Забур 39 CARS - स्तोत्र 39 HCV

Священное Писание

Забур 39:1-18

Песнь 39

(Заб. 69)

1Дирижёру хора. Песнь Давуда.

2Твёрдо надеялся я на Вечного,

и Он склонился ко мне и услышал мой крик о помощи.

3Он поднял меня из страшной пропасти,

из зыбкой трясины.

Он поставил ноги мои на камень

и стопы мои утвердил.

4Он вложил мне в уста новую песнь –

хвалу нашему Богу.

Увидят многие и устрашатся,

и будут на Вечного уповать.

5Благословен тот, кто надежду свою возлагает на Вечного,

кто не обращается к гордым

и к уклоняющимся ко лжи.

6О Вечный, мой Бог,

как многочисленны сотворённые Тобой чудеса

и замыслы Твои о нас!

Никто с Тобой не сравнится!

Я бы стал возвещать о них и рассказывать,

но их больше, чем можно счесть.

7Не захотел Ты ни жертв, ни даров,

но Ты открыл39:7 Или: «проколол». Ср. Исх. 21:5-6. мне уши39:7 Или: «Ты приготовил тело для меня»..

Ты не потребовал ни всесожжения,

ни жертвы за грех.

8Тогда я сказал: «Вот я иду,

как и написано в книге Таурат обо мне.

9Бог мой, я желаю исполнить волю Твою,

и в сердце моём Твой Закон».

10В большом собрании я возвещал Твою праведность;

я не удерживал своих уст –

Ты это знаешь, Вечный.

11Я не скрыл Твоей праведности в своём сердце,

но возвещал верность Твою и спасение.

Я не таил Твою милость и истину

перед большим собранием.

12Не удерживай, Вечный,

милости Твоей от меня;

пусть любовь Твоя и истина

охраняют меня непрестанно.

13Ведь беды меня окружили, и нет им числа;

овладели мной грехи мои, и не могу я видеть.

Их больше, чем волос на моей голове;

храбрость меня оставила.

14Вечный, да будет угодно Тебе избавить меня!

Поспеши мне на помощь, Вечный!

15Пусть все, кто желает моей смерти,

будут пристыжены и посрамлены.

Пусть все, кто хочет моей погибели,

в бесчестии повернут назад.

16Пусть ужаснутся своему позору

говорящие мне: «Ага! Ага!»

17Пусть ликуют и радуются о Тебе

все ищущие Тебя.

Пусть те, кто любит Тебя за Твоё спасение,

всегда говорят: «Велик Вечный!»

18Я же беден и нищ,

пусть Владыка позаботится обо мне.

Ты – помощь моя и мой избавитель;

Бог мой, не замедли!

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 39:1-13

स्तोत्र 39

संगीत निर्देशक के लिये. यदूथून के लिए. दावीद का एक स्तोत्र.

1मैंने निश्चय किया, “मैं पाप करने से अपने आचरण

एवं जीभ से अपने बोलने की चौकसी करूंगा;

यदि मैं दुष्टों की उपस्थिति में हूं,

मैं अपने वचनों पर नियंत्रण रखूंगा.”

2तब मैंने मौन धारण कर लिया,

यहां तक कि मैंने उपकार पर भी नियंत्रण लगा दिया,

तौभी मेरी व्याकुलता बढती चली गई;

3भीतर ही भीतर मेरा हृदय जलता गया

और इस विषय पर अधिक विचार करने पर मेरे भीतर अग्नि भड़कने लगी;

तब मैंने अपना मौन तोड़ दिया और जीभ से बोल उठा:

4“याहवेह, मुझ पर मेरे जीवन का अंत प्रकट कर दीजिए.

मुझे बताइए कि कितने दिन शेष हैं मेरे जीवन के;

मुझ पर स्पष्ट कीजिए कि कितना है मेरा क्षणभंगुर जीवन.

5आपने मेरी आयु क्षणिक मात्र ही निर्धारित की है;

आपकी तुलना में मेरी आयु के वर्ष नगण्य हैं.

वैसे भी मनुष्य का जीवन-श्वास मात्र ही होता है.

6“एक छाया के समान, जो चलती-फिरती रहती है;

उसकी सारी भाग दौड़ निरर्थक ही होती है.

वह धन संचित करता जाता है, किंतु उसे यह ज्ञात ही नहीं होता, कि उसका उपभोग कौन करेगा.

7“तो प्रभु, अब मैं किस बात की प्रतीक्षा करूं?

मेरी एकमात्र आशा आप ही हैं.

8मुझे मेरे समस्त अपराधों से उद्धार प्रदान कीजिए;

मुझे मूर्खों की घृणा का पात्र होने से बचाइए.

9मैं मूक बन गया; मैंने कुछ भी न कहना उपयुक्त समझा,

क्योंकि आप उठे थे.

10अब मुझ पर प्रहार करना रोक दीजिए;

आपके प्रहार से मैं टूट चुका हूं.

11मनुष्यों द्वारा किए गए अपराध के लिए आप उन्हें ताड़ना के साथ दंड देते हैं,

आप उनकी अमूल्य संपत्ति ऐसे नष्ट कर देते हैं, मानो उसे कीड़ा खा गया.

निश्चयतः मनुष्य मात्र एक श्वास है.

12“याहवेह, मेरी प्रार्थना सुनिए,

मेरी सहायता की पुकार पर ध्यान दीजिए;

मेरे आंसुओं की अनसुनी न कीजिए.

मैं अल्पकाल के लिए आपका परदेशी हूं,

ठीक जिस प्रकार मेरे समस्त पूर्वज प्रवासी थे.

13इसके पूर्व कि मैं चला जाऊं, अपनी कोपदृष्टि मुझ पर से हटा लीजिए,

कि कुछ समय के लिए ही मुझे आनंद का सुख प्राप्त हो सके.”