Забур 32 CARS - स्तोत्र 32 HCV

Священное Писание

Забур 32:1-22

Песнь 32

1Радуйтесь, праведные, о Вечном!

Честным подобает Его хвалить.

2Под звуки арфы хвалите Вечного,

играйте Ему на лире десятиструнной!

3Пойте Ему новую песнь;

играйте искусно, восклицая от радости!

4Ведь Вечный выполняет Свои обещания;

Он верен во всём, что делает.

5Вечный любит праведность и справедливость;

Его любовью полна земля.

6Словом Вечного сотворены небеса,

повелением из уст Его – звёздное воинство.

7Он воды морей собрал, как в сосуд32:7 Или: «словно груды».,

положил пучины в хранилища.

8Пусть боится Вечного вся земля;

пусть трепещут пред Ним все жители мира,

9потому что Он сказал – и стало,

Он повелел – и явилось.

10Вечный разрушает советы людей

и уничтожает замыслы народов.

11Но советы Вечного пребудут вовек,

замыслы сердца Его – из поколения в поколение.

12Благословен народ, для которого Вечный – Бог,

народ, что Он избрал Себе в наследие.

13Взирает Вечный с небес

и видит весь род человеческий.

14Он смотрит со Своего престола

на всех, кто живёт на земле, –

15Он, Кто создал их сердца

и вникает во всё, что они творят.

16Не спасёт царя огромное войско;

не спасёт воина великая сила.

17Ненадёжен конь для спасения:

не спасёт он своею мощью.

18Но глаза Вечного обращены на тех, кто Его боится,

кто надеется на Его милость,

19чтобы от смерти их спасти

и прокормить во время голода.

20Мы надеемся на Вечного;

Он нам помощь и щит.

21В нём ликуют наши сердца,

ведь мы уповаем на святое имя Его.

22Да будет любовь Твоя с нами, Вечный,

ведь мы на Тебя надеемся.

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 32:1-11

स्तोत्र 32

दावीद की मसकील32:0 शीर्षक: शायद साहित्यिक या संगीत संबंधित एक शब्द गीत रचना

1धन्य हैं वे,

जिनके अपराध क्षमा कर दिए गए,

जिनके पापों को ढांप दिया गया है.

2कैसा धन्य है वह पुरुष,

जिसे याहवेह अपराधी नहीं मानते,

तथा जिसके हृदय में कोई कपट नहीं है.

3जब तक मैंने अपना पाप छिपाए रखा,

दिन भर कराहते रहने के कारण,

मेरी हड्डियां क्षीण होती चली गई,

4क्योंकि दिन-रात

आपका हाथ मुझ पर भारी था;

मेरा बल मानो ग्रीष्मकाल की

ताप से सूख गई.

5तब मैंने अपना पाप अंगीकार किया,

मैंने अपना अपराध नहीं छिपाया.

मैंने निश्चय किया,

“मैं याहवेह के सामने अपने अपराध स्वीकार करूंगा.”

जब मैंने आपके सामने अपना पाप स्वीकार किया

तब आपने मेरे अपराध का दोष क्षमा किया.

6इसलिये आपके सभी सात्विक,

जब तक संभव है आप से प्रार्थना करते रहें.

तब, जब संकट का प्रबल जल प्रवाह आएगा,

वह उनको स्पर्श न कर सकेगा.

7आप मेरे आश्रय-स्थल हैं;

आप ही मुझे संकट से बचाएंगे

और मुझे उद्धार के विजय घोष से घेर लेंगे.

8याहवेह ने कहा, मैं तुम्हें सदबुद्धि प्रदान करूंगा तथा उपयुक्त मार्ग के लिए तुम्हारी अगुवाई करूंगा;

मैं तुम्हें सम्मति दूंगा और तुम्हारी रक्षा करता रहूंगा.

9तुम्हारी मनोवृत्ति न तो घोड़े समान हो, न खच्चर समान,

जिनमें समझ ही नहीं होती.

उन्हें तो रास और लगाम द्वारा नियंत्रित करना पड़ता है,

अन्यथा वे तुम्हारे निकट नहीं आते.

10दुष्ट अपने ऊपर अनेक संकट ले आते हैं,

किंतु याहवेह का करुणा-प्रेम

उनके सच्चे लोगों को घेरे हुए उसकी सुरक्षा करता रहता है.

11याहवेह में उल्‍लासित होओ और आनंद मनाओ, धर्मियों गाओ;

तुम सभी, जो सीधे मनवाले हो, हर्षोल्लास में जय जयकार करो!