Забур 49 CARS - स्तोत्र 49 HCV

Священное Писание

Забур 49:1-23

Песнь 49

Песнь Асафа.

1Вечный – Бог богов;

Он говорит и призывает народы земли,

от востока и до запада.

2С Сиона, совершенного красотой,

Всевышний являет Свой свет.

3Наш Бог шествует и не останется безмолвным.

Перед Ним пожирающий огонь,

и вокруг Него сильная буря.

4Он призывает небеса сверху и землю

быть свидетелями Его суда над Своим народом:

5«Соберите ко Мне всех, кто верен Мне,

кто заключил со Мной соглашение при жертве».

6И небеса возвещают о праведности Его,

потому что Сам Всевышний – судья. Пауза

7«Слушай, народ Мой, Я буду говорить;

Исраил, Я буду против тебя свидетельствовать.

Я – Всевышний, твой Бог.

8Не за жертвы твои Я тебя корю –

твои всесожжения всегда предо Мною.

9Мне не нужен ни бык из твоих загонов,

ни козлы из твоих дворов,

10ведь все звери в лесу – Мои,

и скот на тысяче гор.

11Я знаю всех птиц в горах

и всё, что живёт в полях.

12Даже если бы Я был голоден, то не сказал бы тебе,

ведь Мне принадлежит мир

и всё, что наполняет его.

13Разве Я ем мясо быков

или пью козлиную кровь?

14Принеси хвалу в жертву Всевышнему49:14 Или: «Принеси Всевышнему жертву благодарности»; то же в ст. 23.

и исполни свои обеты перед Высочайшим.

15И тогда призови Меня в день бедствия,

и Я спасу тебя, а ты прославишь Меня».

16Но нечестивому Всевышний говорит:

«Как ты смеешь возвещать Мои законы

и говорить о Моём соглашении?

17Ты ненавидишь Моё наставление

и отвергаешь Мои повеления.

18Увидев вора, ты с ним сближаешься,

и водишь дружбу с неверными мужьями.

19Ты даёшь злословить своим устам,

и язык твой сплетает ложь.

20Ты всегда обвиняешь брата,

клевещешь на сына матери твоей.

21Ты творил это, а Я молчал;

ты решил, что Я такой же, как ты.

Но Я обличу тебя

и в глаза тебя обвиню.

22Запомните это, забывающие о Всевышнем,

или Я растерзаю вас,

и не будет для вас спасителя.

23Приносящий Мне в жертву хвалу чтит Меня;

тому, кто идёт по праведному пути,

Я явлю спасение Всевышнего».

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 49:1-20

स्तोत्र 49

संगीत निर्देशक के लिये. कोराह के पुत्रों की रचना. एक स्तोत्र.

1विभिन्न देशों के निवासियों, यह सुनो;

धरती के वासियों, यह सुनो,

2सुनो अरे उच्च और निम्न,

सुनो अरे दीन जनो, धनिकों,

3मैं बुद्धिमानी की बातें करने पर हूं;

तथा मेरे हृदय का चिंतन समझ से परिपूर्ण होगा.

4मैं नीतिवचन पर ध्यान दूंगा;

मैं किन्नोर की संगत पर पहेली स्पष्ट करूंगा:

5क्या आवश्यकता है विपत्ति के समय मेरे भयभीत होने की,

जब मेरे शत्रुओं के अपराध मुझे आ घेरते हैं;

6हां, वे जिनका भरोसा उनकी संपत्ति पर है,

तथा जिन्हें अपनी सम्पन्नता का गर्व है?

7कोई भी मनुष्य किसी अन्य मनुष्य के प्राणों का उद्धार नहीं कर सकता,

और न ही वह परमेश्वर को किसी के प्राणों के मूल्य के रूप में कुछ दे सकता है.

8कोई भी किसी भी उपाय से अपने भाई को छुड़ा नहीं सकता,

अथवा उसके लिए परमेश्वर को कोई मोल दे सकता है—क्योंकि उसके प्राणों का मूल्य अत्यंत ऊंचा है.

उत्तम हो कि वह इसके लिए प्रयास करना ही छोड़े

9कि वह मनुष्य सर्वदा जीवित रहे,

कि वह कभी कब्र का अनुभव न करे.

10सभी के सामने यह स्पष्ट है, कि सभी बुद्धिमानो की भी मृत्यु होती है;

वैसे ही मूर्खों और अज्ञानियों की भी,

ये सभी अपनी संपत्ति दूसरों के लिए छोड़ जाते हैं.

11उनके आत्मा में उनका विचार है, कि उनके आवास अमर हैं,

तथा उनके निवास सभी पीढ़ियों के लिए हो गए हैं,

वे तो अपने देशों को भी अपने नाम से पुकारने लगे हैं.

12अपने ऐश्वर्य के बावजूद मनुष्य अमरत्व प्राप्त नहीं कर सकता;

वह तो फिर भी नश्वर पशु समान ही है.

13यह नियति उनकी है, जो बुद्धिहीन हैं तथा उनकी,

जो उनके विचारों से सहमत होते हैं.

14भेड़ों के समान अधोलोक ही उनकी नियति है;

मृत्यु ही उनका चरवाहा होगी.

प्रातःकाल सीधे उन पर शासन करेंगे

तथा उनकी देह अधोलोक की ग्रास हो जाएंगी,

परिणामस्वरूप उनका कोई आधार शेष न रह जाएगा.

15मेरे प्राण परमेश्वर द्वारा अधोलोक के सामर्थ्य से मुक्त किए जाएंगे;

निश्चयतः वह मुझे स्वीकार कर लेंगे.

16किसी पुरुष की विकसित होती जा रही समृद्धि को देख डर न जाना,

जब उसकी जीवनशैली वैभवशाली होने लगे;

17क्योंकि मृत्यु होने पर वह इनमें से कुछ भी अपने साथ नहीं ले जाएगा,

उसका वैभव उसके साथ कब्र में नहीं उतरेगा.

18यद्यपि जब वह जीवित था,

उसने प्रशंसा ही प्राप्त की, क्योंकि मनुष्य ऊंचा होते पुरुष की प्रशंसा करते ही हैं,

19वह पुरुष अन्ततः अपने पूर्वजों में ही जा मिलेगा,

जिनके लिए जीवन प्रकाश देखना नियत नहीं है.

20उत्तरोत्तर समृद्ध होता जा रहा पुरुष अपनी सुबुद्धि खो बैठता है.

तब उसमें और उस पशु में कोई अंतर नहीं रह जाता जिसे वध के लिए अलग किया गया है.