Habrit Hakhadasha/Haderekh

אגרת פולוס השליח אל-הרומיים 11:1-36

1מתעוררת השאלה: האם זנח אלוהים את עמו? חס וחלילה! הרי אני עצמי יהודי, מזרעו של אברהם אבינו ומשבט בנימין. 2לא, אלוהים לא הפקיר את עמו, שבו בחר עוד מבראשית. האם אינכם זוכרים מה אומרים הכתובים על אליהו הנביא? אליהו זעק אל אלוהים והתלונן על עם־ישראל:11‏.2 יא 2 מלכים א יט 10,14 3”את מזבחתיך הרסו ואת נביאיך הרגו בחרב, ואיותר אני לבדי ויבקשו את נפשי לקחתה“.

4ומה ענה לו אלוהים? ”השארתי בישראל שבעת אלפים אשר לא כרעו (ברכיים) לבעל.“

5גם היום לא כל היהודים פנו עורף לאלוהים; יש ביניהם כאלה שנושעו – לפי בחירתו וחסדו של אלוהים. 6ואם הם נבחרו בזכות חסדו של אלוהים, משמע שלא נבחרו בזכות מעשיהם הטובים. אילו נבחרו בזכות מעשיהם הטובים לא היה זה חסד, כי חסד זה מתנה ולא גמול לעבודה.

7מה המסקנה? רוב היהודים לא השיגו את הצדקה אשר ביקשו, רק מעטים השיגו – אלה שבחר אלוהים – ואילו האחרים נעשו עיוורים לאמת. 8כפי שכתוב בישעיהו:11‏.8 יא 8 ישעיהו ו 9; כט 10 ה׳ הרדים את עם ישראל, ועל כן הם הביטו אך לא ראו, שמעו אך לא הבינו. 9ודוד אמר בתהלים11‏.9 יא 9 תהלים סט 23‏-24 שהשפע והאוכל שלהם יטמנו להם פח, ויביאו אותם למחשבה שהכול כשורה בינם לבין אלוהים. 10עיניהם תחשכנה והם יכרעו תחת מעמסה כבדה.

11האם פירוש הדבר שאלוהים הפקיר את עמו והתכחש אליו? ודאי שלא! מאחר שהיהודים חטאו העניק אלוהים לגויים ישועה ורצון להיוושע, כדי לעורר את קנאת היהודים ואת רצונם להיוושע. 12ואם חטאם של היהודים הביא עושר שכזה לעולם, תארו לעצמכם איזו ברכה יביאו היהודים לעולם כאשר יחזרו בתשובה ויאמינו במשיח!

13עתה אני מדבר אליכם, הגויים: כידוע לכם מינה אותי אלוהים לבשר לכם את בשורתו, ואני מבצע את המוטל עלי על הצד הטוב ביותר. 14אולי כך אוכל לעורר את קנאתם של היהודים, בני־עמי, ואחדים מהם ייוושעו. 15אם המרידות שלהם באלוהים הביאה לעולם סליחת חטאים, תארו לעצמכם מה תהיה תוצאת חזרתם בתשובה – ממש תחיית המתים! 16אם החלה המוקדשת לה׳ קודש היא, כך כל העיסה, ואם שורש העץ קודש לה׳ – כך גם הגזע והענפים.

17אם חלק מהענפים – חלק מהיהודים – נכרתו, ובמקומם אתה, ענף זית בר, הורכבת על העץ, חוברת לשורשיו ונהנית ממזונו העשיר, 18אל תתפאר, ואל תזלזל בענפים שנכרתו! אם תחוש גאווה, הזכר לעצמך כי יש לך חשיבות כלשהי רק משום שאלוהים הרכיב אותך על העץ, לפי תוכניתו. מלבד זאת, לא אתה נושא את העץ – אתה אינך אלא ענף; השורש הוא הנושא אותך ואת העץ! 19אם תאמר: ”אבל הענפים ההם נכרתו כדי שלי – הגוי – יהיה מקום בעץ, ומשום כך אני חשוב.“ 20זכור, היהודים נכרתו משום שלא האמינו, ואתה הורכבת רק משום שהאמנת. אל תתגאה בעצמך, אלא הישמר לך, והתייחס אל אלוהים בכבוד וביראה. 21כי אם אלוהים לא חס על הענפים הטבעיים, הוא לא יחוס גם עליך. 22שימו לב, אלוהים הוא טוב לב, ויחד עם זאת קפדן ומחמיר. הוא מחמיר עם אלה שאינם מצייתים לו, אולם הוא ייטיב אתכם, אם תמשיכו לאהוב אותו ולבטוח בו. אם לא תאהבו אותו ולא תבטחו בו, הוא יכרות גם אתכם. 23דעו לכם שאם היהודים יאמינו, אלוהים ירכיבם חזרה על העץ. אל תחשבו שהדבר למעלה מכוחו!

24אם אלוהים היה מוכן לקחת אתכם, הגויים, שהייתם רחוקים ממנו כל־כך והייתם ענפי זית בר, ולהרכיבכם על עץ הזית שלו שהוא ממין משובח, האם אינכם חושבים שישמח יותר להרכיב חזרה על העץ את היהודים, אשר היו הענפים הטבעיים?

25אחי היקרים, איני רוצה להעלים מכם את האמת, פן תתגאו בעצמכם. נכון שיהודים רבים אינם מאמינים בבשורת אלוהים, אך מצב זה יימשך רק עד שכל הגויים, אשר נבחרו על־ידי אלוהים, יאמינו בו. 26ואז כל עם־ישראל ייוושע, ככתוב:11‏.26 יא 26 ישעיה נט 20 ”ובא מציון גואל וישיב פשע מיעקב.“ 27אלוהים אף אמר שיכרות ברית עם ישראל ויסלח לחטאיהם.11‏.27 יא 27 ירמיהו לא

28יהודים רבים הם עתה אויבי הבשורה; הם שונאים אותה. אולם כל זה היה לתועלת שלכם, כי בגלל יחסם זה העניק לכם אלוהים את אוצרותיו. אבל עלינו לזכור שהיהודים הם עדיין עמו הנבחר של אלוהים, בזכות הבטחותיו לאברהם, יצחק ויעקב. 29שהרי אלוהים לעולם אינו מתחרט על דבריו, ולעולם אינו דורש חזרה את מתנותיו. 30פעם גם אתם מרדתם באלוהים, אך הוא ריחם עליכם. 31עתה היהודים הם המורדים והסרבנים, ברם יום אחד הם יחזרו בתשובה, ואלוהים ירחם גם עליהם כפי שריחם עליכם. 32כי אלוהים הסגיר לידי החטא את כל בני־האדם, כדי שיוכל לרחם על כולם.

33מה נפלא הוא אלוהינו! מה עמוקה ועשירה חכמתו! מה עשירה דעתו! דרכיו ומשפטיו הם למעלה מכושר הבנתנו ותפיסתנו. 34מי מאיתנו יודע את מחשבותיו? מי חכם דיו כדי לייעץ לו? 35או מי העניק לו מעולם מתנה המזכה אותו בגמול? 36הרי הכול בא מאלוהים לבדו. הכול נברא על־ידו ולכבודו. לאלוהים הכבוד לעולם. – אמן.

New Chhattisgarhi Translation (नवां नियम छत्तीसगढ़ी)

रोमीमन 11:1-36

इसरायलीमन ऊपर परमेसर के दया

1तब मेंह ए पुछत हंव, का परमेसर ह अपन मनखेमन ला तियाग दीस? बिलकुल नइं! मेंह खुद एक इसरायली मनखे अंव, अऊ मेंह अब्राहम के बंस अऊ बिन्यामीन के गोत्र के अंव। 2परमेसर ह अपन मनखेमन ला नइं तियागे हवय, जऊन मन ला ओह सुरू ले चुनिस। का तुमन नइं जानव कि परमेसर के बचन ह एलियाह अगमजानी के बारे म का कहिथे? ओह इसरायलीमन के बिरोध म परमेसर ले बिनती करिस: 3“हे परभू, ओमन तोर अगमजानीमन ला मार डारिन अऊ तोर बेदीमन ला गिरा दे हवंय। सिरिप मेंह भर बांचे हवंव, अऊ ओमन मोला घलो मार डारे के कोसिस म हवंय।”11:3 1राजा 19:10, 14 4अऊ परमेसर ह ओला का जबाब दीस? ओह कहिस, “मेंह अपन बर सात हजार मनखेमन ला बंचाके रखे हवंव, जऊन मन बाल देवता के आघू म माड़ी नइं टेके हवंय।”11:4 1राजा 19:18 5एही किसम ले, ए समय म घलो कुछू मनखेमन बांचे हवंय, जऊन मन परमेसर के अनुग्रह के दुवारा चुने गे हवंय। 6अऊ यदि एह परमेसर के अनुग्रह ले होईस, त फेर एह बने करम करे के आधार म नो हय। यदि एह बने करम करे के आधार म होतिस, त फेर अनुग्रह के कोनो मतलब नइं होतिस।

7तब एकर का मतलब ए? इसरायली मनखेमन जेकर खोज म रिहिन, ओह ओमन ला नइं मिलिस, पर ओह चुने गय मनखेमन ला मिलिस। आने मनखेमन के हिरदय ला कठोर करे गीस, 8जइसने कि परमेसर के बचन म लिखे हवय:

“परमेसर ह ओमन के बुद्धि ला जड़ कर दे हवय,

ओह ओमन ला अइसने आंखी दे हवय, जऊन ह देखय नइं,

अऊ अइसने कान दे हवय,

जऊन ह सुनय नइं; ओमन के दसा आज तक अइसनेच हवय।”11:8 ब्यवस्था 29:4; यसायाह 29:10

9अऊ दाऊद राजा ह कहिथे,

“ओमन के भोजन ह ओमन बर फांदा अऊ जाल बन जावय;

ओह ओमन बर ठोकर अऊ सजा के कारन बन जावय।

10ओमन के आंखी म अंधियार छा जावय, ताकि ओमन झन देख सकंय,

अऊ ओमन के कनिहां ह सदाकाल बर मुड़ जावय।”11:10 भजन-संहिता 69:22-23

कलम करके लगाय डंगाली

11मेंह फेर पुछत हंव, का इसरायलीमन एकरसेति ठोकर खाईन कि ओमन हमेसा के खातिर गिर पड़ंय? बिलकुल नइं! पर इसरायलीमन के पाप के कारन आनजातमन ला उद्धार मिलिस कि इसरायलीमन ला जलन होवय। 12यदि इसरायलीमन के पाप ह संसार बर आसिस लानथे, अऊ ओमन के नुकसान ह आनजातमन बर आसिस के कारन बनथे, त फेर जब जम्मो इसरायलीमन परमेसर करा लहुंटके आहीं, त आनजातमन ला अऊ कतेक आसिस मिलही।

13अब मेंह तुमन ले गोठियावत हंव, आनजातमन हो! जब तक मेंह तुमन खातिर प्रेरित अंव, तब तक मेंह अपन सेवा ला बढ़ावत हंव, 14ताकि कोनो भी किसम ले, मेंह अपन यहूदी मनखेमन म जलन पैदा करंव अऊ ओम के कुछू झन के उद्धार होवय। 15काबरकि यदि ओमन के तियागे जवई ह परमेसर के संग संसार के मेल मिलाप के कारन बनिस, त ओमन के गरहन करे जवई के मतलब ओमन बर जिनगी होही, जऊन मन मर गे हवंय। 16यदि पहिली फर के रूप म, परमेसर ला चघाय गुंथे पिसान के कुछू भाग ह पबितर अय, त फेर जम्मो गुंथे पिसान ह घलो पबितर अय, अऊ यदि रूख के जरी ह पबितर अय, त फेर ओ रूख के डंगालीमन घलो पबितर अंय।

17यदि जैतून रूख के कुछू डंगालीमन ला टोर देय गे हवय; अऊ ओमन के जगह म, तुमन ला जऊन मन जंगली जैतून रूख के पीका सहीं अव, जोड़े गे हवय अऊ तुम्‍हर पालन-पोसन ओ जैतून रूख के जरी ले होवत हवय, याने कि तुम आनजातमन यहूदीमन के आसिस म भागीदार हो गे हवव, 18त ओ डंगाली ऊपर घमंड झन कर। यदि तेंह घमंड करथस, त ए बात ला सुरता रख कि तेंह जरी ला नइं संभाले हवस, पर जरी ह तोला संभाले हवय। 19तब तेंह कहिबे, “डंगालीमन ला टोरे गीस ताकि मेंह ओमन के जगह म जोड़े जावंव।” 20एह सही ए। ओमन ला ओमन के अबिसवास के कारन टोरे गीस, पर तेंह बिसवास के दुवारा ओम बने हवस। एकरसेति, घमंड झन कर, पर परमेसर के भय मानके चल। 21काबरकि यदि परमेसर ह यहूदीमन ला नइं छोंड़िस, जऊन मन असली डंगाली अंय, त ओह तोला घलो नइं छोंड़य।

22एकरसेति, परमेसर के दया अऊ कठोरता के बारे म सोच। जऊन मन गिर गीन, ओमन ऊपर ओह कठोरता देखाईस, पर तोर ऊपर ओह दया देखाईस, त तेंह ओकर दया म बने रह। नइं तो ओह तोला घलो काटके अलग कर दिही। 23अऊ यदि ओ यहूदीमन अपन अबिसवास ला छोंड़ देथें, त ओमन घलो जोड़े जाहीं, काबरकि परमेसर करा ओमन ला फेर जोड़े के सामरथ हवय। 24जब तुम आनजातमन सुभाव ले जंगली जैतून के डंगाली अव, अऊ सुभाव के उल्टा, तुमन ला काटके असली जैतून रूख म जोड़े गे हवय, त फेर ए यहूदी जऊन मन सुभाविक डंगाली अंय, अपन ही जैतून रूख म काबर अऊ बने ढंग ले जोड़े नइं जाही?

जम्मो इसरायलीमन बंचाय जाहीं

25हे भाईमन हो, अइसन झन होवय कि तुमन घमंडी हो जावव, एकरसेति मेंह चाहत हंव कि तुमन ए भेद ला जानव: जब तक आनजात म ले चुने जम्मो मनखेमन परमेसर करा नइं आ जावंय, तब तक इसरायलीमन के एक भाग ह अइसनेच अपन हिरदय ला कठोर बनाय रखही। 26अऊ ए किसम ले जम्मो इसरायलीमन उद्धार पाहीं, जइसने परमेसर के बचन म लिखे हवय:

“मुक्ति देवइया ह सियोन ले आही;

ओह याकूब के बंस ले अभक्ति ला दूरिहा कर दिही11:26 ए पद म “सियोन” के मतलब अय – “इसरायल के मनखेमन”।

27अऊ ओमन के संग मोर ए करार होही,

जब मेंह ओमन के पाप ला दूरिहा कर दूहूं।”

28जहां तक सुघर संदेस के बात ए, त ओमन तुम्‍हर हित म परमेसर के बईरी अंय; पर जहां तक चुने गय मनखेमन के बात ए, त ओमन अपन पुरखामन के कारन परमेसर के मयारू अंय। 29काबरकि जब परमेसर ह कोनो ला बरदान देथे अऊ चुनथे, त ओह अपन बिचार ला फेर नइं बदलय। 30एक समय रिहिस, जब तुम आनजातमन परमेसर के हुकूम ला नइं मानेव, पर अब यहूदीमन के दुवारा हुकूम नइं माने के कारन, तुम्‍हर ऊपर परमेसर के दया होईस। 31तुम्‍हर ऊपर परमेसर के दया होय के कारन अब यहूदीमन परमेसर के हुकूम नइं मानथें, ताकि ओमन के ऊपर घलो परमेसर के दया होवय। 32काबरकि परमेसर ह जम्मो मनखेमन ला हुकूम नइं माने के पाप म बांधके रखे हवय ताकि ओह जम्मो झन के ऊपर दया देखावय।

परमेसर के इस्तुति

33अहा! परमेसर के धन, बुद्धि अऊ गियान ह कतेक अथाह अय!

ओकर सहीं नियाय कोनो नइं कर सकंय,

अऊ ओकर काम करे के तरिका ला कोनो नइं जान सकंय!

34“परभू के मन के बिचार ला कोनो नइं जान सकंय।

अऊ कोनो ओला सलाह देय के लइक नो हंय।”11:34 यसायाह 40:13

35“आज तक परमेसर ला कोनो कुछू

नइं दे हवंय कि परमेसर ह ओला वापिस देवय।”11:35 अयूब 41:11

36काबरकि जम्मो चीज ह परमेसर ले आय हवय, अऊ ओकर दुवारा बनाय गे हवय अऊ ओकर खातिर बनाय गे हवय।

ओकर महिमा सदाकाल तक होवत रहय! आमीन।