Забур 59 CARS - स्तोत्र 59 HCV

Священное Писание

Забур 59:1-14

Песнь 59

(Заб. 107:7-14)

1Дирижёру хора. На мотив «Лилия свидетельства». Мольба Давуда. Для наставления. 2Написано, когда Давуд воевал с сирийцами из Месопотамии и сирийцами из Цовы59:2 Букв.: «воевал с Арам-Нахараимом и с Арам-Цовой»., и когда Иоав, вернувшись, сразил двенадцать тысяч эдомитян в Соляной долине59:2 См. 2 Цар. 8; 10; 1 Лет. 18–19..

3Ты отверг нас, Всевышний, и сокрушил;

Ты был в гневе – вернись к нам снова!

4Ты заставил землю дрожать и расколол её;

исцели её раны – она содрогается.

5Ты послал Своему народу безотрадные времена;

Ты напоил нас вином, от которого нас шатает.

6Но для тех, кто Тебя боится,

поднял Ты знамя,

чтобы они, собравшись к нему,

стали для лука недосягаемы59:6 Или: «собрались к нему ради истины».. Пауза

7Сохрани нас Своей правой рукой и ответь нам59:7 Или: «мне».,

чтобы спаслись возлюбленные Тобой.

8Всевышний обещал в Своём святилище:

«Я разделю, торжествуя, город Шехем

и долину Суккот размерю для Своего народа59:8 Шехем здесь представляет всю территорию на западе от реки Иордан, а долина Суккот – на востоке..

9Мой Галаад и Мой Манасса,

Ефраим – Мой шлем,

Иуда – Мой скипетр59:9 Галаад – земля на востоке от Иордана. Роду Манассы принадлежали земли как на востоке, так и на западе от реки, а родам Ефраима и Иуды – северная и южная части земли на западе от Иордана. Ефраим и Иуда были наиболее влиятельными родами в Исраиле, а шлем и скипетр символизируют их военную мощь и царскую власть (царь Давуд и его потомки были из рода Иуды)..

10Моав служит Мне умывальной чашей для ног,

Я предъявлю Свои права на Эдом59:10 Букв.: «Я брошу Свою сандалию на Эдом».,

над землёй филистимлян торжествующе воскликну».

11Кто приведёт меня в укреплённый город?

Кто доведёт меня до Эдома?

12Не Ты ли, Всевышний, Который нас отринул

и теперь не выходишь с войсками нашими?

13Окажи нам помощь в борьбе с врагом,

потому что людская помощь бесполезна.

14Со Всевышним мы одержим победу;

Он низвергнет наших врагов.

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 59:1-17

स्तोत्र 59

संगीत निर्देशक के लिये. “अलतशख़ेथ” धुन पर आधारित. दावीद की मिकताम59:0 शीर्षक: शायद साहित्यिक या संगीत संबंधित एक शब्द गीत रचना. यह उस घटना के संदर्भ में है, जब शाऊल ने दावीद का वध करने के उद्देश्य से सैनिक भेज उनके आवास पर घेरा डलवाया था.

1परमेश्वर, मुझे मेरे शत्रुओं से छुड़ा लीजिए;

मुझे उनसे सुरक्षा प्रदान कीजिए, जो मेरे विरुद्ध उठ खड़े हुए हैं.

2मुझे कुकर्मियों से छुड़ा लीजिए

तथा हत्यारे पुरुषों से मुझे सुरक्षा प्रदान कीजिए.

3देखिए, वे कैसे मेरे लिए घात लगाए बैठे हैं!

जो मेरे लिए बुरी युक्ति रच रहे हैं वे हिंसक पुरुष हैं.

याहवेह, न मैंने कोई अपराध किया है और न कोई पाप.

4मुझसे कोई भूल भी नहीं हुई, फिर भी वे आक्रमण के लिए तत्पर हैं.

मेरी दुर्गति पर दृष्टि कर, मेरी सहायता के लिए आ जाइए!

5याहवेह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर,

इस्राएल के परमेश्वर,

इन समस्त राष्ट्रों को दंड देने के लिए उठ जाइए;

दुष्ट विश्‍वासघातियों पर कोई कृपा न कीजिए.

6वे संध्या को लौटते,

कुत्तों के समान चिल्लाते,

और नगर में घूमते रहते हैं.

7आप देखिए कि वे अपने मुंह से क्या-क्या उगल रहे हैं,

उनके ओंठों में से तलवार बाहर आती है,

तब वे कहते हैं, “कौन सुन सकता है हमें?”

8किंतु, याहवेह, आप उन पर हंसते हैं;

ये सारे राष्ट्र आपके उपहास के विषय हैं.

9मेरी शक्ति, मुझे आपके ही उठने की प्रतीक्षा है;

मेरे परमेश्वर, आप मेरे आश्रय-स्थल हैं,

10आप मेरे प्रेममय परमेश्वर हैं.

परमेश्वर मेरे आगे-आगे जाएंगे,

तब मैं अपने निंदकों के ऊपर संतोष के साथ व्यंग्य पूर्ण दृष्टि डाल सकूंगा.

11किंतु मेरे प्रभु, मेरी ढाल, उनकी हत्या न कीजिए,

अन्यथा मेरी प्रजा उन्हें भूल जाएगी.

अपने सामर्थ्य में उन्हें तितर-बितर भटकाने के लिए छोड़ दीजिए,

कि उनमें मनोबल ही शेष न रह जाए.

12उनके मुख के वचन द्वारा किए गए पापों के कारण,

उनके ओंठों द्वारा किए गए अनाचार के लिए

तथा उनके द्वारा दिए गए शाप तथा झूठाचार के कारण,

उन्हें अपने ही अहंकार में फंस जाने दीजिए.

13उन्हें अपनी क्रोध अग्नि में भस्म कर दीजिए,

उन्हें इस प्रकार भस्म कीजिए, कि उनका कुछ भी शेष न रह जाए.

तब यह पृथ्वी के छोर तक सर्वविदित बातें हो जाएगी,

कि परमेश्वर ही वस्तुतः याकोब के शासक हैं.

14वे संध्या को लौटते,

कुत्तों के समान चिल्लाते

और नगर में घूमते रहते हैं.

15वे भोजन की खोज में घूमते रहते हैं

और संतोष न होने पर सियारों जैसे चिल्लाने लगते हैं.

16किंतु मैं आपके सामर्थ्य का गुणगान करूंगा,

प्रातःकाल मेरे गीत का विषय होगा आपका करुणा-प्रेम;

क्योंकि मेरा दृढ़ आश्रय-स्थल आप हैं,

संकट काल में शरण स्थल है.

17मेरा बल, मैं आपका गुणगान करता हूं;

परमेश्वर, आप मेरे आश्रय-स्थल हैं,

आप ही करुणा-प्रेममय मेरे परमेश्वर हैं.