Забур 95 CARS - स्तोत्र 95 HCV

Священное Писание

Забур 95:1-13

Песнь 95

(1 Лет. 16:23-33)

1Воспойте Вечному новую песню,

пойте Вечному, все жители земли.

2Воспойте Вечному, восхваляйте Его имя,

говорите о Его спасении каждый день.

3Возвещайте славу Его среди народов,

чудеса Его – среди всех людей,

4потому что велик Вечный и достоин всякой хвалы;

Он внушает страх более всех богов.

5Все боги народов – лишь идолы,

а Вечный небеса сотворил.

6Слава и величие перед Ним,

сила и великолепие в Его святилище.

7Воздайте Вечному, все народы,

воздайте Ему славу и силу.

8Воздайте славу имени Вечного,

несите дары и идите во дворы Его.

9Прославьте Вечного в великолепии Его святости95:9 Или: «в святом облачении прославьте Вечного»; или: «прославьте Вечного в Его великолепном святилище»..

Трепещи перед Ним, вся земля!

10Скажите народам: «Вечный правит!»

Мир стоит твёрдо и не поколеблется;

Вечный будет судить народы справедливо.

11Да возвеселятся небеса и возликует земля;

да восшумит море и всё, что в нём.

12Да возрадуется поле и всё, что на нём,

и да возликуют все деревья лесные

13перед Вечным, потому что идёт,

идёт Он судить землю.

Он будет судить мир справедливо

и народы – по Своей истине.

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 95:1-11

स्तोत्र 95

1चलो, हम याहवेह के स्तवन में आनंदपूर्वक गाएं;

अपनी उद्धार की चट्टान के लिए उच्च स्वर में मनोहारी संगीत प्रस्तुत करें.

2हम धन्यवाद के भाव में उनकी उपस्थिति में आएं

स्तवन गीतों में हम मनोहारी संगीत प्रस्तुत करें.

3इसलिये कि याहवेह महान परमेश्वर हैं,

समस्त देवताओं के ऊपर सर्वोच्च राजा हैं.

4पृथ्वी की गहराइयों पर उनका नियंत्रण है,

पर्वत शिखर भी उनके अधिकार में हैं.

5समुद्र उन्हीं का है, क्योंकि यह उन्हीं की रचना है,

सूखी भूमि भी उन्हीं की हस्तकृति है.

6आओ, हम नतमस्तक हो आराधना करें,

हम याहवेह, हमारे सृजनहार के सामने घुटने टेकें!

7क्योंकि वह हमारे परमेश्वर हैं

और हम उनके चराई की प्रजा हैं,

उनकी अपनी संरक्षित95:7 मूल भाषा में हाथ की भेड़ें.

यदि आज तुम उनका स्वर सुनते हो,

8“अपने हृदय कठोर न कर लेना. जैसे तुमने मेरिबाह95:8 अर्थ: झगड़ा में किया था,

जैसे तुमने उस समय वन में मस्साह95:8 अर्थ: परीक्षा नामक स्थान पर किया था,

9जहां तुम्हारे पूर्वजों ने मुझे परखा और मेरे धैर्य की परीक्षा ली थी;

जबकि वे उस सबके गवाह थे, जो मैंने उनके सामने किया था.

10उस पीढ़ी से मैं चालीस वर्ष उदास रहा;

मैंने कहा, ‘ये ऐसे लोग हैं जिनके हृदय फिसलते जाते हैं,

वे मेरे मार्ग समझ ही न सके हैं.’

11तब अपने क्रोध में मैंने शपथ ली,

‘मेरे विश्राम में उनका प्रवेश कभी न होगा.’ ”