Забур 106 CARS - स्तोत्र 106 HCV

Священное Писание

Забур 106:1-43

Пятая книга

Песнь 106

1Славьте Вечного, потому что Он благ

и милость Его – навеки!

2Пусть скажут так избавленные Им,

те, кого Он избавил от руки врага

3и собрал из разных земель –

с востока, с запада, с севера и с юга106:3 Букв.: «с моря»..

4Одни из них блуждали в пустыне по безлюдным дорогам

и не нашли города, в котором могли бы поселиться.

5Они голодали и жаждали,

и томилась их душа.

6Но воззвали они к Вечному в своём несчастье,

и Он освободил их от бедствий.

7Повёл их прямым путём в город,

где они могли поселиться.

8Да славят Вечного за Его милость

и за Его чудеса, сотворённые для людей,

9ведь Он утолил душу жаждущую

и душу голодную насытил благами.

10Другие сидели в кромешной тьме,

несчастные узники в железных оковах,

11потому что восстали против слов Всевышнего

и пренебрегли советом Высочайшего.

12Поэтому Он смирил их сердце тяжёлым трудом;

они падали, и некому было помочь.

13Тогда воззвали они к Вечному в своём несчастье,

и Он спас их от бедствий.

14Вывел их из кромешной тьмы,

сломав их оковы.

15Да славят Вечного за Его милость

и за Его чудеса, сотворённые для людей,

16ведь Он сокрушил бронзовые ворота

и сломал железные засовы.

17А безрассудные страдали за свои грехи

и за своё беззаконие.

18От всякой пищи отвращалась душа их,

и они приближались к воротам смерти.

19Тогда воззвали они к Вечному в своём несчастье,

и Он спас их от бедствий.

20Послал Своё слово и излечил их,

избавил их от гибели.

21Да славят Вечного за Его милость

и за Его чудеса, сотворённые для людей;

22да приносят Ему жертвы благодарения

и говорят о делах Его с радостью.

23Некоторые ходили на судах в море,

трудились в больших водах.

24Видели и они дела Вечного,

Его чудеса в пучине.

25Он говорил, и восстал штормовой ветер,

поднимая высокие волны.

26Корабли восходили до небес и низвергались в бездну;

душа моряков таяла в бедствии.

27Они кружились и шатались, как пьяные,

и вся мудрость их исчезла.

28Но воззвали они к Вечному в своём несчастье,

и Он вывел их из бедствий.

29Он превратил бурю в штиль,

и умолкали морские волны.

30Обрадовались люди, что волны утихли,

и привёл Он их к желаемой гавани.

31Да славят Вечного за Его милость

и за Его чудеса, сотворённые для людей;

32да превозносят Его в народном собрании

и хвалят Его в кругу старейшин.

33Он превращает реки в пустыню,

источники вод – в сушу,

34а плодородную землю – в солончак

за нечестие живущих на ней.

35Он превращает пустыню в озеро

и иссохшую землю – в источники вод.

36Он поселяет в ней голодных,

и они строят там город,

в котором могут поселиться;

37засевают поля и насаждают виноградники,

которые приносят обильные плоды.

38Он благословляет их, и они весьма размножаются;

не позволяет Он их стадам уменьшаться.

39Но когда народ убывает,

когда он унижен из-за угнетения, бедствия и скорби,

40тогда Всевышний изливает презрение на вождей

и заставляет их блуждать в пустыне, где нет путей.

41Бедного же Он возвышает из нищеты

и умножает его род, как стадо овец.

42Праведники видят это и радуются,

а нечестивые закрывают свои уста.

43Кто мудр – да уразумеет всё это

и поймёт милость Вечного.

Hindi Contemporary Version

स्तोत्र 106:1-48

स्तोत्र 106

1याहवेह की स्तुति हो!

याहवेह का धन्यवाद करो-वे भले हैं;

उनकी करुणा सदा की है.

2किसमें क्षमता है याहवेह के महाकार्य को लिखने की

अथवा उनका तृप्त स्तवन करने की?

3प्रशंसनीय हैं वे, जो न्याय का पालन करते हैं,

जो सदैव वही करते हैं, जो न्याय संगत ही होता है.

4याहवेह, जब आप अपनी प्रजा पर कृपादृष्टि करें, तब मुझे स्मरण रखिए,

जब आप उन्हें उद्धार दिलाएं, तब मेरा भी ध्यान रखें.

5कि मैं आपके चुने हुओं की समृद्धि देख सकूं,

कि मैं आपके राष्ट्र के आनंद में उल्‍लासित हो सकूं,

कि मैं आपके निज भाग के साथ गर्व कर सकूं.

6हमने अपने पूर्वजों के समान पाप किए हैं;

हमने अपराध किया है, हमारे आचरण में अधर्म था.

7जब हमारे पूर्वज मिस्र देश में थे,

उन्होंने आपके द्वारा किए गए आश्चर्य कार्यों की गहनता को मन में ग्रहण नहीं किया;

उनके लिए आपकी करुणा-प्रेम में किए गए वे अनेक हितकार्य नगण्य ही रहे,

सागर, लाल सागर के तट पर उन्होंने विद्रोह कर दिया.

8फिर भी परमेश्वर ने अपनी महिमा के निमित्त उनकी रक्षा की,

कि उनका अतुलनीय सामर्थ्य प्रख्यात हो जाए.

9परमेश्वर ने लाल सागर को डांटा और वह सूख गया;

परमेश्वर उन्हें उस गहराई में से इस प्रकार लेकर आगे बढ़ते गए मानो वे वन की मार्ग पर चल रहे हों.

10परमेश्वर ने शत्रुओं से उनकी सुरक्षा की;

उन्हें शत्रुओं के अधिकार से मुक्त कर दिया.

11उनके प्रतिरोधी जल में डूब गए;

उनमें से एक भी जीवित न रहा.

12तब उन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास किया

और उनकी वंदना की.

13किंतु शीघ्र ही वह परमेश्वर के महाकार्य को भूल गए.

यहां तक कि उन्होंने परमेश्वर के निर्देशों की प्रतीक्षा भी नहीं की.

14जब वे वन में थे, वे अपने अनियन्त्रित आवेगों में बह गए;

उजाड़ क्षेत्र में उन्होंने परमेश्वर की परीक्षा ली.

15तब परमेश्वर ने उनकी अभिलाषा की पूर्ति कर दी;

इसके अतिरिक्त परमेश्वर ने उन पर महामारी भेज दी.

16मंडप निवासकाल में वे मोशेह

और अहरोन से, जो याहवेह के अभिषिक्त थे, डाह करने लगे.

17तब भूमि फट गई और दाथान को निगल गई;

अबिराम के दल को उसने गाड़ दिया.

18उनके अनुयायियों पर अग्निपात हुआ;

आग ने कुकर्मियों को भस्म कर दिया.

19होरेब पर्वत पर उन्होंने बछड़े की प्रतिमा ढाली

और इस धातु प्रतिमा की आराधना की.

20उन्होंने परमेश्वर की महिमा का विनिमय

उस बैल की प्रतिमा से कर लिया, जो घास चरता है.

21वह उस परमेश्वर को भूल गए, जिन्होंने उनकी रक्षा की थी,

जिन्होंने मिस्र देश में असाधारण कार्य किए थे,

22हाम के क्षेत्र में आश्चर्य कार्य

तथा लाल सागर के तट पर भयंकर कार्य किए थे.

23तब परमेश्वर ने निश्चय किया, कि वह उन्हें नष्ट कर देंगे.

वह उन्हें नष्ट कर चुके होते यदि परमेश्वर के चुने मोशेह उनके

और परमेश्वर के सत्यानाश प्रकोप के मध्य आकर

जलजलाहट को ठंडा न करते.

24इसके बाद इस्राएलियों ने उस सुखदायी भूमि को निकम्मी समझा;

उन्होंने परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर विश्वास नहीं किया.

25अपने-अपने तंबुओं में वे कुड़कुड़ाते रहे.

उन्होंने याहवेह की आज्ञाएं नहीं मानीं.

26तब याहवेह ने शपथ खाई,

कि वह उन्हें वन में ही मिटा देंगे,

27कि वह उनके वंशजों को अन्य राष्ट्रों के मध्य नष्ट कर देंगे

और उन्हें समस्त पृथ्वी पर बिखरा देंगे.

28उन्होंने पओर के देवता बाल की पूजा-अर्चना की.

उन्होंने उस बलि में से खाया, जो निर्जीव देवताओं को अर्पित की गई थी.

29अपने अधर्म के द्वारा उन्होंने याहवेह के क्रोध को भड़का दिया,

परिणामस्वरूप उनके मध्य महामारी फैल गई.

30तब फिनिहास ने सामने आकर मध्यस्थ का कार्य किया,

और महामारी थम गई.

31उनकी इस भूमिका को पीढ़ी से पीढ़ी के लिए

युक्त घोषित किया गया.

32मेरिबाह जलाशय के निकट उन्होंने याहवेह के कोप को भड़काया,

उनके कारण मोशेह पर संकट आ पड़ा,

33क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के आत्मा के विरुद्ध बलवा किया था,

और मोशेह ने बिन सोचे शब्द बोल डाले थे.

34याहवेह के आदेश के अनुरूप

उन्होंने उन लोगों की हत्या नहीं कि,

35परंतु वे अन्य राष्ट्रों से घुल-मिल गए

और उन्होंने उनकी प्रथाएं भी अपना लीं.

36उन्होंने उनकी प्रतिमाओं की आराधना की,

जो उनके लिए फंदा बन गई.

37उन्होंने अपने पुत्र-पुत्रियों को प्रेतों

के लिए बलि कर दिया.

38उन्होंने निर्दोषों का रक्त बहाया,

अपने ही पुत्रों और पुत्रियों का रक्त,

जिनकी उन्होंने कनान देश की प्रतिमाओं को बलि अर्पित की,

और उनके रक्त से भूमि दूषित हो गई.

39अपने कार्यों से उन्होंने स्वयं को भ्रष्ट कर डाला;

उन्होंने अपने ही कार्यों के द्वारा विश्वासघात किया.

40ये सभी वे कार्य थे, जिनके कारण याहवेह अपने ही लोगों से क्रोधित हो गए

और उनको अपना निज भाग उनके लिए घृणास्पद हो गया.

41परमेश्वर ने उन्हें अन्य राष्ट्रों के अधीन कर दिया,

उनके विरोधी ही उन पर शासन करने लगे.

42उनके शत्रु उन पर अधिकार करते रहे

और उन्हें उनकी शक्ति के सामने समर्पण करना पड़ा.

43कितनी ही बार उन्होंने उन्हें मुक्त किया,

किंतु वे थे कि वे विद्रोह करने पर ही सामर्थ्यी थे,

तब वे अपने ही अपराध में नष्ट होते चले गए.

44किंतु उनका संकट परमेश्वर की दृष्टि में था.

तब उन्होंने उनकी पुकार सुनी;

45उनके कल्याण के निमित्त परमेश्वर ने अपनी वाचा का स्मरण किया

और अपने करुणा-प्रेम के परिणामता में परमेश्वर ने उन पर कृपा की.

46परमेश्वर ने उनके प्रति, जिन्होंने उन्हें बंदी बना रखा था,

उनके हृदय में कृपाभाव उत्पन्न कर किया.

47याहवेह, हमारे परमेश्वर, हमारी रक्षा कीजिए,

और हमें विभिन्न राष्ट्रों में से एकत्र कर लीजिए,

कि हम आपके पवित्र नाम के प्रति आभार व्यक्त कर सकें

और आपका स्तवन हमारे गर्व का विषय बन जाए.

48आदि से अनंत काल तक धन्य हैं.

याहवेह, इस्राएल के परमेश्वर,

इस पर सारी प्रजा कहें, “आमेन,”

याहवेह की स्तुति हो.