Забур 90 CARS - स्तोत्र 90 HCV

Священное Писание

Забур 90:1-16

Песнь 90

1Живущий под кровом Высочайшего

в тени Всемогущего покоится,

2говорит о Вечном: «Он – моё прибежище и крепость моя,

Бог мой, на Которого уповаю».

3Он избавит тебя от сети ловца

и от гибельной язвы.

4Он укроет тебя Своими перьями,

и под Его крыльями ты будешь в безопасности;

Его истина будет тебе щитом и бронёй.

5Не убоишься ни ужасов в ночи,

ни стрелы, летящей днём,

6ни язвы, ходящей во мраке,

ни заразы, опустошающей в полдень.

7Тысяча падёт около тебя,

и десять тысяч – справа от тебя,

но к тебе не приблизится.

8Ты сам на это посмотришь

и увидишь возмездие нечестивым.

9Потому что ты избрал Вечного своим прибежищем,

Высочайшего – своей обителью,

10не пристанет к тебе зло,

и язва не приблизится к твоему жилищу.

11Ведь Он Своим ангелам повелит о тебе –

охранять тебя на всех путях твоих.

12Они понесут тебя на руках,

чтобы ноги твои не ударились о камень.

13На льва и на змею наступишь,

растопчешь молодого льва и дракона.

14Вечный говорит:

«Сохраню его, потому что он искренно любит Меня;

защищу его, потому что он знает имя Моё.

15Когда воззовёт ко Мне, Я отвечу:

в беде буду с ним,

избавлю его и прославлю.

16Насыщу его долголетием

и дам ему Моё спасение».

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 90:1-17

चतुर्थ पुस्तक

स्तोत्र 90–106

स्तोत्र 90

परमेश्वर के प्रिय पात्र मोशेह की एक प्रार्थना

1प्रभु, समस्त पीढ़ियों में

आप हमारे आश्रय-स्थल बने रहे हैं.

2इसके पूर्व कि पर्वत अस्तित्व में आते

अथवा पृथ्वी तथा संसार की रचना की जाती,

अनादि से अनंत तक परमेश्वर आप ही हैं.

3आप मनुष्य को यह कहकर पुन: धूल में लौटा देते हैं,

“मानव-पुत्र, लौट जा.”

4आपके लिए एक हजार वर्ष वैसे ही होते हैं

जैसे गत कल का दिन,

अथवा रात्रि का एक प्रहर.

5आप मनुष्यों को ऐसे समेट ले जाते हैं, जैसे बाढ़; वे स्वप्न मात्र होते हैं—

प्रातःकाल में बढ़ने वाली कोमल घास के समान:

6जो प्रातःकाल फूलती है, उसमें बढ़ती है,

किंतु संध्या होते-होते यह मुरझाती और सूख जाती है.

7आपका कोप हमें मिटा डालता है,

आपकी अप्रसन्नता हमें घबरा देती है.

8हमारे अपराध आपके सामने खुलें हैं,

आपकी उपस्थिति में हमारे गुप्त पाप प्रकट हो जाते हैं.

9हमारे जीवन के दिन आपके क्रोध की छाया में ही व्यतीत होते हैं;

हम कराहते हुए ही अपने वर्ष पूर्ण करते हैं.

10हमारी जीवन अवधि सत्तर वर्ष है—संभवतः

अस्सी वर्ष, यदि हम बलिष्ठ हैं;

हमारी आयु का अधिकांश हम दुःख और कष्ट में व्यतीत करते हैं,

हां, ये तीव्र गति से समाप्त हो जाते हैं और हम कूच कर जाते हैं.

11आपके कोप की शक्ति की जानकारी कौन ले सका है!

आपका कोप उतना ही व्यापक है जितना कि लोगों के द्वारा आपका भय मानना.

12हमें जीवन की न्यूनता की धर्ममय विवेचना करने की अन्तर्दृष्टि प्रदान कीजिए,

कि हमारा हृदय बुद्धिमान हो जाएं.

13याहवेह! मृदु हो जाइए और कितना विलंब?

कृपा कीजिए-अपने सेवकों पर.

14प्रातःकाल में ही हमें अपने करुणा-प्रेम से संतुष्ट कर दीजिए,

कि हम आजीवन उल्‍लासित एवं हर्षित रहें.

15हमारे उतने ही दिनों को आनंद से तृप्त कर दीजिए, जितने दिन आपने हमें ताड़ना दी थी,

उतने ही दिन, जितने वर्ष हमने दुर्दशा में व्यतीत किए हैं.

16आपके सेवकों के सामने आपके महाकार्य स्पष्ट हो जाएं

और उनकी संतान पर आपका वैभव.

17हम पर प्रभु, हमारे परमेश्वर की मनोहरता स्थिर रहे;

तथा हमारे लिए हमारे हाथों के परिश्रम को स्थायी कीजिए—

हां, हमारे हाथों का परिश्रम स्थायी रहे.