Забур 139 CARS - स्तोत्र 139 HCV

Священное Писание

Забур 139:1-14

Песнь 139

1Дирижёру хора. Песнь Давуда.

2Избавь меня, Вечный, от злых людей,

сохрани меня от жестоких.

3Они замышляют зло в сердце,

постоянно готовы к войне.

4Изощряют свой язык, как змея;

у них на губах яд гадюки. Пауза

5Сохрани меня, Вечный, от рук нечестивых,

огради от жестоких,

желающих поколебать мои стопы.

6Высокомерные спрятали силки для меня и петли,

разложили сеть по дороге,

расставили для меня западню. Пауза

7Я сказал Вечному: «Ты – мой Бог;

услышь голос моих молений, Вечный!

8Владыка Вечный, сила моего спасения,

Ты прикрыл мою голову в день сражения.

9Вечный, не исполняй желания нечестивых,

не дай успеха их замыслу,

чтобы они не возгордились». Пауза

10Пусть падёт на голову окруживших меня несчастье,

которое вызвали их собственные уста.

11Пусть падут на них горящие угли;

пусть будут они повержены в огонь,

в глубокую пропасть, откуда не подняться им.

12Пусть не утвердится на земле злоязычный человек;

пусть зло преследует жестоких на погибель им.

13Я знаю, что Вечный даст правосудие бедным

и заступится за нищих.

14Поистине, праведные будут славить Твоё имя;

честные будут жить в Твоём присутствии.

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 139:1-24

स्तोत्र 139

संगीत निर्देशक के लिये. दावीद की रचना. एक स्तोत्र.

1याहवेह, आपने मुझे परखा है,

और जान लिया है.

2मैं कब उठता हूं और मैं कब बैठता हूं, यह सब आपको ज्ञात रहता है;

दूरदर्शिता में आप मेरे विचारों को समझ लेते हैं.

3आप मेरे आने जाने और विश्रान्ति का परीक्षण करते रहते हैं;

तथा मेरे समस्त आचार-व्यवहार से आप भली-भांति परिचित हैं.

4इसके पूर्व कि कोई शब्द मेरी जीभ पर आए,

याहवेह, आप, उसे पूरी-पूरी रीति से जान लेते हैं.

5आप मुझे आगे-पीछे, चारों ओर से घेरे रहते हैं,

आपका हाथ सदैव मुझ पर स्थिर रहता है.

6आपका ज्ञान मेरी परख-शक्ति से सर्वथा परे हैं,

मैं इसकी जानकारी लेने में स्वयं को पूर्णतः कमजोर पाता हूं.

7आपके आत्मा से बचकर मैं कहां जा सकता हूं?

आपकी उपस्थिति से बचने के लिए मैं कहां भाग सकता हूं?

8यदि मैं स्वर्ग तक आरोहण करूं तो आप वहां हैं;

यदि मैं अधोलोक में जा लेटूं, आप वहां भी हैं.

9यदि मैं ऊषा के पंखों पर बैठ दूर उड़ चला जाऊं,

और समुद्र के दूसरे तट पर बस जाऊं,

10वहां भी आपका हाथ मेरा अगुवाई करेगा,

आपका दायां हाथ मुझे थामे रहेगा.

11यदि मैं यह विचार करूं, “निश्चयतः मैं अंधकार में छिप जाऊंगा

और मेरे चारों ओर का प्रकाश रात्रि में बदल हो जाएगा,”

12अंधकार भी आपकी दृष्टि के लिए अंधकार नहीं;

आपके लिए तो रात्रि भी दिन के समान ज्योतिर्मय है,

आपके सामने अंधकार और प्रकाश एक समान हैं.

13आपने ही मेरे आन्तरिक अंगों की रचना की;

मेरी माता के गर्भ में आपने मेरी देह की रचना की.

14मैं आपके प्रति कृतज्ञ हूं, क्योंकि आपने मेरी रचना भयानक एवं अद्भुत ढंग से की है;

आश्चर्य हैं आपके कार्य,

मेरे प्राणों को इसका पूर्ण बोध है.

15मेरी ढांचा उस समय आपके लिए रहस्य नहीं थी

जब सभी अवस्था में मेरा निर्माण हो रहा था,

जब मैं पृथ्वी की गहराइयों में जटिल कौशल में तैयार किया जा रहा था.

16आपकी दृष्टि मेरे विकास-उन्मुख भ्रूण पर थी;

मेरे लिए निर्धारित समस्त दिनों का कुल लेखा आपके ग्रंथ में अंकित था

जबकि वे उस समय अस्तित्व में भी न थे.

17परमेश्वर, मेरे लिए निर्धारित आपकी योजनाएं कितनी अमूल्य हैं!

कितना विशाल है उनका कुल योग!

18यदि मैं उनकी गणना प्रारंभ करूं,

तो वे धूल के कणों से भी अधिक होंगी.

जब मैं जागता हूं, आपको अपने निकट पाता हूं.

19परमेश्वर, अच्छा होता कि आप दुष्ट की हत्या कर देते!

हे रक्त पिपासु, दूर हो जाओ मुझसे!

20ये वे हैं, जो आपके विरुद्ध कुयुक्ती की बातें करते हैं;

आपके ये शत्रु आपका नाम गलत ढंग से लेते हैं.

21याहवेह, क्या मुझे भी उनसे घृणा नहीं है, जिन्हें आप से घृणा है?

क्या आपके शत्रु मेरे लिए भी घृणास्पद नहीं हैं?

22उनके प्रति मेरी घृणा अखण्ड है;

वे मेरे भी शत्रु हैं.

23परमेश्वर, परीक्षण करके मेरे हृदय को पहचान लीजिए;

मुझे परखकर मेरे विचारों को जान लीजिए.

24यह देखिए कि मुझमें कहीं कोई बुराई प्रवृत्ति तो नहीं है,

अनंत काल के मार्ग पर मेरी अगुवाई कीजिए.