Chinese Contemporary Bible (Traditional)

但以理書 6:1-28

但以理在獅子坑

1大流士決定設立一百二十個總督治理全國。 2總督之上,設三個總長,以維護王的統治,但以理是其中之一。 3因為但以理有非凡的心智,遠超過其他總長和總督,王便考慮讓他治理全國。 4於是,其他總長和總督想在但以理的政務中找把柄控告他,卻找不到任何把柄或過失,因為他誠實可靠,毫無過失。 5最後他們說:「除非我們從但以理上帝的律法下手,否則找不到指控他的把柄。」

6於是,這些總長和總督齊來見王,說:「願大流士王萬歲! 7所有總長、行政官、總督、謀士和省長都認為王應該下一道禁令,三十天內,任何人不得向王以外的神明或人禱告,違者必被扔進獅子坑。 8王啊,求你頒佈、簽署這道禁令,使之不可更改,正如瑪代人和波斯人的律令是不可更改的。」 9於是大流士王簽署了這道禁令。

10但以理知道王簽署禁令後,就回到家裡。他樓上的窗戶朝向耶路撒冷,他像往常一樣每日三次跪下向上帝禱告、感恩。 11那些官員一同來了,發現但以理向他的上帝禱告、祈求, 12便去見王,提及王的禁令,說:「王啊,你不是簽署禁令,三十天內,任何人不得向王以外的神明或人禱告,違者必被扔進獅子坑嗎?」王說:「確有此事,按照瑪代人和波斯人的律,這禁令不可更改。」 13他們對王說:「王啊,被擄來的猶大但以理不理會你和你的禁令,仍一日三次向他的上帝祈禱。」 14王聽了這些話,十分愁煩,一心想救但以理,直到日落都在籌畫解救之道。 15那些人齊來見王,說:「王啊,按照瑪代人和波斯人的律,王頒佈的禁令和律例是不可更改的。」

16王便下令把但以理帶來扔進獅子坑。他對但以理說:「願你忠心事奉的上帝拯救你!」 17坑口用大石封住,並加上王和大臣的封印,使懲辦但以理的事不可更改。 18王回宮後,整夜禁食,拒絕娛樂,無法入睡。

19次日黎明,王起來匆忙趕往獅子坑, 20到了坑邊,淒聲呼喊但以理:「永活上帝的僕人但以理啊,你忠心事奉的上帝有沒有救你脫離獅子的口?」 21但以理對王說:「願王萬歲! 22我的上帝差遣天使封住了獅子的口,不讓牠們傷害我,因為我在上帝面前是清白的。王啊,我在你面前也沒有過錯。」 23王非常高興,便命人把但以理從坑中拉上來。於是,但以理從坑中被拉了上來,他因為信靠他的上帝,身上毫無損傷。 24王下令把那些惡意控告但以理的人及其兒女妻子都帶來,扔進獅子坑。他們還沒到坑底,獅子便撲上去,咬碎了他們的骨頭。

25後來,大流士王傳諭境內的各族、各邦、各語種的人,說:「願你們大享平安! 26我下令,我統治的國民都要敬畏但以理的上帝,

「因為祂是永活長存的上帝,

祂的國度永不滅亡,

祂的統治直到永遠。

27祂庇護、拯救,

在天上地下行神蹟奇事,

但以理脫離獅子的口。」

28因此,在大流士波斯塞魯士執政期間,但以理凡事亨通。

Hindi Contemporary Version

दानिएल 6:1-28

दानिएल सिंहों के मांद में

1दारयावेश को यह अच्छा लगा कि वह 120 प्रधान नियुक्त करे, जो सारे राज्य में शासन करें, 2और इन सबके ऊपर तीन प्रशासक हों, जिनमें से एक दानिएल था. उन प्रधानों को प्रशासकों के प्रति उत्तरदायी बनाया गया ताकि राजा को किसी प्रकार की हानि न हो. 3दानिएल अपनी असाधारण योग्यताओं के कारण प्रशासकों और प्रधानों के बीच बहुत प्रसिद्ध था, इसलिये राजा ने उसे सारे राज्य का शासक बनाने की योजना बनाई. 4इस पर, प्रशासकों और प्रधानों ने सरकारी कार्यों में दानिएल के क्रियाकलापों के विरुद्ध दोष लगाने का आधार खोजने लगे, पर वे ऐसा न कर सके. उन्हें उसमें कोई भ्रष्टाचार की बात न मिली, क्योंकि दानिएल विश्वासयोग्य था और वह न तो भ्रष्टाचारी था और न ही वह किसी बात में असावधानी बरतता था. 5आखिर में, इन व्यक्तियों ने कहा, “उसके परमेश्वर के कानून के विषय को छोड़, हमें और किसी भी विषय में दानिएल के विरुद्ध दोष लगाने का आधार नहीं मिलेगा.”

6इसलिये ये प्रशासक और प्रधान एक दल के रूप में राजा के पास गये और उन्होंने कहा: “राजा दारयावेश, चिरंजीवी हों! 7राज्य के सब शाही प्रशासक, मुखिया, प्रधान, सलाहकार, और राज्यपाल इस बात पर सहमत हुए कि राजा एक राजाज्ञा निकाले और उस आज्ञा को पालन करने के लिये कहें कि अगले तीस दिनों तक कोई भी व्यक्ति महाराजा के छोड़ किसी और देवता या मानव प्राणी से प्रार्थना करे, तो वह सिंहों की मांद में डाल दिया जाए. 8हे महाराज, अब आप ऐसी आज्ञा दें और इसे लिखित में दे दें ताकि यह बदला न जा सके—मेदियों और फ़ारसियों के कानून के अनुसार जिसे रद्द नहीं किया जा सकता.” 9तब राजा दारयावेश ने उस आज्ञा को लिखित में कर दिया.

10जब दानिएल को मालूम हुआ कि ऐसी आज्ञा निकाली गई है, तो वह अपने घर जाकर ऊपर के कमरे में गया, जहां खिड़कियां येरूशलेम की ओर खुली रहती थी. दिन में तीन बार घुटना टेककर उसने अपने परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए प्रार्थना किया, जैसे कि वह पहले भी करता था. 11तब वे व्यक्ति एक दल के रूप में वहां गये और उन्होंने दानिएल को परमेश्वर से प्रार्थना करते और मदद मांगते हुए पाया. 12अतः वे राजा के पास गये और उसे उसके राजाज्ञा के बारे में कहने लगे: “क्या आपने ऐसी आज्ञा नहीं निकाली है कि अगले तीस दिनों तक कोई भी व्यक्ति महाराजा के छोड़ किसी और देवता या मानव प्राणी से प्रार्थना करे, तो उसे सिंहों की मांद में डाल दिया जाएगा?”

राजा ने उत्तर दिया, “यह आज्ञा तो है—जिसे मेदियों एवं फ़ारसियों के कानून के अनुसार रद्द नहीं किया जा सकता.”

13तब उन्होंने राजा से कहा, “दानिएल, जो यहूदाह से लाये गए बंधुआ लोगों में से एक है, हे महाराज, वह आपकी या आपके द्वारा निकाले गये लिखित आज्ञा की परवाह नहीं करता है. वह अभी भी दिन में तीन बार प्रार्थना करता है.” 14यह बात सुनकर राजा बहुत उदास हुआ; उसने दानिएल को बचाने का संकल्प कर लिया था और सूर्यास्त होने तक वह दानिएल को बचाने की हर कोशिश करता रहा.

15तब लोग एक दल के रूप में राजा दारयावेश के पास गये और उन्होंने उनसे कहा, “हे महाराज, आप यह बात याद रखें कि मेदिया और फ़ारसी कानून के अनुसार राजा के द्वारा दिया गया कोई भी फैसला या राजाज्ञा बदला नहीं जा सकता.”

16तब राजा ने आज्ञा दी, और वे दानिएल को लाकर उसे सिंहों की मांद में डाल दिये. राजा ने दानिएल से कहा, “तुम्हारा परमेश्वर, जिसकी सेवा तुम निष्ठापूर्वक करते हो, वही तुझे बचाएं!”

17एक पत्थर लाकर मांद के मुहाने पर रख दिया गया, और राजा ने अपने स्वयं की मुहरवाली अंगूठी और अपने प्रभावशाली लोगों की अंगूठियों से उस पर मुहर लगा दी, ताकि दानिएल की स्थिति में किसी भी प्रकार का बदलाव न किया जा सके. 18तब राजा अपने महल में लौट आया गया और उसने पूरी रात बिना कुछ खाएं और बिना किसी मनोरंजन के बिताया. और वह सो न सका.

19बड़े सुबह, राजा उठा और जल्दी से सिंहों के मांद पर गया. 20जब वह मांद के पास पहुंचा, तो उसने एक पीड़ा भरी आवाज में दानिएल का पुकारा, “हे दानिएल, जीवित परमेश्वर के सेवक, क्या तुम्हारे उस परमेश्वर ने तुम्हें सिंहों से बचाकर रखा है, जिसकी तुम निष्ठापूर्वक सेवा करते हो?”

21तब दानिएल ने उत्तर दिया, “हे राजा, आप चिरंजीवी हों! 22मेरे परमेश्वर ने अपना स्वर्गदूत भेजकर सिंहों के मुंह को बंद कर दिया. उन्होंने मेरी कुछ भी हानि नहीं की, क्योंकि मैं उसकी दृष्टि में निर्दोष पाया गया. और हे महाराज, आपके सामने भी मैंने कोई अपराध नहीं किया है.”

23तब राजा अति आनंदित हुआ और उसने आज्ञा दी कि दानिएल को मांद से बाहर निकाला जाए. और जब दानिएल को मांद से ऊपर खींचकर बाहर निकाला गया, तो उसमें किसी भी प्रकार का चोट का निशान नहीं पाया गया, क्योंकि उसने अपने परमेश्वर पर भरोसा रखा था.

24वे व्यक्ति, जिन्होंने दानिएल पर झूठा दोष लगाया था, वे राजा की आज्ञा पर लाये गए, और उन्हें उनकी पत्नियों और बच्चों समेत सिंहों के मांद में डाल दिया गया. और इसके पहले कि ये मांद के तल तक पहुंचें, सिंहों ने झपटकर उन्हें पकड़ लिया और हड्डियों समेत उनको चबा डाला.

25तब राजा दारयावेश ने सारी पृथ्वी में सब जाति और हर भाषा के लोगों को यह लिखा:

“आप सब बहुत उन्नति करें!

26“मैं यह आज्ञा देता हूं कि मेरे राज्य में हर जगह के लोग दानिएल के परमेश्वर का भय माने और उनकी भक्ति करें.

“क्योंकि वही जीवित परमेश्वर हैं

और वह सदाकाल तक बने रहते हैं;

उनका राज्य कभी नाश नहीं होगा,

और उनका प्रभुत्व कभी समाप्त नहीं होगा.

27वह छुड़ाते हैं और वह बचाते हैं;

वह स्वर्ग और पृथ्वी पर

चिन्ह और चमत्कार दिखाते हैं.

उन्होंने दानिएल को

सिंहों की शक्ति से बचाया है.”

28इस प्रकार दानिएल, दारयावेश और तथा फारस देश के कोरेश के शासनकाल में उन्नति करते गए.