Chinese Contemporary Bible (Traditional)

但以理書 9:1-27

但以理為同胞禱告

1瑪代亞哈隨魯的兒子大流士被立為迦勒底國的王元年, 2即他統治的第一年,我但以理從經書上耶和華給耶利米先知的話得知,耶路撒冷必荒涼七十年。

3我便禁食,身披麻衣,頭蒙灰塵,向主上帝禱告祈求。 4我向我的上帝耶和華禱告、認罪,說:「主啊,你是偉大而可畏的上帝,你向那些愛你、遵守你誡命的人信守你的慈愛之約。 5我們犯罪作惡,行為邪惡叛逆,偏離你的誡命和典章, 6沒有聽從你的僕人——眾先知奉你的名向我們的君王、首領、先祖及國中百姓所說的話。 7主啊,你是公義的,我們今日滿面羞愧,我們猶大人和耶路撒冷的居民,以及因對你不忠而被驅散到遠近各地的以色列人都滿面羞愧。 8主啊,我們和我們的君王、首領、先祖因得罪了你而滿臉羞愧。 9雖然我們背叛了主——我們的上帝,祂卻有憐憫和饒恕之心。 10我們沒有聽從我們的上帝耶和華的話,沒有遵行祂藉祂的僕人——眾先知給我們頒佈的律法。 11以色列人都違背你的律法,偏離正道,不聽從你的話。你僕人摩西的律法書上所記載的咒詛和審判都落在了我們身上,因為我們得罪了你。 12你把大災難降在我們身上,應驗了你警告我們和我們官長的話。耶路撒冷遭遇的災禍普天之下從未有過。 13這一切災禍降在了我們身上,正如摩西律法書的記載。然而,我們的上帝耶和華啊,我們卻沒有離開罪惡,認識你的真理,以便懇求你施恩。 14所以耶和華決意使災禍降在我們身上,因為我們的上帝耶和華的一切作為都是公義的,我們卻沒有聽從祂的話。

15「主——我們的上帝啊,你曾用大能的手把你的子民領出埃及,使自己威名遠揚直到今日。我們卻犯罪作惡。 16主啊,你一向公義,求你不要向你的耶路撒冷城——你的聖山發烈怒。由於我們的罪惡和我們祖先的過犯,耶路撒冷和你的子民成了四圍鄰人嘲諷的對象。 17我們的上帝啊,求你垂聽僕人的禱告祈求,為你自己的緣故,笑顏垂顧你荒涼的聖所。 18我的上帝啊,求你側耳垂聽,睜眼眷顧我們荒涼的土地和屬於你名下的城。我們向你祈求,並非因為我們有什麼義行,乃是因為你充滿憐憫。 19主啊,求你垂聽!主啊,求你赦免!主啊,求你應允,立刻行動!我的上帝啊,為你自己的緣故,求你不要耽延,因為這城和這民都屬於你的名下。」

加百列解釋預言

20我繼續禱告,承認我和同胞以色列人的罪,為我上帝耶和華的聖山在祂面前祈求。 21我正禱告的時候,先前在異象中看見的那位加百列奉命疾飛而來。那是獻晚祭的時候。 22他向我解釋說:「但以理啊,我來是要使你有智慧和悟性。 23你剛開始祈求,就已賜下答覆,我是來告訴你的,因為你倍受眷愛。所以你要留意以下的信息,明白異象的意思。

24「已經為你的同胞和聖城定了七十個七,以終結叛逆,除掉罪惡,贖盡過犯,帶來永遠的公義,封住異象和預言,膏抹至聖所9·24 至聖所」或譯「至聖者」。25你要知道,也要明白,從重建耶路撒冷的命令發出,到受膏的君王來臨,其間有七個七加六十二個七。耶路撒冷城及其廣場和壕溝必得重建,且是在艱難時期。 26六十二個七之後,受膏者必被殺害,一無所有。另有一王要興起,他的臣民要毀滅這城和聖所。結局必如洪水沖來,戰爭將持續到末了,到處一片荒涼——這已經註定。 27那王必與許多人締結一七之久的盟約。一七之半,他必終止祭牲和供物,並且設立帶來毀滅的可憎之物,直到所定的結局臨到這惡者。」

Hindi Contemporary Version

दानिएल 9:1-27

दानिएल की प्रार्थना

1(मेदिया वंश) के अहषवेरोष9:1 आहासू अरुस के पुत्र दारयावेश को बाबेलवासियों9:1 कसदियों के राज्य का शासक ठहराया गया था. 2उसके राज्य के पहले साल, मैं, दानिएल, ग्रंथों से, येरेमियाह भविष्यवक्ता को दिये गये याहवेह के वचन के अनुसार यह समझ गया कि येरूशलेम की निर्जनता सत्तर वर्षों तक रहेगी. 3अतः मैं टाट का वस्त्र पहने, राख लगाये, उपवास करते हुए प्रभु परमेश्वर से गिड़गिड़ाकर प्रार्थना और याचना करने लगा.

4मैंने याहवेह, अपने परमेश्वर से इस प्रकार प्रार्थना की और अपने पापों को माना:

“हे प्रभु, महान और अद्भुत परमेश्वर, आप उनके साथ अपने प्रेम की वाचा को बनाए रखते हैं, जो आप से प्रेम करते और आपकी आज्ञाओं को मानते हैं, 5हमने पाप और गलत काम किए हैं. हमने बुरे काम करके विद्रोह किया है; हमने आपकी आज्ञाओं और कानूनों को नहीं माना है. 6हमने आपके उन सेवक भविष्यवक्ताओं की बातों को नहीं सुना, जिन्होंने आपके नाम से हमारे राजाओं, हमारे राजकुमारों और हमारे पूर्वजों, और देश के सारे लोगों से बातें की.

7“हे प्रभु, आप धर्मी हैं, परंतु आज हम बहुत लज्जित हैं—यहूदिया के लोग, येरूशलेम के निवासी और सब इस्राएली, जो पास और दूर हैं, हमारे विश्वासघात के कारण आपने उन्हें सब देशों में तितर-बितर कर दिया है. 8हे याहवेह, हम और हमारे राजा, हमारे राजकुमार और हमारे पूर्वज बहुत लज्जित हैं, क्योंकि हमने आपके विरुद्ध पाप किया है. 9यद्यपि हमने आपके विरुद्ध विद्रोह किया है, तो भी हे प्रभु हमारे परमेश्वर, आप दयालु और क्षमा शील हैं; 10हमने याहवेह हमारे परमेश्वर की बातों को नहीं माना है या उन कानूनों का पालन नहीं किया है, जिसे उन्होंने अपने सेवक भविष्यवक्ताओं के ज़रिए हमें दिया था. 11सारे इस्राएल आपके कानून का उल्लंघन किया है और आपकी बातों को मानने के बदले उससे दूर हट गये हैं.

“इसलिये परमेश्वर के सेवक, मोशेह के कानून में लिखित शाप और ठहराया गया दंड हमारे ऊपर उंडेल दिया गया है, क्योंकि हमने आपके विरुद्ध पाप किया है. 12आपने हमारे ऊपर बड़ी विपत्ति लाकर हमारे और हमारे शासकों के विरुद्ध कहे गये वचन को आपने पूरा किया है. आकाश के नीचे सारी पृथ्वी पर ऐसी विपत्ति और कहीं नहीं पड़ी, जैसी विपत्ति येरूशलेम में पड़ी है. 13जैसा कि मोशेह के कानून में लिखा है, ये सारी विपत्ति हम पर आ पड़ी है, फिर भी हमने न तो याहवेह हमारे परमेश्वर का अनुग्रह पाने का यत्न किया है, और न ही अपने पापों को छोड़कर आपकी सच्चाई पर ध्यान दिया है. 14इसलिये याहवेह हमारे ऊपर विपत्ति लाने में नहीं हिचकिचाये, क्योंकि याहवेह जो कुछ भी करते हैं, उन सब बातों में वे धर्मीपन दिखाते हैं; तौभी हमने उनकी बातों को नहीं माना.

15“और अब, हे प्रभु, हमारे परमेश्वर, जिसने अपने बलवान हाथ से अपने लोगों को मिस्र देश से निकाल लाया और अपने लिये एक नाम स्थापित किया, जो आज तक बना हुआ है, परंतु हमने पाप किया है, हमने दुष्टता ही की है. 16हे प्रभु, आप अपने सारे धर्मी कामों को ध्यान में रखते हुए, अपने क्रोध और कोप को येरूशलेम शहर से दूर करिये, जो आपका शहर और आपका पवित्र पर्वत है. हमारे पापों और हमारे पूर्वजों के अपराधों ने येरूशलेम और आपके लोगों को उन सबके सामने उपेक्षा का पात्र बना दिया है, जो हमारे आस-पास रहते हैं.

17“अब, हे हमारे परमेश्वर, अपने सेवक की प्रार्थना और विनती को सुनिये. हे प्रभु, अपने हित में, अपने उजड़े हुए पवित्र स्थान पर कृपादृष्टि कीजिये. 18हे हमारे परमेश्वर, कान लगाकर सुनिये और आंख खोलकर उजड़े हुए उस शहर को देखिये, जो आपके नाम से जाना जाता है. हम इसलिये विनती नहीं कर रहे हैं कि हम धर्मी हैं, पर इसलिये कि आप बड़े दयालु हैं. 19हे प्रभु, सुन लीजिए! हे प्रभु, क्षमा कर दीजिए! हे प्रभु, सुनिए और करिये! हे मेरे परमेश्वर, अपने ही हित में, विलंब न कीजिए, क्योंकि आपका शहर और आपके लोग आपके नाम से जाने जाते हैं.”

सत्तर “सात”

20जब मैं अपने पाप और अपने इस्राएली लोगों के पाप को मानते हुए बात और प्रार्थना कर रहा था और याहवेह मेरे परमेश्वर के सामने उसके पवित्र पर्वत के लिये विनती कर रहा था— 21जब मैं प्रार्थना में ही था, तब गब्रिएल, जिसे मैं पहले दर्शन में देख चुका था, शाम के बलिदान के समय तेज गति से मेरे पास आया. 22उसने निर्देश देकर मुझसे कहा, “हे दानिएल, मैं तुम्हें अन्तर्दृष्टि और समझने की शक्ति देने आया हूं. 23जब तुमने प्रार्थना करना शुरू किया, तभी एक आज्ञा दी गई, जिसे मैं तुम्हें बताने आया हूं, क्योंकि तुम बहुत सम्मानीय व्यक्ति हो. इसलिये इन बातों पर विचार करके दर्शन को समझ लो:

24“तुम्हारे लोगों और तुम्हारे पवित्र शहर के लिए सत्तर ‘सात’9:24 सप्ताह ठहराए गये हैं कि वे अपराध करना छोड़ दें, पापों का अंत कर दें, दुष्टता का प्रायश्चित करें, अपने में सदाकाल का धर्मीपन लाएं, दर्शन और भविष्यवाणी की बातों पर मुहर लगाई जाए और सर्वोच्च पवित्र स्थान का अभिषेक किया जाए.

25“इस बात को जानो समझ लो: येरूशलेम के फिर से स्थापित और पुनर्निर्माण के लिये वचन के निकलने से लेकर अभिषिक्त जन, शासक के आने तक सात ‘सात’ और बासठ ‘सात’ का समय ठहराया गया है. इसका पुनर्निर्माण गलियों और एक खाई के साथ होगा, किंतु यह कठिन समय में होगा. 26बासठ ‘सात’ के बाद अभिषिक्त जन मार डाला जाएगा, और कुछ न होगा. शासन करनेवाले के लोग आकर शहर और पवित्र स्थान को नष्ट कर देंगे. बाढ़ के समान अंत आ जाएगा: अंत तक युद्ध होता रहेगा, और उजाड़ का निर्णय लिया जा चुका है. 27वह बहुतों के साथ एक ‘सात’ के लिये एक वाचा का पुष्टि करेगा. ‘सात’ के बीच में ही, वह बलिदान और भेंट का अंत कर देगा. और मंदिर पर एक घृणास्पद चीज़ को स्थापित करेगा, जो उजाड़ का कारण होगा. यह तब तक होता रहेगा, जब तक कि ठहराये गए समय के अंत में उस9:27 उजाड़नेवाले पर विनाश न उंडेल दिया जाए.”