte von ihrer Generation niemand mehr. 7Ihre Nachkommen aber vermehrten sich und wuchsen zu einem großen Volk heran. Bald waren es so viele geworden, dass sie das ganze Land bevölkerten.

8Da trat ein neuer König die Herrschaft an, der von Josef nichts mehr wusste. 9Er sagte zu den Ägyptern: »Ihr seht, dass die Israeliten schon fast zahlreicher und mächtiger sind als wir. 10Wir müssen uns etwas einfallen lassen, damit dieses Volk nicht noch weiter wächst! Denn sonst laufen sie womöglich zu unseren Feinden über, wenn ein Krieg ausbrechen sollte. Dann könnten sie gegen uns kämpfen und das Land in ihre Gewalt bringen1,10 Oder: das Land verlassen.

11So zwang man die Israeliten zur Sklavenarbeit und setzte Aufseher über sie ein. Sie mussten für den Pharao die Vorratsstädte Pitom und Ramses bauen. 12Doch je mehr die Israeliten unterdrückt wurden, desto zahlreicher wurden sie. Sie breiteten sich im ganzen Land aus, so dass es den Ägyptern langsam unheimlich wurde. 13Darum zwangen sie die Israeliten erbarmungslos zu harter Arbeit 14und machten ihnen das Leben schwer: Sie mussten aus Lehm Ziegel herstellen und auf den Feldern arbeiten.

15Den israelitischen Hebammen Schifra und Pua befahl der ägyptische König: 16»Wenn ihr von den hebräischen Frauen zur Geburt gerufen werdet und seht, dass ein Junge zur Welt kommt, dann tötet ihn sofort! Ist es ein Mädchen, könnt ihr es am Leben lassen!« 17Aber aus Ehrfurcht vor Gott hielten sich die Hebammen nicht an den königlichen Befehl, sondern ließen die Jungen am Leben.

18Als der König sie deswegen zur Rede stellte, 19erklärten sie: »Die hebräischen Frauen sind viel kräftiger als die Ägypterinnen. Ehe wir zu ihnen kommen, haben sie ihr Kind schon geboren!«

20-21Weil die Hebammen Ehrfurcht vor Gott hatten, tat er ihnen Gutes und schenkte ihnen eigene Familien und Kinder. Das Volk Israel wurde immer größer und mächtiger. 22Schließlich befahl der Pharao den Ägyptern: »Werft alle neugeborenen Jungen der Hebräer in den Nil, nur die Mädchen lasst am Leben!«

Hindi Contemporary Version

निर्गमन 1:1-22

मिस्र देश से इस्राएल का निकलना

1याकोब के साथ मिस्र में अपने-अपने घराने के साथ आकर रहनेवाले इस्राएलियों के नाम निम्नलिखित हैं:

2रियूबेन, शिमओन, लेवी और यहूदाह;

3इस्साकार, ज़ेबुलून तथा बिन्यामिन;

4दान एवं नफताली;

गाद एवं आशेर.

5याकोब के वंश में सत्तर जन थे, योसेफ़ पहले ही मिस्र में थे.

6वहां योसेफ़ और उनके सभी भाई तथा पूरी पीढ़ी के लोगों की मृत्यु हो गई थी 7इस्राएली बहुत फलवंत थे और वे बढ़ते चले गए, और बहुत सामर्थ्यी होकर पूरे देश में भर गए.

8फिर मिस्र में एक नया राजा बना, जो योसेफ़ को नहीं जानता था. 9उसने अपनी प्रजा से यह कहा, “इस्राएल के लोग संख्या में और बल में हमसे अधिक है. 10इसलिये हम समझदारी से रहें, ये लोग तो बढ़ते जाएंगे ऐसा न हो कि युद्ध की स्थिति में हमारे शत्रुओं के साथ मिलकर, हमसे ही युद्ध करने लगें और देश छोड़कर चले जाएं.”

11इस विचार से उन्होंने इस्राएलियों को कड़ी मेहनत कराने के उद्देश्य से ठेकेदार नियुक्त कर दिए. तब फ़रोह के लिए पिथोम तथा रामेसेस नगर बनाए. 12जितना इस्राएलियों को कष्ट दिया गया, उतने ही वे बढ़ते और देश में फैलते गए, इसलिये इस्राएली मिस्रवासियों के लिए डर का कारण बन गये. 13मिस्री इस्राएलियों से कठोर मेहनत कराते रहे. 14इस प्रकार मिस्रियों ने इस्राएलियों के जीवन को दुखी कर दिया. उन्हें गारे तथा ईंट के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी. सभी कामों में उन्हें दुखी कर सताया जाता था.

15यह देख मिस्र देश के राजा ने इब्री धायों को बुलवाया. इनमें एक का नाम शिफ्राह तथा दूसरी का पुआह था. 16राजा ने उनसे कहा कि, “इब्री स्त्रियों का प्रसव कराते समय जैसे ही तुम्हें यह पता चले कि लड़का है, तुम उसकी हत्या कर देना; किंतु यदि वह पुत्री हो, तो उसे जीवित रहने देना.” 17किंतु धायें परमेश्वर का भय मानने वालीं थी. इस कारण उन्होंने राजा कि बात नहीं मानी; वे पुत्रों को जीवित छोड़ती चली गईं. 18इसलिये राजा ने धायों को बुलवाया और उनसे पूछा, “तुम ऐसा क्यों कर रही हो? क्यों लडकों को जीवित छोड़ रही हो?”

19उन्होंने फ़रोह को उत्तर दिया, “इब्री स्त्रियां मिस्री स्त्रियों के समान नहीं होती; वे हृष्ट-पुष्ट होती हैं, इसलिये हमारे पहुंचने से पहले ही प्रसव कर चुकी होती हैं.”

20इस कारण परमेश्वर की दया उन धायों पर बनी रही, इस्राएली बढ़ते और शक्तिशाली होते गए. 21धायों के मन में परमेश्वर का भय था, इस कारण परमेश्वर ने उनको अपने परिवार दिये.

22फिर फ़रोह ने सब लोगों से कहा कि “हर नवजात पुत्र को, जो तुम्हारे आस-पास जन्म लेता है, उन्हें नील नदी में फेंक दिया करना, किंतु पुत्री को जीवित रहने देना.”