Забур 44 CARS - स्तोत्र 44 HCV

Священное Писание

Забур 44:1-18

Песнь 44

1Дирижёру хора. На мотив «Лилии». Наставление потомков Кораха. Свадебная песня.

2Сердце моё полнится прекрасной речью.

Для царя исполняю я эту песнь;

мой язык – перо искусного писаря.

3Ты прекраснее всех людей;

благодатная речь сходит с твоих уст,

ведь Всевышний навеки благословил тебя.

4Могучий, препояшься мечом,

облекись в славу и величие.

5И величия полон, победоносно поезжай верхом

ради истины, смирения и праведности.

Пусть рука твоя вершит грозные подвиги.

6Пусть острые стрелы твои пронзают сердца врагов царя;

пусть народы падут под ноги твои.

7О Боже, Твой престол вечен44:7 Или: «Вечен твой престол, что дан тебе Всевышним». В этом случае здесь на первый план выходит обращение к исраильскому царю, прообразу Масиха, и, значит, последующие местоимения будут писаться со строчной буквы.,

и справедливость – скипетр Твоего Царства.

8Ты возлюбил праведность, а беззаконие возненавидел;

поэтому Всевышний, Твой Бог, возвысил Тебя над другими,

помазав44:8 Посредством обряда помазания человек посвящался на определённое служение. Такого помазания удостаивались пророки, цари и священнослужители. Тебя при великой радости44:7-8 Эти слова являются пророчеством об Исе Масихе (см. Евр. 1:8-9)..

9Благоухают твои одежды миррой, алоэ и кассией44:9 Мирра (смирна) – приятно пахнущая смола растущего в Аравии растения. Алоэ – источающее ароматную смолу дерево, родиной которого является Индокитай, использовалось как благовоние, а также при бальзамировании. Не имеет ничего общего с общеизвестным обыкновенным алоэ. Кассия – разновидность корицы..

Из дворцов, украшенных костью слоновой,

музыка струн тебя веселит.

10Среди твоих почётных гостей – царские дочери.

По правую руку от тебя – царица в золоте из Офира.

11Выслушай, дочь, обдумай и прислушайся:

забудь свой народ и дом отца твоего.

12Царь возжелает твоей красоты,

покорись ему – он твой господин.

13Жители Тира придут с дарами,

богатейшие из народа будут искать твоей милости.

14Внутри покоев прекрасна невеста, дочь царя;

её одежда золотом расшита.

15В многоцветной одежде выводят её к царю;

девушки, её подруги, ведутся к тебе вслед за ней.

16Их ведут с весельем и радостью;

они вступают в царский дворец.

17Место предков твоих, о царь, займут твои сыновья;

по всей земле вождями ты их поставишь.

18Я сделаю памятным имя твоё в поколениях,

и народы будут славить тебя вовек.

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 44:1-26

स्तोत्र 44

संगीत निर्देशक के लिये. कोराह के पुत्रों की रचना. एक मसकील.44:0 शीर्षक: शायद साहित्यिक या संगीत संबंधित एक शब्द

1परमेश्वर, प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों के समय में आपने जो कुछ किया है,

पूर्वजों के द्वारा उसका लेखा हमने अपने कानों से सुना है.

2अपने भुजबल से आपने राष्ट्रों को निकाल दिया

और उनके स्थान पर हमारे पूर्वजों को बसा दिया;

आपने उन लोगों को कुचल दिया

और हमारे पूर्वजों को समृद्ध बना दिया.

3यह अधिकार उन्होंने अपनी तलवार के बल पर नहीं किया,

और न ही यह उनके भुजबल का परिणाम था;

यह परिणाम था आपके दायें हाथ,

उसके सामर्थ्य तथा आपके मुख के प्रकाश का,

क्योंकि वे आपके प्रिय पात्र थे.

4मेरे परमेश्वर, आप मेरे राजा हैं,

याकोब की विजय का आदेश दीजिए.

5आपके द्वारा ही हम अपने शत्रुओं पर प्रबल हो सकेंगे;

आप ही की महिमामय नाम से हम अपने शत्रुओं को कुचल डालेंगे.

6मुझे अपने धनुष पर भरोसा नहीं है,

मेरी तलवार भी मेरी विजय का साधन नहीं है;

7हमें अपने शत्रुओं पर विजय आपने ही प्रदान की है,

आपने ही हमारे शत्रुओं को लज्जित किया है.

8हम निरंतर परमेश्वर में गर्व करते रहे,

हम सदा-सर्वदा आपकी महिमा का धन्यवाद करते रहेंगे.

9किंतु अब आपने हमें लज्जित होने के लिए शोकित छोड़ दिया है;

आप हमारी सेना के साथ भी नहीं चल रहे.

10आपके दूर होने के कारण, हमें शत्रुओं को पीठ दिखानी पड़ी.

यहां तक कि हमारे विरोधी हमें लूटकर चले गए.

11आपने हमें वध के लिए निर्धारित भेड़ों समान छोड़ दिया है.

आपने हमें अनेक राष्ट्रों में बिखेर दिया है.

12आपने अपनी प्रजा को मिट्टी के मोल बेच दिया,

और ऊपर से आपने इसमें लाभ मिलने की भी बात नहीं की.

13अपने पड़ोसियों के लिए अब हम निंदनीय हो गए हैं,

सबके सामने घृणित एवं उपहास पात्र.

14राष्ट्रों में हम उपमा होकर रह गए हैं;

हमारे नाम पर वे सिर हिलाने लगते हैं.

15सारे दिन मेरा अपमान मेरे सामने झूलता रहता है,

तथा मेरी लज्जा ने मुझे भयभीत कर रखा है.

16उस शत्रु की वाणी, जो मेरी निंदा एवं कलंकित करता है,

उसकी उपस्थिति के कारण जो शत्रु तथा बदला लेनेवाले है.

17हमने न तो आपको भुला दिया था,

और न हमने आपकी वाचा ही भंग की;

फिर भी हमें यह सब सहना पड़ा.

18हमारे हृदय आप से बहके नहीं;

हमारे कदम आपके मार्ग से भटके नहीं.

19फिर भी आपने हमें उजाड़ कर गीदड़ों का बसेरा बना दिया;

और हमें गहन अंधकार में छिपा दिया.

20यदि हम अपने परमेश्वर को भूल ही जाते

अथवा हमने अन्य देवताओं की ओर हाथ बढ़ाया होता,

21क्या परमेश्वर को इसका पता न चल गया होता,

उन्हें तो हृदय के सभी रहस्यों का ज्ञान होता है?

22फिर भी आपके निमित्त हम दिन भर मृत्यु का सामना करते रहते हैं;

हमारी स्थिति वध के लिए निर्धारित भेड़ों के समान है.

23जागिए, प्रभु! सो क्यों रहे हैं?

उठ जाइए! हमें सदा के लिए शोकित न छोड़िए.

24आपने हमसे अपना मुख क्यों छिपा लिया है

हमारी दुर्दशा और उत्पीड़न को अनदेखा न कीजिए?

25हमारे प्राण धूल में मिल ही चुके हैं;

हमारा पेट भूमि से जा लगा है.

26उठकर हमारी सहायता कीजिए;

अपने करुणा-प्रेम के निमित्त हमारा उद्धार कीजिए.