Забур 68 CARS - स्तोत्र 68 HCV

Священное Писание

Забур 68:1-37

Песнь 68

1Дирижёру хора. На мотив «Лилии». Песнь Давуда.

2Спаси меня, Всевышний,

потому что воды поднялись до шеи моей!

3Я погряз в глубоком иле, и нет опоры;

вошёл в глубокие воды, и потоком накрыло меня.

4Устал я, взывая о помощи;

иссушено моё горло.

Я выплакал глаза свои

в ожидании моего Бога.

5Ненавидящих меня без всякой причины

стало больше, чем волос на моей голове.

Умножились враги мои,

несправедливо меня преследующие.

То, чего не отнимал,

я должен отдать.

6Всевышний, Ты знаешь глупость мою,

и грехи мои от Тебя не сокрыты.

7Да не смущу я тех, кто надеется на Тебя,

Владыка Вечный, Повелитель Сил.

Пусть не будут опозорены из-за меня те,

кто ищет Тебя, Бог Исраила.

8Ведь ради Тебя сношу я упрёки,

и позор покрыл моё лицо.

9Изгоем я стал для братьев моих,

чужим для сыновей матери моей,

10потому что ревность о доме Твоём снедает меня,

и оскорбления тех, кто злословит Тебя, пали на меня.

11Когда я плакал и постился,

это ставили мне в упрёк.

12Когда я одевался в рубище,

я был посмешищем для них.

13Беседуют обо мне старейшины, сидящие у ворот68:13 Ворота города были центром всей общественной жизни, около них проходили и судебные разбирательства.,

и поют обо мне пьяницы.

14А я молюсь Тебе, Вечный,

во время Твоего благоволения.

По Своей великой милости ответь мне, Всевышний,

и в верности Твоей спаси меня.

15Вытащи меня из тины

и не дай погрязнуть мне!

Дай избавиться от ненавистников моих,

от вод глубоких!

16Да не накроет меня потоком вод,

и да не поглотит меня глубина,

и да не сомкнёт надо мной яма пасть свою.

17Ответь мне, Вечный, потому что благостна милость Твоя;

по Своей великой милости посмотри на меня.

18Не скрывай Своего лица от раба Твоего,

ведь я в беде.

Поспеши, ответь мне!

19Приблизься и избавь меня,

от моих врагов спаси!

20Ты знаешь, как меня презирают,

как бесчестят и позорят меня;

все враги мои пред Тобой.

21Поругание разбило моё сердце, и я сокрушён.

Рассчитывал на сострадание, но нет его,

на утешителей, но не нашёл их.

22Дали мне в пищу желчь;

при жажде моей уксусом меня напоили68:22 См. Мат. 27:34, 48; Мк. 15:36; Лк. 23:36; Ин. 19:29..

23Пусть их праздничные застолья станут для них ловушкой,

а священные праздники – западнёй68:23 Или: «ловушкой, возмездием и западнёй»..

24Пусть их глаза померкнут, чтобы они не видели,

и пусть их спины согнутся навсегда.

25Пролей на них Своё негодование,

и пусть пылающий гнев Твой настигнет их.

26Пусть их жилище будет в запустении;

пусть никто в шатрах их больше не живёт,

27потому что они преследуют тех, кого Ты и без того поразил,

и говорят о страданиях поверженных Тобою.

28Прибавь грех этот к грехам их,

и оправдания пусть не найдут они.

29Пусть будут вычеркнуты они из книги жизни

и да не будут записаны там вместе с праведниками.

30Я же угнетён и страдаю.

Спасение Твоё, Всевышний, пусть возвысит меня!

31Буду славить имя Всевышнего в песне,

буду превозносить Его с благодарностью.

32Это будет приятней Вечному, нежели вол,

приятнее, чем молодой бык с рогами и копытами.

33Когда увидят угнетённые, обрадуются.

Ищущие Всевышнего, пусть оживут ваши сердца!

34Вечный слышит нуждающихся

и узниками Своими не пренебрегает.

35Да восхвалят Его небеса и земля,

моря и всё, что живёт в них,

36потому что Всевышний освободит Иерусалим68:36 Букв.: «Сион».

и восстановит города Иудеи.

Его народ будет жить там и владеть ими,

37потомки Его рабов унаследуют их,

и любящие Его имя будут проживать в них.

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 68:1-35

स्तोत्र 68

संगीत निर्देशक के लिये. दावीद की रचना. एक स्तोत्र. एक गीत.

1परमेश्वर उठे, कि उनके शत्रु बिखर जाएं;

उनके शत्रु उनके सम्मुख से भाग खड़े हों.

2आप उन्हें वैसे ही उड़ा दें, जैसे हवा धुएं को उड़ा ले जाती है,

वे परमेश्वर के सामने उसी प्रकार नष्ट हो जाएं

जिस प्रकार अग्नि के सम्मुख आने पर मोम.

3धर्मी हर्षित हों और वे परमेश्वर की उपस्थिति में

हर्षोल्लास में मगन हों;

वे आनंद में उल्‍लासित हों.

4परमेश्वर का गुणगान करो, जो मेघों पर विराजमान होकर आगे बढ़ते हैं,

उनकी महिमा का स्तवन करो. उनका नाम है याहवेह.

उपयुक्त है कि उनके सामने उल्‍लासित रहा जाए.

5परमेश्वर अपने पवित्र आवास में अनाथों

के पिता तथा विधवाओं के रक्षक हैं.

6वह एकाकियों के लिए स्थायी परिवार निर्धारित करते

तथा बंदियों को मुक्त कर देते हैं तब वे हर्ष गीत गाने लगते हैं;

किंतु हठीले तपते, सूखे वन में निवास करने के लिए छोड़ दिए जाते हैं.

7परमेश्वर, जब आप अपनी प्रजा के आगे-आगे चलने के लिए निकल पड़े,

जब आप वन में से होकर जा रहे थे,

8पृथ्वी कांप उठी, आकाश ने वृष्टि भेजी की,

परमेश्वर के सामने, वह जो सीनायी पर्वत के परमेश्वर हैं,

परमेश्वर के सामने, जो इस्राएल के परमेश्वर हैं.

9परमेश्वर, आपने बड़ी वृष्टि प्रदान की;

आपने अपनी प्रजा को सशक्तता प्रदान की.

10आपकी प्रजा उस देश में बस गई.

परमेश्वर, आपने अपनी दया के भंडार से असहाय प्रजा की आवश्यकता की व्यवस्था की.

11प्रभु ने आदेश दिया और बड़ी संख्या में,

स्त्रियों ने यह शुभ संदेश प्रसारित कर दिया:

12“सेनाओं के राजा पलायन कर रहे हैं, हां, वे पलायन कर रहे हैं,

और वह जो घर पर रह गई है लूट की सामग्री को वितरित करेगी.

13जब तुम भेड़शाला में लेटते हो,

तुम ऐसे लगते हो मानो कबूतरी के पंखों पर चांदी,

तथा उसके पैरों पर प्रकाशमान स्वर्ण मढ़ा गया हो.”

14जब सर्वशक्तिमान ने राजाओं को वहां तितर-बितर किया,

ज़लमोन में हिमपात हो रहा था.

15परमेश्वर का पर्वत, बाशान पर्वत है,

अनेकों शिखरयुक्त पर्वत, बाशान पर्वत है,

16अनेक शिखरयुक्त पर्वतों तुम उस पर्वत की ओर डाह की दृष्टि क्यों डाल रहे हो,

जिसे परमेश्वर ने अपना आवास बनाना चाहा है,

निश्चयतः वहां याहवेह सदा-सर्वदा निवास करेंगे?

17परमेश्वर के रथ बीस हजार

और हजारों हजार में हैं;

प्रभु अपनी पवित्रता में उनके मध्य हैं, जैसे सीनायी पर्वत पर.

18जब आप ऊंचाइयों पर चढ़ गए,

और आप अपने साथ बड़ी संख्या में युद्धबन्दी ले गए;

आपने मनुष्यों से, हां,

हठीले मनुष्यों से भी भेंट स्वीकार की,

कि आप, याहवेह परमेश्वर वहां निवास करें.

19परमेश्वर, हमारे प्रभु, हमारे उद्धारक का स्तवन हो,

जो प्रतिदिन के जीवन में हमारे सहायक हैं.

20हमारे परमेश्वर वह परमेश्वर हैं, जो हमें उद्धार प्रदान करते हैं;

मृत्यु से उद्धार सर्वसत्ताधारी अधिराज याहवेह से ही होता है.

21इसमें कोई संदेह नहीं, कि परमेश्वर अपने शत्रुओं के सिर कुचल देंगे,

केश युक्त सिर, जो पापों में लिप्त रहते हैं.

22प्रभु ने घोषणा की, “मैं तुम्हारे शत्रुओं को बाशान से भी खींच लाऊंगा;

मैं उन्हें सागर की गहराइयों तक से निकाल लाऊंगा,

23कि तुम अपने पांव अपने शत्रुओं के रक्त में डूबा सको,

और तुम्हारे कुत्ते भी अपनी जीभ तृप्त कर सकें.”

24परमेश्वर, आपका शोभायात्रा दल अब दिखने लगा है;

वह शोभायात्रा दल, जो मेरे परमेश्वर और मेरे राजा का है,

जो मंदिर की ओर अगुवाई करते हैं

25इस शोभायात्रा में सबसे आगे चल रहा है गायक-वृन्द, उसके पीछे है वाद्य-वृन्द;

जिनमें युवतियां भी हैं जो डफ़ बजा रही हैं.

26विशाल जनसभा में परमेश्वर का स्तवन किया जाए;

इस्राएल राष्ट्र की सभा में याहवेह का स्तवन किया जाए.

27बिन्यामिन का छोटा कुल उनके आगे-आगे चल रहा है,

वहीं यहूदी कुल के न्यायियों का विशाल समूह है,

ज़ेबुलून तथा नफताली कुल के प्रधान भी उनमें सम्मिलित हैं.

28परमेश्वर, अपने अधिकार के सामर्थ्य के अनुरूप आदेश दीजिए.

हम पर अपनी शक्ति प्रदर्शित कीजिए. परमेश्वर, जैसा आप पहले भी कर चुके हैं, वही आज भी कीजिए.

29येरूशलेम में आपके मंदिर की महिमा के कारण,

राजा अपनी भेंटें आपको समर्पित करेंगे.

30सरकंडों के मध्य घूमते हिंसक पशुओं को,

राष्ट्रों के बछड़ों के मध्य सांडों के झुंड को आप फटकार लगाइए.

उन्हें रौंद डालिए, जिन्हें भेंट पाने की लालसा रहती है.

युद्ध के लिए प्रसन्न राष्ट्रों की एकता भंग कर दीजिए.

31मिस्र देश से राजदूत आएंगे;

तथा कूश देश परमेश्वर के सामने समर्पित हो जाएगा.

32पृथ्वी के समस्त राज्यो, परमेश्वर का गुणगान करो,

प्रभु का स्तवन करो.

33उन्हीं का स्तवन, जो सनातन काल से स्वर्ग में चलते फिरते रहे हैं,

जिनका स्वर मेघ के गर्जन समान है.

34उन परमेश्वर के सामर्थ्य की घोषणा करो,

जिनका वैभव इस्राएल राष्ट्र पर छाया है,

जिनका नियंत्रण समस्त स्वर्ग पर प्रगट है.

35परमेश्वर, अपने मंदिर में आप कितने शोभायमान लगते हैं;

इस्राएल के परमेश्वर अपनी प्रजा को अधिकार एवं सामर्थ्य प्रदान करते हैं.

परमेश्वर का स्तवन होता रहे!