Забур 51 CARS - स्तोत्र 51 HCV

Священное Писание

Забур 51:1-11

Песнь 51

1Дирижёру хора. Наставление Давуда, 2когда эдомитянин Доэг пришёл к Шаулу и сообщил ему: «Давуд в доме Ахи-Малика»51:2 См. 1 Цар. 21–22..

3Что хвалишься злодейством, сильный?

Весь день со мной милость Всевышнего!

4Твой язык замышляет гибель;

он подобен отточенной бритве, о коварный.

5Ты любишь зло больше добра

и ложь – сильнее, чем слова правды. Пауза

6Ты любишь гибельные слова

и язык вероломный.

7Но Всевышний погубит тебя навек;

Он схватит тебя и выкинет прочь из шатра,

исторгнет твой корень из земли живых. Пауза

8Увидят праведники и устрашатся,

посмеются над тобой, говоря:

9«Вот человек,

который не сделал Всевышнего своей крепостью,

а верил в свои сокровища

и укреплялся, уничтожая других».

10А я подобен маслине,

зеленеющей в доме Всевышнего;

я верю в милость Всевышнего

вовеки.

11Буду славить Тебя вовек за сделанное Тобой

и уповать на Тебя,

потому что Ты благ к верным Тебе.

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 51:1-19

स्तोत्र 51

संगीत निर्देशक के लिये. दावीद का एक स्तोत्र. यह उस अवसर का लिखा है जब दावीद ने बैथशेबा से व्यभिचार किया और नबी नाथान ने दावीद का सामना किया था.

1परमेश्वर, अपने करुणा-प्रेम में,

अपनी बड़ी करुणा में;

मुझ पर दया कीजिए,

मेरे अपराधों को मिटा दीजिए.

2मेरी समस्त अधर्म को धो दीजिए

और मुझे मेरे पाप से शुद्ध कर दीजिए.

3मैंने अपने अपराध पहचान लिए हैं,

और मेरा पाप मेरे दृष्टि पर छाया रहता है.

4वस्तुतः मैंने आपके, मात्र आपके विरुद्ध ही पाप किया है,

मैंने ठीक वही किया है, जो आपकी दृष्टि में बुरा है;

तब जब आप अपने न्याय के अनुरूप दंड देते हैं,

यह हर दृष्टि से न्याय संगत एवं उपयुक्त है.

5इसमें भी संदेह नहीं कि मैं जन्म के समय से ही पापी हूं,

हां, उसी क्षण से, जब मेरी माता ने मुझे गर्भ में धारण किया था.

6यह भी बातें है कि आपकी यह अभिलाषा है, कि हमारे आत्मा में सत्य हो;

तब आप मेरे अन्तःकरण में भलाई प्रदान करेंगे.

7जूफ़ा पौधे की टहनी से मुझे स्वच्छ करें, तो मैं शुद्ध हो जाऊंगा;

मुझे धो दीजिए, तब मैं हिम से भी अधिक श्वेत हो जाऊंगा.

8मुझमें हर्षोल्लास एवं आनंद का संचार कीजिए;

कि मेरी हड्डियां जिन्हें आपने कुचल दिया है, मगन हो उठें.

9मेरे पापों को अपनी दृष्टि से दूर कर दीजिए

और मेरे समस्त अपराध मिटा दीजिए.

10परमेश्वर, मुझमें एक शुद्ध हृदय को उत्पन्न कीजिए,

और मेरे अंदर में सुदृढ़ आत्मा की पुनस्थापना कीजिए.

11मुझे अपने सान्निध्य से दूर न कीजिए

और न मुझसे आपके पवित्रात्मा को न छीनिए.

12अपनी उद्धार का उल्लास मुझमें पुन: संचारित कीजिए,

और एक तत्पर आत्मा प्रदान कर मुझमें नवजीवन का संचार कीजिए.

13तब मैं अपराधियों को आपकी नीतियों की शिक्षा दे सकूंगा,

कि पापी आपकी ओर पुन: फिर सकें.

14परमेश्वर, मेरे छुड़ानेवाला परमेश्वर,

मुझे रक्तपात के दोष भाव से मुक्त कर दीजिए,

कि मेरी जीभ आपकी धार्मिकता का स्तुति गान कर सके.

15प्रभु, मेरे ओंठों को खोल दीजिए,

कि मेरे मुख से आपकी स्तुति-प्रशंसा हो सके.

16आपकी प्रसन्नता बलियों में नहीं है, अन्यथा मैं बलि अर्पित करता,

अग्निबलि भी आपको प्रसन्न नहीं.

17टूटी आत्मा ही परमेश्वर के लिए उपयुक्त बलि है;

टूटा और पछताया हुआ हृदय को,

हे परमेश्वर, आप घृणा नहीं करते हैं.

18ज़ियोन की समृद्धि पर आपकी कृपादृष्टि हो,

येरूशलेम की शहरपनाह का पुनर्निर्माण हो.

19तब धर्मी की अग्निबलि

तथा सर्वांग पशुबलि अर्पण से आप प्रसन्न होंगे;

और आपकी वेदी पर बैल अर्पित किए जाएंगे.