Забур 40 CARS - स्तोत्र 40 HCV

Священное Писание

Забур 40:1-14

Песнь 40

1Дирижёру хора. Песнь Давуда.

2Благословен тот, кто заботится о слабом40:2 Или: «о бедном».:

во время беды избавит его Вечный.

3Вечный сохранит его и сбережёт ему жизнь,

счастьем одарит его на земле

и не отдаст его на произвол врагов.

4Вечный укрепит его во время болезни

и поднимет его с ложа недуга.

5Я сказал: «Вечный, помилуй меня;

исцели меня – я пред Тобой согрешил».

6Враги мои со злобой говорят обо мне:

«Когда же умрёт он и погибнет имя его?»

7Если приходит кто навестить меня,

то ложь говорит, а в сердце своём слагает злые слухи;

потом он выходит и всем их рассказывает.

8Все враги мои шепчутся против меня,

думают худшее обо мне40:8 Или: «зло замышляют против меня».:

9«Смертельный недуг его одолел;

он слёг и больше ему не встать».

10Даже близкий друг, на которого я полагался,

тот, кто ел мой хлеб,

пошёл против меня40:10 См. Ин. 13:18, 21-27..

11Но Ты, Вечный, помилуй меня;

подними меня, и я воздам им!

12Из того я узнаю, что угоден Тебе,

если не одолеет меня враг мой,

13а меня Ты поддержишь за непорочность мою

и навеки поставишь пред Собою.

Заключительное благословение первой книги

14Хвала Вечному, Богу Исраила,

от века и до века!

Аминь и аминь!

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 40:1-17

स्तोत्र 40

संगीत निर्देशक के लिये. दावीद की रचना. एक स्तोत्र.

1मैं धैर्यपूर्वक याहवेह की प्रतीक्षा करता रहा;

उन्होंने मेरी ओर झुककर मेरा रोना सुना.

2उन्होंने मुझे सत्यानाश गड्ढे में से बचा लिया,

दलदल और कीच के गड्ढे से निकाल;

उन्होंने मुझे एक चट्टान पर ले जा खड़ा कर दिया

अब मेरे पांव स्थिर स्थान पर है.

3उन्होंने मुझे हमारे परमेश्वर के स्तवन में,

एक नए गीत को सिखाया.

अनेक यह देखेंगे, श्रद्धा-भय-भाव से भयभीत हो जाएंगे

और याहवेह में विश्वास करेंगे.

4धन्य है वह पुरुष,

जो याहवेह पर भरोसा रखता है,

जो अभिमानियों से कोई आशा नहीं रखता, अथवा उनसे,

जो झूठे देवताओं के शरण में हैं.

5याहवेह, मेरे परमेश्वर,

आपके द्वारा किए गए चमत्कार चिन्ह अनेक-अनेक हैं,

और हमारे लिए आपके द्वारा योजित योजनाएं.

आपके तुल्य कोई भी नहीं है;

यदि मैं उनका वर्णन करना प्रारंभ भी करूं,

तो उनके असंख्य होने के कारण उनका लिखा करना असंभव होगा.

6आपको बलि और भेंट की कोई अभिलाषा नहीं,

किंतु आपने मेरे कान खोल दिए.

आपने अग्निबलि और पापबलि की भी चाहत नहीं की.

7तब मैंने यह कहा, “देखिए मैं आ रहा हूं;

पुस्तिका में यह मेरे ही विषय में लिखा है.

8मेरे परमेश्वर, मुझे प्रिय है आपकी ही इच्छापूर्ति;

आपकी व्यवस्था मेरे हृदय में बसी है.”

9विशाल सभा में मैंने आपके धर्ममय शुभ संदेश का प्रचार किया है;

देख लीजिए, याहवेह, आप जानते हैं

कि मैं इस विषय में चुप न रहूंगा.

10मैंने अपने परमेश्वर की धार्मिकता को अपने हृदय में ही सीमित नहीं रखा;

मैं आपकी विश्वासयोग्यता तथा आपके द्वारा प्रदान किए गए उद्धार की चर्चा करता रहता हूं.

विशाल सभा के सामने

मैं आपके सत्य एवं आपके करुणा-प्रेम को छुपाता नहीं.

11याहवेह, आप अपनी कृपा से मुझे दूर न करिये;

आपका करुणा-प्रेम तथा आपकी सत्यता निरंतर मुझे सुरक्षित रखेंगे.

12मैं असंख्य बुराई से घिर चुका हूं; मेरे अपराधों ने बढ़कर मुझे दबा दिया है;

परिणामस्वरूप अब मैं देख भी नहीं पा रहा.

ये अपराध संख्या में मेरे सिर के बालों से भी अधिक हैं,

मेरा साहस अब टूटा जा रहा है.

13याहवेह, कृपा कर मुझे उद्धार प्रदान कीजिए;

याहवेह, तुरंत मेरी सहायता कीजिए.

14वे, जो मेरे प्राणों के प्यासे हैं,

लज्जित और निराश किए जाएं;

वे जिनका आनंद मेरी पीड़ा में है,

पीठ दिखाकर भागे तथा अपमानित किए जाएं.

15वे सभी, जो मेरी स्थिति को देख, “आहा! आहा!”

कर रहे हैं, अपनी ही लज्जास्पद स्थिति को देख विस्मित हो जाएं.

16किंतु वे सभी, जो आपकी खोज करते हैं

हर्षोल्लास में मगन हों;

वे सभी, जिन्हें आपके उद्धार की आकांक्षा है, यही कहें,

“उच्चासन पर बसा हों याहवेह!”

17प्रभु, मैं गरीब और ज़रूरतमंद हूं;

इस कारण मुझ पर कृपादृष्टि कीजिए.

आप ही मेरे सहायक तथा छुड़ानेवाला हैं;

मेरे परमेश्वर, अब विलंब न कीजिए.