Забур 143 CARS - स्तोत्र 143 HCV

Священное Писание

Забур 143:1-15

Песнь 143

Песнь Давуда.

1Хвала Вечному, Скале моей,

Который обучает мои руки войне

и мои пальцы – битве.

2Он – Бог, милующий меня,

крепость моя и прибежище моё,

избавитель мой и щит мой,

Тот, на Кого я уповаю,

Кто подчиняет мне мой народ.

3Вечный, кто такой человек, что Ты знаешь о нём,

и смертный, что Ты обращаешь на него внимание?

4Человек подобен дуновению ветра;

дни его – как уходящая тень.

5Вечный, приклони небеса и сойди;

коснись гор – и задымятся они.

6Пошли молнию и рассей моих врагов;

выпусти Свои стрелы и смети их.

7Протяни руку Свою с высоты;

избавь меня и спаси

от великих вод,

от рук чужеземцев,

8которые никогда не говорят правду

и лгут, даже когда клянутся, подняв правую руку.

9Новую песню воспою Тебе, Всевышний,

на десятиструнной лире сыграю Тебе –

10Тому, Кто даёт победу царям,

избавляет Давуда, Своего раба, от смертоносного меча.

11Избавь меня и спаси

от рук чужеземцев,

которые никогда не говорят правду

и лгут, даже когда клянутся, подняв правую руку.

12Пусть будут наши сыновья

подобны молодым разросшимся растениям;

пусть будут наши дочери

подобны стройным колоннам во дворцах;

13да будут наши житницы полны,

богаты всяким зерном;

да будут на наших пастбищах

тысячи, десятки тысяч овец;

14да будут жиреть наши волы;

да не будет ни расхищения, ни пропажи143:14 Или: «да не будет ни разрушения стен, ни плена».,

ни воплей на наших улицах.

15Благословен тот народ, у которого всё так и есть;

благословен тот народ, чей Бог – Вечный!

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 143:1-12

स्तोत्र 143

दावीद का एक स्तोत्र.

1याहवेह, मेरी प्रार्थना सुन लीजिए,

कृपा करके मेरे गिड़गिड़ाने पर ध्यान दीजिए;

अपनी सच्चाई में, अपनी धार्मिकता में

मुझे उत्तर दीजिए.

2अपने सेवक का न्याय कर उसे दंड न दीजिए,

क्योंकि आपके सामने कोई भी मनुष्य धर्मी नहीं है.

3शत्रु मेरा पीछा कर रहा है,

उसने मुझे कुचलकर मेरे प्राण धूल में मिला दिए हैं.

उसने मुझे ऐसे अंधकार में ला बैठाया है,

जैसा दीर्घ काल से मृत पुरुष के लिए होता है.

4मैं पूर्णतः दुर्बल हो चुका हूं;

मेरे हृदय को भय ने भीतर ही भीतर भयभीत कर दिया है.

5मुझे प्राचीन काल स्मरण आ रहा है;

आपके वे समस्त महाकार्य मेरे विचारों का विषय हैं,

आपके हस्तकार्य मेरे मनन का विषय हैं.

6अपने हाथ मैं आपकी ओर बढ़ाता हूं;

आपके लिए मेरी लालसा वैसी है जैसी शुष्क वन में एक प्यासे पुरुष की होती है.

7याहवेह, शीघ्र ही मुझे उत्तर दीजिए;

मेरी आत्मा दुर्बल हो चुकी है.

अपना मुख मुझसे छिपा न लीजिए

अन्यथा मेरी भी नियति वही हो जाएगी, जो उनकी होती है, जो कब्र में समा जाते हैं.

8मैंने आप पर ही भरोसा किया है,

तब अरुणोदय मेरे लिए आपके करुणा-प्रेम का संदेश लेकर आए.

मुझे मेरे लिए निर्धारित मार्ग पर चलना है वह बताइए,

क्योंकि मेरे प्राणों की पुकार आपके ही और लगी है.

9मुझे मेरे शत्रुओं से छुड़ा लीजिए याहवेह,

आश्रय के लिए मैं दौड़ा हुआ आपके निकट आया हूं.

10मुझे अपनी इच्छा के आज्ञापालन की शिक्षा दीजिए,

क्योंकि मेरे परमेश्वर आप हैं;

आपका धन्य आत्मा

मुझे धर्म पथ की ओर ले जाए.

11याहवेह, स्वयं अपनी महिमा के निमित्त मेरे प्राणों का परिरक्षण कीजिए;

अपनी धार्मिकता में मेरे प्राणों को संकट से बचा लीजिए.

12अपनी करुणा-प्रेम में मेरे शत्रुओं की हत्या कीजिए;

मेरे समस्त विरोधियों को भी नष्ट कर दीजिए,

क्योंकि मैं आपका सेवक हूं.