Священное Писание

Исаия 1:1-31

1Видение об Иудее и Иерусалиме, которое Исаия, сын Амоца, видел во времена правления Уззии, Иотама, Ахаза и Езекии, царей Иудеи1:1 Уззия, Иотам, Ахаз и Езекия правили Иудеей в период с 792 по 686 гг. до н. э. Об их правлении см. 4 Цар. 15:1-7, 32–16:20; 18–20; 2 Лет. 26–32..

Грех народа

2Слушайте, небеса! Внимай, земля!

Так говорит Вечный1:2 Вечный – на языке оригинала: «Яхве». Под этим именем Всевышний открылся Мусе и народу Исраила (см. Исх. 3:13-15). См. пояснительный словарь.:

– Я воспитал и вырастил сыновей,

а они восстали против Меня.

3Знает вол хозяина своего,

и осёл – своё стойло,

а Исраил не знает,

народ Мой не понимает.

4О грешное племя,

отягчённый грехом народ,

потомство злодеев,

сыновья растления!

Оставили Вечного,

презрели святого Бога Исраила,

повернулись к Нему спиной.

5Зачем вы так упорны в своём отступничестве?

Хотите, чтобы вас били ещё?

Вся голова ваша в ранах,

всё сердце изнурено.

6С головы до пят

нет у вас живого места,

только раны, рубцы

и открытые язвы –

не промытые, не перевязанные,

не смягчённые маслом.

7В запустении ваша страна,

сожжены дотла города.

Чужаки грабят вашу землю у вас на глазах;

в запустении всё, как после разорения чужими.

8Остался Иерусалим1:8 Букв.: «дочь Сиона» – это олицетворение Иерусалима.,

как шатёр в винограднике,

словно шалаш на бахче,

точно город в осаде.

9Если бы Вечный, Повелитель Сил,

не сохранил нам нескольких уцелевших,

то мы уподобились бы Содому,

стали бы как Гоморра1:9 См. Нач. 18:20–19:29..

10Слушайте слово Вечного,

вожди «Содома»;

внимай Закону нашего Бога,

народ «Гоморры»!

11– Что Мне множество ваших жертв? –

говорит Вечный. –

Я пресыщен всесожжениями баранов,

жиром откормленного скота;

крови телят, ягнят и козлят

Я не хочу.

12Когда вы приходите,

чтобы предстать предо Мной,

кто вас об этом просит?

Не топчите Мои дворы;

13не приносите больше бессмысленных даров;

благовония Мне противны.

Ваши Новолуния, субботы, созывы собраний1:13 Праздник Новолуния – исраильтяне, пользовавшиеся лунным календарём, праздновали начало каждого месяца, которое совпадало с новолунием (см. Чис. 28:11-15). Суббота – седьмой день недели у иудеев, день, посвящённый Вечному. В этот день, согласно повелению Вечного, исраильский народ должен был отдыхать и совершать ритуальные приношения (см. Исх. 31:12-17; Чис. 28:9-10). См. также таблицу «Праздники в Исраиле». не терплю –

это праздники с беззаконием.

14Новолуния ваши и праздники

ненавидит душа Моя.

Они стали для Меня бременем,

Я устал его нести.

15Когда вы поднимаете свои руки в молитве,

Я прячу от вас глаза,

и когда умножаете ваши молитвы,

Я не слышу.

Ваши руки полны крови;

16омойтесь, очиститесь.

Удалите свои злодеяния

с глаз Моих долой!

Перестаньте творить зло,

17научитесь делать добро!

Ищите справедливости,

обличайте угнетателя1:17 Или: «поддерживайте угнетённого».,

защищайте сироту,

заступайтесь за вдову.

18Придите же, и вместе рассудим, –

говорит Вечный. –

Пусть грехи ваши как багрянец, –

убелю их, как снег;

пусть красны они, словно пурпур, –

они будут как белая шерсть.

19Если захотите и послушаетесь,

будете есть блага земные,

20но если будете упрямыми и мятежными,

вас поглотит меч, –

так сказали уста Вечного.

21Как же это стала блудницей

некогда верная столица?!

Она была полна правосудия,

обитала в ней правда,

а теперь вот – убийцы!

22Серебро твоё стало окалиной,

вино твоё разбавлено водой.

23Твои правители – изменники

и сообщники воров;

все они любят взятки

и гоняются за подарками.

Не защищают они сироту,

дело вдовы до них не доходит.

24Поэтому Владыка Вечный, Повелитель Сил,

могучий Бог Исраила, возвещает:

– О, как Я избавлюсь от врагов,

отомщу за Себя Своим недругам!

25Руку Мою на тебя обращу;

отчищу окалину твою, точно щёлоком,

отделю от тебя все примеси.

26Я верну тебе судей, как в прежние времена,

твоих советников, как в начале.

И тогда тебя назовут

«Городом правды»,

«Столицей верной».

27Сион будет выкуплен правосудием,

раскаявшиеся жители его – праведностью.

28Но мятежники и грешники будут сокрушены,

и оставившие Вечного погибнут.

29– Вам будет стыдно из-за священных дубов,

под которыми вы желали поклоняться идолам;

вы покраснеете за священные сады,

которые вы избрали вместо Меня.

30Будете как дуб с увядшими листьями,

как сад без воды.

31Сильные станут паклей,

дело их – искрой:

вспыхнут они вместе,

и никто не потушит.

Hindi Contemporary Version

यशायाह 1:1-31

परमेश्वर की प्रजा का विद्रोह

1यहूदिया तथा येरूशलेम के विषय में आमोज़ के पुत्र यशायाह का दर्शन, जो उन्हें यहूदिया के राजा उज्जियाह, योथाम, आहाज़, और हिज़किय्याह के शासनकाल में प्राप्त हुआ:

2हे आकाश! और पृथ्वी सुनो!

क्योंकि यह याहवेह की आज्ञा है:

“कि मैंने अपने बच्चों का पालन पोषण किया और उन्हें बढ़ाया,

किंतु उन्होंने मुझसे नफरत की.

3बैल अपने स्वामी को जानता है,

और गधा अपने स्वामी की चरनी को,

किंतु इस्राएल,

मेरी प्रजा को इसकी समझ नहीं.”

4हाय है तुम लोगों पर,

जो पाप और अधर्म से भरे हो,

जिनमें सच्चाई नहीं,

और जिनका स्वभाव बुरा है!

जिसने याहवेह को छोड़ दिया है;

और जिसने इस्राएल के पवित्र स्वामी का अपमान किया

और जो याहवेह से दूर हो गया है!

5तुम क्यों बुरा बनना चाहते हो?

विद्रोह करते हो?

तुम्हारे सिर में घाव है,

और तुम्हारा मन दुखी है.

6सिर से पांव तक घाव और शरीर में

खरोंच चोट है जिन्हें न तो पोंछा गया,

न ही पट्टी बांधी गई और कोमल बनाने के लिए

न ही उन पर तेल लगाया गया.

7तुम्हारा देश उजड़ गया,

नगर आग से भस्म कर दिए गए;

लोगों ने तुम्हारे खेतों को ले लिया.

8ज़ियोन की पुत्री

अंगूर के बगीचे में छोड़ दी गई,

ककड़ी के खेत में आश्रय के जैसे,

या पिछड़े हुए नगर में अकेली खड़ी है.

9यदि सर्वशक्तिमान याहवेह ने

हमें न बचाया होता,

तो हम भी सोदोम

और अमोराह के समान हो जाते.

10सोदोम के शासको,

याहवेह का वचन सुनो;

अमोराह के लोगों!

हमारे परमेश्वर के व्यवस्था-विधान पर ध्यान दो.

11याहवेह कहता है कि,

“तुम्हारे बहुत से मेल बलि मेरे किस काम के?”

तुम्हारे मेढ़ों की अग्निबलियां

और पशुओं की चर्बी;

और बैलों, मेमनों और बकरों के

रक्त से मैं खुश नहीं होता.

12जब तुम मेरे सामने आते हो,

तो तुम किस अधिकार से,

मेरे आंगनों में चलते हो?

13अब मुझे अन्नबलि न चढ़ाना

और धूप से नये चांद.

विश्राम दिन1:13 शब्बाथ, सातवां दिन जो विश्राम का पवित्र दिन है और सभाओं का आयोजन

मुझे अच्छा नहीं लगता.

14नफरत है मुझे

तुम्हारे नये चांद पर्वों तथा वार्षिक उत्सवों से.

बोझ बन गए हैं ये मेरे लिए;

थक गया हूं मैं इन्हें सहते सहते.

15तब जब तुम प्रार्थना में मेरी ओर अपने हाथ फैलाओगे,

मैं तुमसे अपना मुंह छिपा लूंगा;

चाहे तुम कितनी भी प्रार्थनाएं करते रहो,

मैं उन्हें नहीं सुनूंगा.

क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं!

16तुम अपने आपको शुद्ध करो.

और मेरे सामने से अपने बुरे कामों को हटा दो;

बुराई करना छोड़ दो.

17अच्छा काम करना सीखो;

दुखियों की सहायता करो.

अनाथों की रक्षा करो;

और विधवाओं को न्याय दिलवाओ.

18यह याहवेह का संदेश है,

“अब आओ, हम मिलकर इसका निष्कर्ष निकाले,

चाहे तुम्हारे पाप लाल रंग के हों,

वे हिम समान श्वेत हो जाएंगे;

चाहे वे बैंगनी रंग के हों,

तो भी वे ऊन के समान सफेद हो जाएंगे.

19यदि सच्चाई से मेरी बात मानोगे,

तो इस देश की उत्तम से उत्तम चीज़ें खा पाओगे;

20और यदि तुम विरोध करो और बात न मानोगे,

तो तलवार से मार दिये जाओगे.”

यह याहवेह का यही वचन है!

कृतघ्न नगर

21वह नगर जिसमें सत्य, न्याय और धार्मिकता पाई जाती है,

उसमें व्यभिचार कैसे बढ़ गया!

22तुम्हारी चांदी में मिलावट है,

और तुम्हारे दाखरस में पानी मिला दिया गया है.

23राज्य करनेवाले विद्रोही,

और चोरों के मित्र हैं;

सब घूस लेते हैं

और लालची हैं.

वे अनाथों की रक्षा नहीं करते;

और न विधवाओं को न्याय दिलाते हैं.

24अतः इस्राएल के सर्वशक्तिमान,

प्रभु सर्वशक्तिमान याहवेह कहते हैं की

“मैं अपने बैरियों से बदला लूंगा.

25मैं तुम्हारे विरुद्ध अपना हाथ उठाऊंगा;

मैं तुम्हारे धातु की गंदगी को दूर कर दूंगा

और उसमें जो मिलावट है उसे दूर करूंगा.

26मैं फिर से न्यायी और मंत्री बनाऊंगा और उनको उनका पद दूंगा.

फिर इस नगर में कोई कमी नहीं होगी.”

27ज़ियोन को न्याय से,

और जो अपने आपको बदलेगा वे धर्म से छुड़ा लिये जायेंगे.

28लेकिन विद्रोहियों और पापियों को एक साथ नष्ट कर दिया जाएगा,

जिन्होंने याहवेह को त्याग दिया है.

29“वे उन बांज वृक्षों से,

जिनकी तुम चाह रखते थे लज्जित हो जाएंगे;

और जिन क्यारियों में मेहनत करके खुश होते थे

अब उसी से लज्जित होना पड़ेगा.

30तुम उस बांज वृक्ष के समान हो जाओगे जिसके पत्ते सूख गए हैं,

और सूखी क्यारियां जिसमें पानी नहीं पिलाया गया हो.

31बलवान व्यक्ति आग

और उसका काम चिंगारी होगा;

और वे एक साथ जल जायेंगे,

और कोई उन्हें बचा नहीं पाएगा.”