Священное Писание

Неемия 1:1-11

Молитва Неемии об Иерусалиме

1Слова Неемии, сына Ахалии:

В месяце кислеве, в двадцатом году правления царя Артаксеркса1:1 Артаксеркс I Лонгиман (Долгорукий) правил Персидской империей с 464 по 424 гг. до н. э. (поздней осенью 446 г. до н. э.), когда я находился в крепости города Сузы, 2Ханани – один из моих братьев – пришёл из Иудеи с некоторыми другими людьми, и я расспросил их об уцелевших жителях Иудеи, которые вернулись из плена, и об Иерусалиме.

3Они сказали мне:

– Те, кто прошёл через плен и вернулся в провинцию Иудея, сейчас в большой беде и бесчестии. Стена Иерусалима разрушена, а его ворота сожжены.

4Услышав это, я сел и заплакал. Несколько дней я скорбел, постился и молился пред Богом небесным. 5Я говорил:

– О Вечный1:5 Вечный – на языке оригинала: «Яхве». Под этим именем Всевышний открылся Мусе и народу Исраила (см. Исх. 3:13-15). См. пояснительный словарь., Бог небес, Бог великий и грозный, верный соглашению любви с теми, кто любит Тебя и слушается Твоих повелений, 6да будут уши Твои внимательны и глаза Твои открыты, чтобы услышать молитву Твоего раба, которой я молюсь пред Тобой день и ночь за Твоих рабов, народ Исраила. Я признаюсь в грехах, которыми мы, исраильтяне, включая меня и дом моего отца, согрешили против Тебя. 7Мы поступали пред Тобой нечестиво. Мы не слушались повелений, установлений и законов, которые Ты дал Своему рабу Мусе.

8Вспомни повеление, которое Ты дал Своему рабу Мусе, сказав: «Если вы нарушите верность, Я рассею вас среди народов, 9но если вы вернётесь ко Мне и станете слушаться Моих повелений, то даже если ваши изгнанники будут находиться на краю земли, Я соберу вас оттуда и приведу на место, которое Я избрал, чтобы Мне там поклонялись»1:8-9 См. Лев. 26:27-28, 33; Втор. 28:64; 30:1-5..

10Они – Твои рабы и Твой народ, который Ты искупил Своей великой силой и могучей рукой. 11О Владыка, да будут уши Твои внимательны к моей молитве и к молитве других Твоих рабов, которые любят чтить Твоё имя. Дай сегодня Твоему рабу успех, даровав ему расположение царя.

Я был виночерпием1:11 Виночерпий был одним из самых важных лиц при дворе, которому царь доверял свою жизнь. царя.

Hindi Contemporary Version

नेहेमियाह 1:1-11

1यह हाकालियाह के पुत्र नेहेमियाह के वचन हैं.

यह घटना बीसवें वर्ष के किसलेव महीने की है, जब मैं राजधानी शूशन में था, 2यहूदिया से कुछ लोग मेरे एक रिश्तेदार हनानी के साथ आए; मैंने उनसे येरूशलेम के बारे में और उन यहूदियों के बारे में जानकारी पाई, जो बंधुआई से बच निकले थे और जो अब जीवित थे.

3उन्होंने मुझे बताया, “वह बचे हुए यहूदी, जो बंधुआई से जीवित बच निकल आये है और जो इस समय उस प्रदेश में रह रहा है, वे बड़े दर्द में और निंदनीय अवस्था में हैं. येरूशलेम की शहरपनाह टूट चुकी है और उसके प्रवेश फाटक जला दिए जा चुके हैं.”

4यह सुनकर मैं बैठकर रोने लगा और मैं बहुत दिन रोता रहा; कुछ दिन तक मैं स्वर्ग के परमेश्वर के सामने उपवास और प्रार्थना करता रहा. 5मैंने कहा:

“याहवेह, स्वर्ग के परमेश्वर यह मेरी प्रार्थना है, आप जो महान और आदरणीय परमेश्वर हैं, आप, जो उनके प्रति अपनी वाचा और अपनी करुणा रखते हैं, जो आपके प्रति अपने प्रेम में अटल और आज्ञापालन करते हैं, 6आपके सेवक की प्रार्थना की ओर आपके कान लगे रहें और आपकी आंखें खुली रहें, कि आप अपने सेवक की प्रार्थना सुनें, मैं आपके चरणों में आपके सेवक इस्राएल वंशजों की ओर से दिन-रात यह प्रार्थना कर रहा हूं. इस्राएलियों ने और हमने जो पाप आपके विरुद्ध किए हैं, उन्हें मैं स्वीकार कर रहा हूं. मैंने और मेरे पिता के परिवार ने पाप किए हैं. 7हमारा आचरण आपके सामने बहुत ही दुष्टता से भरा रहा है. हमने आपके आदेशों का पालन नहीं किया है, न ही हमने आपके नियमों और विधियों का पालन ही किया है, जिनका आदेश आपने अपने सेवक मोशेह को दिया था.

8“आप अपने उस आदेश को याद कीजिए, जो आपने अपने सेवक मोशेह को इस प्रकार दिया था: ‘यदि तुम अविश्वासी हो जाओगे तो मैं तुम्हें देशों के बीच बिखरा दूंगा. 9मगर यदि तुम मेरी ओर फिरकर मेरे आदेशों का पालन करके उनका अनुसरण करोगे, तो तुममें से कुछ को यदि दूर आकाश के नीचे तक कर दिया गया था, मैं तुम्हें वहां से भी उस जगह पर ले आऊंगा, जिस जगह को मैंने अपनी प्रतिष्ठा की स्थापना के लिए सही समझा था.’

10“वे आपके ही सेवक हैं, आपकी ही प्रजा, जिन्हें आपने अपने असाधारण सामर्थ्य और बलवंत हाथ से छुड़ा लिया था. 11प्रभु, आप से मेरी प्रार्थना है, अपने सेवक की विनती पर कान लगाएं और उन सेवकों की प्रार्थनाओं के पर, जो आपका भय मानते हैं. आज अपने सेवक को सफलता देकर उसके प्रति इस व्यक्ति को दयालु कीजिए.”

मैं इस समय राजा के लिए पिलाने वाले के पद पर था.